ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
[ १७ ] पशु हो जाता है। यही पशु जीव आणव, कार्म और मायीय इन मलों से युक्त रहता है। ज्ञान स्वरूप को छिपानेवाला आणवमल है जिस में जीव अणुमात्र अर्थात् संकुचितरूप को प्राप्त हो जाता है। जन्म और भोग को देनेवाला मायीयमल है और माया-शक्ति द्वारा कर्ता की अज्ञानता में कार्यमल रहता है। शून्यादि प्रमा- ताओं को प्रलयाकल से पुकारा है इनमें कार्यमल तो रहता ही है किन्तु मायीय विकल्प से रहता है। विज्ञेश्वर लोग वेद्य को भिन्न रूप से देखते है जैसे तन्तुवाय वस्त्र की दृष्टि से अत्यन्त भिन्न ही उसे देखता है इसलिए विज्ञेश्वरों में मायामल का सम्बन्ध माना जाता है। इस प्रकार पशु जीव और देव त्रिविधमल से युक्त होते हैं। संसार के लिए एक मात्र कारण कार्यमल को माना गया है। इस प्रकार यह छत्तीस तत्त्व से युक्त विश्व भगवान् सच्चिदानन्द देव की प्राणादि शक्तियों के रूप में स्थित है। भगवान् परम शिव प्राण-अपान, समान, उदान और व्यानरूप से सम्पूर्ण पशु जीवों में उल्लासपूर्वक प्रवेश करने के कारण प्रलयाकल, विज्ञानाकल आदि विविध रूपों में विभक्त हो जाते हैं। ‘स्वात्मैव सर्वजन्तूनामेक एव महेश्वरः ।’ सम्पूर्ण जड-जङ्गम प्राणियों का आत्मा महेश्वर ही है और वह गगनवत् व्याप्त है। यह सारा का सारा वैभव मेरा ही है इस प्रकार जाननेवाले का विमर्श दृढ़ हो जाने पर जीवन्मुक्त हो जाता है। अर्वाचीन युग के महर्षि श्री गोपालशास्त्री दर्शनकेशरी के आशीर्वाद से इस ग्रन्थ को नया रूप प्राप्त हुआ है एवं यह कार्य पूर्ण हुआ है। साहित्यवेदान्ताचार्य श्रीवंशपति द्विवेदी एम. ए., एवं डॉ० श्री चन्द्रकान्त द्विवेदी के हार्दिक प्रोत्साहन से मेरा मनोबल सदैव बढा है। भारतीय संस्कृत- संस्कृति में उत्कृष्ट श्रद्धा-भावना रखनेवाले मफतलालग्रुप एवं हमारे सेवक-मण्डल ने इस ग्रन्थ के प्रकाशन के लिए धनराशि व्यय की है। स्वच्छ मुद्रणकार्य के लिए प्रेस के अध्यक्ष श्री पं० विश्वम्भरनाथ द्विवेदी को धन्यवाद । भगवान् परम शिव इन लोगों का कल्याण करें । कृष्णानन्दसागर.
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ॐ नमः सच्चिदानन्दाय अथ ईश्वरप्रत्यभिज्ञा महामाहेश्वराचार्यवर्यश्रीमदुत्पलदेवाचार्यविरचिता श्रीमदभिनवगुप्ताचार्यवर्यविरचित- विमर्शिनी- व्याख्यासंवलिता अथ प्रथमः ज्ञानाधिकारः अथ प्रथमे ज्ञानाधिकारे उपोद्घाताख्यं प्रथममाह्निकम् निराशंसात्पूर्णादहमिति पुरा भासयति यद्- द्विशाखामाशास्ते तदनु च विभङ्क्तुं निजकलाम् । स्वरूपादुन्मेषप्रसरणनिमेषस्थिति Call/जुषस्- तदद्वैतं वन्दे परमशिवशक्त्यात्मनिखिलम् ॥ १ ॥ सर्वदर्शनाचार्य-श्रीकृष्णानन्दसागर-विरचिता हिन्दी-व्याख्या शिवरञ्जनी सृष्टि के पूर्व 'अहम्' परमशिव परिपूर्णरूप होने के कारण किसी भी प्रकार की आकांक्षा से रहित होकर भासता रहा है; और उसके बाद में अपनी स्वातन्त्र्यशक्ति को विभक्त करने के लिए दो शाखाओं [ 'अहमिदम्' सदाशिव-ईश्वर ] को जो अव्यक्तरूप में रही उसे व्यक्त करने की इच्छा की। अपने चिन्मय स्वरूप से उन्मेष-फैलाव और निमेष-स्थिति से युक्त; उस परमशिवशक्तिरूप अखिल अद्वैत की हमलोग वन्दना करते हैं ॥ १ ॥ १. शुद्ध चिन्मय स्वभाव वाले परमशिव ही परिपूर्ण अपने स्वरूप में रहे; इसीलिए किसी भी तरह की इच्छा न रखते हुए अपनी स्वातन्त्र्य शक्ति की महिमा से एवं परमानन्द चमत्कार के तारतम्य से बाहर की ओर उल्लसित होने की इच्छा की; जो कि सृष्टि के आदि में 'अहम्' इस परामर्शरूप से विस्फुरित
२ ] ईश्वर्प्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-१, का.-१ श्रीत्रैयम्बकसद्वंशमध्यमुक्तामयस्थितेः । श्रीसोमानन्दनाथस्य विज्ञानप्रतिबिम्बकम् ॥ २ ॥ अनुत्तरानन्यसाक्षिपुमर्थोपायमभ्यधात् । ईश्वरप्रत्यभिज्ञाख्यं यः शास्त्रं यत्सुनिर्मलम् ॥ ३ ॥ श्री त्र्यम्बक के विशिष्ठगुणों वाले वंश के मध्य में रखे गये मुक्तामणि के सदृश श्रीसोमानन्द- पाद विराजमान रहें ॥ २ ॥ अनुत्तर, स्वसंवित्, अनन्यसाक्षी एवं मोक्ष का उपाय दिखाने वाला जो अत्यन्त निर्मल शैव आगम रहस्य ‘शिवदृष्टिाशास्त्र’ है उसे आचार्य उत्पलदेव ने ‘ईश्वरप्रत्यभिज्ञा’ के रूप में विरचित किया है ॥ ३ ॥ होते रहे और उसके बाद ‘अहम्’ और ‘इदम्’ परामर्शरूप इन दो शाखाओं को भासित किया। एवं शुद्ध चिन्मय के अधिकरण ‘अहम्’ अंश में ही जब परमेश्वर ‘इदम्’ अंश को उल्लसित करते हैं, तब तो उसका पदार्थों में खींचे गये चित्र के तुल्य ही मात्र अस्फुट स्वरूप रहता है इसी कारण सदाशिव तत्त्व कहलाता है। जो कि उसमें इच्छा विशेष रखते हैं, ‘अहमिदम्’ सदाशिव ईश्वर के पदार्थवर्ग में स्फुटित होने पर उसी के ही अधिकरण ‘इदम्’ भाग में ‘अहम्’ भाग को सींचता है, तब फिर उसमें उस समय ज्ञानशक्ति की प्रधानता रहती है इसी को ‘इदमहम्’ ईश्वर तत्त्व कहा जाता है, इसीलिए अहं विमर्श की विशेषता न रहने पर भी ‘इदमहम्’ में ‘इदम्’ भाग की स्फुट और अस्फुट रूप से भी प्रधानता रहती है। जब फिर पदार्थों में बढ़े हुए भेद-भाव वाले ‘इदम्’ अंश की स्फुरण अवस्था में शुद्धचिन्मात्र का उसमें चले जाने पर ‘अहम्’ अंश उल्लासित होता है, तब तो फिर द्वैतवादियों के ईश्वर के समान ‘समधृत तुला’ न्याय से शुद्ध विद्या तत्त्व में ‘अहम्’ और ‘इदम्’ ये दोनों परामर्श समान होते हैं, जैसे तुला के दोनों पलड़े। जिस अभेद ज्ञान की भूमिका में समान स्फुट रूप से ‘अहम् और इदम्’ रूप प्रकाश में अंशों का जो प्रत्यवमर्श होता है उसका नाम ही शुद्ध विद्या है। इस दशा में क्रिया- शक्ति की प्रधानता रहती है। मंत्र और विद्येश्वर इसके प्रमाता है। ‘अहम्’ ऐसा ही परामर्श होगा; जिसमें क्रिया शक्ति की प्रधानता रहती है—इसलिए इसे विद्या तत्त्व कहा जाता है। यद्यपि परमशिव का ही यह सारा ऐश्वर्य है तो भी उसका ही यह सारा का सारा स्वरूप बाहर की ओर जिस तरह से दिखायी देता है वही शक्तितत्त्व का व्यापार है। उसी प्रकार सदाशिव और ईश्वर में भी विद्यातत्त्व रहता है। इस प्रकार किसी भी प्रकार की आकांक्षा न रखते हुए अहन्ता-इदन्ता के प्रतिभास न रहने पर भी बाहर की ओर सृष्टि शक्ति के उन्मेष और निमेष रूप अवस्था के तारतम्य से उद्भासनरूप चमत्कार करने वाले और वहाँ पर अपने अन्तर्गत जो शक्तिभाग है उसका शिवभाग से पृथक् भासन करना ही प्रसरण कहलाता है जिसका शिव आदि से लेकर पृथिवी तत्त्व तक संचार होता रहता है और अपने अन्तर भाग में मिला देने से निमेष स्थिति कहलाती है। एवं चिदानन्दमय अपने स्वरूप से अभिन्नरूप होने के कारण पूर्ण अहन्ता के उद्भासन करने में स्वातन्त्र्य शक्ति रूप अपनी कला को भासित करने के लिए सदाशिव और ईश्वर इन दोनों स्वरूपों की इच्छा प्रकट की। अर्थात् अपनी स्वातन्त्र्य शक्ति से ही यह सारा-का-सारा विश्व बिना किसी सामग्री
१. ज्ञान अधिकार: प्रत्यक्ष, स्मृति, अपोहन एवं ईश्वर-ज्ञान शक्ति प्रतिपादन
