भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

पृष्ठ 32, कुल 343 में से

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अ.-१, आ.-१, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ९ स्वात्मोपभोगयोग्यतां निरर्गलां गमयित्वा; इयता विदितवेद्यत्वेन परार्थे शास्त्रकरणे अधिकारो दर्शितः; अन्यथा प्रतारकतामात्रमेव स्यात् । पूर्वकाल्येन सामनन्तर्यम् अत्र विवक्षितम् । अन्यथा तु आसादनतारतम्यप्राप्तौ मायीयमलकलापसंस्कारप्रक्षये कथं परोपदेशः शक्यक्रियः । सम्भवन्ति हि मायागर्भाधिकारिणो विष्णुविरिञ्चाद्याः तदुत्तीर्णा अपि महामायाधिकृताः शुद्धाशुद्धा मन्त्र- तदीश-तन्महेशात्मानः; शुद्धा अपि श्रीसदाशिवप्रभृतयः । ते तु यदीयैश्वर्यविप्रुड्भिरीश्वरीभूताः स भगवान् अनवच्छिन्नप्रकाशानन्दस्वात्तन्त्र्यपरमार्थो महेश्वरः, तस्य 'दास्यम्' इत्यनेन तत्प्रत्य- भिज्ञोपपादनस्य महाफलत्वम् आसूत्रयति । दीयते अस्मै स्वामिना सर्वं यथाभिलषितम् इति दासः, तस्य भाव इत्यनेन परमेश्वररूपस्वातन्त्र्यपात्रता उक्ता । 'जनस्येति' यः कश्चित् जायमानः तस्य, इत्यनेन अधिकारिविषयो नात्र कश्चिन्नियम इति दर्शयति, यस्य यस्य हि इदं स्वरूपप्रथनं तस्य तस्य महाफलं, प्रथनस्यैव परमार्थफलत्वात्, तस्य च प्रतिबन्धकसंमतैरप्रतिबन्धनीयत्वात्, नहि प्रथितमप्रथितमिति न्यायात् । तदुक्तम्, 'नेहौतिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते । स्वल्पमप्यस्य भासित हुए का पुनः स्वरूप के साथ ऐक्यभाव कर देना विमर्शन कहलाता है ] 'आसाद्येति' चारों ओर से परिपूर्णरूप की प्राप्ति कर अपने उपभोग के योग्य बनाकर; सारे वेद्यभावों को जानकर दूसरे के लिए शास्त्रोपदेश करने में अधिकार प्राप्त करना दिखाया गया है; अन्यथा जगत् को ठगना मात्र ही होता है । पूर्व काल के साथ मेल कराने के लिए उसके बाद यह है—ऐसा समझना चाहिए । यदि ऐसी बात नहीं है तो आसादन की तारतम्यता [तारतम्य शब्द क्रम के अतिशय अर्थ में रूढ है ] एक के बाद एक का होना मायीयमल समूह के संस्कार क्षय हो जाने पर फिर दूसरे के लिए उपदेश करना कैसे शक्य हो सकेगा । क्योंकि माया गर्भ के अधिकारी होने से ब्रह्मा, विष्णु आदि देव तो जरूर उपदेश दे सकते हैं। शुद्ध विद्या के नीचे एवं माया के ऊपर महामाया में वे रहते हैं। जिसमें आणवमल सुप्त रहता है जो कि महामाया के अधिकारी शुद्धा-शुद्ध, मंत्र, मंत्रेश्वर, मंत्र-महेश्वर रूप में रहते हैं उनके ऊपर केवल श्री सदाशिव प्रभृति होते हैं, वे जिनके ऐश्वर्य बिन्दु- मात्र से ईश्वर बन जाते हैं वे भगवान् अनवच्छिन्न प्रकाश-आनन्दघन-परमार्थ महेश्वर हैं, उसकी 'दास्य'—दासता बतायी गयी है इससे प्रत्यभिज्ञा का उपपादन करना महाफल सूचित किया गया है । जिनको स्वामी प्रभु ने सब अभीष्ट दे दिये हैं वे ही दास कहलाते हैं, उन्हीं का भाव दास्य है इसीलिए वे परमेश्वर के साथ स्वातन्त्र्य के पात्र बन जाते हैं—ऐसा कहा गया है । 'जनस्येति' जो कोई पैदा होता है उसका इससे अधिकारी सूचित होता है इसमें कोई नियम जाति-वर्ग का नहीं उठता है कि व्यक्ति विशेष को ही इसका लाभ हो और अन्य किसी को न हो; किन्तु सभी को समानरूप से इसका लाभ मिलता है—ऐसा दिखाया गया है । जिस-जिस को इसके स्वरूप का विस्तार प्राप्त हो जाता है—उस-उस को महाफल का आस्वादन मिलता है, और प्रतिबन्धक की सम्मति से नहीं लिखा गया है क्योंकि जो नहीं लिखा जाता है वह १. इस आत्मज्ञान की साधना में क्रम-व्यतिक्रम कुछ भी नहीं होता क्योंकि प्रमाद का अभाव होने के कारण जैसे अति-उष्ण तैल की कढ़ाई में पड़ा हुआ चन्दन का एक बूँद भी शीघ्र ही तैल को शीतल कर देता है इस प्रकार थोड़ी-सी भी योग-बुद्धि से की हुई साधना महाभयंकर संसार को विनष्ट कर देती है । २

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