ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-१, का.-१ स चायं द्वितीयः कार्यकारणभावो लौकिकान्वयव्यतिरेकसिद्धप्रसिद्धकार्यकारणभाव- विलक्षणत्वात् स्फुटेन रूपेणासंवेद्यमानः कादाचित्कवस्तुसद्भावावभासोन्नीयमानपरमार्थः अतिदुर्घटकारित्वलक्षणैश्वर्यविजृम्भाभाविताद्भुतभावः प्रथमकोटिसम्भावना शून्यः कालिकाकारस्व- प्रकाशावरणनिराकरणमनोरथशतदुष्प्राप इत्येवं प्रकारः थमा द्योतकनिपातसहितेन निरूपितः ‘कथंचिदिति’ केनचिच्च प्रकारेण परमेश्वराभिन्नगुरुचरणसमाराधनेन परमेश्वरघटितेनैव । यथोक्तम् ‘सम्बन्धोऽतीव दुर्घटः····।’ इति । ‘आसाद्येति’आ समन्तात् परिपूर्णरूपतया सादयित्वा, सन्तानरूप प्रवाह ही तत्त्वसार है—ऐसा बौद्धों का मत है और जिसका बुद्धितत्त्व में ही पर्यव- सान होता है । कोई-कोई वेदान्ती प्राण को ही आत्मा मानते हैं । अभाव ब्रह्मावादी असद्-रूप से उसे कहते हैं । माध्यमिक शून्यवादी बौद्ध भी तो इसी को शून्य मानते हैं । पञ्चरात्रमत में ‘परा’ प्रकृति भगवान् वासुदेव है । अग्नि से निकली हुई चिनगारी की तरह भगवान् वासुदेव से जीव निकलते हैं । ‘परा’ प्रकृति में परिणाम स्वीकार करने से अव्यक्त में इनका समावेश है । सांख्यादि मतवाले ‘विज्ञानाकल [ जो मायातत्त्व से ऊपर शुद्ध विद्यातत्त्व के नीचे रहने वाला प्रमाता वर्ग ] की भूमिका स्वीकार करते हैं ‘सदेव सोम्य इदमग्र आसीत्’ एक सद्रूप अद्वैत तत्त्व ही सृष्टि के पूर्व में था; इसे वेदान्ती मानते हैं। इनका समावेश ईश्वरतत्त्व [ जिसमें एकाधिकरणरूप से विश्व की प्रतीति की व्यवस्था हो ] में होता है, शब्द तत्त्वमय पश्यन्तीरूप आत्मतत्त्व को वैयाकरण लोग मानते हैं इनका समावेश सदाशिवतत्त्व [ शिवशक्ति के योग से स्फुरित अहन्ता प्रधान कारणतत्त्व ] में हो जाता है । ] वह दूसरा कार्य-कारणभाव लौकिक अन्वयव्यतिरेक से सिद्ध है जो प्रसिद्ध कार्य- कारणभाव से विलक्षण स्पष्ट रूप से नहीं मालूम पड़ने वाला कभी भासित होने तथा कभी न होने के कारण इसकी परमार्थता का अनुमान करना पड़ता है इसलिए यह अति दुर्घटकारी ऐश्वर्य से युक्त होकर अद्भुत भाव वाला होता है, प्रथम कोटि सम्भावना से शून्यकालिक आकार के स्वभाव आवरण का निराकरण सैकड़ों मनोरथों से भी करना कठिन है। इस प्रकार असमर्थता का सूचक ‘थमा’ में थम यह द्योतक निपात सहित निरूपण किया हुआ है, ‘कथञ्चित्’ इसका यही अर्थ होता है कि परमेश्वर से अभिन्न गुरु-[ सद्गुरु की प्राप्ति होना अत्यन्त कठिन है ] चरण की सेवा से ही परमेश्वर की तन्मयता को प्राप्त कर सकते हैं। जैसा कि इस विषय में कहा भी है । ‘सम्बन्धोऽतीव दुर्घटः·········।’ [ अपने स्वरूप से भिन्न-भिन्न रूपों में विश्व का अवभासन करना ही अत्यन्त दुर्घट है और १. इसी द्वितीय कार्य कारण भाव में ‘कथञ्चित्’ शब्द से कहे शब्द प्रवृत्तिनिमित्तत्व का परामर्शान करते हैं—‘स च अयमिति’ इस प्रतीक से । क्योंकि माय्रीय कार्य-कारण भाव स्वप्न काल में होने वाले कुम्भ- कार के घट बनाने की तरह [ स्वप्नगत-कुलालघट-न्यायेन ] स्वातन्त्र्य सार रूप से भासन रूप संविद्रूप में रहने वाला पारमार्थिक कर्तृत्वत्मक कार्य-कारण भाव की भित्ति पर विश्रान्त होकर मायामय संसार में हृदयंगम होने के कारण प्रसिद्ध है किन्तु जहाँ पर वह दिखायी नहीं देता है। वहाँ पर वह पारमार्थिक ही है ।
अ.-१, आ.-१, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ९ स्वात्मोपभोगयोग्यतां निरर्गलां गमयित्वा; इयता विदितवेद्यत्वेन परार्थे शास्त्रकरणे अधिकारो दर्शितः; अन्यथा प्रतारकतामात्रमेव स्यात् । पूर्वकाल्येन सामनन्तर्यम् अत्र विवक्षितम् । अन्यथा तु आसादनतारतम्यप्राप्तौ मायीयमलकलापसंस्कारप्रक्षये कथं परोपदेशः शक्यक्रियः । सम्भवन्ति हि मायागर्भाधिकारिणो विष्णुविरिञ्चाद्याः तदुत्तीर्णा अपि महामायाधिकृताः शुद्धाशुद्धा मन्त्र- तदीश-तन्महेशात्मानः; शुद्धा अपि श्रीसदाशिवप्रभृतयः । ते तु यदीयैश्वर्यविप्रुड्भिरीश्वरीभूताः स भगवान् अनवच्छिन्नप्रकाशानन्दस्वात्तन्त्र्यपरमार्थो महेश्वरः, तस्य 'दास्यम्' इत्यनेन तत्प्रत्य- भिज्ञोपपादनस्य महाफलत्वम् आसूत्रयति । दीयते अस्मै स्वामिना सर्वं यथाभिलषितम् इति दासः, तस्य भाव इत्यनेन परमेश्वररूपस्वातन्त्र्यपात्रता उक्ता । 'जनस्येति' यः कश्चित् जायमानः तस्य, इत्यनेन अधिकारिविषयो नात्र कश्चिन्नियम इति दर्शयति, यस्य यस्य हि इदं स्वरूपप्रथनं तस्य तस्य महाफलं, प्रथनस्यैव परमार्थफलत्वात्, तस्य च प्रतिबन्धकसंमतैरप्रतिबन्धनीयत्वात्, नहि प्रथितमप्रथितमिति न्यायात् । तदुक्तम्, 'नेहौतिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते । स्वल्पमप्यस्य भासित हुए का पुनः स्वरूप के साथ ऐक्यभाव कर देना विमर्शन कहलाता है ] 'आसाद्येति' चारों ओर से परिपूर्णरूप की प्राप्ति कर अपने उपभोग के योग्य बनाकर; सारे वेद्यभावों को जानकर दूसरे के लिए शास्त्रोपदेश करने में अधिकार प्राप्त करना दिखाया गया है; अन्यथा जगत् को ठगना मात्र ही होता है । पूर्व काल के साथ मेल कराने के लिए उसके बाद यह है—ऐसा समझना चाहिए । यदि ऐसी बात नहीं है तो आसादन की तारतम्यता [तारतम्य शब्द क्रम के अतिशय अर्थ में रूढ है ] एक के बाद एक का होना मायीयमल समूह के संस्कार क्षय हो जाने पर फिर दूसरे के लिए उपदेश करना कैसे शक्य हो सकेगा । क्योंकि माया गर्भ के अधिकारी होने से ब्रह्मा, विष्णु आदि देव तो जरूर उपदेश दे सकते हैं। शुद्ध विद्या के नीचे एवं माया के ऊपर महामाया में वे रहते हैं। जिसमें आणवमल सुप्त रहता है जो कि महामाया के अधिकारी शुद्धा-शुद्ध, मंत्र, मंत्रेश्वर, मंत्र-महेश्वर रूप में रहते हैं उनके ऊपर केवल श्री सदाशिव प्रभृति होते हैं, वे जिनके ऐश्वर्य बिन्दु- मात्र से ईश्वर बन जाते हैं वे भगवान् अनवच्छिन्न प्रकाश-आनन्दघन-परमार्थ महेश्वर हैं, उसकी 'दास्य'—दासता बतायी गयी है इससे प्रत्यभिज्ञा का उपपादन करना महाफल सूचित किया गया है । जिनको स्वामी प्रभु ने सब अभीष्ट दे दिये हैं वे ही दास कहलाते हैं, उन्हीं का भाव दास्य है इसीलिए वे परमेश्वर के साथ स्वातन्त्र्य के पात्र बन जाते हैं—ऐसा कहा गया है । 'जनस्येति' जो कोई पैदा होता है उसका इससे अधिकारी सूचित होता है इसमें कोई नियम जाति-वर्ग का नहीं उठता है कि व्यक्ति विशेष को ही इसका लाभ हो और अन्य किसी को न हो; किन्तु सभी को समानरूप से इसका लाभ मिलता है—ऐसा दिखाया गया है । जिस-जिस को इसके स्वरूप का विस्तार प्राप्त हो जाता है—उस-उस को महाफल का आस्वादन मिलता है, और प्रतिबन्धक की सम्मति से नहीं लिखा गया है क्योंकि जो नहीं लिखा जाता है वह १. इस आत्मज्ञान की साधना में क्रम-व्यतिक्रम कुछ भी नहीं होता क्योंकि प्रमाद का अभाव होने के कारण जैसे अति-उष्ण तैल की कढ़ाई में पड़ा हुआ चन्दन का एक बूँद भी शीघ्र ही तैल को शीतल कर देता है इस प्रकार थोड़ी-सी भी योग-बुद्धि से की हुई साधना महाभयंकर संसार को विनष्ट कर देती है । २
१० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-१, का.-१ धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥' इति । परमगुरुपादैरपि शिवदृष्टौ— एकवारं प्रमाणेन शास्त्राद्वा गुरुवाक्यतः । ज्ञाते शिवत्वे सर्वस्थे प्रतिपत्त्या दृढात्मना ॥ करणेन नास्ति कृत्यं क्वापि भावनयापि वा । सकृज्ज्ञाते सुवर्णे किं भावनाकरणादिना ॥ सर्वदा पितृमात्रादितुल्यदाढर्येन सत्यता । इति । 'जनस्य' अनवरतजननमरणपीडितस्य इत्यनेन कृपास्पदतया उपकरणोयत्वमाह । अपिशब्दः स्वात्मनः तदभिन्नताम् आविष्कुर्वन् पूर्णत्वेन स्वात्मनि परार्थसम्पत्त्यतिरिक्तप्रयो- जनान्तरावकाशं पराकरोति । १ परार्थश्च प्रयोजनं भवत्येव तल्लक्षणयोगात्, नहि अयं दैवशापः स्वार्थ एव प्रयोजनं, न परार्थं इति; तस्यापि अतल्लक्षणयोगित्वे सति अप्रयोजनत्वात्; सम्पाद्यत्वेन अभिसंहितं यत् मुख्यतया, तत एव क्रियासु प्रयोजकं तत्प्रयोजनम् । अत एव भेदवादेऽपि ईश्वरस्य सृष्ट्यादिकरणे परार्थ एव प्रयोजनम् इति दर्शयितुं न्यायनिर्माणवेधसा निरूपितम् । अपने आप प्रसिद्ध हो जाता है—इस न्याय से । इस विषयमें 'श्रीमद्भगवद्गीता' में कहा गया है— ‘नेहातिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते । स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥’ निष्काम कर्मयोग में आरम्भ का नाश नहीं होता है एवं उल्टा फलरूप दोष भी नहीं लगता, इसलिए इस निष्काम कर्मयोगरूप धर्म का थोड़ा भी साधन भजन, संसार सागर के महान् भय से जीवात्मा को पार कर देता है । प्रमाण से, शास्त्र से या गुरुवाक्य से एक बार भी दृढ़प्रतिपत्ति पूर्वक ज्ञान हो जाने पर कि यह सारा का सारा शिवममय है—ऐसा दृढ ज्ञान हो जाने से इन्द्रियों के द्वारा कोई कृत्य ही नहीं रह जाता और न भावना से भी कोई प्रयोजन रह जाता है जैसे स्वर्ण की परीक्षा हो जाने के बाद भावनाकरण [ घिसना-आग में तपाना ] आदि करना नहीं रह जाता है । माता-पिता की जानकारी करने के लिए क्या कोई दूसरा उपाय किया जाता है ? यह तो जन्म से ही ज्ञात है कि ये हमारे माता-पिता आदि स्वजन हैं । 