भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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अ.-१, आ.-१, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ११ 'यमर्थमधिकृत्य पुरुषः प्रवर्तते तत् प्रयोजनम्' इति । 'इच्छन्' इति इच्छाविषयीकृतस्य फलस्य प्रवृत्तौ हेतुत्वं शत्रा दर्शयति । इच्छाशक्तिश्च उत्तरोत्तरम् उच्छूनस्वभावतया क्रियाशक्तिपर्यन्तोभवति—इति दर्शयिष्यामः । उपशब्दः समीपार्थः, तेन जनस्य परमेश्वरधर्मसमीपताकरणम् अत्र फलम् । तत एव आह—'समस्त' इति परमेश्वरतालाभे हि समस्ताः संपदः तन्निःष्यन्दमय्यः संपन्ना एव, रोहणलाभे रत्नसंपद इव । प्रमुषितस्वात्मपरमार्थस्य हि किम् अन्येन लब्धेन, लब्धतत्परमार्थस्यापि तदन्यत् नास्ति यद् वाञ्छनीयम् । यदुक्तं ग्रन्थकृतैव 'भक्तिलक्ष्मोसमुद्घानां किमन्यदुपयाचितम् । एनया वा दरिद्राणां किमन्यदुपयाचितम् ।।' इति । एवं षष्ठीसमासेन प्रयोजनमुक्तम्, बहुव्रीहिणा तु उपायः सूच्यते । 'समस्तस्य' भावाभावरूपस्य बाह्याभ्यन्तरस्य नीलसुखादेः या 'संपत्' संपत्तिः सिद्धिः तथात्व- 'यमर्थमधिकृत्य पुरुषः प्रवर्तते तत् प्रयोजनम्' जिस अर्थ = विषय को लेकर प्राणियों की प्रवृत्ति होती हो उसे प्रयोजन कहते हैं । 'इच्छन्' इच्छा के विषय हुए फल की सिद्धि में हेतु 'शतृप्रत्यय' से दिखाया गया है [ 'लक्षणहेत्वोः क्रियायाः' ( ३-२-१२६ ) इस पाणिनीय सूत्र से क्रिया के हेतु अर्थ में शतृप्रत्यय हुआ ] और इच्छाशक्ति उत्तरोत्तर बढ़ती हुई क्रियाशक्ति में परिणत हो जाती है—यह हम क्रियाधिकार में दिखायेगें । 'उप' शब्द का समीप अर्थ है, इसलिए यह सिद्ध होता है कि मनुष्य को ईश्वर धर्म के समीप पहुँचा देना ही यहाँ पर फल है । इसी से कहा है कि 'समस्त' सम्पूर्ण रूप से ईश्वरता के लाभ हो जाने पर सारी सम्पत्तियाँ उसका स्रोत हो जाती है। जिसका स्वार्थरूप परमार्थ है उसका मायाशक्ति से यदि नाश हो जाता है तब फिर अणिमा, लघिमा आदि अष्टसिद्धि नवनिधिरूप सिद्धि मिल भी जाय, तो भी उससे कौन सा प्रयोजन सिद्ध होनेवाला है, और जिसको पूर्ण परमार्थ प्राप्त हो चुका है उसके लिए अन्य कोई आकांक्षा-वाञ्छा नहीं रह जाती है। जो कि ग्रन्थकार ने स्वयं ही कहा है कि जिस व्यक्ति को भक्तिरूपी लक्ष्मी मिल गयी है उसके लिए दूसरा फिर माँगना क्या रह जाता है या जो दरिद्र है उसके लिए फिर माँगना भी व्यर्थ है।' इस प्रकार षष्ठी समास से प्रयोजन कह दिया गया और बहुव्रीहि समास से उपाय सूचित होता है । 'समस्तस्य' समस्त शब्द से यह द्योतित होता है कि बाह्य आभ्यन्तररूप नीलसुखादि दूसरों का उपकार करने की इच्छा कैसे रख सकता है ? अपने स्वार्थ भाव के रहने पर ही तो दूसरों का उपकार हो पाता है। स्वं कर्तव्यं किमपि कलयँल्लोक एष प्रयत्नात् । नो पारार्थ्यं प्रति घटयते कांचन स्वात्मवृत्तिम् ॥ यस्तु त्यक्ताखिलभवमलः प्राप्तसंपूर्णबोधः । कृत्यं तस्य स्फुटमिदमपल्लोककर्त्तव्यमात्रम् ॥ सांसारिक जीव बड़े यत्नपूर्वक अपने कार्य में लगा हुआ होने के कारण दूसरों के लिए कुछ भी तो नहीं करता है क्योंकि अपने स्वार्थ में डूबा हुआ है समस्त गुणदोषों से दूर हटकर, सम्पूर्ण ज्ञान को प्राप्त कर लेता है उसका कर्तव्य मात्र दूसरों का उपकार करना ही शेष रह जाता है।