ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-१, का.-१ इति । उपपत्तिः संभवः, तां संभवन्तीं तत्समर्थाचरणेन प्रयोजकव्यापारेण संपादयामि । तथाहि— संभवति तावत् असौ, अविच्छिन्नप्रकाशत्वात्; निरोधकाभिमतमायाशक्तिसमपसारणमात्रमेव तु तत्र उपपादनम् । प्रत्यभिज्ञोपपत्तौ स्वपरविभागाभावे तदपेक्षं कर्त्रभिप्रायोदि असंभाव्यम् इति परस्मैपदप्रयोगः । इत्थं च अत्र श्लोके योजना,—महेश्वरस्य दास्यं समस्तसंपल्लाभहेतुं कथंचित् आसाद्य, जनस्यापि कथंचित् तत्प्रत्यभिज्ञाम् आसाद्य प्रापय्य, उपकारं समस्तसंपल्लाभहेतुभूतं महेश्वरदास्यात्मकम् इच्छन्, तामेव समस्तसंपत्समवाप्तिहेतुकां तत्प्रत्यभिज्ञाम् उपपादयामि । ‘आसाद्य’ इति आवृत्तियोजना द्वौ णिचौ । इयति च व्याख्याने वृत्तिकृता भरो न कृतः, तात्पर्य- व्याख्यानात् । यदुक्तम् ‘संवृतसूत्रनिर्देशविवृतिमात्रव्यापारायाम् ।’ इति । टीकाकारेणापि हो जाता है, इस प्रत्यभिज्ञा का मैं उपपादन करता हूँ। उपपत्ति सम्भव होने से उस सम्भावना की ठीक-ठीक समझ बूझकर प्रयोजक-व्यापार से संपन्न करता हूँ। क्योंकि वैसे तो यह संभव भी हो सकता है, अविच्छिन्न प्रकाशरूप होने के कारण; वहाँ पर तो केवल निरोध करनेवाली अभीष्ट मायाशक्ति ही है, उसे वहाँ से दूर कर देना ही उपपादन है । प्रत्यभिज्ञा की उपपत्ति हो जाने पर तो अपना और परायेपन का विभाग ही नहीं रह जाता और उसकी अपेक्षा रखनेवाले कर्त्ता के अभिप्रायोदि की संभावना भी नहीं बन सकती; इसी कारण ‘उपपादयामि’ इस में परस्मैपद का प्रयोग हुआ है। इस प्रकार इस श्लोक में जोड़ना चाहिए, संपूर्ण संपत्ति की प्राप्ति में हेतुरूप उस महेश्वर के प्रति दास्य भाव रखना ही एक मात्र लक्ष्य है। महेश्वर की दास्यभावना को किसी तरह प्राप्त करके और अन्य लोगों में भी उस महेश्वर की किसी प्रकार पहचान कराकर, समस्त संपत्ति की प्राप्ति में खास कारणरूप से महेश्वर के प्रति दास्यभावना रखना ही एकमात्र कारण है इसे भी दास्यभाव मिल जाये—ऐसी उपकार करने की भावना को आगे रखते हुए जो संपूर्ण संपत्ति की प्राप्ति में हेतुभूत प्रत्यभिज्ञा है उसका मैं उपपादन करता हूँ। ‘आसाद्य’ इस प्रयोग में ‘देहली-दीपक’ न्याय से एकबार प्रयोग करने पर भी एक साथ दो या दो से अधिक अर्थ का भी क्रम से बोध होता है क्योंकि [ आसाद्य ] इसमें दो ‘णिच्’ प्रत्यय हैं और वृत्तिकार ने इतने व्याख्यान में कोई विशेष भार नहीं दिया है, चूँ कि इसके तात्पर्य मात्र की ही व्याख्या करनी थी । जिसके बारे में कहा भी गया है कि—‘ढका हुआ जो सूत्र का अर्थ है उसका निर्देश करने के लिए ही यह विवरण मात्र व्यापारवाली टीका है ।’ १. जहाँ पर कर्ता के अभिप्राय से क्रियाफल की विवक्षा की जाती है वहाँ पर आत्मनेपद में क्रिया होती है, किन्तु जिसमें वह नहीं होती है उसमें तो ‘शेषात् कर्तरि परस्मैपदम्’ इससे परस्मैपद में होती है । किन्तु प्रत्यभिज्ञा ज्ञान के उपाय को बताने वाले ग्रन्थ कर्ता में समस्त सम्पत्ति के कारण रूप परमेश्वर की दास्यभावना की प्राप्ति से, पूर्णता में डूब जाने से स्व-पर विभाग गल गया है, इसी कारण कर्ता का अभिप्राय क्रियाफल विनष्ट हो जाता है अर्थात् कर्ता को अभीष्ट अपने लिये नहीं रह जाता है । जिससे ‘तत्प्रत्यभिज्ञामुपपादयेऽहम्’ यह प्रयोग नहीं होता है । अपने आपके लिए किञ्चित् करने योग्य एवं अपेक्षणीय भी नहीं रह जाता, क्योंकि समस्त एषणायें ज्ञान के द्वारा विनष्ट हो जाती हैं, परोपकारार्थ ही मात्र इच्छा अवशेष रह जाती है, जो अपने स्वार्थ में डूबे हुए हैं वे परोपकारार्थ नहीं कर सकते हैं, इसी कारण परस्मैपद का प्रयोग ‘तत्प्रत्यभिज्ञामुपपादयामि’ इस अंश में किया गया है ।