'जनस्य' जो निरन्तर जन्म-मरण के दुःखों से पीडित रहता है इससे कृपा का पात्र और उपकार करने योग्य है यह सब सूचित होता है । 'अपि' शब्द से अपने में अभिन्नता को प्रकट करते हुए अपने आप में पूर्णता की प्राप्ति हो जाने के कारण परार्थ सम्पत्ति के अतिरिक्त कोई दूसरा प्रयोजन नहीं रह जाता है—यह सूचित करता है । और उस ज्ञानी का एक मात्र यही प्रयोजन रह जाता है कि दूसरे का यथाशक्ति परोपकारादि कार्य करते रहें, अपना ही मात्र प्रयोजन हो—ऐसा कोई नियम नहीं होता कि दूसरे का कार्य सम्पन्न न हो अपने से, यह कोई कसम नहीं खायी है कि अपने ही स्वार्थ सिद्ध हों, और दूसरे के न हों, यदि उसमें प्रयोजन का लक्षण न घटता हो तो क्या उसे प्रयोजन नहीं कहा जायेगा; मुख्य रूप से जिसका सम्पादन किया जाय वही प्रयोजन कहलाता है वही क्रिया में प्रयोजक होता है इसी से इसी का नाम प्रयोजन है । इसीलिए भेदवाद में भी ईश्वर को सृष्टि करने में किसी अन्य का मतलब सिद्ध करना ही तो प्रयोजन है; इसीको न्यायशास्त्र के निर्माता गौतममुनि ने भी अपने न्यायदर्शन में दिखाया है— १. अपने विषय में किसी प्रकार की आकांक्षा-इच्छा न रह जाने पर तो दूसरों की उपकार करने की भावना ही मात्र शेष रूप से रह जाती है । क्योंकि परमेश्वर की दासता जिसने हृदयंगम कर ली है वे तो अपने आप में परिपूर्ण हो चुके हैं तब फिर उनके लिए कोई वस्तु प्राप्त करने की रह नहीं जाती, दूसरों का उपकार करने की भावना से ही कार्य वर्ग में प्रवृत्ति मात्र होती है, अपने स्वार्थ में डूबा हुआ व्यक्ति
अ.-१, आ.-१, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ११ 'यमर्थमधिकृत्य पुरुषः प्रवर्तते तत् प्रयोजनम्' इति । 'इच्छन्' इति इच्छाविषयीकृतस्य फलस्य प्रवृत्तौ हेतुत्वं शत्रा दर्शयति । इच्छाशक्तिश्च उत्तरोत्तरम् उच्छूनस्वभावतया क्रियाशक्तिपर्यन्तोभवति—इति दर्शयिष्यामः । उपशब्दः समीपार्थः, तेन जनस्य परमेश्वरधर्मसमीपताकरणम् अत्र फलम् । तत एव आह—'समस्त' इति परमेश्वरतालाभे हि समस्ताः संपदः तन्निःष्यन्दमय्यः संपन्ना एव, रोहणलाभे रत्नसंपद इव । प्रमुषितस्वात्मपरमार्थस्य हि किम् अन्येन लब्धेन, लब्धतत्परमार्थस्यापि तदन्यत् नास्ति यद् वाञ्छनीयम् । यदुक्तं ग्रन्थकृतैव 'भक्तिलक्ष्मोसमुद्घानां किमन्यदुपयाचितम् । एनया वा दरिद्राणां किमन्यदुपयाचितम् ।।' इति । एवं षष्ठीसमासेन प्रयोजनमुक्तम्, बहुव्रीहिणा तु उपायः सूच्यते । 'समस्तस्य' भावाभावरूपस्य बाह्याभ्यन्तरस्य नीलसुखादेः या 'संपत्' संपत्तिः सिद्धिः तथात्व- 'यमर्थमधिकृत्य पुरुषः प्रवर्तते तत् प्रयोजनम्' जिस अर्थ = विषय को लेकर प्राणियों की प्रवृत्ति होती हो उसे प्रयोजन कहते हैं । 'इच्छन्' इच्छा के विषय हुए फल की सिद्धि में हेतु 'शतृप्रत्यय' से दिखाया गया है [ 'लक्षणहेत्वोः क्रियायाः' ( ३-२-१२६ ) इस पाणिनीय सूत्र से क्रिया के हेतु अर्थ में शतृप्रत्यय हुआ ] और इच्छाशक्ति उत्तरोत्तर बढ़ती हुई क्रियाशक्ति में परिणत हो जाती है—यह हम क्रियाधिकार में दिखायेगें । 'उप' शब्द का समीप अर्थ है, इसलिए यह सिद्ध होता है कि मनुष्य को ईश्वर धर्म के समीप पहुँचा देना ही यहाँ पर फल है । इसी से कहा है कि 'समस्त' सम्पूर्ण रूप से ईश्वरता के लाभ हो जाने पर सारी सम्पत्तियाँ उसका स्रोत हो जाती है। जिसका स्वार्थरूप परमार्थ है उसका मायाशक्ति से यदि नाश हो जाता है तब फिर अणिमा, लघिमा आदि अष्टसिद्धि नवनिधिरूप सिद्धि मिल भी जाय, तो भी उससे कौन सा प्रयोजन सिद्ध होनेवाला है, और जिसको पूर्ण परमार्थ प्राप्त हो चुका है उसके लिए अन्य कोई आकांक्षा-वाञ्छा नहीं रह जाती है। जो कि ग्रन्थकार ने स्वयं ही कहा है कि जिस व्यक्ति को भक्तिरूपी लक्ष्मी मिल गयी है उसके लिए दूसरा फिर माँगना क्या रह जाता है या जो दरिद्र है उसके लिए फिर माँगना भी व्यर्थ है।' इस प्रकार षष्ठी समास से प्रयोजन कह दिया गया और बहुव्रीहि समास से उपाय सूचित होता है । 'समस्तस्य' समस्त शब्द से यह द्योतित होता है कि बाह्य आभ्यन्तररूप नीलसुखादि दूसरों का उपकार करने की इच्छा कैसे रख सकता है ? अपने स्वार्थ भाव के रहने पर ही तो दूसरों का उपकार हो पाता है। स्वं कर्तव्यं किमपि कलयँल्लोक एष प्रयत्नात् । नो पारार्थ्यं प्रति घटयते कांचन स्वात्मवृत्तिम् ॥ यस्तु त्यक्ताखिलभवमलः प्राप्तसंपूर्णबोधः । कृत्यं तस्य स्फुटमिदमपल्लोककर्त्तव्यमात्रम् ॥ सांसारिक जीव बड़े यत्नपूर्वक अपने कार्य में लगा हुआ होने के कारण दूसरों के लिए कुछ भी तो नहीं करता है क्योंकि अपने स्वार्थ में डूबा हुआ है समस्त गुणदोषों से दूर हटकर, सम्पूर्ण ज्ञान को प्राप्त कर लेता है उसका कर्तव्य मात्र दूसरों का उपकार करना ही शेष रह जाता है।
१२] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-१, का.-१ प्रकाशः, तस्याः सम्यक् 'अवाप्तिः' विमर्शरूढिः, सैव 'हेतुः' यस्यां तत्प्रत्यभिज्ञायाम्, तथाहि— स्फुटतरभासमाननीलसुखादिप्रमान्वेषणद्वारेणैव पारमार्थिकप्रमातृलाभ इह उपदिश्यते । यदाह अन्यत्र—'इदमित्यस्य विच्छिन्नविमर्शस्य कृतार्थता । या स्वस्वरूपे विश्रान्तिर्विमर्शः सोऽहमित्ययम्॥' इति । तथा तत्रैव—'प्रकाशस्यात्मविश्रान्तिर्रहंभावो हि कीर्तितः । उक्ता च सैव विश्रान्तिः सर्वा- पेक्षानिरोधतः ।। स्वातन्त्र्यमथ कर्तृत्वं मुख्यमीश्वरतापि च ।' इति । इयता च उपाये अतिदुर्घट- त्वाशङ्का पराकृता । यदन्ते निरूपयिष्यति 'सुघट एष मार्गो नवः' ( ४ अ० ३ आ० १६ श्लो० ) इति । 'तस्य' महेश्वरस्य 'प्रत्यभिज्ञा' प्रतीपमात्माभिमुख्येन ज्ञानं प्रकाशः प्रत्यभिज्ञा । प्रतीपम् इति—स्वात्मावभासो हि न अननुभूतपूर्वोऽविच्छिन्नप्रकाशत्वात् तस्य, स तु तच्छक्त्यैव विच्छिन्न पदार्थ भाव और अभाव वाले हैं जो कि 'संपत्' सम्पत्ति सिद्धि होती है उसकी अच्छी तरह से प्राप्ति कर लेना, वही कारण जिस प्रत्यभिज्ञा में है, इससे प्रत्यभिज्ञा की विशेषणता इस पद से परामृष्ट होती है स्पष्टरूप से भासित होनेवाले नीलसुखादि पदार्थों के प्रमा अन्वेषण द्वारा पारमार्थिकता का प्रमाता को लाभ हो जाता है—ऐसा यहाँ पर उपदेश दिया जाता है। इसे अन्यत्र भी बताया गया है— यह जो 'इदम्' विच्छिन्न विमर्श है उसकी कृतार्थता तभी होती है जब कि अपने में स्वरूप का ज्ञान न होकर विश्राम ले लेता है 'सोऽहम्' वही मैं हूँ इस स्थिति तक पहुँच जाना है। क्योंकि प्रकाश का अपने स्वरूप में विश्राम हो जाना ही अहम्भाव कहलाता है और सभी अपेक्षाओं को रोक देनेवाली वही विश्रान्ति कही भी गयी है। इसको स्वातन्त्र्य, मुख्यकर्तृत्व और ईश्वरता इत्यादि नामों से कहते हैं। इतने ग्रन्थ से उपाय में जो अतिदुर्घटकारिता की आशङ्का थी उसे दूर कर दिया गया है। परिच्छिन्नता को छोड़कर नित्य, शुद्ध, व्यापक भाव को जान लेना ही प्रत्यभिज्ञा है। इसके विषय में कहा भी है— स्मरणानुभवारूढा सामानाधिकरण्यधीः । संस्कारेन्द्रियजन्या च प्रत्यभिज्ञा प्रकीर्तिता ॥ 'स्मरण और अनुभव में आरूढ हुई सामानाधिकरण्य बुद्धि और संस्कार इन्द्रिय से जन्य प्रत्यभिज्ञा कहलाती है।' 'प्रतीपमिति'—ज्ञात स्वात्मस्वरूप का अवभास होने का नाम ही प्रतीप है क्योंकि जिसका पूर्व में अनुभव नहीं हुआ था उसका अविच्छिन्न प्रकाश होने के कारण मायाशक्ति से वह तो १. प्रकाश का जीवितभूत स्वरूप विमर्श ही अहं भाव नाम वाला है, जब कि यह अपना और दूसरे के प्रकाश करने में अपने से भिन्न किसी को अपेक्षा नहीं रखता है। इदन्ता तो अपने आप को प्रकाशित करने में असमर्थ है तब फिर दूसरे की तो बात करनी ही दूर रही। अहं भाव का मुख्य धर्म व्यापकत्व, नित्यत्वादि है और यह दूसरे धर्म समूह का भी आक्षेप कर लेगा, विमर्शक होने से ही स्व-पर-प्रकाश रूप में रहना ही अनन्य उन्मुख तृप्ति से किये गये अपेक्षा न रहने के कारण विश्रान्ति रूप स्वरूप की प्राप्ति हो जाती है। इसी स्वातन्त्र्यरूपता से उस-उस देश कालादि के अवभास में सहस्र उल्लास का सामर्थ्यबल आ जाता है जब कि उस समय ईषणादि उपाधिवशात् अनेक शक्ति-योग के द्वारा कर्तृत्वादि शब्दों से व्यवहार होता हुआ देखा जाता है। इसी को अहं प्रकाश वाला कहा जाता है जिसे प्रकाश करने के लिए अन्य की अपेक्षा नहीं पड़ती है।
