ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 33, कुल 343 में से
संदर्भ में पढ़ें१० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-१, का.-१ धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥' इति । परमगुरुपादैरपि शिवदृष्टौ— एकवारं प्रमाणेन शास्त्राद्वा गुरुवाक्यतः । ज्ञाते शिवत्वे सर्वस्थे प्रतिपत्त्या दृढात्मना ॥ करणेन नास्ति कृत्यं क्वापि भावनयापि वा । सकृज्ज्ञाते सुवर्णे किं भावनाकरणादिना ॥ सर्वदा पितृमात्रादितुल्यदाढर्येन सत्यता । इति । 'जनस्य' अनवरतजननमरणपीडितस्य इत्यनेन कृपास्पदतया उपकरणोयत्वमाह । अपिशब्दः स्वात्मनः तदभिन्नताम् आविष्कुर्वन् पूर्णत्वेन स्वात्मनि परार्थसम्पत्त्यतिरिक्तप्रयो- जनान्तरावकाशं पराकरोति । १ परार्थश्च प्रयोजनं भवत्येव तल्लक्षणयोगात्, नहि अयं दैवशापः स्वार्थ एव प्रयोजनं, न परार्थं इति; तस्यापि अतल्लक्षणयोगित्वे सति अप्रयोजनत्वात्; सम्पाद्यत्वेन अभिसंहितं यत् मुख्यतया, तत एव क्रियासु प्रयोजकं तत्प्रयोजनम् । अत एव भेदवादेऽपि ईश्वरस्य सृष्ट्यादिकरणे परार्थ एव प्रयोजनम् इति दर्शयितुं न्यायनिर्माणवेधसा निरूपितम् । अपने आप प्रसिद्ध हो जाता है—इस न्याय से । इस विषयमें 'श्रीमद्भगवद्गीता' में कहा गया है— ‘नेहातिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते । स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥’ निष्काम कर्मयोग में आरम्भ का नाश नहीं होता है एवं उल्टा फलरूप दोष भी नहीं लगता, इसलिए इस निष्काम कर्मयोगरूप धर्म का थोड़ा भी साधन भजन, संसार सागर के महान् भय से जीवात्मा को पार कर देता है । प्रमाण से, शास्त्र से या गुरुवाक्य से एक बार भी दृढ़प्रतिपत्ति पूर्वक ज्ञान हो जाने पर कि यह सारा का सारा शिवममय है—ऐसा दृढ ज्ञान हो जाने से इन्द्रियों के द्वारा कोई कृत्य ही नहीं रह जाता और न भावना से भी कोई प्रयोजन रह जाता है जैसे स्वर्ण की परीक्षा हो जाने के बाद भावनाकरण [ घिसना-आग में तपाना ] आदि करना नहीं रह जाता है । माता-पिता की जानकारी करने के लिए क्या कोई दूसरा उपाय किया जाता है ? यह तो जन्म से ही ज्ञात है कि ये हमारे माता-पिता आदि स्वजन हैं । 'जनस्य' जो निरन्तर जन्म-मरण के दुःखों से पीडित रहता है इससे कृपा का पात्र और उपकार करने योग्य है यह सब सूचित होता है । 'अपि' शब्द से अपने में अभिन्नता को प्रकट करते हुए अपने आप में पूर्णता की प्राप्ति हो जाने के कारण परार्थ सम्पत्ति के अतिरिक्त कोई दूसरा प्रयोजन नहीं रह जाता है—यह सूचित करता है । और उस ज्ञानी का एक मात्र यही प्रयोजन रह जाता है कि दूसरे का यथाशक्ति परोपकारादि कार्य करते रहें, अपना ही मात्र प्रयोजन हो—ऐसा कोई नियम नहीं होता कि दूसरे का कार्य सम्पन्न न हो अपने से, यह कोई कसम नहीं खायी है कि अपने ही स्वार्थ सिद्ध हों, और दूसरे के न हों, यदि उसमें प्रयोजन का लक्षण न घटता हो तो क्या उसे प्रयोजन नहीं कहा जायेगा; मुख्य रूप से जिसका सम्पादन किया जाय वही प्रयोजन कहलाता है वही क्रिया में प्रयोजक होता है इसी से इसी का नाम प्रयोजन है । इसीलिए भेदवाद में भी ईश्वर को सृष्टि करने में किसी अन्य का मतलब सिद्ध करना ही तो प्रयोजन है; इसीको न्यायशास्त्र के निर्माता गौतममुनि ने भी अपने न्यायदर्शन में दिखाया है— १. अपने विषय में किसी प्रकार की आकांक्षा-इच्छा न रह जाने पर तो दूसरों की उपकार करने की भावना ही मात्र शेष रूप से रह जाती है । क्योंकि परमेश्वर की दासता जिसने हृदयंगम कर ली है वे तो अपने आप में परिपूर्ण हो चुके हैं तब फिर उनके लिए कोई वस्तु प्राप्त करने की रह नहीं जाती, दूसरों का उपकार करने की भावना से ही कार्य वर्ग में प्रवृत्ति मात्र होती है, अपने स्वार्थ में डूबा हुआ व्यक्ति