अ.-१, आ.-१, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ३ तत्प्रशिष्यः करोम्येतां तत्सूत्रविवृतिं लघुम् । बुद्ध्वाभिनवगुप्तोऽहं श्रीमल्लक्ष्मणगुप्ततः ॥ ४ ॥ वृत्त्या तात्पर्यं टीकया तद्विचारः सूत्रेष्वेतेषु ग्रन्थकारेण दृब्धम् । तस्मात्सूत्रार्थं मन्दबुद्धीन्प्रतीत्थं सम्यग्व्याख्यास्ये प्रत्यभिज्ञाविविक्तयै ॥ ५ ॥ सर्वत्रालपमतौ यद्वा कुत्रापि सुमहाधियि । न वान्यत्रापि तु स्वात्मन्येषा स्यादुपकारिणी ॥ ६ ॥ ग्रन्थकारः अपरोक्षात्मनि दृष्टशक्तिकां परमेश्वरतन्मयतां परत्र संचिक्रमिषिषुः, स्वता- दात्म्यसमर्पणपूर्वम् अविघ्नेन तत्सम्पत्तिं मन्यमानः, परमेश्वरोत्कर्षप्रह्वतापरामर्शशेषतया परमेश्वरतादात्म्ययोग्यतापादनबुद्ध्या प्रयोजनम् आसूत्रयति— श्री उत्पलदेव के शिष्य श्री लक्ष्मणगुप्त से उक्त ईश्वरप्रत्यभिज्ञा दर्शनशास्त्र का अध्ययन कर, मैं श्री आचार्य उत्पलदेव का प्रशिष्य अभिनवगुप्त ईश्वरप्रत्यभिज्ञा की, सूत्ररूप कारिकाओं की विवृत्ति ( टीका ) का निर्माण करता हूँ ॥ ४ ॥ यहाँ पर वृत्ति शब्द से तात्पर्य लेना है एवं टीका से उसका विचार ग्रहण करना होगा । ग्रन्थकार ने स्वयं इसे सूत्ररूपी कारिकाओं में गूँथ दिया है । मतिमन्द लोगों को इस शास्त्र का ठीक-ठीक बोध हो जाये इसीलिए हम इसका विवेचन प्रत्यभिज्ञा की व्याख्या करते समय करेंगे ॥ ५ ॥ ईश्वर प्रत्यभिज्ञा को लेकर विमर्शिनी नामक व्याख्या की जा रही है; इससे सर्वसामान्य मन्दमति को या कहीं, किसी भी प्रतिभाशाली को या अन्यत्र दूसरों को लाभ न भी हो; किन्तु 'स्वान्तःसुखाय' अपने आपके लिए उपकार करनेवाली तो अवश्य होगी ॥ ६ ॥ जिसकी अपरोक्षरूप में शक्ति दृढ़तया देखी हुई है उस परमेश्वर की तन्मयता का दूसरे लोगों में भी संक्रमण हो जाय, अपने आप में परमेश्वर की तादात्म्यस्थिति समर्पित कर निर्विघ्नरूप से प्राप्त होनेवाली परमेश्वर की सम्पत्ति का अनुभव करते हुए, परमेश्वर सम्बन्धी प्रकर्षगुणों का श्रद्धा भावपूर्वक परामर्श करते हुए, उसके साथ तादात्म्यभाव प्राप्त करना ही एकमात्र प्रयोजन है इसको ग्रन्थकर्ता सूत्ररूप में कहते हैं— की अपेक्षा रखते हुए स्व-स्वरूप से अभिन्न होने पर भी भिन्न दर्पण में दिखायी पड़ने वाली नगरी के समान चित्र-विचित्र रंग-ढंग से मिला हुआ भासता है । भिन्न-भिन्न रूपों वाले पदार्थों में व्यक्त हो जाना ही द्वैत कहलाता है और जिसमें द्वैत भाव का अभाव हो वही अद्वैत है, वस्तुतः अहन्ता और इदन्ता से रहित जो ज्ञान है वही अद्वैत ज्ञान है । अथवा दो प्रकार से प्राप्त होता हो, उसमें होने वाले को द्वैत कहते हैं; संशय-विपर्ययादि ज्ञान से वर्जित अद्वैत ज्ञान है, संपूर्ण विश्व पर निर्भर होकर देहादि परिमित प्रमातृभावरूप कलंक को दबाकर, मैं उस परमशिव तत्त्व में प्रवेश करता हूँ—ऐसा कहना ही अद्वैत है ।
४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-१, का.-१ कथंचिदासाद्य महेश्वरस्य दास्यं¹ जनस्याप्युपकारमिच्छन् । समस्तसंपत्समवाप्तिहेतुं तत्²प्रत्यभिज्ञामुपपादयामि ॥ १ ॥ इह परमेश्वरं प्रति या इयं कायवाङ्मनसां तदेकविषयतानियोजनालक्षणा प्रह्वता सा नमस्कारस्य अर्थः । सा च तथा कर्तुम् उचिता प्रामाणिकस्य भवति, यदि सर्वतो नमस्करणीयस्य उत्कर्षं पश्येत् । अन्यथा युक्तिम् अपरामृशतः अपरमार्थरूपेऽपि नमस्कारोद्यतस्य सांसारिक- पशुजनमध्यपातित्वमेव । यथोक्तम् 'न विन्दन्ति परं देवं विद्यारागेण रञ्जिताः।' इति । किसी प्रकार अनायासरूप से महेश्वर की दासता प्राप्त होकर दूसरे लोगों को भी प्राप्त हो जाये—ऐसे उपकार की भावना रखते हुए, जो समस्त सम्पत्ति की प्राप्ति में कारण है, मैं उस ईश्वरप्रत्यभिज्ञा का कारिका के रूप में विस्तार करता हूँ ॥ १ ॥ इस प्रत्यभिज्ञाशास्त्र में परमेश्वर के प्रति मन, वाणी और शरीर की एक-विषयाकाररूप से वृत्ति का होना ही उसमें नम्रीभाव है । नमस्कार करने का अर्थ भी वही है, प्रामाणिक- जनों के लिए ऐसी श्रद्धा भक्ति का रखना ही समुचित माना जाता है । सब जगह यदि नमस्कार करने के अर्थ को ही उत्कर्षरूप में देखेंगे तभी ठीक होता है अन्यथा ठीक नहीं होता, क्योंकि जो उचित ढंग से विचार विमर्श करनेवाले नहीं हैं, अर्थात् परमार्थरूप नहीं है उस में भी उनका नमस्कार होने लगेगा । जैसा कि सांसारिक पशुजनों का नमस्कार होता है । कहा भी १. जिसको स्वामी के द्वारा यथेष्ट-अभीष्ट पदार्थ प्राप्त हो जाता है वही दास है [ दीयते स्वामिना यदभि- लषितमिति दासः ] अपने इष्टदेव की सेवा-शुश्रूषा में विभोर हो जाना ही दास्यभाव है इसकी व्युत्पत्ति है 'दास + ष्यञ्, दास्य = दासता । किन्तु इस प्रसङ्ग में महाफल का आस्वादन कर लेना ही दासता है । यह लौकिक दासता नहीं है । जिसमें दासता को हीन-दीन समझा जाता है । इसमें तो ईश्वर तदात्मता प्राप्त करना ही दासता कही गयी है और ईश्वर सम्बन्धी उत्कर्ष भी इसी का नाम है । दासता के कारण ही ईश्वर तत्त्व की उपलब्धि होती है और उसी ईश्वरपद माहेश्वर्य में विश्रान्ति भी प्राप्त कर लेते हैं । २. प्रत्यभिज्ञा शब्द का अर्थ अपने स्वरूप की पहचान करना होता है । इस अपार संसार में आकर जीवात्मा अपने स्वरूप को भूल जाता है । देह, इन्द्रिय, आदि को अज्ञान के कारण अपना स्वरूप मान बैठता है कि मैं देहरूप हूँ । स्थूल, कृश, युवा, सुन्दर इत्यादि अनित्य धर्मों को नित्य मान लेता है । यह शास्त्र स्व-स्वरूप की पहचान कराता है इसलिए इसका नाम प्रत्य- भिज्ञा शास्त्र [ दर्शन ] पड़ा है । इसकी व्युत्पत्ति ऐसी है कि प्रत्यभिज्ञायते उपायभावेन प्रत्यभिज्ञापदं प्राप्यते, अनया इति, अनेन शास्त्रेण इति । प्रति + अभि + ज्ञा + अङ् + टाप् = प्रत्यभिज्ञा जानना इस अर्थ में निष्पन्न है । प्रति शब्द का अर्थ होता है प्रतीप [ विपरीत-उलटा-प्रतिकूल ] जो वस्तु जैसी है उससे भिन्न समझना- देखना । अभि का अर्थ यह है—अभिमुख-सम्मुख रूप से अर्थात् सुस्पष्ट रूप से । "ज्ञा" का अर्थ है ज्ञान-प्रकाश । हृदय पट में भलीभाँति बोध हो जाना ही प्रत्यभिज्ञा कहलाती है यानी ईश्वर तत्त्व का विस्तृत भाव से अभिमुख प्रकाश हो जाना ही ईश्वर प्रत्यभिज्ञा कहा जाता है ।
अ.-१, आ.-१, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ५ तावति हि मायीयाशुद्धविद्याराग-कलासंचार्यमाणस्य पशुत्वमेव । इतरापेक्षया तु कति- पयाध्वोत्तीर्णतया समुत्कर्षोऽपि स्यात् । तदुक्तम्- 'कस्य नाम करणैरकृत्रिमैः पश्यतस्तव विभूतिमक्षताम् । विभ्रमादवरतोऽपि जायते त्वां व्युदस्य वरद स्तुतिस्पृहा ॥' इति श्रीमद्विद्यापतिना । एतच्च आगमकाण्डे निरूपयिष्यामः । तस्मात् निखिलोत्कर्ष- परामर्शनमपि तत्र स्वीकार्यम् । यद्यपि आयातदृढेश्वरशक्तिपातस्य स्वयमेवेयमिती परमशिव- भूमिरभ्येति हृदयगोचरम्, न तु अत्र स्वात्मीयः पुरुषकारः कोऽपि निर्वहति, सर्वस्य तस्य मायामयत्वेनान्धतमसप्रख्यस्यामायीयं शुद्धप्रकाशं स्वप्रतिद्वन्द्विनं प्रति उपायतानुपपत्तेः तथापि तदेव तथाविधं रूपं प्रख्योपाख्याक्रमेण स्वात्मपरावभासविषयभावजिगमिषया निःशेषोत्कर्ष- विशेषाभिधायि-जयत्यादिशब्दानुवेधेन परामर्शनीयम्, इति नमस्कारे जयत्यर्थ आक्षेप्यः । गया है-"विद्या के राग से रंगे हुए होने के कारण परमदेव का वास्तविरूप नहीं जान पाते हैं।" क्योंकि तब तक मायीय-अशुद्ध विद्या, राग, कला आदि में भ्रमण करने वाले पशुजीव ही कहलाते हैं और इसी में रहना ही एक प्रकार की पशुता मानी जाती है। बौद्धादि की अपेक्षा से तो जरूर कुछ-न-कुछ सांख्यादि लोग मार्ग उत्तीर्ण कर समुत्कर्ष प्राप्त किये हुए हैं। श्री विद्यापति ने इस विषय में ठीक ही कहा है- "हे श्रेष्ठ वस्तु को देनेवाले वरद ! अकृत्रिम इन्द्रियों से किस देखने वाले की तुझे छोड़कर अन्य में स्तुति करने की इच्छा भ्रम से भी हो सकती है ? अर्थात् व्यापक पूर्णदेव को छोड़कर किसी अन्य परिच्छिन्न देवी-देवता में कभी भी भ्रम से भी इच्छा नहीं हो सकती।" इस बात का हम आगम काण्ड में अच्छी तरह निरूपण करेंगे। इसलिए वहाँ पर सम्पूर्ण उत्कर्ष के परामर्श को भी माना हुआ है। ईश्वरसम्बन्धी शक्तिपात दृढरूप से हृदय में हो जाने पर तो अपने आप ही परमशिवभूमि प्राप्त हो जाती है, फिर उसे प्राप्त करने के लिए अन्य कोई भी यत्न करने की आवश्यकता नहीं दीखती, प्रयत्न तो अप्राप्त वस्तु के लिए किया जाता है किन्तु यह तो प्राप्त ही है फिर प्रयत्न क्यों किया जाये ? यहाँ कोई अपना पुरुषार्थ काम नहीं करता है, वह सब मायीय होने के कारण घनोभूत अन्धकार के समान होता है, वह मायीय शुद्ध प्रकाश का प्रतिद्वन्द्वी है वह उसका उपाय कैसे हो सकेगा, तो भी उसी प्रकार से उसीरूप में अपने आपको समझना और दूसरे लोगों को समझाने आदि क्रम से अपने को प्रकाशित करना और दूसरे को प्रकाशित कराना इत्यादि भाव को जनाने की इच्छा से सम्पूर्ण उत्कर्ष विशेष को कहने वाला है, इस विषय को 'जयति' इत्यादि शब्दों से परामर्श करते हैं, इसलिए यहाँ पर नमस्कार अर्थ में 'जयति' शब्द का आक्षेप किया हुआ है। १. अपने स्वरूप का ज्ञान करना प्रख्या कहा जाता है दूसरों को विदित करा देना उपाख्या है । प्रख्या से तो अपने आत्मा के अवभास का विषय बोध हो जाता है, क्योंकि अपने आप से ही अन्तर में प्रस्फुट हुए का विषय ज्ञान कर सकता है । उपाख्या से दूसरों में आभास का विषय बोध होता है । स्पष्ट रूप से उच्चारण किये गये शब्द का अर्थ दूसरों के द्वारा भी ज्ञान का विषय हो जाता है । इस प्रकार क्रमशः समस्त उत्कर्ष परमशिव रूप यह आभास के बिना भी स्वातन्त्र्य ( १-५-६) में आगे कहा गया