अ.-१, आ.-१, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १३ इव विकल्पित इव लक्ष्यते—इति वक्ष्यते। प्रत्यभिज्ञा च—भातभासमानरूपानुसंधानात्मिका, स एवायं चैत्र—इति प्रतिसंधानेन अभिमुखीभूते वस्तुनि ज्ञानम्; लोकेऽपि एतत्पुत्र एवंगुण एवंरूपक इत्येवं वा, अन्ततोऽपि सामान्यात्मना वा ज्ञातस्य पुनरभिमुखीभावावसरे प्रतिसंधित- प्राणितमेव ज्ञानं प्रत्यभिज्ञा—इति व्यवह्रियते; नृपतिं प्रति प्रत्यभिज्ञापितोऽयम्—इत्यादौ। इहापि प्रसिद्धपुराणसिद्धान्तागमानुमानादिविदितपूर्णशक्तिस्वभावे ईश्वरे सति स्वात्मन्यभि- मुखीभूते तत्प्रतिसंधानेन ज्ञानम् उदेति, नूनं स एव ईश्वरोऽहम्—इति, तामेनाम् 'उपपादयामि' विच्छिन्न सा, विकल्पित सा दिखायी दे रहा है इस विषय में आगे और भी विचार करेंगे। प्रत्यभिज्ञा उसी का नाम है जो पूर्व में आभासित होता रहा एवं इस समय में भी भासित हो रहा है; पूर्वकाल एवं इस वर्तमान समयके काल का सम्प्रति वर्तमान में एकरूप से मिलकर भासित होने का नाम ही प्रत्यभिज्ञा है, जैसे यह वही चैत्र है; ऐसा पूर्वकाल के ज्ञान को वर्तमानकाल में ऐक्य कर सामने स्थित वस्तु पदार्थ में ज्ञान कराती है वही प्रत्यभिज्ञा है; यह लोक व्यवहार में भी देखा जाता है कि इसका पुत्र इन गुणगरिमाओं से सम्पन्न है एवं रूप यौवन से युक्त है; जब कालान्तर में सामान्यरूप से अथवा ज्ञात पदार्थ के अपने सामने आ जाने पर पूर्व में जैसा ज्ञान हुआ था वैसा वर्तमानकाल का ज्ञान सम्मुखस्थ वस्तु पदार्थ में मिला देने से यही भान होता है कि यह वही वस्तु पदार्थ है जो मैंने पूर्व में देखा था, जैसा कि राजा से इनकी पहचान करा दी है। जिसका आगमाधिकार में निरूपण किया जायेगा। इति प्रकटितो मया सुघट एष मार्गो नवो महागुरुभिरुच्यते स्म शिवदृष्टिशास्त्रे यथा। तदत्र निदधत्पदं भुवनकर्तृतामात्मनो विभाव्य शिवतामयीमनिशमाविशन् सिद्ध्यति ॥ १ ॥ ( ४ अ० ३ आ० १६ श्लोक ) 'तस्य' उस महेश्वर की 'प्रत्यभिज्ञा' पहचान होना; जो कि अपने स्वरूप के ज्ञान को प्रत्यभिज्ञा कहा जाता है; मैं वही महेश्वर हूँ—ऐसी प्रत्यभिज्ञा-पहचान करना कि मैं उस महेश्वर से अभिन्न हूँ। जीवात्मा ज्ञात पदार्थ को जानता हुआ भी मोहवशात् फंसकर नहीं जानता हुआ सा होकर जब फिर से अपनी ओर हृदयंगमीभाव से ज्ञान करने का नाम ही प्रत्यभिज्ञा है। अथवा ज्ञात वस्तुपदार्थ को भी विस्मृत करने के जैसा और उस भूले हुए को पुनः प्राप्तकर लेना, केवल स्मर्य- माणरूप से नहीं, अपितु प्रत्यक्ष स्पष्टरूप से जानकारी प्राप्तकर लेना ही प्रत्यभिज्ञा कहलाती है। यह वही चैत्र है जो मैंने 'सौराष्ट्र' में देखा था जो कि आज उसे अपनी आँखों के सामने देख रहा हूँ—इस प्रकार सतत निरन्तर आत्म-तत्त्व भासित होने पर भी मोह के कारण अपने आपको दूसरा ही मान लिया है कि मैं परिच्छिन्न इत्यादि हूँ। इस प्रत्यभिज्ञा शास्त्र में भी प्रसिद्ध पुराण, सिद्धान्त, आगम और अनुमानादि प्रमाणों से सिद्ध विदित ज्ञान का उदय पूर्णशक्ति सम्पन्न ईश्वर के अपनी तरफ उन्मुख होने से और उसका प्रतिसंधान करने से होता है, निश्चय ही ठीक वही ईश्वर मैं स्वयं हूँ—ऐसा जीवात्मा को बोध
१४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-१, का.-१ इति । उपपत्तिः संभवः, तां संभवन्तीं तत्समर्थाचरणेन प्रयोजकव्यापारेण संपादयामि । तथाहि— संभवति तावत् असौ, अविच्छिन्नप्रकाशत्वात्; निरोधकाभिमतमायाशक्तिसमपसारणमात्रमेव तु तत्र उपपादनम् । प्रत्यभिज्ञोपपत्तौ स्वपरविभागाभावे तदपेक्षं कर्त्रभिप्रायोदि असंभाव्यम् इति परस्मैपदप्रयोगः । इत्थं च अत्र श्लोके योजना,—महेश्वरस्य दास्यं समस्तसंपल्लाभहेतुं कथंचित् आसाद्य, जनस्यापि कथंचित् तत्प्रत्यभिज्ञाम् आसाद्य प्रापय्य, उपकारं समस्तसंपल्लाभहेतुभूतं महेश्वरदास्यात्मकम् इच्छन्, तामेव समस्तसंपत्समवाप्तिहेतुकां तत्प्रत्यभिज्ञाम् उपपादयामि । ‘आसाद्य’ इति आवृत्तियोजना द्वौ णिचौ । इयति च व्याख्याने वृत्तिकृता भरो न कृतः, तात्पर्य- व्याख्यानात् । यदुक्तम् ‘संवृतसूत्रनिर्देशविवृतिमात्रव्यापारायाम् ।’ इति । टीकाकारेणापि हो जाता है, इस प्रत्यभिज्ञा का मैं उपपादन करता हूँ। उपपत्ति सम्भव होने से उस सम्भावना की ठीक-ठीक समझ बूझकर प्रयोजक-व्यापार से संपन्न करता हूँ। क्योंकि वैसे तो यह संभव भी हो सकता है, अविच्छिन्न प्रकाशरूप होने के कारण; वहाँ पर तो केवल निरोध करनेवाली अभीष्ट मायाशक्ति ही है, उसे वहाँ से दूर कर देना ही उपपादन है । प्रत्यभिज्ञा की उपपत्ति हो जाने पर तो अपना और परायेपन का विभाग ही नहीं रह जाता और उसकी अपेक्षा रखनेवाले कर्त्ता के अभिप्रायोदि की संभावना भी नहीं बन सकती; इसी कारण ‘उपपादयामि’ इस में परस्मैपद का प्रयोग हुआ है। इस प्रकार इस श्लोक में जोड़ना चाहिए, संपूर्ण संपत्ति की प्राप्ति में हेतुरूप उस महेश्वर के प्रति दास्य भाव रखना ही एक मात्र लक्ष्य है। महेश्वर की दास्यभावना को किसी तरह प्राप्त करके और अन्य लोगों में भी उस महेश्वर की किसी प्रकार पहचान कराकर, समस्त संपत्ति की प्राप्ति में खास कारणरूप से महेश्वर के प्रति दास्यभावना रखना ही एकमात्र कारण है इसे भी दास्यभाव मिल जाये—ऐसी उपकार करने की भावना को आगे रखते हुए जो संपूर्ण संपत्ति की प्राप्ति में हेतुभूत प्रत्यभिज्ञा है उसका मैं उपपादन करता हूँ। ‘आसाद्य’ इस प्रयोग में ‘देहली-दीपक’ न्याय से एकबार प्रयोग करने पर भी एक साथ दो या दो से अधिक अर्थ का भी क्रम से बोध होता है क्योंकि [ आसाद्य ] इसमें दो ‘णिच्’ प्रत्यय हैं और वृत्तिकार ने इतने व्याख्यान में कोई विशेष भार नहीं दिया है, चूँ कि इसके तात्पर्य मात्र की ही व्याख्या करनी थी । जिसके बारे में कहा भी गया है कि—‘ढका हुआ जो सूत्र का अर्थ है उसका निर्देश करने के लिए ही यह विवरण मात्र व्यापारवाली टीका है ।’ १. जहाँ पर कर्ता के अभिप्राय से क्रियाफल की विवक्षा की जाती है वहाँ पर आत्मनेपद में क्रिया होती है, किन्तु जिसमें वह नहीं होती है उसमें तो ‘शेषात् कर्तरि परस्मैपदम्’ इससे परस्मैपद में होती है । किन्तु प्रत्यभिज्ञा ज्ञान के उपाय को बताने वाले ग्रन्थ कर्ता में समस्त सम्पत्ति के कारण रूप परमेश्वर की दास्यभावना की प्राप्ति से, पूर्णता में डूब जाने से स्व-पर विभाग गल गया है, इसी कारण कर्ता का अभिप्राय क्रियाफल विनष्ट हो जाता है अर्थात् कर्ता को अभीष्ट अपने लिये नहीं रह जाता है । जिससे ‘तत्प्रत्यभिज्ञामुपपादयेऽहम्’ यह प्रयोग नहीं होता है । अपने आपके लिए किञ्चित् करने योग्य एवं अपेक्षणीय भी नहीं रह जाता, क्योंकि समस्त एषणायें ज्ञान के द्वारा विनष्ट हो जाती हैं, परोपकारार्थ ही मात्र इच्छा अवशेष रह जाती है, जो अपने स्वार्थ में डूबे हुए हैं वे परोपकारार्थ नहीं कर सकते हैं, इसी कारण परस्मैपद का प्रयोग ‘तत्प्रत्यभिज्ञामुपपादयामि’ इस अंश में किया गया है ।
