भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

पृष्ठ 31, कुल 343 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 31

८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-१, का.-१ स चायं द्वितीयः कार्यकारणभावो लौकिकान्वयव्यतिरेकसिद्धप्रसिद्धकार्यकारणभाव- विलक्षणत्वात् स्फुटेन रूपेणासंवेद्यमानः कादाचित्कवस्तुसद्भावावभासोन्नीयमानपरमार्थः अतिदुर्घटकारित्वलक्षणैश्वर्यविजृम्भाभाविताद्भुतभावः प्रथमकोटिसम्भावना शून्यः कालिकाकारस्व- प्रकाशावरणनिराकरणमनोरथशतदुष्प्राप इत्येवं प्रकारः थमा द्योतकनिपातसहितेन निरूपितः ‘कथंचिदिति’ केनचिच्च प्रकारेण परमेश्वराभिन्नगुरुचरणसमाराधनेन परमेश्वरघटितेनैव । यथोक्तम् ‘सम्बन्धोऽतीव दुर्घटः····।’ इति । ‘आसाद्येति’आ समन्तात् परिपूर्णरूपतया सादयित्वा, सन्तानरूप प्रवाह ही तत्त्वसार है—ऐसा बौद्धों का मत है और जिसका बुद्धितत्त्व में ही पर्यव- सान होता है । कोई-कोई वेदान्ती प्राण को ही आत्मा मानते हैं । अभाव ब्रह्मावादी असद्-रूप से उसे कहते हैं । माध्यमिक शून्यवादी बौद्ध भी तो इसी को शून्य मानते हैं । पञ्चरात्रमत में ‘परा’ प्रकृति भगवान् वासुदेव है । अग्नि से निकली हुई चिनगारी की तरह भगवान् वासुदेव से जीव निकलते हैं । ‘परा’ प्रकृति में परिणाम स्वीकार करने से अव्यक्त में इनका समावेश है । सांख्यादि मतवाले ‘विज्ञानाकल [ जो मायातत्त्व से ऊपर शुद्ध विद्यातत्त्व के नीचे रहने वाला प्रमाता वर्ग ] की भूमिका स्वीकार करते हैं ‘सदेव सोम्य इदमग्र आसीत्’ एक सद्रूप अद्वैत तत्त्व ही सृष्टि के पूर्व में था; इसे वेदान्ती मानते हैं। इनका समावेश ईश्वरतत्त्व [ जिसमें एकाधिकरणरूप से विश्व की प्रतीति की व्यवस्था हो ] में होता है, शब्द तत्त्वमय पश्यन्तीरूप आत्मतत्त्व को वैयाकरण लोग मानते हैं इनका समावेश सदाशिवतत्त्व [ शिवशक्ति के योग से स्फुरित अहन्ता प्रधान कारणतत्त्व ] में हो जाता है । ] वह दूसरा कार्य-कारणभाव लौकिक अन्वयव्यतिरेक से सिद्ध है जो प्रसिद्ध कार्य- कारणभाव से विलक्षण स्पष्ट रूप से नहीं मालूम पड़ने वाला कभी भासित होने तथा कभी न होने के कारण इसकी परमार्थता का अनुमान करना पड़ता है इसलिए यह अति दुर्घटकारी ऐश्वर्य से युक्त होकर अद्भुत भाव वाला होता है, प्रथम कोटि सम्भावना से शून्यकालिक आकार के स्वभाव आवरण का निराकरण सैकड़ों मनोरथों से भी करना कठिन है। इस प्रकार असमर्थता का सूचक ‘थमा’ में थम यह द्योतक निपात सहित निरूपण किया हुआ है, ‘कथञ्चित्’ इसका यही अर्थ होता है कि परमेश्वर से अभिन्न गुरु-[ सद्गुरु की प्राप्ति होना अत्यन्त कठिन है ] चरण की सेवा से ही परमेश्वर की तन्मयता को प्राप्त कर सकते हैं। जैसा कि इस विषय में कहा भी है । ‘सम्बन्धोऽतीव दुर्घटः·········।’ [ अपने स्वरूप से भिन्न-भिन्न रूपों में विश्व का अवभासन करना ही अत्यन्त दुर्घट है और १. इसी द्वितीय कार्य कारण भाव में ‘कथञ्चित्’ शब्द से कहे शब्द प्रवृत्तिनिमित्तत्व का परामर्शान करते हैं—‘स च अयमिति’ इस प्रतीक से । क्योंकि माय्रीय कार्य-कारण भाव स्वप्न काल में होने वाले कुम्भ- कार के घट बनाने की तरह [ स्वप्नगत-कुलालघट-न्यायेन ] स्वातन्त्र्य सार रूप से भासन रूप संविद्रूप में रहने वाला पारमार्थिक कर्तृत्वत्मक कार्य-कारण भाव की भित्ति पर विश्रान्त होकर मायामय संसार में हृदयंगम होने के कारण प्रसिद्ध है किन्तु जहाँ पर वह दिखायी नहीं देता है। वहाँ पर वह पारमार्थिक ही है ।