६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-१, का.-१ जयपदोदीरणेऽपि तादृशसमुत्कर्षातिशयशालिनि स्वात्मानमप्रह्वीकुर्वाणस्य तटस्थस्य परनमात्मो- पकारित्वम्-इति समुत्कर्षविशेषाक्षिप्त एव नमस्कारोऽवश्यमभ्यन्तरीकार्यः, इत्यनया युक्त्या जय-नमस्कारैकतरप्रक्रमे अन्यतरस्य अर्थाक्षिप्तता अवश्यमङ्गीकर्तव्या। वन्दन-नमन-स्मरण- प्रधानप्रभृतीनामपि नमस्कार-जयत्यर्थमात्रपरमार्थत्वात् इयमेव वर्तनी। अत्रायं पुनर्ग्रन्थकृता तादृक् प्रक्रम आश्रितः, यत्र द्वयमपि इदं स्वशब्दपरामृष्टमेव। एतच्च पदार्थव्याख्यानावसर एव प्रकटीभविष्यति। स्वशब्दपरामर्शश्च सर्वजनहितत्वाद्युक्तियुक्तः, स हि सर्वस्यैव झटिति हृदयंगमः, अर्थाक्षिप्तस्तु कतिचिदेव प्रति स्वप्रतिभोदितवाक्त्वविमर्शसंभवात्, वाक्त्ववावमर्शशून्यस्य च प्रकाशस्याप्रकाशकल्पत्वात्। एतच्च अग्रे स्फुटीभविष्यति। तदनेन अभिप्रायेण प्रसिद्धजय-नमः- प्रभृतिशब्दशय्यानाश्लेषेण इमां सरणिम् अनुसरति स्म ग्रन्थकारः। इह यद्यत्किञ्चित् स्फुरति तत्तद्दृश्यमानेश्वररूपस्वात्मप्रथामात्रं, तत्र तु उपायोपेयभाव- प्रभृतिः कार्यकारणभावोऽपि यथाप्रकाशं परमार्थभूत एव, प्रकाशस्य अनपह्नवनीयत्वात्। यदाह जयपद के उच्चारण करने से वैसे उत्कर्ष वाले परमेश्वर में अपने आपको नम्र विनयशील बनाकर, तटस्थ जो परमात्मा है उसका उपकार करना इसी उत्कर्ष विशेष का आक्षेप ही नमस्कार है। उसको इसके गर्भ में रखना है, इस युक्ति से जय या नमस्कार किसी एक के कहने से भी दूसरे का आक्षेप अर्थात् अवश्य अङ्गीकार करना चाहिए। वन्दन, नमन, स्मरण और ध्यान आदि सभी का नमस्कार पर्यन्त, अर्थ मात्र में ही तात्पर्य है यही इसका मार्ग भी है। ग्रन्थकार पुनः यहाँ पर उसो क्रम का आश्रय लेते हैं, जहाँ पर नमन और उत्कर्ष अपने ही शब्दों से परामृष्ट होते हैं और यह पदार्थों के व्याख्यान करने के अवसर पर प्रकट होंगें। अपने शब्द से परामर्श करना ही सभी लोगों के लिए हितकारी होगा, क्योंकि वह सभी को शीघ्र ही हृदयङ्गम हो जाता है, जिसका अर्थ से आक्षेप किया जाता है वह तो किसी-किसी को ही हो सकता है, अपनी प्रतिभा से वाक्त्व का अवमर्श सम्भव न होने के कारण सबको प्रायः सम्भव नहीं होता जो कि वाक्त्व का परामर्श कर सके, और जो वाक्त्व के अवमर्श से शून्य है उसका प्रकाश तो अन्धकार तुल्य ही है। इस बात को आगे "स्वभावमवभासस्य" (१-५-११) इस स्थल पर स्पष्ट करेंगे। इसी अभिप्राय से प्रसिद्ध, 'जय, नमः', प्रभृति शब्दों की भूमिका से इस बात का अनुसरण ग्रन्थकार ने किया है। [यहाँ पर सूत्र के थोड़े अंश को लेकर परामर्श करते हुए उसके अर्थ का समर्थन करने के लिए दो प्रकार का कार्यकारणभाव दिखाते हैं] इस सूत्र में जो कुछ कार्य कारणभाव विवरण के रूप में झलकाया गया है वह वर्तमान और आगे आनेवाले ईश्वर के स्वरूप का फैलावमात्र है, वहाँ उपाय और उपेयभाव आदि कार्य है इस नीति से अपने और दूसरे की प्रकाश्यता की प्राप्ति के लिए समावेश (समाधि) अवस्था के उपदेशादि में परामर्श करना होगा। १. परामर्श के स्वभाव को जानने वाले अवभास को जानते हैं। विमर्श का अर्थ है कि 'अहम्' ऐसा जो असांकेतिक, स्वातन्त्र्य रूप एवं आत्मविश्रान्ति स्वभाव वाला होता है। तत्त्वज्ञ लोग इसे मन्त्र शरीर श्री मातृका, श्री मालिनी-इत्यादि रूपों में मानते हैं। प्रकाश का मुख्य रूप प्रत्यवमर्श होता है, उसके बिना अर्थ के द्वारा भेद किये गये आकारका मात्र स्वच्छ ही रूप रहता है किन्तु चेतनता नहीं रहती क्योंकि चमत्कार का उसमें अभाव है।
अ.-१, आ.-१, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ७ भट्टदिवाकरवत्सो विवेकाञ्जने 'प्रकाशश्चैष भावानाम्.....' इत्यादि '.....न शापोक्त्या विलीयते ।' इत्यन्तम् । तत्र तु कार्यकारणभावेऽपि क्वचित् परिपूर्णस्वातन्त्र्यलक्षणमाहेश्वर्यानान्तरीयकताक्रोडी- कृतानन्तशक्तिचक्रचुम्बितभावभावितप्रथान्तरव्यवधानं चकास्ति; स तु मायोयत्वेन व्यवस्था- पयिष्यते, जडचेतनाद्यवान्तरभेदशतसम्भिन्नश्च असौ तत्कृतश्च सर्वोऽयं निष्पाद्य-निष्पादकभाव- ज्ञाप्य-ज्ञापकभावावभासो लोकव्यवहाररूपः । यत्र तु शुद्धप्रथात्मकानुत्तरशक्तिशालिनिरर्गल- स्वात्मप्रकाश एव मायोयप्रथान्तरव्यवधानवन्ध्यो निबन्धनं, तत्र तस्यैव भगवतः कारणत्वम् । एष च अनुग्रहलक्षणोऽन्त्यः पञ्चमः पारमेश्वरः कृत्यविशेषः परपुरुषार्थप्रापकः, तन्निबन्धनत्वात् पर- मार्थमोक्षस्य । अन्यत्रत्यो हि अपवर्गः कुतश्चित् मुक्तिः, न सर्वत इति निःश्रेयसाभास इति वक्ष्यामः । कारणभाव भी ठीक ही प्रकाशित होता है, क्योंकि प्रकाश छिपाया नहीं जा सकता है । जिसे भट्टदिवाकरवत्स ने विवेकांजन में कहा है—"प्रकाशश्चैष भावानाम्...।" इत्यादि से लेकर "...न शापोक्त्या विलीयते ।" यहाँ तक । यह पदार्थों का ही प्रकाश है, उसे गाली देकर लुप्त नहीं कर सकते । किन्तु वहाँ पर कार्यकारणभाव में भी कहीं परिपूर्ण स्वतन्त्ररूप महेश्वरता को अपने में अन्तर्भाव करने पर अनन्तशक्ति से युक्त तरह-तरह का प्रकाश दिखायी देने लगता है; परन्तु वह मायिक ही प्रकाश कहलाता है, और यह जड और चेतनादि अनन्त भेद से युक्त रहता है, और उसी के द्वारा ही इस जगत् का सारा ज्ञाप्य-ज्ञापकभाव एवं निष्पाद्य-निष्पादकभाव सम्बन्ध होता है इसी से लोकव्यवहार भी चलता है । जहाँ पर शुद्धप्रथारूप अनुत्तरशक्तिशाली निरन्तर अपना प्रकाश ही मायीय अन्यप्रथाओं के व्यवधान से शून्य कारण रहता है, वहाँ पर भी उस भगवान् की ही कारणता रहती है और यही भगवान् का सृष्टि, स्थिति, संहार, पिधान और अनुग्रह नामक पञ्चकृत्य विशेष है । पिधान उसे कहते हैं जो संस्काररूप से स्थिर पदार्थ वस्तु है उसका भी विलीनीकरण कर देना, एवं अपने स्वस्वरूप में तादात्म्यरूप से अवस्थापन करना ही अनुग्रह है जो कि ये पाँचों परमपुरुषार्थ देनेवाले हैं, और वे परमार्थ मोक्ष में भी कारण हैं । क्योंकि अन्यदर्शनों में तो कहीं अपवर्ग शब्द से तो कहीं मुक्तिशब्द से कहा जाता है । किसी एक अंश में ही मुक्ति होती है सब तरह से नहीं होती; इसलिए वह निःश्रेयसाभास मात्र है यह हम आगे बतायेंगे । [ बुद्धितत्त्वे स्थिता बौद्धा गुणेष्वार्हंताः स्थिताः । स्थिताः वेदविदः पुंसि, ह्यव्यक्ते पांचरात्रकाः ॥ बुद्धितत्त्व में बौद्धलोग, गुणों में जैनजन, पुरुष के विषय में वेदान्ती, और अव्यक्तरूप के विषय में पञ्चरात्रमत वालों की स्थिति रहती है, जो भिन्न-भिन्न भूमिकाओं में शिवतत्त्व का रहना होता है उसी भूमिकाओं में ही सभी दर्शनों की अवस्थिति रहती है 'तद् भूमिकाः सर्वदर्शन- स्थितयः' । ] ये सभी भूमिकायें नट की स्वेच्छा से गृहीत भूमिका के समान ही हैं जो कि कृत्रिम ही होती है । 'चैतन्यविशिष्टशरीरमात्मा' चैतन्यविशिष्ट शरीर ही आत्मा है—ऐसा मत नास्तिक चार्वाकों का है । ज्ञानादि गुणसमुदाय का आश्रय बुद्धितत्त्व ही आत्मा है—ऐसा न्यायदर्शन के निपुण नैयायिक आदि लोग मानते हैं । एवं अपवर्ग में उसका उच्छेद होने से शून्यप्राय बताते हैं 'अहम्' प्रतीति से जानने के योग्य, सुख दुःखादि उपाधि से रहित आत्मा है—ऐसा मीमांसकों का सिद्धान्त है । जिसका समावेश बुद्धि में ही होता है । ज्ञान का क्षणिक