अ.-१, आ.-१, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १५ वृत्तिमात्रं व्याख्यातुमुद्यतेन नेदं स्पृष्टम्, अस्माकं तु सूत्रव्याख्यान एव उद्यम—इति विभज्य व्याख्यातम् । एवं सर्वत्र । एवमनेन श्लोकेन अभिधेयं, प्रयोजनं, तत्प्रयोजनं, तत्प्रयोजनम्, अधिकारिनिरूपणं, गुरुपर्वक्रमः, संबन्ध—इति दर्शितम् । तथाहि—समस्तसंपल्लक्षणो व्याख्यातो योऽर्थः पूर्वं पुण्यपापादौ संसारमूलकारणे हेतुः, स एव प्रत्यभिज्ञायते अनया—इति करण- एवं टीकाकार के द्वारा भी वृत्तिमात्र की व्याख्या करना ही उद्देश्य था उससे अतिरिक्त थोड़ा सा भी कहीं स्पर्श नहीं किया हुआ है और हमारा भी तो यत्न मात्र सूत्र की व्याख्या करने में है; इससे अधिक नहीं है, इसलिए हमने खूब-खोल-खोलकर व्याख्या की है। इसी प्रकार ही सब जगह व्याख्या की गयी है । इस श्लोक से जो विषय करना था उसे भी अभिधेय के रूप से कहा है, प्रयोजन और उसका प्रयोजन तथा प्रयोजन के भी प्रयोजन को दिखलाया है, अधिकारी के विषय में भी कहा है कि इस प्रत्यभिज्ञाशास्त्र को प्राप्त करनेवाले कौन अधिकारी हो सकते हैं इसका भी अच्छी तरह से निरूपण हुआ है, तथा गुरु-परम्परा के क्रम को भी दिखाया है। इन ईश्वरप्रत्यभिज्ञा आदि शास्त्रों की कौन-कौन से गुरुजनों के द्वारा रचनाएँ हुई हैं एवं आदि से अन्त तक इनके प्रधान गुरु लोग रहे, तथा इस ईश्वरप्रत्यभिज्ञा का प्रतिपाद्य-प्रतिपादकभाव रूप जो सम्बन्ध है उसे भी हमने दिखा दिया है । [ अभिधेय का उपाय और प्रयोजन का जो उपाय ज्ञान है एवं उसका प्रयोजन प्रत्यभिज्ञान होना, प्रत्यभिज्ञान का भी प्रयोजन परमेश्वर सम्बन्धी ऐश्वर्य की प्राप्ति करना है। अधिकारी तो जिस किसी भी जाति-वर्ग का पवित्र हृदय वाला हो सकता है । श्री कण्ठनाथ प्रभृति गुरु सम्बन्ध क्रम में आ जाते हैं। श्री कण्ठनाथ के शासन काल के चले जाने पर दुर्वासामुनि हुए उन्होंने भी इस दर्शन के उद्धार के लिए आदेश दिया, उन्होंने भी भगवान् देव से आदेश प्राप्तकर त्र्यम्बकादित्य नाम के मानस पुत्र को पैदा किया । गुरु प्रवर्तित मार्ग को चलाने के लिए श्री अनन्तनाथ से शिवतत्त्व श्री कण्ठनाथ ने प्राप्त किया, वह भी भगवान् शक्ति से, इस प्रकार आगमों में गुरु परम्परा के सम्बन्ध क्रम का निरूपण हुआ है यहाँ प्रतिपाद्य- प्रतिपादक भाव सम्बन्ध है । ] वैसे तो समस्त संपत्ति को देनेवाला जो अर्थ है उसी की व्याख्या की गयी है; क्योंकि पूर्व जन्म के अर्जित पुण्य-पापादि ही तो इस असार-संसार का मूल कारण है, इस व्याख्यान से उसी की पहचान होती है 'प्रत्यभिज्ञायते अनया' इस कथन को करण १. इस 'दर्शन' प्रत्यभिज्ञा शास्त्र में विषय उपाय है और प्रयोजन उपाय ज्ञान है, उसका प्रयोजन प्रत्यभिज्ञान है, उसका प्रयोजन पारमैश्वर्य की प्राप्ति करना है। इसका अधिकारी जो कोई शक्तिपात-परमेश्वर का अनुग्रह वाला, पवित्र हृदय से युक्त हो सकता है। श्री कण्ठनाथ से लेकर श्री सोमानन्द आदि तक गुरु परम्परा का सम्बन्ध द्योतित होता है। 'कैलासाद्रौ भ्रमन् देवो मूर्त्या श्रीकण्ठरूपया। अनुग्रहायाव- तीर्णश्चोदयामास भूतले ॥ मुनिं दुर्वाससं ऽऽऽशास्त्रं रहस्यं कुरु तादृशम् ॥' कलिकाल के कालुष्य से यह शैवाद्वैत दर्शन प्रायः लुप्त हो गया था और उसकी परम्परा का ह्रास हो जाने से बहुत काल के बाद कैलास पर्वत पर परिभ्रमण करते हुए भगवान् शंकर ने श्री कण्ठमूर्ति रूप को धारण कर दुर्वासा मुनि को इस शैव शास्त्र का प्रचार-प्रसार करने के लिए आज्ञा की। उनकी आज्ञा को शिरोधार्य समझकर दुर्वासा मुनि ने अखिल आगम रूप उपनिषद्-वेद के सारभूत षडर्ध
१६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-१, का.-१ व्युत्पत्त्या उपायः इह लोकोत्तरमार्गं प्रति निर्णीतः, —इति अतिदुर्घटकारित्वलक्षणमैश्वर्यम् 'मार्गों नव' (४ अ० ३ आ० १६ श्लो०) इति शास्त्रान्ते निरूपयिष्यमाणं सूचयता उपायः प्रदर्शितः अभिधेयत्वेन । अत एव 'तथाहि जडभूतानाम्' (१ अ० १ आ० ४ श्लो०) इत्युपक्रमपूर्वं श्लोकान्तरं भविष्यति । प्रयोजनं च प्रत्यभिज्ञोपायज्ञानं, तस्य प्रयोजनं प्रत्यभिज्ञानं, तस्यापि प्रयोजनं समस्तसंपल्लक्षणपारमैश्वर्यैकरूपप्रथनं; ततः परं नास्त्येव, तस्य सर्वपर्यन्तफलत्वात् अंशांशिकयापि । यदुक्तं मयैव स्तोत्रे —'फलं क्रियाणामथवा विधीनां पर्यन्ततस्त्वन्मयतैव देव । फलेप्सवो ये पुनरत्र तेषां मूढा स्थितिः स्यादनवस्थयैव ।।' इति । एतद् वक्ष्यति 'तदत्र निदधत्पदम्' व्युत्पत्ति होने से लोकोत्तर मार्ग का देनेवाला है यह उपाय निर्णीत हो जाता है, इसका अति- दुर्घटकारीरूप ऐश्वर्य माना जाता है जो कि आगे कहा भी है—'मार्गों नव' (४।३।१६) । इस प्रकार शास्त्र के अन्त में निरूपण करते हुए हमने उपाय भी इसके सूचित किये हैं जो प्रतिपाद्य विषयक हैं । इसलिए 'तथाहि जडभूतानाम्' (१ अ. १०४ श्लोक) जैसा कि जडभूतों की प्रतिष्ठा जीव के आश्रित होती है उस तरह उपक्रमपूर्वक दूसरे-दूसरे श्लोक कहे जायेंगे तब फिर प्रयोजन क्या वस्तु है ? उत्तर यह है कि प्रत्यभिज्ञा का उपाय जानना ही यहाँ पर प्रयोजन है, उसका भी प्रयोजन ईश्वर का प्रत्यभिज्ञान होना कि मैं महेश्वररूप हूँ, तब फिर उस प्रत्यभिज्ञान का क्या प्रयोजन है और किसलिए ? समस्त संपत्तिरूप परमेश्वर के परम ऐश्वर्य का प्रथन हो जाना ही वस्तुतः प्रयोजन है; इसके बाद कुछ अवशेष करना नहीं रह जाता है, सारा का सारा फल मिल जाने से कुछ भी आंशिकरूप से शेष नहीं रह जाता है । मैंने स्वयं ही स्तोत्र में बताया है— 'हे देव ! क्रियाओं से उत्पन्न होने वाले अथवा विधियों से होने वाले जितने भी फल होते हैं; उन सब से हम तुम्हारे पूर्ण व्यापकरूप में तन्मय हो जायें । जो लोग फल की आकांक्षा रखते हैं वे सभी मूढ़ ही हैं और इससे अनवस्था ही होगी ।' इस विषय में आगे विवेचन किया जायेगा । दो पाद से 'तदत्र निदधत्पदम्' (४ अ० ३ आ० १६ श्लोक) 'जनस्य' इसके द्वारा अधिकारी कौन हो सकता है, इसे दिखाया है । जिसका उपसंहार करते समय बताया जायेगा— [ त्रिक ] शास्त्र जो संसार में विलुप्त हो गया था इसके प्रचारार्थ त्र्यम्बक आदित्य नामक मानस पुत्र को उत्पन्न किया और इन्होंने भी इस प्रकार मानस प्रक्रिया से सृष्टि क्रम के द्वारा पुत्र उत्पन्न किया, स्वयं गुहा में जाकर ध्यानस्थ हो गये । इस प्रकार क्रमशः सृष्टि-प्रक्रिया चलती आयी । आगे चलकर मानुषी सृष्टि का क्रम चला । इस मानुषी सृष्टि में संगम आदित्य और वर्षादित्य पुत्र उत्पन्न हुए, उनके भी भगवान् अरुणादित्य नाम के पुत्र पैदा हुए । श्री सोमानन्द आनन्दादित्य से हुए । इस प्रकार शैवा- द्वैत दर्शन के प्रचारार्थ श्री सोमानन्द का अत्यधिक योग रहा है । इनका बनाया हुआ 'शिवदृष्टिशास्त्र' इस दर्शन का सर्वप्रथम ग्रन्थ है । इसके आधार पर उत्पलदेव एवं अभिनवगुप्त, लक्ष्मणगुप्त, वसुगुप्त, क्षेमराज एवं रामेश्वर झा आदि ने ग्रन्थों की रचनाएं की । इस ग्रन्थ का प्रतिपाद्य-प्रतिपादकभाव सम्बन्ध है । १. सम्पूर्ण सम्पत्ति की प्राप्ति होने पर ही पूर्णता दिखायी देती है । राज्य, भोग, स्वर्ग, भवन इत्यादि भोग पदार्थ की प्राप्ति में भी उत्तरोत्तर इच्छा विशेष बढ़ती ही जाती है, कहाँ पूर्णता को स्थान मिला माना जाय ? जब परमार्थ मिल जाने पर तो इससे अतिरिक्त प्राप्त करने के लिए रह ही नहीं जाता है, उस परमेश्वर भाव में सम्मिलित हो जाने पर तो फिर क्या वाञ्छनीय रह जाता है—इसका यही आशय है ।
.अ.-१, आ.-१, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १७ ( ४ अ० ३ आ० १६ श्लो० ) इति पादद्वयेन । 'जनस्य' इत्यनेन अधिकारी दर्शितः । यत् निगम- यिष्यति 'अनिशमाविशन्' ( ४ अ० ३ आ० १६ श्लो० ) इति । 'कथंचित्' इत्यनेन गुरुपर्वक्रमः । वक्ष्यति 'महागुरुभिरुच्यते स्म शिवदृष्टिशास्त्रे यथा ।' ( ४ अ० ३ आ० १६ श्लो० ) इति । एवं प्रतिज्ञातव्यसमस्तवस्तुसंग्रहेण इदं वाक्यमुद्देशरूपं प्रतिज्ञापिण्डात्मकं च, मध्यग्रन्थस्तु हेतुवादि- निरूपकः, 'इति प्रकटितो मया' ( ४-३-१६ ) इति च अन्त्यश्लोको निगमनग्रन्थः,- इत्येवं- पञ्चावयवात्मकमिदं शास्त्रं परव्युत्पत्तिफलम् । नैयायिकक्रमस्यैव मायापदे पारमार्थिकत्वम्— इति ग्रन्थकाराभिप्रायः 'क्रियासंबन्धसामान्य' ( २ अ० २ आ० १ श्लो० ) इत्यादिषु उद्देशेषु प्रकटोभविष्यति — इति तावद् ग्रन्थस्य तात्पर्यम् । सुजनश्च लौकिकेश्वर- परिचित ईश्वरविषये जनम् अनुजीविगुणोपपन्नं प्रकाशयति, जनविषये च आभिगामिकादिगुणगण- सम्पन्नम् ईश्वरं प्रकाशयति, — इति इयानर्थः सामान्येन षष्ठीसमासेन दर्शितः 'तस्य प्रत्यभिज्ञा' इति । एतच्छ्लोकाकर्णनसमये च शिष्याणाम् एतदर्थसंक्रमेण परमेश्वरतादात्म्यमेव उपजायते तावत् । तथाहि — 'जनस्य' — इत्याकर्णनात् वयं ते जननमरणपीडिता अपर्युदस्तवृत्तयश्च, अस्माक- 'अनिशमाविशन्' ( ४ अ० ३ आ० १६ श्लोक में ) 'कथंचित्' इस शब्द से गुरु परम्परा का क्रम 'महागुरुभिरुच्यते स्म शिवदृष्टिशास्त्रे यथा' ( ४ अ० ३ आ० १६ श्लोक ) से कहा जायेगा । इस प्रकार प्रतिज्ञा करने योग्य सारी वस्तुओं का संग्रह करके प्रतिज्ञा