भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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१२] ईश्‍वरप्रत्‍यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-१, का.-१ प्रकाशः, तस्याः सम्यक् 'अवाप्तिः' विमर्शरूढिः, सैव 'हेतुः' यस्यां तत्प्रत्यभिज्ञायाम्, तथाहि— स्फुटतरभासमाननीलसुखादिप्रमान्वेषणद्वारेणैव पारमार्थिकप्रमातृलाभ इह उपदिश्यते । यदाह अन्यत्र—'इदमित्यस्य विच्छिन्नविमर्शस्य कृतार्थता । या स्वस्वरूपे विश्रान्तिर्विमर्शः सोऽहमित्ययम्॥' इति । तथा तत्रैव—'प्रकाशस्यात्मविश्रान्तिर्रहंभावो हि कीर्तितः । उक्ता च सैव विश्रान्तिः सर्वा- पेक्षानिरोधतः ।। स्वातन्त्र्यमथ कर्तृत्वं मुख्यमीश्वरतापि च ।' इति । इयता च उपाये अतिदुर्घट- त्वाशङ्का पराकृता । यदन्ते निरूपयिष्यति 'सुघट एष मार्गो नवः' ( ४ अ० ३ आ० १६ श्लो० ) इति । 'तस्य' महेश्वरस्य 'प्रत्यभिज्ञा' प्रतीपमात्माभिमुख्येन ज्ञानं प्रकाशः प्रत्यभिज्ञा । प्रतीपम् इति—स्वात्मावभासो हि न अननुभूतपूर्वोऽविच्छिन्नप्रकाशत्वात् तस्य, स तु तच्छक्त्यैव विच्छिन्न पदार्थ भाव और अभाव वाले हैं जो कि 'संपत्' सम्पत्ति सिद्धि होती है उसकी अच्छी तरह से प्राप्ति कर लेना, वही कारण जिस प्रत्यभिज्ञा में है, इससे प्रत्यभिज्ञा की विशेषणता इस पद से परामृष्ट होती है स्पष्टरूप से भासित होनेवाले नीलसुखादि पदार्थों के प्रमा अन्वेषण द्वारा पारमार्थिकता का प्रमाता को लाभ हो जाता है—ऐसा यहाँ पर उपदेश दिया जाता है। इसे अन्यत्र भी बताया गया है— यह जो 'इदम्' विच्छिन्न विमर्श है उसकी कृतार्थता तभी होती है जब कि अपने में स्वरूप का ज्ञान न होकर विश्राम ले लेता है 'सोऽहम्' वही मैं हूँ इस स्थिति तक पहुँच जाना है। क्योंकि प्रकाश का अपने स्वरूप में विश्राम हो जाना ही अहम्भाव कहलाता है और सभी अपेक्षाओं को रोक देनेवाली वही विश्रान्ति कही भी गयी है। इसको स्वातन्त्र्य, मुख्यकर्तृत्व और ईश्वरता इत्यादि नामों से कहते हैं। इतने ग्रन्थ से उपाय में जो अतिदुर्घटकारिता की आशङ्का थी उसे दूर कर दिया गया है। परिच्छिन्नता को छोड़कर नित्य, शुद्ध, व्यापक भाव को जान लेना ही प्रत्यभिज्ञा है। इसके विषय में कहा भी है— स्मरणानुभवारूढा सामानाधिकरण्यधीः । संस्कारेन्द्रियजन्या च प्रत्यभिज्ञा प्रकीर्तिता ॥ 'स्मरण और अनुभव में आरूढ हुई सामानाधिकरण्य बुद्धि और संस्कार इन्द्रिय से जन्य प्रत्यभिज्ञा कहलाती है।' 'प्रतीपमिति'—ज्ञात स्वात्मस्वरूप का अवभास होने का नाम ही प्रतीप है क्योंकि जिसका पूर्व में अनुभव नहीं हुआ था उसका अविच्छिन्न प्रकाश होने के कारण मायाशक्ति से वह तो १. प्रकाश का जीवितभूत स्वरूप विमर्श ही अहं भाव नाम वाला है, जब कि यह अपना और दूसरे के प्रकाश करने में अपने से भिन्न किसी को अपेक्षा नहीं रखता है। इदन्ता तो अपने आप को प्रकाशित करने में असमर्थ है तब फिर दूसरे की तो बात करनी ही दूर रही। अहं भाव का मुख्य धर्म व्यापकत्व, नित्यत्वादि है और यह दूसरे धर्म समूह का भी आक्षेप कर लेगा, विमर्शक होने से ही स्व-पर-प्रकाश रूप में रहना ही अनन्य उन्मुख तृप्ति से किये गये अपेक्षा न रहने के कारण विश्रान्ति रूप स्वरूप की प्राप्ति हो जाती है। इसी स्वातन्त्र्यरूपता से उस-उस देश कालादि के अवभास में सहस्र उल्लास का सामर्थ्यबल आ जाता है जब कि उस समय ईषणादि उपाधिवशात् अनेक शक्ति-योग के द्वारा कर्तृत्वादि शब्दों से व्यवहार होता हुआ देखा जाता है। इसी को अहं प्रकाश वाला कहा जाता है जिसे प्रकाश करने के लिए अन्य की अपेक्षा नहीं पड़ती है।