८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-१, का.-१ स चायं द्वितीयः कार्यकारणभावो लौकिकान्वयव्यतिरेकसिद्धप्रसिद्धकार्यकारणभाव- विलक्षणत्वात् स्फुटेन रूपेणासंवेद्यमानः कादाचित्कवस्तुसद्भावावभासोन्नीयमानपरमार्थः अतिदुर्घटकारित्वलक्षणैश्वर्यविजृम्भाभाविताद्भुतभावः प्रथमकोटिसम्भावना शून्यः कालिकाकारस्व- प्रकाशावरणनिराकरणमनोरथशतदुष्प्राप इत्येवं प्रकारः थमा द्योतकनिपातसहितेन निरूपितः ‘कथंचिदिति’ केनचिच्च प्रकारेण परमेश्वराभिन्नगुरुचरणसमाराधनेन परमेश्वरघटितेनैव । यथोक्तम् ‘सम्बन्धोऽतीव दुर्घटः····।’ इति । ‘आसाद्येति’आ समन्तात् परिपूर्णरूपतया सादयित्वा, सन्तानरूप प्रवाह ही तत्त्वसार है—ऐसा बौद्धों का मत है और जिसका बुद्धितत्त्व में ही पर्यव- सान होता है । कोई-कोई वेदान्ती प्राण को ही आत्मा मानते हैं । अभाव ब्रह्मावादी असद्-रूप से उसे कहते हैं । माध्यमिक शून्यवादी बौद्ध भी तो इसी को शून्य मानते हैं । पञ्चरात्रमत में ‘परा’ प्रकृति भगवान् वासुदेव है । अग्नि से निकली हुई चिनगारी की तरह भगवान् वासुदेव से जीव निकलते हैं । ‘परा’ प्रकृति में परिणाम स्वीकार करने से अव्यक्त में इनका समावेश है । सांख्यादि मतवाले ‘विज्ञानाकल [ जो मायातत्त्व से ऊपर शुद्ध विद्यातत्त्व के नीचे रहने वाला प्रमाता वर्ग ] की भूमिका स्वीकार करते हैं ‘सदेव सोम्य इदमग्र आसीत्’ एक सद्रूप अद्वैत तत्त्व ही सृष्टि के पूर्व में था; इसे वेदान्ती मानते हैं। इनका समावेश ईश्वरतत्त्व [ जिसमें एकाधिकरणरूप से विश्व की प्रतीति की व्यवस्था हो ] में होता है, शब्द तत्त्वमय पश्यन्तीरूप आत्मतत्त्व को वैयाकरण लोग मानते हैं इनका समावेश सदाशिवतत्त्व [ शिवशक्ति के योग से स्फुरित अहन्ता प्रधान कारणतत्त्व ] में हो जाता है । ] वह दूसरा कार्य-कारणभाव लौकिक अन्वयव्यतिरेक से सिद्ध है जो प्रसिद्ध कार्य- कारणभाव से विलक्षण स्पष्ट रूप से नहीं मालूम पड़ने वाला कभी भासित होने तथा कभी न होने के कारण इसकी परमार्थता का अनुमान करना पड़ता है इसलिए यह अति दुर्घटकारी ऐश्वर्य से युक्त होकर अद्भुत भाव वाला होता है, प्रथम कोटि सम्भावना से शून्यकालिक आकार के स्वभाव आवरण का निराकरण सैकड़ों मनोरथों से भी करना कठिन है। इस प्रकार असमर्थता का सूचक ‘थमा’ में थम यह द्योतक निपात सहित निरूपण किया हुआ है, ‘कथञ्चित्’ इसका यही अर्थ होता है कि परमेश्वर से अभिन्न गुरु-[ सद्गुरु की प्राप्ति होना अत्यन्त कठिन है ] चरण की सेवा से ही परमेश्वर की तन्मयता को प्राप्त कर सकते हैं। जैसा कि इस विषय में कहा भी है । ‘सम्बन्धोऽतीव दुर्घटः·········।’ [ अपने स्वरूप से भिन्न-भिन्न रूपों में विश्व का अवभासन करना ही अत्यन्त दुर्घट है और १. इसी द्वितीय कार्य कारण भाव में ‘कथञ्चित्’ शब्द से कहे शब्द प्रवृत्तिनिमित्तत्व का परामर्शान करते हैं—‘स च अयमिति’ इस प्रतीक से । क्योंकि माय्रीय कार्य-कारण भाव स्वप्न काल में होने वाले कुम्भ- कार के घट बनाने की तरह [ स्वप्नगत-कुलालघट-न्यायेन ] स्वातन्त्र्य सार रूप से भासन रूप संविद्रूप में रहने वाला पारमार्थिक कर्तृत्वत्मक कार्य-कारण भाव की भित्ति पर विश्रान्त होकर मायामय संसार में हृदयंगम होने के कारण प्रसिद्ध है किन्तु जहाँ पर वह दिखायी नहीं देता है। वहाँ पर वह पारमार्थिक ही है ।
अ.-१, आ.-१, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ९ स्वात्मोपभोगयोग्यतां निरर्गलां गमयित्वा; इयता विदितवेद्यत्वेन परार्थे शास्त्रकरणे अधिकारो दर्शितः; अन्यथा प्रतारकतामात्रमेव स्यात् । पूर्वकाल्येन सामनन्तर्यम् अत्र विवक्षितम् । अन्यथा तु आसादनतारतम्यप्राप्तौ मायीयमलकलापसंस्कारप्रक्षये कथं परोपदेशः शक्यक्रियः । सम्भवन्ति हि मायागर्भाधिकारिणो विष्णुविरिञ्चाद्याः तदुत्तीर्णा अपि महामायाधिकृताः शुद्धाशुद्धा मन्त्र- तदीश-तन्महेशात्मानः; शुद्धा अपि श्रीसदाशिवप्रभृतयः । ते तु यदीयैश्वर्यविप्रुड्भिरीश्वरीभूताः स भगवान् अनवच्छिन्नप्रकाशानन्दस्वात्तन्त्र्यपरमार्थो महेश्वरः, तस्य 'दास्यम्' इत्यनेन तत्प्रत्य- भिज्ञोपपादनस्य महाफलत्वम् आसूत्रयति । दीयते अस्मै स्वामिना सर्वं यथाभिलषितम् इति दासः, तस्य भाव इत्यनेन परमेश्वररूपस्वातन्त्र्यपात्रता उक्ता । 'जनस्येति' यः कश्चित् जायमानः तस्य, इत्यनेन अधिकारिविषयो नात्र कश्चिन्नियम इति दर्शयति, यस्य यस्य हि इदं स्वरूपप्रथनं तस्य तस्य महाफलं, प्रथनस्यैव परमार्थफलत्वात्, तस्य च प्रतिबन्धकसंमतैरप्रतिबन्धनीयत्वात्, नहि प्रथितमप्रथितमिति न्यायात् । तदुक्तम्, 'नेहौतिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते । स्वल्पमप्यस्य भासित हुए का पुनः स्वरूप के साथ ऐक्यभाव कर देना विमर्शन कहलाता है ] 'आसाद्येति' चारों ओर से परिपूर्णरूप की प्राप्ति कर अपने उपभोग के योग्य बनाकर; सारे वेद्यभावों को जानकर दूसरे के लिए शास्त्रोपदेश करने में अधिकार प्राप्त करना दिखाया गया है; अन्यथा जगत् को ठगना मात्र ही होता है । पूर्व काल के साथ मेल कराने के लिए उसके बाद यह है—ऐसा समझना चाहिए । यदि ऐसी बात नहीं है तो आसादन की तारतम्यता [तारतम्य शब्द क्रम के अतिशय अर्थ में रूढ है ] एक के बाद एक का होना मायीयमल समूह के संस्कार क्षय हो जाने पर फिर दूसरे के लिए उपदेश करना कैसे शक्य हो सकेगा । क्योंकि माया गर्भ के अधिकारी होने से ब्रह्मा, विष्णु आदि देव तो जरूर उपदेश दे सकते हैं। शुद्ध विद्या के नीचे एवं माया के ऊपर महामाया में वे रहते हैं। जिसमें आणवमल सुप्त रहता है जो कि महामाया के अधिकारी शुद्धा-शुद्ध, मंत्र, मंत्रेश्वर, मंत्र-महेश्वर रूप में रहते हैं उनके ऊपर केवल श्री सदाशिव प्रभृति होते हैं, वे जिनके ऐश्वर्य बिन्दु- मात्र से ईश्वर बन जाते हैं वे भगवान् अनवच्छिन्न प्रकाश-आनन्दघन-परमार्थ महेश्वर हैं, उसकी 'दास्य'—दासता बतायी गयी है इससे प्रत्यभिज्ञा का उपपादन करना महाफल सूचित किया गया है । जिनको स्वामी प्रभु ने सब अभीष्ट दे दिये हैं वे ही दास कहलाते हैं, उन्हीं का भाव दास्य है इसीलिए वे परमेश्वर के साथ स्वातन्त्र्य के पात्र बन जाते हैं—ऐसा कहा गया है । 'जनस्येति' जो कोई पैदा होता है उसका इससे अधिकारी सूचित होता है इसमें कोई नियम जाति-वर्ग का नहीं उठता है कि व्यक्ति विशेष को ही इसका लाभ हो और अन्य किसी को न हो; किन्तु सभी को समानरूप से इसका लाभ मिलता है—ऐसा दिखाया गया है । जिस-जिस को इसके स्वरूप का विस्तार प्राप्त हो जाता है—उस-उस को महाफल का आस्वादन मिलता है, और प्रतिबन्धक की सम्मति से नहीं लिखा गया है क्योंकि जो नहीं लिखा जाता है वह १. इस आत्मज्ञान की साधना में क्रम-व्यतिक्रम कुछ भी नहीं होता क्योंकि प्रमाद का अभाव होने के कारण जैसे अति-उष्ण तैल की कढ़ाई में पड़ा हुआ चन्दन का एक बूँद भी शीघ्र ही तैल को शीतल कर देता है इस प्रकार थोड़ी-सी भी योग-बुद्धि से की हुई साधना महाभयंकर संसार को विनष्ट कर देती है । २
१० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-१, का.-१ धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥' इति । परमगुरुपादैरपि शिवदृष्टौ— एकवारं प्रमाणेन शास्त्राद्वा गुरुवाक्यतः । ज्ञाते शिवत्वे सर्वस्थे प्रतिपत्त्या दृढात्मना ॥ करणेन नास्ति कृत्यं क्वापि भावनयापि वा । सकृज्ज्ञाते सुवर्णे किं भावनाकरणादिना ॥ सर्वदा पितृमात्रादितुल्यदाढर्येन सत्यता । इति । 'जनस्य' अनवरतजननमरणपीडितस्य इत्यनेन कृपास्पदतया उपकरणोयत्वमाह । अपिशब्दः स्वात्मनः तदभिन्नताम् आविष्कुर्वन् पूर्णत्वेन स्वात्मनि परार्थसम्पत्त्यतिरिक्तप्रयो- जनान्तरावकाशं पराकरोति । १ परार्थश्च प्रयोजनं भवत्येव तल्लक्षणयोगात्, नहि अयं दैवशापः स्वार्थ एव प्रयोजनं, न परार्थं इति; तस्यापि अतल्लक्षणयोगित्वे सति अप्रयोजनत्वात्; सम्पाद्यत्वेन अभिसंहितं यत् मुख्यतया, तत एव क्रियासु प्रयोजकं तत्प्रयोजनम् । अत एव भेदवादेऽपि ईश्वरस्य सृष्ट्यादिकरणे परार्थ एव प्रयोजनम् इति दर्शयितुं न्यायनिर्माणवेधसा निरूपितम् । अपने आप प्रसिद्ध हो जाता है—इस न्याय से । इस विषयमें 'श्रीमद्भगवद्गीता' में कहा गया है— ‘नेहातिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते । स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥’ निष्काम कर्मयोग में आरम्भ का नाश नहीं होता है एवं उल्टा फलरूप दोष भी नहीं लगता, इसलिए इस निष्काम कर्मयोगरूप धर्म का थोड़ा भी साधन भजन, संसार सागर के महान् भय से जीवात्मा को पार कर देता है । प्रमाण से, शास्त्र से या गुरुवाक्य से एक बार भी दृढ़प्रतिपत्ति पूर्वक ज्ञान हो जाने पर कि यह सारा का सारा शिवममय है—ऐसा दृढ ज्ञान हो जाने से इन्द्रियों के द्वारा कोई कृत्य ही नहीं रह जाता और न भावना से भी कोई प्रयोजन रह जाता है जैसे स्वर्ण की परीक्षा हो जाने के बाद भावनाकरण [ घिसना-आग में तपाना ] आदि करना नहीं रह जाता है । माता-पिता की जानकारी करने के लिए क्या कोई दूसरा उपाय किया जाता है ? यह तो जन्म से ही ज्ञात है कि ये हमारे माता-पिता आदि स्वजन हैं । 'जनस्य' जो निरन्तर जन्म-मरण के दुःखों से पीडित रहता है इससे कृपा का पात्र और उपकार करने योग्य है यह सब सूचित होता है । 'अपि' शब्द से अपने में अभिन्नता को प्रकट करते हुए अपने आप में पूर्णता की प्राप्ति हो जाने के कारण परार्थ सम्पत्ति के अतिरिक्त कोई दूसरा प्रयोजन नहीं रह जाता है—यह सूचित करता है । और उस ज्ञानी का एक मात्र यही प्रयोजन रह जाता है कि दूसरे का यथाशक्ति परोपकारादि कार्य करते रहें, अपना ही मात्र प्रयोजन हो—ऐसा कोई नियम नहीं होता कि दूसरे का कार्य सम्पन्न न हो अपने से, यह कोई कसम नहीं खायी है कि अपने ही स्वार्थ सिद्ध हों, और दूसरे के न हों, यदि उसमें प्रयोजन का लक्षण न घटता हो तो क्या उसे प्रयोजन नहीं कहा जायेगा; मुख्य रूप से जिसका सम्पादन किया जाय वही प्रयोजन कहलाता है वही क्रिया में प्रयोजक होता है इसी से इसी का नाम प्रयोजन है । इसीलिए भेदवाद में भी ईश्वर को सृष्टि करने में किसी अन्य का मतलब सिद्ध करना ही तो प्रयोजन है; इसीको न्यायशास्त्र के निर्माता गौतममुनि ने भी अपने न्यायदर्शन में दिखाया है— १. अपने विषय में किसी प्रकार की आकांक्षा-इच्छा न रह जाने पर तो दूसरों की उपकार करने की भावना ही मात्र शेष रूप से रह जाती है । क्योंकि परमेश्वर की दासता जिसने हृदयंगम कर ली है वे तो अपने आप में परिपूर्ण हो चुके हैं तब फिर उनके लिए कोई वस्तु प्राप्त करने की रह नहीं जाती, दूसरों का उपकार करने की भावना से ही कार्य वर्ग में प्रवृत्ति मात्र होती है, अपने स्वार्थ में डूबा हुआ व्यक्ति
अ.-१, आ.-१, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ११ 'यमर्थमधिकृत्य पुरुषः प्रवर्तते तत् प्रयोजनम्' इति । 'इच्छन्' इति इच्छाविषयीकृतस्य फलस्य प्रवृत्तौ हेतुत्वं शत्रा दर्शयति । इच्छाशक्तिश्च उत्तरोत्तरम् उच्छूनस्वभावतया क्रियाशक्तिपर्यन्तोभवति—इति दर्शयिष्यामः । उपशब्दः समीपार्थः, तेन जनस्य परमेश्वरधर्मसमीपताकरणम् अत्र फलम् । तत एव आह—'समस्त' इति परमेश्वरतालाभे हि समस्ताः संपदः तन्निःष्यन्दमय्यः संपन्ना एव, रोहणलाभे रत्नसंपद इव । प्रमुषितस्वात्मपरमार्थस्य हि किम् अन्येन लब्धेन, लब्धतत्परमार्थस्यापि तदन्यत् नास्ति यद् वाञ्छनीयम् । यदुक्तं ग्रन्थकृतैव 'भक्तिलक्ष्मोसमुद्घानां किमन्यदुपयाचितम् । एनया वा दरिद्राणां किमन्यदुपयाचितम् ।।' इति । एवं षष्ठीसमासेन प्रयोजनमुक्तम्, बहुव्रीहिणा तु उपायः सूच्यते । 'समस्तस्य' भावाभावरूपस्य बाह्याभ्यन्तरस्य नीलसुखादेः या 'संपत्' संपत्तिः सिद्धिः तथात्व- 'यमर्थमधिकृत्य पुरुषः प्रवर्तते तत् प्रयोजनम्' जिस अर्थ = विषय को लेकर प्राणियों की प्रवृत्ति होती हो उसे प्रयोजन कहते हैं । 'इच्छन्' इच्छा के विषय हुए फल की सिद्धि में हेतु 'शतृप्रत्यय' से दिखाया गया है [ 'लक्षणहेत्वोः क्रियायाः' ( ३-२-१२६ ) इस पाणिनीय सूत्र से क्रिया के हेतु अर्थ में शतृप्रत्यय हुआ ] और इच्छाशक्ति उत्तरोत्तर बढ़ती हुई क्रियाशक्ति में परिणत हो जाती है—यह हम क्रियाधिकार में दिखायेगें । 'उप' शब्द का समीप अर्थ है, इसलिए यह सिद्ध होता है कि मनुष्य को ईश्वर धर्म के समीप पहुँचा देना ही यहाँ पर फल है । इसी से कहा है कि 'समस्त' सम्पूर्ण रूप से ईश्वरता के लाभ हो जाने पर सारी सम्पत्तियाँ उसका स्रोत हो जाती है। जिसका स्वार्थरूप परमार्थ है उसका मायाशक्ति से यदि नाश हो जाता है तब फिर अणिमा, लघिमा आदि अष्टसिद्धि नवनिधिरूप सिद्धि मिल भी जाय, तो भी उससे कौन सा प्रयोजन सिद्ध होनेवाला है, और जिसको पूर्ण परमार्थ प्राप्त हो चुका है उसके लिए अन्य कोई आकांक्षा-वाञ्छा नहीं रह जाती है। जो कि ग्रन्थकार ने स्वयं ही कहा है कि जिस व्यक्ति को भक्तिरूपी लक्ष्मी मिल गयी है उसके लिए दूसरा फिर माँगना क्या रह जाता है या जो दरिद्र है उसके लिए फिर माँगना भी व्यर्थ है।' इस प्रकार षष्ठी समास से प्रयोजन कह दिया गया और बहुव्रीहि समास से उपाय सूचित होता है । 'समस्तस्य' समस्त शब्द से यह द्योतित होता है कि बाह्य आभ्यन्तररूप नीलसुखादि दूसरों का उपकार करने की इच्छा कैसे रख सकता है ? अपने स्वार्थ भाव के रहने पर ही तो दूसरों का उपकार हो पाता है। स्वं कर्तव्यं किमपि कलयँल्लोक एष प्रयत्नात् । नो पारार्थ्यं प्रति घटयते कांचन स्वात्मवृत्तिम् ॥ यस्तु त्यक्ताखिलभवमलः प्राप्तसंपूर्णबोधः । कृत्यं तस्य स्फुटमिदमपल्लोककर्त्तव्यमात्रम् ॥ सांसारिक जीव बड़े यत्नपूर्वक अपने कार्य में लगा हुआ होने के कारण दूसरों के लिए कुछ भी तो नहीं करता है क्योंकि अपने स्वार्थ में डूबा हुआ है समस्त गुणदोषों से दूर हटकर, सम्पूर्ण ज्ञान को प्राप्त कर लेता है उसका कर्तव्य मात्र दूसरों का उपकार करना ही शेष रह जाता है।
१२] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-१, का.-१ प्रकाशः, तस्याः सम्यक् 'अवाप्तिः' विमर्शरूढिः, सैव 'हेतुः' यस्यां तत्प्रत्यभिज्ञायाम्, तथाहि— स्फुटतरभासमाननीलसुखादिप्रमान्वेषणद्वारेणैव पारमार्थिकप्रमातृलाभ इह उपदिश्यते । यदाह अन्यत्र—'इदमित्यस्य विच्छिन्नविमर्शस्य कृतार्थता । या स्वस्वरूपे विश्रान्तिर्विमर्शः सोऽहमित्ययम्॥' इति । तथा तत्रैव—'प्रकाशस्यात्मविश्रान्तिर्रहंभावो हि कीर्तितः । उक्ता च सैव विश्रान्तिः सर्वा- पेक्षानिरोधतः ।। स्वातन्त्र्यमथ कर्तृत्वं मुख्यमीश्वरतापि च ।' इति । इयता च उपाये अतिदुर्घट- त्वाशङ्का पराकृता । यदन्ते निरूपयिष्यति 'सुघट एष मार्गो नवः' ( ४ अ० ३ आ० १६ श्लो० ) इति । 