भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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अ.-१, आ.-१, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १३ इव विकल्पित इव लक्ष्यते—इति वक्ष्यते। प्रत्यभिज्ञा च—भातभासमानरूपानुसंधानात्मिका, स एवायं चैत्र—इति प्रतिसंधानेन अभिमुखीभूते वस्तुनि ज्ञानम्; लोकेऽपि एतत्पुत्र एवंगुण एवंरूपक इत्येवं वा, अन्ततोऽपि सामान्यात्मना वा ज्ञातस्य पुनरभिमुखीभावावसरे प्रतिसंधित- प्राणितमेव ज्ञानं प्रत्यभिज्ञा—इति व्यवह्रियते; नृपतिं प्रति प्रत्यभिज्ञापितोऽयम्—इत्यादौ। इहापि प्रसिद्धपुराणसिद्धान्तागमानुमानादिविदितपूर्णशक्तिस्वभावे ईश्वरे सति स्वात्मन्यभि- मुखीभूते तत्प्रतिसंधानेन ज्ञानम् उदेति, नूनं स एव ईश्वरोऽहम्—इति, तामेनाम् 'उपपादयामि' विच्छिन्न सा, विकल्पित सा दिखायी दे रहा है इस विषय में आगे और भी विचार करेंगे। प्रत्यभिज्ञा उसी का नाम है जो पूर्व में आभासित होता रहा एवं इस समय में भी भासित हो रहा है; पूर्वकाल एवं इस वर्तमान समयके काल का सम्प्रति वर्तमान में एकरूप से मिलकर भासित होने का नाम ही प्रत्यभिज्ञा है, जैसे यह वही चैत्र है; ऐसा पूर्वकाल के ज्ञान को वर्तमानकाल में ऐक्य कर सामने स्थित वस्तु पदार्थ में ज्ञान कराती है वही प्रत्यभिज्ञा है; यह लोक व्यवहार में भी देखा जाता है कि इसका पुत्र इन गुणगरिमाओं से सम्पन्न है एवं रूप यौवन से युक्त है; जब कालान्तर में सामान्यरूप से अथवा ज्ञात पदार्थ के अपने सामने आ जाने पर पूर्व में जैसा ज्ञान हुआ था वैसा वर्तमानकाल का ज्ञान सम्मुखस्थ वस्तु पदार्थ में मिला देने से यही भान होता है कि यह वही वस्तु पदार्थ है जो मैंने पूर्व में देखा था, जैसा कि राजा से इनकी पहचान करा दी है। जिसका आगमाधिकार में निरूपण किया जायेगा। इति प्रकटितो मया सुघट एष मार्गो नवो महागुरुभिरुच्यते स्म शिवदृष्टिशास्त्रे यथा। तदत्र निदधत्पदं भुवनकर्तृतामात्मनो विभाव्य शिवतामयीमनिशमाविशन् सिद्ध्यति ॥ १ ॥ ( ४ अ० ३ आ० १६ श्लोक ) 'तस्य' उस महेश्वर की 'प्रत्यभिज्ञा' पहचान होना; जो कि अपने स्वरूप के ज्ञान को प्रत्यभिज्ञा कहा जाता है; मैं वही महेश्वर हूँ—ऐसी प्रत्यभिज्ञा-पहचान करना कि मैं उस महेश्वर से अभिन्न हूँ। जीवात्मा ज्ञात पदार्थ को जानता हुआ भी मोहवशात् फंसकर नहीं जानता हुआ सा होकर जब फिर से अपनी ओर हृदयंगमीभाव से ज्ञान करने का नाम ही प्रत्यभिज्ञा है। अथवा ज्ञात वस्तुपदार्थ को भी विस्मृत करने के जैसा और उस भूले हुए को पुनः प्राप्तकर लेना, केवल स्मर्य- माणरूप से नहीं, अपितु प्रत्यक्ष स्पष्टरूप से जानकारी प्राप्तकर लेना ही प्रत्यभिज्ञा कहलाती है। यह वही चैत्र है जो मैंने 'सौराष्ट्र' में देखा था जो कि आज उसे अपनी आँखों के सामने देख रहा हूँ—इस प्रकार सतत निरन्तर आत्म-तत्त्व भासित होने पर भी मोह के कारण अपने आपको दूसरा ही मान लिया है कि मैं परिच्छिन्न इत्यादि हूँ। इस प्रत्यभिज्ञा शास्त्र में भी प्रसिद्ध पुराण, सिद्धान्त, आगम और अनुमानादि प्रमाणों से सिद्ध विदित ज्ञान का उदय पूर्णशक्ति सम्पन्न ईश्वर के अपनी तरफ उन्मुख होने से और उसका प्रतिसंधान करने से होता है, निश्चय ही ठीक वही ईश्वर मैं स्वयं हूँ—ऐसा जीवात्मा को बोध