को एक पिण्डाकार- रूप में दिखा दिया, और बीच का ग्रन्थ तो हेतु आदि का निरूपण करता है, 'इति प्रकटितो मया' ( ४-३-१६ ) और अन्तिम श्लोक से ग्रन्थ का उपसंहार किया हुआ है। इस प्रकार प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय और निगमन रूप पाँचों अवयवों वाला यह शास्त्र परम व्युत्पत्तिरूप फल देने वाला है। नैयायिक लोगों के क्रम को ग्रन्थकार ने मायापद में पारमार्थिकरूप माना है, 'क्रिया- सम्बन्धसामान्य' ( २ अ० २ आ० १ श्लोक ) के उद्देश्यों में प्रकट किया जायेगा । यही इस ग्रन्थ का तात्पर्य है और सज्जन लोग लौकिक ईश्वर के विषय में परिचित हो जाने पर अनुचर- वर्ग को अपने स्वामी के विशेष गुणों का वर्णन किया करते हैं और लोगों के विषय में भी ईश्वर सम्बन्धी गुण गरिमा का प्रकाश डालते रहते हैं इतना अर्थ 'तस्य प्रत्यभिज्ञा' इस सामान्य षष्ठी समास के द्वारा दिखा दिया । इस षष्ठीसमास में कर्त्ता और कर्म ये दोनों हैं अर्थात् तत्कर्तृक प्रत्यभिज्ञा एवं तत्कर्मक प्रत्यभिज्ञा समझना चाहिए । इस श्लोक के सुनते समय में ही श्रद्धालु शिष्यों को इसका बोधार्थ संक्रमण क्रमशः परमेश्वर की तादात्म्यता उत्पन्न करा देता है। जैसा कि 'जनस्य' ऐसा सुनने मात्र से हम जन्म-मरण के दुःखों से बहुत ही पीडित हैं और प्रमाण-विपर्यय-विकल्प-निद्रा-स्मृति आदि वृत्तियों से भिन्न अथवा उसके सदृशवस्तुओं से भिन्न; हमलोगों का उपकार चाहते हुए, परमेश्वर १. जिनकी चारों ओर से बाहरी समस्त 'प्रमाण-विपर्यय-विकल्प-निद्रा-स्मृति' वृत्तियां अस्त हो चुकी हैं वे उदासीन कहलाते हैं इससे विपरीत अपर्युदास वृत्तियाँ होती हैं। अथवा सदृश वस्तु का परिग्रहण करना ही पर्युदास है, अपने से विपरीत वृत्तियों का ग्रहण नहीं करना ही उदासीन भाव है। अर्थात् किसी अन्य में अपनी वृत्ति को न रखना ही अनन्य वृत्ति कहलाता है । ३
१८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-१, का.-१ मयम् उपकारम् इच्छन्, महेश्वरस्य दास्यम् आसाद्य, समस्तसंपत्समवाप्तिहेतुं तत्प्रत्यभिज्ञाम् उपपादयति; ततश्च प्रत्यभिज्ञामेवंभूतां वयं प्राप्ता एव—इति । इत्थमेव हि अधिकारिणि शास्त्रार्थस्य बिम्बप्रतिबिम्बवत् संक्रान्तिः लोङ्लिङादीनां विषयीभवति—इति प्रथमपुरुषार्थः उत्तमपुरुषार्थे पर्यवस्यति, न तु तात्स्थ्येन; अधिकार्यनधिकारिणोः प्रतिपत्तौ विशेषाभावप्रसङ्गात् । आरोग्य- कामाः शिवां सेवन्तां सेवेध्वम्—इति वा वाक्यार्थस्य सेवामहै-इत्येवंरूपेण अधिकारिणि द्वितीय- कक्ष्यासंक्रान्तौ तृतीयकक्ष्यायामेव भाविकोटिपतितामपि पुरुषार्थसंपत्तिम् अकालकलितस्वरूपानु- प्रवेशेन स्वात्मीकृताम् अभिमन्यमाने, तत एव विततसंवित्सुन्दरपरामर्शे पूर्णताभिमानप्रतिलम्भात्, अन्यस्य तु अनेवंरूपत्वेनैव अधिकारिता तात्स्थ्यप्राणा—इति । तदास्ताम् अवान्तरमेतत् अति- गहनं च—इति स्थितमेतत् । एतेन श्लोकेन ईश्वरसामुख्यं विनेयानां प्रयोजनादिप्रतिपादनं च क्रियते—इति ॥ १ ॥ अनन्तभावसंभारभासने स्पन्दनं परम् । उपोद्घातायते यस्य तं स्तुमः सर्वदा शिवम् ॥ ननु ईश्वरस्य सिद्धिरेव कर्तव्या, केयं सिद्धिः ! न तावत् उत्पत्तिः नित्यत्वात् । नापि ईश्वर- सिद्धिकारादयस्तस्योत्पत्तिं विदधते । ज्ञप्तिः सिद्धिरिति चेत् ! अनवच्छिन्नप्रकाशस्य प्रमाणव्यापा- की दासता को पाकर, सम्पूर्ण अलौकिक सम्पत्ति प्राप्ति में हेतुरूप ईश्वर की प्रत्यभिज्ञा का उपपादन करते हैं,—ऐसी प्रत्यभिज्ञा हमलोग प्राप्त कर चुके हैं। इस प्रकार अधिकारी में ही शास्त्र का अर्थ बिम्ब-प्रतिबिम्बभाव के समान संक्रमण हो जाता है; यह ‘लोट्’ लकार और ‘लिङ्’ लकार का अर्थ है—इस प्रकार प्रथमपुरुष का अर्थ उत्तम- पुरुष के अर्थ में पर्यवसित होता है, तटस्थरूप से नहीं होता है; क्योंकि अधिकारी और अनधि- कारी के जानने में किसी तरह की विशेषता नहीं है। आरोग्य की कामना चाहने वाले भगवतीशक्ति को सेवा करें; तुम लोग सेवा करो या वाक्यार्थ के लिए उत्तमपुरुष का प्रयोग ‘सेवामहै’ हमलोग सेवा करते हैं इस प्रकार से अधिकारी में द्वितीय कक्षा का संक्रमण हो जाने पर ‘सेवेध्वम्’ इस तृतीय कक्षा में पड़ने पर आगामी कोटि ‘लोट्’ लकार में पुरुषार्थ सम्पत्ति को अकालकलित कोटि में प्रविष्ट कराकर अपने अधीन कर उसे मानने पर उत्तमपुरुष का प्रयोग होता है, इसलिए खूब विस्तृत संवित् सुन्दरता के परामर्श में पूर्णता ला देने के कारण दूसरे का तो उससे भिन्न तटस्थरूप में अधिकारिता है। रहने दो, इसको यह तो बड़ा भीतर घुसा हुआ और अति कठिन भी है जिस परिस्थिति में है उसी में रखना ही समुचित दिखायी देता है। इस श्लोक से शिष्यों के प्रयोजन आदि का और ईश्वर की सन्मुखता का प्रतिपादन विषय भी हो जाता है ॥ १ ॥ अनन्त भावपदार्थ समूह को प्रकाशित करने में जिसका सर्वश्रेष्ठ स्पन्दन-उपोद्घात होता है। उस शिव की हम लोग स्तुति करते हैं ॥ अब शंका करते हैं कि ईश्वर की सिद्धि करनी चाहिए, किन्तु कौन सी यह सिद्धि है ? ईश्वर की उत्पत्ति हो नहीं सकती है क्योंकि ईश्वर नित्य-शुद्ध-बुद्ध स्वभावरूप है और न तो ईश्वर की सिद्धि करने वाले लोग उनको उत्पत्ति के विषय में कुछ बता भी सकते हैं ठीक ढंग से, या उत्पत्ति दिखा सकते हैं। ईश्वर के विषय में ज्ञानरूप मात्र सिद्धि सम्भव हो
अ.-१, आ.-१, का.-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १९ रोपाधेयप्रकाशात्मकसिद्ध्यनुपयोग एव । ननु अनवच्छिन्नस्तदीयः प्रकाश—इति कथमेतत्; घट- सुखादिप्रकाशे हि तत्प्रकाशः कुतः ?, तदप्रकाशेऽपि सुप्तमूर्च्छादौ नतरां; स्वप्रकाशेऽपि वा ईश्वरे प्रमातॄणां किं वृत्तं, येन तेषां प्रमाणव्यापारानुपयोग ?—इत्याशङ्क्याह— कर्तरि ज्ञातरि स्वात्मन्यादिसिद्धे महेश्वरे । अजडात्मा निषेधं वा सिद्धिं वा विदधीत कः ॥ २ ॥ इह क ईश्वरे कीदृशे कीदृशेन प्रमाणेन अस्ति-इति ज्ञानलक्षणां सिद्धिं, नास्तीति ज्ञानलक्षणं वा निषेधं कुर्यात् ? प्रमाता इति चेत्, स एव कः ? देहादिर्जडः उत तदन्यो वा कश्चित् आत्मादि- शब्दवाच्यः ? सोऽपि स्वप्रकाशस्वभावो वा न वा ? देहादिर्जडः इति चेत्, स एव स्वात्मनि सकती है—ऐसा यदि करते हो ? तो यह होना असम्भव सा ही है क्योंकि अनवच्छिन्न प्रकाश वाले के प्रमाण व्यापार को लगाकर उसे प्रकाशित करने वाली सिद्धि उपयुक्त हो नहीं बैठती है । पुनः शङ्का करते हुए कहते हैं कि उसका प्रकाश अनवच्छिन्न माना जाता है तब यह कैसे घटित होगा; क्योंकि घट-सुखादि के प्रकाश में उसका प्रकाश कहाँ से आया हुआ माना जाय ? उस अनवच्छिन्न प्रकाशात्मा के प्रकाश न रहने पर भी स्वप्न-मूर्च्छा, शयनादि में तो उससे भी अधिक नहीं रहेगा । [ ‘अक्षैरर्थोऽवग्रहः पुंसां तज्जाग्रदिति कथ्यते । यत्तैर्विनाऽर्थस्मरणं मनसा स्वप्नसंज्ञितम् ॥ यत्रार्थस्मरणे न स्तस्तत्सौषुप्तमिति स्मृतम् । शुद्धबोधैकरूपो योऽवस्थातः सैव तुर्यता ॥ जिसमें चक्षु इन्द्रियों के द्वारा पुरुष को अर्थ का ग्रहण होता हो उस अवस्था का नाम जाग्रत् है । जब उनके बिना मात्र मन से ही अर्थ विषय का ग्रहण जिसमें होता हो उसे स्वप्न अवस्था कहते हैं । जिसमें अर्थ का स्मरण भी न होता हो उसी का नाम सुषुप्ति अवस्था है । जिसमें शुद्ध-बुद्ध-मुक्त-नित्य स्वभाव का बोध हो उसे चतुर्थ अवस्था ‘शिव’ कहा जाता है । उसमें भी सुषुप्ति अवस्था दो प्रकार की मानी जाती है । मूर्च्छादि न्याय से, एक संवेद्य है और दूसरी अपवेद्य है । ‘मैं सुखी हूँ’—इसी का नाम संवेद्य है और ‘मैंने कुछ भी नहीं जाना’ यह अपवेद्य है । ] ईश्वर के स्वप्रकाश रहने पर प्रमाताओं का इसमें क्या बिगड़ना है, जिससे उन प्रमाताओं के प्रमाण-व्यापार का अनुपयोग होता हो ? इस विषय में आशङ्का कर उत्तर देते हैं— अपने आप स्वयं कर्ता, ज्ञाता, आदि सिद्ध महेश्वर के रहने पर कौन चेतन निषेध या सिद्धि अपने आप की करेगा ॥ २ ॥ कौन व्यक्ति कैसे ईश्वर में प्रमाण के द्वारा ज्ञान लक्षणा की सिद्धि या निषेध कर सकता है, उसकी सत्ता है या नहीं है ऐसे कैसे कर सकेगा ? यदि माना जाय कि ईश्वर के अस्तित्व में सिद्धि या निषेध प्रमाता करता है तो वही प्रमाता कौन है जो सिद्धि और निषेध करने चल पड़ा है ? चार्वाकादि नास्तिक लोग देहादि जड-पदार्थों को मानते हैं यदि ऐसा कहो, तो क्या सचमुच देहादि जड या उससे भिन्न कोई आत्म शब्द का वाच्य माना जाय ?
२० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-१, का.-२ असिद्धः परत्र कां सिद्धिं कुर्यात् ? आत्मापि अस्वप्रकाशो जड एव तत्तुल्ययोगक्षेमः । स्वप्रकाश- स्वभावः इति चेत्, कीदृशेन स्वेन रूपेण आभाति ? यदि परिनिष्ठितसंविन्मात्ररूपेण, तदा संविदां भेदनं, भेदितानां च अन्तरनुसंधानेन अभेदनं न स्यात्; तेन स्वतन्त्रस्वप्रकाशात्मतया तावत् स भासते, तथा भासमानश्च कीदृशमीश्वरं साधयेत् निषेधेत् वा ? कर्तृज्ञातृस्वभावम् इति चेत्, ननु स प्रमातैव तथाभूतः — इति कोऽन्यः सः ? ननु सर्वकर्तृत्वसर्वज्ञत्वे प्रमातुर्न स्तः, न खलु सर्व- शब्दार्थो ज्ञातृकर्तृत्वयोः स्वरूपं भिनत्ति, भेददर्शनेऽपि ईश्वरज्ञानचिकीर्षाप्रयत्नादेर्नित्यस्य विषयेण अकारणभूतेन अनाधेयातिशयत्वात् । प्रकाशमानतानयनमेव विषयत्वम् इति चेत्, अप्रकाशस्व- भावस्य तथात्वमनुचितम् — इति वक्ष्यामः । प्रकाशमानस्वभावत्वे विषयोऽपि सर्वात्मना प्रकाश एव निमग्न इति प्रकाशः प्रकाशते — इत्येतावन्मात्रपरमार्थत्वे कः सर्वज्ञासर्वज्ञविभागः ?, प्रमाणमपि एवं सिद्धत्वासिद्धत्वाभ्यां पर्यनुयोज्यम्; एवं सिद्धिरपि । तस्मात् विषयाभिमतं वस्तु- शरीरतया गृहीत्वा तावत् निर्भासमान आत्मैव प्रकाशते विच्छेदशून्यः, सुषुप्तमपि प्रति प्रकाशत वह भी स्वप्रकाश स्वभाव वाला है अथवा नहीं है ? यदि देहादि जड-भाव को ही मानते हो, तो वह भी अपने में असिद्ध होता हुआ दूसरे की कौन सी सिद्धि कर देगा ? इससे तो फिर आत्मा भी अप्रकाश रूप जड तुल्य हो जायेगा और यदि उसे स्वप्रकाश तुल्य मान लिया जाय; तो फिर वह कैसे अपने स्वयं के स्वरूप को भासित करेगा ? यदि कहो कि परिमित संवित्मात्र रूप से भासता है, तब तो ज्ञानों का भेद दिखाई पड़ता है और भेद से अलग किये पदार्थों के भीतर अनुसन्धान रूप से अभेद का होना मुश्किल हो जायेगा; इसलिए यह मानना होगा कि वह स्वतंत्र अपने प्रकाशात्मक रूप से भासित होता हुआ कैसे ईश्वर की सिद्धि कर पायेगा या निषेध कर सकेगा ? यदि स्वप्रकाश रूप आत्मा कर्तारूप और ज्ञातारूप है—ऐसा मानते हो तो वह प्रमाता हो उसी प्रकार का है, ऐसी बात है तो फिर दूसरा कौन वह है ? 'ननु' कहकर प्रश्न करते हैं कि सर्वकर्तृत्व और सर्वज्ञत्व भी तो उस प्रमाता में नहीं है, क्योंकि सर्वकर्तृत्व और सर्वज्ञत्व तो ईश्वर परमात्मा में रहते हैं; सर्वशब्द का अर्थ कर्तृत्व ज्ञातृत्व के स्वरूप का भेद नहीं करता है, भेदवादी के दर्शनों में भी ईश्वर का ज्ञान, करने की इच्छा और प्रयत्नादि के नित्य होने से; एवं विषय का कारण नहीं होने से उसमें कुछ भी अतिशय नहीं लगाया जा सकता है । यदि ईश्वर परमात्मा में प्रकाशमानता लाया जाना ही विषय मानते हो; तब तो फिर यह अप्रकाश वाले का ही धर्म हो जाता है जब कि उसो प्रकार से मानना उचित नहीं दिखायी देता है—इस विषय में हम स्वयं आगे कहेंगे— प्रकाशमान स्वभावता के रहने पर विषय भी सब तरह से प्रकाश में अन्तर्निहित रहता है; प्रकाश प्रकाशरूप से प्रकाशित रहता है, यही वस्तुस्थिति है और जब इस प्रकार परमार्थभाव के रहने पर फिर सर्वज्ञ और असर्वज्ञ का विभाग कौन-सा माना जाये ? जबकि सर्वज्ञ और असर्वज्ञ के विचार की यहाँ पर कोई आवश्यकता नहीं दिखायी पड़ती है ? प्रमाण भी सिद्ध है या असिद्ध है इस ढंग से इसमें भी पूछना होगा [ यदि प्रमाण प्रकाश के अन्तर्गत सिद्ध है तब फिर प्रकाश ही अपने आपकी सिद्धि एवं निषेध क्या करेगा ? यदि असिद्ध है तो फिर अप्रकाश स्वभाव वाले का उसी प्रकार का होना अनुचित ही है ] एवं सिद्धि के विषय में भी विचार करना होगा । इसलिए शरीर धारण करके तब तक निर्भासित होता हुआ विच्छेद शून्य होकर आत्मा ही
अ.-१, आ.-१, का.-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २१ एव, अन्यथा स्मृत्ययोगात्; प्रकाशस्य च नित्यत्वात् विच्छेदहेतोरभावेन, अन्यप्रमात्रपेक्षया च प्रकाशमानत्वात्, स्वपरप्रमातृविभागस्य तत्सृष्टस्य मायीयत्वेन वक्ष्यमाणत्वात् । स चायं स्वतन्त्रः । स्वातन्त्र्यं च अस्य अभेदे भेदनं, भेदिते च अन्तरनुसंधानेन अभेदनम्—इति बहुप्रकारं वक्ष्यामः । तदेव अस्य पारमेश्वयं मुख्यमानन्दमयं रूपम्-इति पूर्वमुपात्तं 'कर्तरि' इति । तदेव तु स्वातन्त्र्यं विभज्य वक्तुं 'ज्ञातरि' इति पश्चान्निर्दिष्टम् । ज्ञानपल्लवस्वभावैव हि क्रिया-इति वक्ष्यते । तेन सर्वक्रियास्वतन्त्रे सर्वशक्तिके-इति यावद् उक्तं, भवेत् तावदेव 'कर्तरि ज्ञातरि'इति । इयमेव च संवित्स्वभावता । संविदिति तु उच्यमाना विकल्प्यत्वेन प्रमेयतां स्पृशन्ती सृष्टत्वात् न परमार्थ- संवित्-इति वक्ष्यामः । कर्ता ज्ञाता च महेश्वर—इत्यभिधानेऽपि स एव प्रकार आपतेत्, इति— यथा यथा प्रमेयभूमिकापादनन्यक्कारकलङ्कपरिहारः शक्यः तथा तथा यावद्गति यतितव्यम्,— इति भूतविभक्त्या निर्देशः कृतः । उपदेशावसरे हि सर्वात्मना तावत् सा प्रमेयता अस्य परिहर्तुम् अशक्या । 'स्वात्मनि' इति, स्वस्मिन् अनपायिरूपे स्वभावे इत्यनेन वैशेषिकाद्यभिमतजडात्मवा- दनिरासः । 'आदिसिद्धे' इति, अविच्छिन्नप्रकाशे इत्यर्थः । 'महेश्वरे' इति, एतदेव माहेश्वर्यं— प्रकाशित होता रहता है, एवं गहन निद्रा में सोनेवाले व्यक्ति को भी प्रकाशित करता है यदि ऐसा न माना जाय तो स्मृति कैसे हो पायेगी अर्थात् इससे फिर स्मृति नहीं हो सकती है, क्योंकि प्रकाश के नित्य होने से वहाँ पर विच्छेद का कोई कारण नहीं मिलता, और दूसरे प्रमाता की अपेक्षा से प्रकाशमान होने के कारण, अपना और अपने से भिन्न दूसरे प्रमाता का विभाग जो कि उसी से बनाया गया है वे सभी मायीय प्रमाता हैं। इसको विवक्षा आगे की जायेगी और वह सर्वतंत्र स्वतंत्र है। इसका स्वातंत्र्य अभेद में भेद कर भासित करता है और भेद करने पर भी भीतर अनुसंधानरूप से एक अभेदरूप रहता है यह बहुत प्रकार का है इसका हम आगे निरूपण करेंगे। वही इसका परम ऐश्वर्य है एवं मुख्य आनन्दमय स्वरूप है इसको पूर्व में हमने 'कर्तरि' में और उसी का स्वातंत्र्यरूप से विभाग कर कहने के लिए 'ज्ञातरि' ज्ञाता में है यह पीछे से निर्देश किया है। क्रिया क्या चीज है ? इसके विषय में हम आगे दिखायेंगे कि ज्ञान स्वभाव के ही विस्तारवाली क्रिया होती है अर्थात् ज्ञान के विस्तार को ही क्रिया कहा जाता है। इस कारण सब क्रियाओं की स्वतन्त्रता में और सब शक्ति सम्पन्न वाली क्रियाओं के विषय में और जो कुछ कहा गया है यह सब 'कर्तरि-ज्ञातरि' में ही रहता है और यही ज्ञान का वास्तविक स्वरूप भी है। संवित् इतना कहने पर तो विकल्पित होकर प्रमेयरूप बन जाती है किन्तु सृष्टिरूप होने के कारण परमार्थ संवित् नहीं कहलाती है। इस विषय में हम कहेंगे। कर्त्ता और ज्ञाता के रूप में महेश्वर को बताने पर भी उसी प्रकार करना पड़ेगा, इसलिये जैसे-जैसे प्रमेय भूमिका को प्राप्त कर लेने से कलङ्क का परिहार करना शक्य हो सके वैसे-वैसे प्रयत्न करना चाहिए, इस बात को भूतकाल की विभक्तिसे दिखाया गया है। क्योंकि उपदेश अवस्था में इसका सब प्रकार से तो प्रमेयता का परिहार करना शक्य नहीं हो सकता है। 'स्वात्मनि' शब्द जो श्लोक में दिया है इसका यह आशय है कि अपने निरूपायरूप स्वभाव में रहते हैं इससे वैशेषिकों के जडात्मवाद सिद्धान्त का खण्डन हो जाता है। 'आदिसिद्धे' इस शब्द से यह भाव प्रकट होता है कि वह अनवच्छिन्न प्रकाशरूपमें स्थित है। 'महेश्वरे' इससे यह सार निकलता है कि यही महेश्वर का