'तस्य' महेश्वरस्य 'प्रत्यभिज्ञा' प्रतीपमात्माभिमुख्येन ज्ञानं प्रकाशः प्रत्यभिज्ञा । प्रतीपम् इति—स्वात्मावभासो हि न अननुभूतपूर्वोऽविच्छिन्नप्रकाशत्वात् तस्य, स तु तच्छक्त्यैव विच्छिन्न पदार्थ भाव और अभाव वाले हैं जो कि 'संपत्' सम्पत्ति सिद्धि होती है उसकी अच्छी तरह से प्राप्ति कर लेना, वही कारण जिस प्रत्यभिज्ञा में है, इससे प्रत्यभिज्ञा की विशेषणता इस पद से परामृष्ट होती है स्पष्टरूप से भासित होनेवाले नीलसुखादि पदार्थों के प्रमा अन्वेषण द्वारा पारमार्थिकता का प्रमाता को लाभ हो जाता है—ऐसा यहाँ पर उपदेश दिया जाता है। इसे अन्यत्र भी बताया गया है— यह जो 'इदम्' विच्छिन्न विमर्श है उसकी कृतार्थता तभी होती है जब कि अपने में स्वरूप का ज्ञान न होकर विश्राम ले लेता है 'सोऽहम्' वही मैं हूँ इस स्थिति तक पहुँच जाना है। क्योंकि प्रकाश का अपने स्वरूप में विश्राम हो जाना ही अहम्भाव कहलाता है और सभी अपेक्षाओं को रोक देनेवाली वही विश्रान्ति कही भी गयी है। इसको स्वातन्त्र्य, मुख्यकर्तृत्व और ईश्वरता इत्यादि नामों से कहते हैं। इतने ग्रन्थ से उपाय में जो अतिदुर्घटकारिता की आशङ्का थी उसे दूर कर दिया गया है। परिच्छिन्नता को छोड़कर नित्य, शुद्ध, व्यापक भाव को जान लेना ही प्रत्यभिज्ञा है। इसके विषय में कहा भी है— स्मरणानुभवारूढा सामानाधिकरण्यधीः । संस्कारेन्द्रियजन्या च प्रत्यभिज्ञा प्रकीर्तिता ॥ 'स्मरण और अनुभव में आरूढ हुई सामानाधिकरण्य बुद्धि और संस्कार इन्द्रिय से जन्य प्रत्यभिज्ञा कहलाती है।' 'प्रतीपमिति'—ज्ञात स्वात्मस्वरूप का अवभास होने का नाम ही प्रतीप है क्योंकि जिसका पूर्व में अनुभव नहीं हुआ था उसका अविच्छिन्न प्रकाश होने के कारण मायाशक्ति से वह तो १. प्रकाश का जीवितभूत स्वरूप विमर्श ही अहं भाव नाम वाला है, जब कि यह अपना और दूसरे के प्रकाश करने में अपने से भिन्न किसी को अपेक्षा नहीं रखता है। इदन्ता तो अपने आप को प्रकाशित करने में असमर्थ है तब फिर दूसरे की तो बात करनी ही दूर रही। अहं भाव का मुख्य धर्म व्यापकत्व, नित्यत्वादि है और यह दूसरे धर्म समूह का भी आक्षेप कर लेगा, विमर्शक होने से ही स्व-पर-प्रकाश रूप में रहना ही अनन्य उन्मुख तृप्ति से किये गये अपेक्षा न रहने के कारण विश्रान्ति रूप स्वरूप की प्राप्ति हो जाती है। इसी स्वातन्त्र्यरूपता से उस-उस देश कालादि के अवभास में सहस्र उल्लास का सामर्थ्यबल आ जाता है जब कि उस समय ईषणादि उपाधिवशात् अनेक शक्ति-योग के द्वारा कर्तृत्वादि शब्दों से व्यवहार होता हुआ देखा जाता है। इसी को अहं प्रकाश वाला कहा जाता है जिसे प्रकाश करने के लिए अन्य की अपेक्षा नहीं पड़ती है।
अ.-१, आ.-१, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १३ इव विकल्पित इव लक्ष्यते—इति वक्ष्यते। प्रत्यभिज्ञा च—भातभासमानरूपानुसंधानात्मिका, स एवायं चैत्र—इति प्रतिसंधानेन अभिमुखीभूते वस्तुनि ज्ञानम्; लोकेऽपि एतत्पुत्र एवंगुण एवंरूपक इत्येवं वा, अन्ततोऽपि सामान्यात्मना वा ज्ञातस्य पुनरभिमुखीभावावसरे प्रतिसंधित- प्राणितमेव ज्ञानं प्रत्यभिज्ञा—इति व्यवह्रियते; नृपतिं प्रति प्रत्यभिज्ञापितोऽयम्—इत्यादौ। इहापि प्रसिद्धपुराणसिद्धान्तागमानुमानादिविदितपूर्णशक्तिस्वभावे ईश्वरे सति स्वात्मन्यभि- मुखीभूते तत्प्रतिसंधानेन ज्ञानम् उदेति, नूनं स एव ईश्वरोऽहम्—इति, तामेनाम् 'उपपादयामि' विच्छिन्न सा, विकल्पित सा दिखायी दे रहा है इस विषय में आगे और भी विचार करेंगे। प्रत्यभिज्ञा उसी का नाम है जो पूर्व में आभासित होता रहा एवं इस समय में भी भासित हो रहा है; पूर्वकाल एवं इस वर्तमान समयके काल का सम्प्रति वर्तमान में एकरूप से मिलकर भासित होने का नाम ही प्रत्यभिज्ञा है, जैसे यह वही चैत्र है; ऐसा पूर्वकाल के ज्ञान को वर्तमानकाल में ऐक्य कर सामने स्थित वस्तु पदार्थ में ज्ञान कराती है वही प्रत्यभिज्ञा है; यह लोक व्यवहार में भी देखा जाता है कि इसका पुत्र इन गुणगरिमाओं से सम्पन्न है एवं रूप यौवन से युक्त है; जब कालान्तर में सामान्यरूप से अथवा ज्ञात पदार्थ के अपने सामने आ जाने पर पूर्व में जैसा ज्ञान हुआ था वैसा वर्तमानकाल का ज्ञान सम्मुखस्थ वस्तु पदार्थ में मिला देने से यही भान होता है कि यह वही वस्तु पदार्थ है जो मैंने पूर्व में देखा था, जैसा कि राजा से इनकी पहचान करा दी है। जिसका आगमाधिकार में निरूपण किया जायेगा। इति प्रकटितो मया सुघट एष मार्गो नवो महागुरुभिरुच्यते स्म शिवदृष्टिशास्त्रे यथा। तदत्र निदधत्पदं भुवनकर्तृतामात्मनो विभाव्य शिवतामयीमनिशमाविशन् सिद्ध्यति ॥ १ ॥ ( ४ अ० ३ आ० १६ श्लोक ) 'तस्य' उस महेश्वर की 'प्रत्यभिज्ञा' पहचान होना; जो कि अपने स्वरूप के ज्ञान को प्रत्यभिज्ञा कहा जाता है; मैं वही महेश्वर हूँ—ऐसी प्रत्यभिज्ञा-पहचान करना कि मैं उस महेश्वर से अभिन्न हूँ। जीवात्मा ज्ञात पदार्थ को जानता हुआ भी मोहवशात् फंसकर नहीं जानता हुआ सा होकर जब फिर से अपनी ओर हृदयंगमीभाव से ज्ञान करने का नाम ही प्रत्यभिज्ञा है। अथवा ज्ञात वस्तुपदार्थ को भी विस्मृत करने के जैसा और उस भूले हुए को पुनः प्राप्तकर लेना, केवल स्मर्य- माणरूप से नहीं, अपितु प्रत्यक्ष स्पष्टरूप से जानकारी प्राप्तकर लेना ही प्रत्यभिज्ञा कहलाती है। यह वही चैत्र है जो मैंने 'सौराष्ट्र' में देखा था जो कि आज उसे अपनी आँखों के सामने देख रहा हूँ—इस प्रकार सतत निरन्तर आत्म-तत्त्व भासित होने पर भी मोह के कारण अपने आपको दूसरा ही मान लिया है कि मैं परिच्छिन्न इत्यादि हूँ। इस प्रत्यभिज्ञा शास्त्र में भी प्रसिद्ध पुराण, सिद्धान्त, आगम और अनुमानादि प्रमाणों से सिद्ध विदित ज्ञान का उदय पूर्णशक्ति सम्पन्न ईश्वर के अपनी तरफ उन्मुख होने से और उसका प्रतिसंधान करने से होता है, निश्चय ही ठीक वही ईश्वर मैं स्वयं हूँ—ऐसा जीवात्मा को बोध
१४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-१, का.-१ इति । उपपत्तिः संभवः, तां संभवन्तीं तत्समर्थाचरणेन प्रयोजकव्यापारेण संपादयामि । तथाहि— संभवति तावत् असौ, अविच्छिन्नप्रकाशत्वात्; निरोधकाभिमतमायाशक्तिसमपसारणमात्रमेव तु तत्र उपपादनम् । प्रत्यभिज्ञोपपत्तौ स्वपरविभागाभावे तदपेक्षं कर्त्रभिप्रायोदि असंभाव्यम् इति परस्मैपदप्रयोगः । इत्थं च अत्र श्लोके योजना,—महेश्वरस्य दास्यं समस्तसंपल्लाभहेतुं कथंचित् आसाद्य, जनस्यापि कथंचित् तत्प्रत्यभिज्ञाम् आसाद्य प्रापय्य, उपकारं समस्तसंपल्लाभहेतुभूतं महेश्वरदास्यात्मकम् इच्छन्, तामेव समस्तसंपत्समवाप्तिहेतुकां तत्प्रत्यभिज्ञाम् उपपादयामि । ‘आसाद्य’ इति आवृत्तियोजना द्वौ णिचौ । इयति च व्याख्याने वृत्तिकृता भरो न कृतः, तात्पर्य- व्याख्यानात् । यदुक्तम् ‘संवृतसूत्रनिर्देशविवृतिमात्रव्यापारायाम् ।’ इति । टीकाकारेणापि हो जाता है, इस प्रत्यभिज्ञा का मैं उपपादन करता हूँ। उपपत्ति सम्भव होने से उस सम्भावना की ठीक-ठीक समझ बूझकर प्रयोजक-व्यापार से संपन्न करता हूँ। क्योंकि वैसे तो यह संभव भी हो सकता है, अविच्छिन्न प्रकाशरूप होने के कारण; वहाँ पर तो केवल निरोध करनेवाली अभीष्ट मायाशक्ति ही है, उसे वहाँ से दूर कर देना ही उपपादन है । प्रत्यभिज्ञा की उपपत्ति हो जाने पर तो अपना और परायेपन का विभाग ही नहीं रह जाता और उसकी अपेक्षा रखनेवाले कर्त्ता के अभिप्रायोदि की संभावना भी नहीं बन सकती; इसी कारण ‘उपपादयामि’ इस में परस्मैपद का प्रयोग हुआ है। इस प्रकार इस श्लोक में जोड़ना चाहिए, संपूर्ण संपत्ति की प्राप्ति में हेतुरूप उस महेश्वर के प्रति दास्य भाव रखना ही एक मात्र लक्ष्य है। महेश्वर की दास्यभावना को किसी तरह प्राप्त करके और अन्य लोगों में भी उस महेश्वर की किसी प्रकार पहचान कराकर, समस्त संपत्ति की प्राप्ति में खास कारणरूप से महेश्वर के प्रति दास्यभावना रखना ही एकमात्र कारण है इसे भी दास्यभाव मिल जाये—ऐसी उपकार करने की भावना को आगे रखते हुए जो संपूर्ण संपत्ति की प्राप्ति में हेतुभूत प्रत्यभिज्ञा है उसका मैं उपपादन करता हूँ। ‘आसाद्य’ इस प्रयोग में ‘देहली-दीपक’ न्याय से एकबार प्रयोग करने पर भी एक साथ दो या दो से अधिक अर्थ का भी क्रम से बोध होता है क्योंकि [ आसाद्य ] इसमें दो ‘णिच्’ प्रत्यय हैं और वृत्तिकार ने इतने व्याख्यान में कोई विशेष भार नहीं दिया है, चूँ कि इसके तात्पर्य मात्र की ही व्याख्या करनी थी । जिसके बारे में कहा भी गया है कि—‘ढका हुआ जो सूत्र का अर्थ है उसका निर्देश करने के लिए ही यह विवरण मात्र व्यापारवाली टीका है ।’ १. जहाँ पर कर्ता के अभिप्राय से क्रियाफल की विवक्षा की जाती है वहाँ पर आत्मनेपद में क्रिया होती है, किन्तु जिसमें वह नहीं होती है उसमें तो ‘शेषात् कर्तरि परस्मैपदम्’ इससे परस्मैपद में होती है । किन्तु प्रत्यभिज्ञा ज्ञान के उपाय को बताने वाले ग्रन्थ कर्ता में समस्त सम्पत्ति के कारण रूप परमेश्वर की दास्यभावना की प्राप्ति से, पूर्णता में डूब जाने से स्व-पर विभाग गल गया है, इसी कारण कर्ता का अभिप्राय क्रियाफल विनष्ट हो जाता है अर्थात् कर्ता को अभीष्ट अपने लिये नहीं रह जाता है । जिससे ‘तत्प्रत्यभिज्ञामुपपादयेऽहम्’ यह प्रयोग नहीं होता है । अपने आपके लिए किञ्चित् करने योग्य एवं अपेक्षणीय भी नहीं रह जाता, क्योंकि समस्त एषणायें ज्ञान के द्वारा विनष्ट हो जाती हैं, परोपकारार्थ ही मात्र इच्छा अवशेष रह जाती है, जो अपने स्वार्थ में डूबे हुए हैं वे परोपकारार्थ नहीं कर सकते हैं, इसी कारण परस्मैपद का प्रयोग ‘तत्प्रत्यभिज्ञामुपपादयामि’ इस अंश में किया गया है ।
अ.-१, आ.-१, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १५ वृत्तिमात्रं व्याख्यातुमुद्यतेन नेदं स्पृष्टम्, अस्माकं तु सूत्रव्याख्यान एव उद्यम—इति विभज्य व्याख्यातम् । एवं सर्वत्र । एवमनेन श्लोकेन अभिधेयं, प्रयोजनं, तत्प्रयोजनं, तत्प्रयोजनम्, अधिकारिनिरूपणं, गुरुपर्वक्रमः, संबन्ध—इति दर्शितम् । तथाहि—समस्तसंपल्लक्षणो व्याख्यातो योऽर्थः पूर्वं पुण्यपापादौ संसारमूलकारणे हेतुः, स एव प्रत्यभिज्ञायते अनया—इति करण- एवं टीकाकार के द्वारा भी वृत्तिमात्र की व्याख्या करना ही उद्देश्य था उससे अतिरिक्त थोड़ा सा भी कहीं स्पर्श नहीं किया हुआ है और हमारा भी तो यत्न मात्र सूत्र की व्याख्या करने में है; इससे अधिक नहीं है, इसलिए हमने खूब-खोल-खोलकर व्याख्या की है। इसी प्रकार ही सब जगह व्याख्या की गयी है । इस श्लोक से जो विषय करना था उसे भी अभिधेय के रूप से कहा है, प्रयोजन और उसका प्रयोजन तथा प्रयोजन के भी प्रयोजन को दिखलाया है, अधिकारी के विषय में भी कहा है कि इस प्रत्यभिज्ञाशास्त्र को प्राप्त करनेवाले कौन अधिकारी हो सकते हैं इसका भी अच्छी तरह से निरूपण हुआ है, तथा गुरु-परम्परा के क्रम को भी दिखाया है। इन ईश्वरप्रत्यभिज्ञा आदि शास्त्रों की कौन-कौन से गुरुजनों के द्वारा रचनाएँ हुई हैं एवं आदि से अन्त तक इनके प्रधान गुरु लोग रहे, तथा इस ईश्वरप्रत्यभिज्ञा का प्रतिपाद्य-प्रतिपादकभाव रूप जो सम्बन्ध है उसे भी हमने दिखा दिया है । [ अभिधेय का उपाय और प्रयोजन का जो उपाय ज्ञान है एवं उसका प्रयोजन प्रत्यभिज्ञान होना, प्रत्यभिज्ञान का भी प्रयोजन परमेश्वर सम्बन्धी ऐश्वर्य की प्राप्ति करना है। अधिकारी तो जिस किसी भी जाति-वर्ग का पवित्र हृदय वाला हो सकता है । श्री कण्ठनाथ प्रभृति गुरु सम्बन्ध क्रम में आ जाते हैं। श्री कण्ठनाथ के शासन काल के चले जाने पर दुर्वासामुनि हुए उन्होंने भी इस दर्शन के उद्धार के लिए आदेश दिया, उन्होंने भी भगवान् देव से आदेश प्राप्तकर त्र्यम्बकादित्य नाम के मानस पुत्र को पैदा किया । गुरु प्रवर्तित मार्ग को चलाने के लिए श्री अनन्तनाथ से शिवतत्त्व श्री कण्ठनाथ ने प्राप्त किया, वह भी भगवान् शक्ति से, इस प्रकार आगमों में गुरु परम्परा के सम्बन्ध क्रम का निरूपण हुआ है यहाँ प्रतिपाद्य- प्रतिपादक भाव सम्बन्ध है । ] वैसे तो समस्त संपत्ति को देनेवाला जो अर्थ है उसी की व्याख्या की गयी है; क्योंकि पूर्व जन्म के अर्जित पुण्य-पापादि ही तो इस असार-संसार का मूल कारण है, इस व्याख्यान से उसी की पहचान होती है 'प्रत्यभिज्ञायते अनया' इस कथन को करण १. इस 'दर्शन' प्रत्यभिज्ञा शास्त्र में विषय उपाय है और प्रयोजन उपाय ज्ञान है, उसका प्रयोजन प्रत्यभिज्ञान है, उसका प्रयोजन पारमैश्वर्य की प्राप्ति करना है। इसका अधिकारी जो कोई शक्तिपात-परमेश्वर का अनुग्रह वाला, पवित्र हृदय से युक्त हो सकता है। श्री कण्ठनाथ से लेकर श्री सोमानन्द आदि तक गुरु परम्परा का सम्बन्ध द्योतित होता है। 'कैलासाद्रौ भ्रमन् देवो मूर्त्या श्रीकण्ठरूपया। अनुग्रहायाव- तीर्णश्चोदयामास भूतले ॥ मुनिं दुर्वाससं ऽऽऽशास्त्रं रहस्यं कुरु तादृशम् ॥' कलिकाल के कालुष्य से यह शैवाद्वैत दर्शन प्रायः लुप्त हो गया था और उसकी परम्परा का ह्रास हो जाने से बहुत काल के बाद कैलास पर्वत पर परिभ्रमण करते हुए भगवान् शंकर ने श्री कण्ठमूर्ति रूप को धारण कर दुर्वासा मुनि को इस शैव शास्त्र का प्रचार-प्रसार करने के लिए आज्ञा की। उनकी आज्ञा को शिरोधार्य समझकर दुर्वासा मुनि ने अखिल आगम रूप उपनिषद्-वेद के सारभूत षडर्ध
१६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-१, का.-१ व्युत्पत्त्या उपायः इह लोकोत्तरमार्गं प्रति निर्णीतः, —इति अतिदुर्घटकारित्वलक्षणमैश्वर्यम् 'मार्गों नव' (४ अ० ३ आ० १६ श्लो०) इति शास्त्रान्ते निरूपयिष्यमाणं सूचयता उपायः प्रदर्शितः अभिधेयत्वेन । अत एव 'तथाहि जडभूतानाम्' (१ अ० १ आ० ४ श्लो०) इत्युपक्रमपूर्वं श्लोकान्तरं भविष्यति । प्रयोजनं च प्रत्यभिज्ञोपायज्ञानं, तस्य प्रयोजनं प्रत्यभिज्ञानं, तस्यापि प्रयोजनं समस्तसंपल्लक्षणपारमैश्वर्यैकरूपप्रथनं; ततः परं नास्त्येव, तस्य सर्वपर्यन्तफलत्वात् अंशांशिकयापि । यदुक्तं मयैव स्तोत्रे —'फलं क्रियाणामथवा विधीनां पर्यन्ततस्त्वन्मयतैव देव । फलेप्सवो ये पुनरत्र तेषां मूढा स्थितिः स्यादनवस्थयैव ।।' इति । एतद् वक्ष्यति 'तदत्र निदधत्पदम्' व्युत्पत्ति होने से लोकोत्तर मार्ग का देनेवाला है यह उपाय निर्णीत हो जाता है, इसका अति- दुर्घटकारीरूप ऐश्वर्य माना जाता है जो कि आगे कहा भी है—'मार्गों नव' (४।३।१६) । इस प्रकार शास्त्र के अन्त में निरूपण करते हुए हमने उपाय भी इसके सूचित किये हैं जो प्रतिपाद्य विषयक हैं । इसलिए 'तथाहि जडभूतानाम्' (१ अ. १०४ श्लोक) जैसा कि जडभूतों की प्रतिष्ठा जीव के आश्रित होती है उस तरह उपक्रमपूर्वक दूसरे-दूसरे श्लोक कहे जायेंगे तब फिर प्रयोजन क्या वस्तु है ? उत्तर यह है कि प्रत्यभिज्ञा का उपाय जानना ही यहाँ पर प्रयोजन है, उसका भी प्रयोजन ईश्वर का प्रत्यभिज्ञान होना कि मैं महेश्वररूप हूँ, तब फिर उस प्रत्यभिज्ञान का क्या प्रयोजन है और किसलिए ? समस्त संपत्तिरूप परमेश्वर के परम ऐश्वर्य का प्रथन हो जाना ही वस्तुतः प्रयोजन है; इसके बाद कुछ अवशेष करना नहीं रह जाता है, सारा का सारा फल मिल जाने से कुछ भी आंशिकरूप से शेष नहीं रह जाता है । मैंने स्वयं ही स्तोत्र में बताया है— 'हे देव ! क्रियाओं से उत्पन्न होने वाले अथवा विधियों से होने वाले जितने भी फल होते हैं; उन सब से हम तुम्हारे पूर्ण व्यापकरूप में तन्मय हो जायें । जो लोग फल की आकांक्षा रखते हैं वे सभी मूढ़ ही हैं और इससे अनवस्था ही होगी ।' इस विषय में आगे विवेचन किया जायेगा । दो पाद से 'तदत्र निदधत्पदम्' (४ अ० ३ आ० १६ श्लोक) 'जनस्य' इसके द्वारा अधिकारी कौन हो सकता है, इसे दिखाया है । जिसका उपसंहार करते समय बताया जायेगा— [ त्रिक ] शास्त्र जो संसार में विलुप्त हो गया था इसके प्रचारार्थ त्र्यम्बक आदित्य नामक मानस पुत्र को उत्पन्न किया और इन्होंने भी इस प्रकार मानस प्रक्रिया से सृष्टि क्रम के द्वारा पुत्र उत्पन्न किया, स्वयं गुहा में जाकर ध्यानस्थ हो गये । इस प्रकार क्रमशः सृष्टि-प्रक्रिया चलती आयी । आगे चलकर मानुषी सृष्टि का क्रम चला । इस मानुषी सृष्टि में संगम आदित्य और वर्षादित्य पुत्र उत्पन्न हुए, उनके भी भगवान् अरुणादित्य नाम के पुत्र पैदा हुए । श्री सोमानन्द आनन्दादित्य से हुए । इस प्रकार शैवा- द्वैत दर्शन के प्रचारार्थ श्री सोमानन्द का अत्यधिक योग रहा है । इनका बनाया हुआ 'शिवदृष्टिशास्त्र' इस दर्शन का सर्वप्रथम ग्रन्थ है । इसके आधार पर उत्पलदेव एवं अभिनवगुप्त, लक्ष्मणगुप्त, वसुगुप्त, क्षेमराज एवं रामेश्वर झा आदि ने ग्रन्थों की रचनाएं की । इस ग्रन्थ का प्रतिपाद्य-प्रतिपादकभाव सम्बन्ध है । १. सम्पूर्ण सम्पत्ति की प्राप्ति होने पर ही पूर्णता दिखायी देती है । राज्य, भोग, स्वर्ग, भवन इत्यादि भोग पदार्थ की प्राप्ति में भी उत्तरोत्तर इच्छा विशेष बढ़ती ही जाती है, कहाँ पूर्णता को स्थान मिला माना जाय ? जब परमार्थ मिल जाने पर तो इससे अतिरिक्त प्राप्त करने के लिए रह ही नहीं जाता है, उस परमेश्वर भाव में सम्मिलित हो जाने पर तो फिर क्या वाञ्छनीय रह जाता है—इसका यही आशय है ।
.अ.-१, आ.-१, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १७ ( ४ अ० ३ आ० १६ श्लो० ) इति पादद्वयेन । 'जनस्य' इत्यनेन अधिकारी दर्शितः । यत् निगम- यिष्यति 'अनिशमाविशन्' ( ४ अ० ३ आ० १६ श्लो० ) इति । 'कथंचित्' इत्यनेन गुरुपर्वक्रमः । वक्ष्यति 'महागुरुभिरुच्यते स्म शिवदृष्टिशास्त्रे यथा ।' ( ४ अ० ३ आ० १६ श्लो० ) इति । एवं प्रतिज्ञातव्यसमस्तवस्तुसंग्रहेण इदं वाक्यमुद्देशरूपं प्रतिज्ञापिण्डात्मकं च, मध्यग्रन्थस्तु हेतुवादि- निरूपकः, 'इति प्रकटितो मया' ( ४-३-१६ ) इति च अन्त्यश्लोको निगमनग्रन्थः,- इत्येवं- पञ्चावयवात्मकमिदं शास्त्रं परव्युत्पत्तिफलम् । नैयायिकक्रमस्यैव मायापदे पारमार्थिकत्वम्— इति ग्रन्थकाराभिप्रायः 'क्रियासंबन्धसामान्य' ( २ अ० २ आ० १ श्लो० ) इत्यादिषु उद्देशेषु प्रकटोभविष्यति — इति तावद् ग्रन्थस्य तात्पर्यम् । सुजनश्च लौकिकेश्वर- परिचित ईश्वरविषये जनम् अनुजीविगुणोपपन्नं प्रकाशयति, जनविषये च आभिगामिकादिगुणगण- सम्पन्नम् ईश्वरं प्रकाशयति, — इति इयानर्थः सामान्येन षष्ठीसमासेन दर्शितः 'तस्य प्रत्यभिज्ञा' इति । एतच्छ्लोकाकर्णनसमये च शिष्याणाम् एतदर्थसंक्रमेण परमेश्वरतादात्म्यमेव उपजायते तावत् । तथाहि — 'जनस्य' — इत्याकर्णनात् वयं ते जननमरणपीडिता अपर्युदस्तवृत्तयश्च, अस्माक- 'अनिशमाविशन्' ( ४ अ० ३ आ० १६ श्लोक में ) 'कथंचित्' इस शब्द से गुरु परम्परा का क्रम 'महागुरुभिरुच्यते स्म शिवदृष्टिशास्त्रे यथा' ( ४ अ० ३ आ० १६ श्लोक ) से कहा जायेगा । इस प्रकार प्रतिज्ञा करने योग्य सारी वस्तुओं का संग्रह करके प्रतिज्ञा को एक पिण्डाकार- रूप में दिखा दिया, और बीच का ग्रन्थ तो हेतु आदि का निरूपण करता है, 'इति प्रकटितो मया' ( ४-३-१६ ) और अन्तिम श्लोक से ग्रन्थ का उपसंहार किया हुआ है। इस प्रकार प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय और निगमन रूप पाँचों अवयवों वाला यह शास्त्र परम व्युत्पत्तिरूप फल देने वाला है। नैयायिक लोगों के क्रम को ग्रन्थकार ने मायापद में पारमार्थिकरूप माना है, 'क्रिया- सम्बन्धसामान्य' ( २ अ० २ आ० १ श्लोक ) के उद्देश्यों में प्रकट किया जायेगा । यही इस ग्रन्थ का तात्पर्य है और सज्जन लोग लौकिक ईश्वर के विषय में परिचित हो जाने पर अनुचर- वर्ग को अपने स्वामी के विशेष गुणों का वर्णन किया करते हैं और लोगों के विषय में भी ईश्वर सम्बन्धी गुण गरिमा का प्रकाश डालते रहते हैं इतना अर्थ 'तस्य प्रत्यभिज्ञा' इस सामान्य षष्ठी समास के द्वारा दिखा दिया । इस षष्ठीसमास में कर्त्ता और कर्म ये दोनों हैं अर्थात् तत्कर्तृक प्रत्यभिज्ञा एवं तत्कर्मक प्रत्यभिज्ञा समझना चाहिए । इस श्लोक के सुनते समय में ही श्रद्धालु शिष्यों को इसका बोधार्थ संक्रमण क्रमशः परमेश्वर की तादात्म्यता उत्पन्न करा देता है। जैसा कि 'जनस्य' ऐसा सुनने मात्र से हम जन्म-मरण के दुःखों से बहुत ही पीडित हैं और प्रमाण-विपर्यय-विकल्प-निद्रा-स्मृति आदि वृत्तियों से भिन्न अथवा उसके सदृशवस्तुओं से भिन्न; हमलोगों का उपकार चाहते हुए, परमेश्वर १. जिनकी चारों ओर से बाहरी समस्त 'प्रमाण-विपर्यय-विकल्प-निद्रा-स्मृति' वृत्तियां अस्त हो चुकी हैं वे उदासीन कहलाते हैं इससे विपरीत अपर्युदास वृत्तियाँ होती हैं। अथवा सदृश वस्तु का परिग्रहण करना ही पर्युदास है, अपने से विपरीत वृत्तियों का ग्रहण नहीं करना ही उदासीन भाव है। अर्थात् किसी अन्य में अपनी वृत्ति को न रखना ही अनन्य वृत्ति कहलाता है । ३
१८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-१, का.-१ मयम् उपकारम् इच्छन्, महेश्वरस्य दास्यम् आसाद्य, समस्तसंपत्समवाप्तिहेतुं तत्प्रत्यभिज्ञाम् उपपादयति; ततश्च प्रत्यभिज्ञामेवंभूतां वयं प्राप्ता एव—इति । इत्थमेव हि अधिकारिणि शास्त्रार्थस्य बिम्बप्रतिबिम्बवत् संक्रान्तिः लोङ्लिङादीनां विषयीभवति—इति प्रथमपुरुषार्थः उत्तमपुरुषार्थे पर्यवस्यति, न तु तात्स्थ्येन; अधिकार्यनधिकारिणोः प्रतिपत्तौ विशेषाभावप्रसङ्गात् । आरोग्य- कामाः शिवां सेवन्तां सेवेध्वम्—इति वा वाक्यार्थस्य सेवामहै-इत्येवंरूपेण अधिकारिणि द्वितीय- कक्ष्यासंक्रान्तौ तृतीयकक्ष्यायामेव भाविकोटिपतितामपि पुरुषार्थसंपत्तिम् अकालकलितस्वरूपानु- प्रवेशेन स्वात्मीकृताम् अभिमन्यमाने, तत एव विततसंवित्सुन्दरपरामर्शे पूर्णताभिमानप्रतिलम्भात्, अन्यस्य तु अनेवंरूपत्वेनैव अधिकारिता तात्स्थ्यप्राणा—इति । तदास्ताम् अवान्तरमेतत् अति- गहनं च—इति स्थितमेतत् । एतेन श्लोकेन ईश्वरसामुख्यं विनेयानां प्रयोजनादिप्रतिपादनं च क्रियते—इति ॥ १ ॥ अनन्तभावसंभारभासने स्पन्दनं परम् । उपोद्घातायते यस्य तं स्तुमः सर्वदा शिवम् ॥ ननु ईश्वरस्य सिद्धिरेव कर्तव्या, केयं सिद्धिः ! न तावत् उत्पत्तिः नित्यत्वात् । नापि ईश्वर- सिद्धिकारादयस्तस्योत्पत्तिं विदधते । ज्ञप्तिः सिद्धिरिति चेत् ! अनवच्छिन्नप्रकाशस्य प्रमाणव्यापा- की दासता को पाकर, सम्पूर्ण अलौकिक सम्पत्ति प्राप्ति में हेतुरूप ईश्वर की प्रत्यभिज्ञा का उपपादन करते हैं,—ऐसी प्रत्यभिज्ञा हमलोग प्राप्त कर चुके हैं। इस प्रकार अधिकारी में ही शास्त्र का अर्थ बिम्ब-प्रतिबिम्बभाव के समान संक्रमण हो जाता है; यह ‘लोट्’ लकार और ‘लिङ्’ लकार का अर्थ है—इस प्रकार प्रथमपुरुष का अर्थ उत्तम- पुरुष के अर्थ में पर्यवसित होता है, तटस्थरूप से नहीं होता है; क्योंकि अधिकारी और अनधि- कारी के जानने में किसी तरह की विशेषता नहीं है। आरोग्य की कामना चाहने वाले भगवतीशक्ति को सेवा करें; तुम लोग सेवा करो या वाक्यार्थ के लिए उत्तमपुरुष का प्रयोग ‘सेवामहै’ हमलोग सेवा करते हैं इस प्रकार से अधिकारी में द्वितीय कक्षा का संक्रमण हो जाने पर ‘सेवेध्वम्’ इस तृतीय कक्षा में पड़ने पर आगामी कोटि ‘लोट्’ लकार में पुरुषार्थ सम्पत्ति को अकालकलित कोटि में प्रविष्ट कराकर अपने अधीन कर उसे मानने पर उत्तमपुरुष का प्रयोग होता है, इसलिए खूब विस्तृत संवित् सुन्दरता के परामर्श में पूर्णता ला देने के कारण दूसरे का तो उससे भिन्न तटस्थरूप में अधिकारिता है। रहने दो, इसको यह तो बड़ा भीतर घुसा हुआ और अति कठिन भी है जिस परिस्थिति में है उसी में रखना ही समुचित दिखायी देता है। इस श्लोक से शिष्यों के प्रयोजन आदि का और ईश्वर की सन्मुखता का प्रतिपादन विषय भी हो जाता है ॥ १ ॥ अनन्त भावपदार्थ समूह को प्रकाशित करने में जिसका सर्वश्रेष्ठ स्पन्दन-उपोद्घात होता है। उस शिव की हम लोग स्तुति करते हैं ॥ अब शंका करते हैं कि ईश्वर की सिद्धि करनी चाहिए, किन्तु कौन सी यह सिद्धि है ? ईश्वर की उत्पत्ति हो नहीं सकती है क्योंकि ईश्वर नित्य-शुद्ध-बुद्ध स्वभावरूप है और न तो ईश्वर की सिद्धि करने वाले लोग उनको उत्पत्ति के विषय में कुछ बता भी सकते हैं ठीक ढंग से, या उत्पत्ति दिखा सकते हैं। ईश्वर के विषय में ज्ञानरूप मात्र सिद्धि सम्भव हो