२२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-१, का.-३ यद् अनवच्छिन्नप्रकाशत्वेन ज्ञातृ-कर्तृत्वधारोपारोहः । 'अजडात्मा' इति, यस्य तु वैशेषिकादेर्जड आत्मा स सिद्धिं करोतु ईश्वरविषयाम्; अन्यस्तु सांख्यादिर्निषेधं; सांख्योऽपि विषयावभासनरूपं ज्ञानं बुद्धिधर्ममिच्छन् आत्मानं वस्तुतो जडमेव उपैति; न च जडात्मा स्वात्मन्यपि दुर्लभप्रका- शस्वातन्त्र्यलेशः किंचित् साधयितुं निषेद्धुं वा प्रभविष्णुः पाषाण इव; न च अजडात्मनोऽपि एतद् उचितं, तथाहि—स स्वात्मनि सिद्धिमित्थं कुर्यात्—यदि अस्य सोऽभिनवत्वेन भासमानः पूर्वं न भासते, अनाभासनं चेत् जडतैव । निषेधं च इत्थं विदध्यात्—यदि स न प्रकाशते तथा च जडः, न च जडस्य एतत् युक्तम्—इत्युक्तं, नापि अजडस्य; तस्मात् संवित्प्रकाश एव घटादि- प्रकाशः, न त्वसौ स्वतन्त्रः कश्चित् वास्तवः; प्रकाश एव च आत्मा; तत् न तत्र कारकव्यापारवत् प्रमाणव्यापारोऽपि नित्यत्ववत् स्वप्रकाशत्वस्यापि तत्र भावात् ॥ २ ॥ ननु कारकव्यापारः प्रमाणव्यापारश्च यदि ईश्वरे न संभवति, तर्हि प्रत्यभिज्ञापयामि— इति यो व्यापार उक्तः स कतमो व्यापार ?,—इत्याशङ्क्याह— किंतु मोहवशादस्मिन्दृष्टेऽप्यनुपलक्षिते । शक्त्याविष्करणेनेयं प्रत्यभिज्ञोपदर्श्यते ॥ ३ ॥ ऐश्वर्य है जो अनवच्छिन्न प्रकाश रूप होकर ज्ञातृत्वरूप और कर्तृरूप धारा के ऊपर आरूढ रहता है । 'अजडात्मा' इस शब्द से वैशेषिकों के मत में आत्मा को जड माना है । यदि वे लोग ऐसा मानते हैं तो ईश्वर विषयक सिद्धि करें; और दूसरे सांख्यादि लोग निषेध करते रहें; सांख्य-सिद्धान्तवाले भी तो विषय को अवभासित करने वाले ज्ञान को ही बुद्धि का धर्म और आत्मा के रूप में मानते हैं और वह भी एक प्रकार से जड को ही आत्मा मानना हुआ; और जो जडरूप है उससे अपने में दुर्लभ प्रकाश की स्वतन्त्रता का लेशमात्र भी सिद्ध नहीं कर सकेगा या निषेध कर पायेगा; क्योंकि वह एक तरह से पत्थर जैसा ही है; और अजडरूप चेतन का होना समुचित भी नहीं है । वे लोग इस प्रकार से अपने आत्मा को सिद्धि करेंगे—यदि इसका वह आत्मा कोई नये रूप से भासित होने वाला है जो कि पूर्व में नहीं भासता था, तब तो वह फिर जड ही हो गया । और निषेध इस प्रकार करेंगे कि यदि वह प्रकाशित नहीं होता है तो वह जडरूप ही है और जड स्वभाव वाले का ऐसा होना उचित भी नहीं है, इसी कारण हमने कहा है कि अजड- रूप चेतन आत्मा की सिद्धि नहीं कर सकता है; इसलिए यह मान लो कि संवित् प्रकाश ही घट-पटादि का प्रकाश है, वह स्वतन्त्र रूप से किसी वस्तु का स्वरूप नहीं है और प्रकाश ही आत्मा है । वहाँ पर कोई कारकव्यापार के समान प्रमाणव्यापार भी नहीं रहता; क्योंकि नित्यत्व के समान होनेके कारण स्वयं अपने प्रकाश से भासित रहता है ऐसी स्थिति में वहाँ पर कारक व्यापार क्या कर सकता है ॥ २ ॥ अब 'ननु' कहकर प्रश्न करते हैं कि कारकव्यापार और प्रमाणव्यापार यदि ईश्वर में न सम्भव होते हों तो, मैं प्रत्यभिज्ञा करता हूँ—ऐसा जो व्यापार कहा गया है वह कौन सा व्यापार है ? इस विषय में आशंका कर उत्तर में कहते हैं कि— किन्तु मोह से वशीभूत हो जाने के कारण देखते हुए भी स्वरूप को नहीं देखते हैं । इसी कारण विद्याशक्ति का आविष्कार कर इस प्रत्यभिज्ञा को दिखाते हैं ॥ ३ ॥
अ.-१, आ.-१, का.-३ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २३ स ईश्वरस्वभाव आत्मा प्रकाशते तावत्, तत्र च अस्य स्वातन्त्र्यम्-इति न केनचिद्वपुषा न प्रकाशते, तत्र अप्रकाशात्मनापि प्रकाशते प्रकाशात्मनापि, तत्रापि प्रकाशात्मनि सर्वथा प्रकाशात्मना प्रकाशो भागशो वा; भागशः प्रकाशने सर्वस्य व्यतिरेकेण अव्यतिरेकेण वा, कतिपयस्य व्यतिरेकेण अव्यतिरेकेण वा, उक्तप्रकारपूर्णतया वा; तदमी सप्त प्रकाराः । तत्र प्रथमः प्रकारो जडोल्लासः, अन्त्यः परमशिवात्मा, मध्यमा जीवाभासाः, सैव भगवतो माया विमोहिनी नाम शक्तिः, तद्वशात् प्रकाशात्मतया सततम् अवभासमानेऽपि आत्मनि भागेन अप्रकाशनवशाद् ‘अनुपलक्षिते’ सर्वथा हृदयंगमीभावमप्राप्ते अत एव पूर्णतावभासनसाध्याम् अर्थक्रियाम् अकुर्वति, तत्पूर्णतावभासनात्मकामिमानविशेषसिद्धये ‘प्रत्यभिज्ञा’ व्याख्यातपूर्वा प्रदर्श्यते, कथं ‘शक्तेः’ ईश्वरनिष्ठत्वेन प्रसिद्धया दृक्क्रियात्मिकाया ‘आविष्करणेन’ प्रदर्शनेन अभिमानसाध्यार्थक्रियाणां तदभिमानसिद्ध्या विना असिद्धेः; तथा च दृष्टान्तं दर्शयति ‘तैस्तैरप्युपयाचितैः ( ४ अ० ३ अ० १७ श्लो० ) ।’ इति । एतदुक्तं भवति-न कारकव्यापारो भगवति, नापि ज्ञापकव्यापारोऽयम्, अपि तु मोहाप- सारणमात्रमेतत्, व्यवहारसाधनानां प्रमाणानां तावत्येव विश्रान्तेः । घटोऽयमग्रगः प्रत्यक्ष- त्वात्-इत्यनेन हि घटो न ज्ञाप्यते प्रत्यक्षेणैव प्रकाशमानत्वात्, अन्यथा पक्षे हेत्वसिद्धेः, केवलं वह ईश्वर स्वभाव वाला आत्मा प्रकाशित होता है, और उसमें ही इसका परम स्वातंत्र्य निहित है—इस प्रकार वह किसी शरीर से नहीं प्रकाशित होता, वह उसमें जड-शून्यभाव से भी भासित होता है और प्रकाशरूप से भी भासित होता है, उस प्रकाशात्मा में सब प्रकार के प्रकाश प्रकाशित होते हैं या कुछ अंश में प्रकाश रहता है आंशिक प्रकाश के मानने पर भी उसमें साधर्म्य रूप से रहता है; या वैधर्म्य रूप से रहता है, यह भी विकल्प हो सकता है, कहे हुए की पूर्णता से है, इस प्रकार ये सात विकल्प हो सकते हैं। इसमें पहला प्रकार तो यह है कि जड पदार्थों का जिसमें उल्लास होता हो, अन्त में परम शिव का स्वरूप हो और बीच में जीवात्माओं का आभास हो, वही भगवान् की माया-शक्ति है। जिससे कि प्राणी मोह पाश में बँध जाता है उसी कारण से प्रकाशरूप का निरन्तर प्रकाश होने पर भी आत्मा में कुछ अंश प्रकाशित न होने के कारण ‘अनुप- लक्षिते’ सभी प्रकारके हृदयंगमभाव नहीं प्राप्त करते हैं ऐसा होनेपर भी पूर्णता के अवभासन से होने वाली व्यवहार क्रिया नहीं करते रहने से, उस पूर्णता के अवभासनात्मक अभिमान की विशेष सिद्धि के लिए जिस ‘प्रत्यभिज्ञा’ की हमने पूर्व में ही व्याख्या कर दी है उसे दिखलाते हैं। उसे कैसे बताते हो; ऐसा यदि प्रश्न करते हो तो, इसके उत्तर में सुनो, ‘ईश्वर परमात्मामें रहनेवाली प्रसिद्ध ज्ञान-क्रियारूप शक्तिका ‘आविष्करणेन’ आविष्कार द्वारा दिखाना अभिमान साध्य अर्थक्रियाओं की अभिमानसिद्धि के बिना सिद्धि का होना सम्भव नहीं हो सकता है, उसे दृष्टान्त देकर दिखाते हैं—तैस्तैरप्युपयाचितैः ( ४ अ० ३ आ० १७ श्लोक ) उन-उन मनौतियों के द्वारा भी जब दमयन्ती नल को प्रत्यक्ष होते हुए भी नहीं पहचान सकी । यह कहा गया है कि—उस परमेश्वर में न तो कारक व्यापार घटता है और न जनानेका कोई व्यापार कर सकता है, किन्तु यहाँ पर तो केवल मोह दूर करनेसे ही प्रयोजन सिद्ध हो जाता है, व्यवहार को सिद्ध करने वाले का प्रमाण भी तो इतने कार्य करके विश्रान्त हो जाते हैं। देखो—जैसा कि हमारे सामने घट प्रत्यक्षरूपसे विद्यमान है चूँकि प्रकाशमान होनेके कारण यदि ऐसा मानते हो; तो फिर पक्ष में हेतु का रहना असिद्ध हो
२४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-१, का.-४ मोहमात्रमपसार्यते । यश्चायं मोहस्तदपसारणं च यत्, तदुभयमपि भगवत एव विजृम्भामार्चं, न तु अधिकं किंचित्—इत्युक्तं वक्ष्यते च ॥ ३ ॥ ननु परिदृश्यमाने भावराशौ किमीया शक्तिराविष्क्रियते कं च प्रति ? इति, जडानां तावत् न ज्ञानात्मिका शक्तिरस्ति, क्रियात्मिकापि स्वातन्त्र्यप्राणा स्वातन्त्र्यव्यपगमाद् असंभावना- भूमिरैव; तथा च रथो गच्छति—इत्यादौ उपचारं केचन प्रतिपन्नाः, न च जडान्प्रति व्यवहार- साधनम् उचितम्; अथ अजडजीवज्जनताधिकारेण उभयमपि, तर्हि सर्वस्य स्वात्मा महेश्वर— इति दूरतरं विप्रकर्षिता प्रत्याशा, तदेतद् आशङ्क्य निरूपयति— तथाहि जडभूतानां प्रतिष्ठा जीवदाश्रया । ज्ञानं क्रिया च भूतानां जीवतां जीवनं मतम् ॥ ४ ॥ ‘तथाहि’ इति युक्त्युपक्रमं द्योतयति, दृश्यतां किल इत्यर्थः । ‘तथा’ इत्यनेन साध्यं सूच्यते, ‘हिना’ हेतुरित्यन्ये, प्रकृतं साध्यं हेतुसिद्ध्यायत्तमुपक्रम्यते इत्यर्थः । तेन इति बुद्धिवर्तिना, अत एव स्मर्यमाणेन ग्रन्थेन वर्णयिष्यमाणेन प्रकारेण यस्मात् सर्वमेतद् युक्तम् इति ‘तथाहि’ इति शब्दस्य वार्थः । इह तावत् भावराशियथा विमृश्यते तथा अस्ति, अस्तित्वस्य प्रकाशं शरणोकूर्वतः जायेगा, मात्र मोह दूर करना ही इसका कार्य है। अब जिज्ञासा होती है कि यह क्या वस्तु है ? और उसे कहाँसे हटाना है ? ये दोनों ही भगवान् की इच्छा का कार्य है—इससे अधिक कोई चीज नहीं है—इस विषय में हम कह भी चुके हैं और आगे भी कहेंगे ॥ ३ ॥ अब शंका करते हैं कि दिखलाई देने वाली जो भाव राशियाँ हैं उनमें कौन सी शक्ति आविर्भूत की जाती है और किसके प्रति को जाती है ? यदि जड-पदार्थों को लेकर कहते हो; तो जड-पदार्थों में थोड़ी सी भी ज्ञानशक्त नहीं रहती है, क्रियात्मक शक्ति जिसका परम स्वात॑त्र्य ‘जीवन’ माना जाता है, स्वात॑त्र्य के न रहने से तो उसकी सम्भावना ही नहीं की जा सकती है; जैसा कि ‘रथो गच्छति’ रथ जाता है, इससे रथ में गमनात्मक क्रिया का रहना असम्भव है क्योंकि रथ जड पदार्थ है; कुछ लोग रथ पर बैठे हुए की भी क्रिया को स्वीकार करते हैं और जड- पदार्थों का व्यवहार होता हुआ देखा भी नहीं जाता और समुचित भी नहीं है; चेतन जीवित हुए जीवों के ही अधिकार द्वारा ये दोनों प्रकार के कार्य होते हैं तब तो फिर सबकी आत्मा महेश्वर है, ऐसी आशा करना बहुत दूर की बात हो जायेगी, इस पर आशङ्का कर विवेचन करते हैं— इसलिए वैसा ही सिद्ध होता है कि जडभूतों की प्रतिष्ठा जीवित जीवों के आश्रित होती है। ज्ञान और क्रिया जीवित प्राणियों का जीवन है—ऐसा माना जाता है ॥ ४ ॥ ‘तथाहि’ इस शब्द से युक्ति का उपक्रम द्योतित हो रहा है, दृढ़ता पूर्वक देखो—ऐसा इसका भावार्थ निकलता है। ‘तथा’ इससे साध्य सूचित होता है ‘हिना’ इस शब्द के द्वारा हेतु सूचित होता है दूसरे लोगों की ऐसी मान्यता है, प्रकृत जो साध्य है वह हेतु सिद्धि के अधीन है इसलिए हम उसका उपक्रम करते हैं ‘तेन’ यह बुद्धि में रहने वाले होने के कारण है, इसलिए आगे स्मरण किये जाने वाले ग्रन्थ के द्वारा यह वर्णन समुचित है ऐसा ‘तथाहि’ शब्द का विकल्प अर्थ है यहाँ पर भाव राशि का जैसा विचार किया जाता है वैसा ही है क्योंकि अस्तित्व के प्रकाश का
अ.-१, आ.-१, का.-४ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २५ प्रकाशप्राणितदेशीयं विमर्शम् आश्रित्य समुन्मेषात्, अविमृष्टं हि यदि वस्तु तन्न नीलं न पीतं न सत् न असदिति, कुत ? —इति पर्यनुयोगे किम् उत्तरं स्यात् । तेन यद् यथा यावत् अबाधितं विमृश्यते तत् तथा तावत् अस्ति, तत एव देशकालाकारविततात्मानोऽपि द्रव्यक्रियासंबन्धादयः एकत्वेन परमार्थसन्त-इति वक्ष्यते 'क्रिया संबन्धसामान्य (२ आ० २ आ० १ श्लो०) ।' इत्यादिना, ततश्च विततमपि इदं विश्वं संक्षेपविमर्शदशाधिरोहे जडं जीवच्च—इत्येतावता द्वयरूपेण अस्ति । तत्र जडा अपि विमृश्यमाना न स्वतन्त्रा भवन्ति, विमृश्यमानता हि तेषां न स्वशरीर- विश्रान्तः कोऽपि धर्मः जडत्वाभावप्रसंगात्, मम नीलं भाति मया नीलं ज्ञायते इति । तेषां 'जडभूतानां चिन्मयत्वेऽपि मायाख्यया ईश्वरशक्त्या जाड्यं प्रापितानां 'जीवन्तं' प्रमातारमाश्रित्य 'प्रतिष्ठा' तत्प्रमात्राभिमुख्येन अवस्थानं, ततो जडा नाम न पृथक् सन्ति । यथोक्तं ग्रन्थकृतैव 'एवमात्मन्यसत्कल्पाः प्रकाशस्यैव सन्त्यमी । जडाः ........................॥' इति । स एव हि स्वात्मा सन् वक्तव्यो यस्य अन्यानुपाहितं रूपं चकास्ति; न च भारू- पामुपाहितं जडं नाम किञ्चित्, तेन जडानां हि शक्तिराविष्क्रियते जडान्प्रति—इत्येतत् तावत् निरुत्थानमेव । ये तु अन्ये जडेभ्यो जीवन्त—इति नाम प्रसिद्धाः तेषामपि शरीरप्राणपुर्यष्टक- शून्याकाराः तावत् जडा एव—इति तेषामपि किमुच्यते । एवं घटशरीरप्राणसुखतदभावरूपं आश्रय लेने वाले प्रकाश से जीवित प्रायः विमर्श के आश्रित होकर उन्मेष होने के कारण, जिसका विमर्श नहीं किया गया है ऐसी वस्तु न तो नील है और न तो पीत ही है; और न सत् है और न असत् है ऐसा क्यों है ? इस तरह से प्रश्न करने पर उत्तर क्या देंगे । इसलिए जो जितना भी अबाधित परामर्श होता है; वह वैसा उतना ही रहता है इससे देश-काल-आकार आदि विस्तृत स्वभाव वाले द्रव्य क्रिया के सम्बन्धादि यथार्थ सत् हैं—ऐसा आगे बताया जायेगा 'क्रिया सम्बन्ध सामान्य' ( २ अ० २ आ० १ श्लोक ) इस स्थल में । इसलिए विस्तृत होता हुआ भी यह संसार विमर्श दशा में आरूढ़ होने पर जड और चेतन इन्हीं दो रूपों में रहता है । जडवर्ग भी विमर्श दशा में आ जाने पर स्वतंत्र नहीं रहते, विमृष्ट होना कोई उनका अपने स्वरूप में विश्राम लेने वाला धर्म नहीं है तब तो फिर जडभाव का अभाव प्रसंग आ जायेगा, मुझे नील भासता है । अथवा मेरे द्वारा नील का ज्ञान होता है । उन जड- पदार्थों के चिन्मयरूप होने पर भी माया नामक ईश्वर की शक्ति से जडता को प्राप्त हुए 'जीवन्तम्' जीवित प्रमाता का आश्रय लेकर 'प्रतिष्ठा' उस प्रमाता के अभिमुख वर्तमानरूप से स्थित रहता है, इसलिए जडवर्ग कोई उससे अलग नहीं है जब कि ग्रन्थकार ने स्वयं इसका प्रतिपादन किया है । "इस प्रकार ये सभी पदार्थ अपने में असत् कल्प [ नहीं रहने के बराबर ] प्रकाशक के ही अन्तर्भूत हैं ।" उसी आत्मा को सत्य कहना चाहिए जिसका रूप अन्य किसी से युक्त न होता हुआ स्वयं प्रकाशित होता हो । जड कोई ज्योतिरूप से संयुक्त नहीं रहता, इसी कारण जडपदार्थों के लिए ही जडवस्तुओं की शक्ति दिखाई जाती है किन्तु ऐसा घटित होना तो असंभव्य ही दीखता है । जो लोग जडभावों से भिन्न जीते हुए कहे जाते हैं उनमें भी बहुत से शरीर-प्राण पुर्यष्टक [ शब्द-स्पर्श- रूप-रस-गंध-मन-बुद्धि और अहंकार को पुर्यष्टक कहते हैं ] से शून्य ही आकार होते हैं और उनके भी शरीरादि जडरूप ही तो हैं इस विषय में अधिक और क्या कहा जाय । इस प्रकार घट-शरीर- ४
२६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-१, का.-४ सत् यल्लग्नं भाति तदेव जीवरूपभूतं सत्यम्; तस्य च आपाते यद्यपि बहुत्वं भाति तथापि तत् जडात्मकवेद्यशरीराद्युपाधेः । ततस्तत् अपारमार्थिकम् अन्योन्याश्रयात्, जीवा हि जडभेदात् भेदभागिनः जडाश्च जीवभेदात्, एतद्देहोऽयम् एतद्वेद्योऽयम्—इति भेदम् उपेयुः, नीलपीतादिभेदस्तु प्रमातृसंलग्नतया अभेदभूमिमेव परमारूढ इति किं तेन । तदयं जीवानांमभेद एव संपन्न, इति जीवन् प्रमाता—इति जातं । जीवनं च जीवनकर्तृत्वं तच्च ज्ञानक्रियात्मकं, यो हि जानाति च करोति च स जीवति—इत्युच्यते । तदयं प्रमाता ज्ञानक्रियाशक्तियोगाद् ईश्वर—इति व्यवहर्तव्यः प्राण-सुख और उन सबों का अभाव दुःखदिरूप सत् वस्तु को कुछ संसक्त मिला हुआ भासता है और वही जीवरूप में सत्य भी है; यद्यपि उसे देखने पर पहले-पहल बहुत से मालूम पड़ते हैं तो भी वह संबद्ध जडात्मक वेद्य शरीरादि की उपाधि से है। इसीलिए इसे पारमार्थिक रूप नहीं कहा जा सकता, क्योंकि परस्पर एक दूसरे के आश्रित होने के कारण, जीव जड से भिन्न भेद भागी होने से और जड जीव से भिन्न है, इसीलिए यह देह है एवं यह वेद्य है—ऐसे भेद-भाव को प्राप्त करना होगा, नील-पीतादि के भेद तो प्रमाता के संसक्त मिले हुए रहने के कारण अभेदात्मक भूमि में आरूढ़ रहता है उससे क्या प्रयोजन सिद्ध करना है। इसलिए जीवों का अभेद ही सिद्ध सम्पन्न हुआ, इसलिए जीवन प्रमाता कहा जाता है और जीवन जीव का कर्तापन है और इसी कारण उसे ज्ञान-क्रियात्मक कहा जाता है, जो जैसा जानता है उसे वैसा ही करता भी है और जीता है। इसलिए यह प्रमाता ज्ञान क्रियात्मक शक्ति के योग से ईश्वर हो जाता है—ऐसा पुराण- १. परिच्छिन्नप्रकाशत्वं जडस्य किल लक्षणम् । जडाद्विलक्षणो बोधो यतो न परिमीयते ॥ परिच्छिन्न प्रकाशत्व होना जड का लक्षण है। ज्ञान तो जड से विलक्षण होता है इसलिए उसका परिच्छेद नहीं होता । २. इच्छा-ज्ञान-क्रियापूर्वा यस्मात्सर्वाः प्रवृत्तयः । सर्वेपि जन्तवस्तस्मादीश्वरा इति निश्चिताः ॥ इति । ज्ञानक्रियाशक्तिलक्षणं च— स्वप्रकाशे निजे धाम्नि भास्येद्भावविश्रमान् । भासना च क्रिया शक्तिरिति शास्त्रेषु कथ्यते ॥ यया विचित्रतन्वादिकल्पना प्रविभज्यते । भासनानभाते च कथं नामप्रकल्पनम् ॥ तदस्यान्तःस्थितं भानं ज्ञानशक्तिरहं स्मृता । ‘इच्छा एवं क्रिया ज्ञानपूर्वक ही हुआ करती है और तभी प्रवृत्तियां देखी जाती हैं। सभी प्राणीवर्ग ईश्वर का ही स्वरूप है यह दृढ़तापूर्वक मानना चाहिए ।’ ज्ञान-क्रियाशक्ति का स्वरूप दिखाते हैं —‘सब भावों को अपने बोध में जो भासित करते हैं वहां पर उसका भासना है और उसी क्रिया-शक्ति को शास्त्रों में भी कहा गया है जिससे विचित्र शरीरादि की स्थिति का विभाग होता है, यदि ऐसा उसका भासना नहीं भासित होता हो तो, कल्पना का होना असम्भव हो जायेगा; इसलिए उसका अन्तःकरण में रहकर भासित होना ज्ञान-शक्ति कहलाती है जिसका अहं विमर्श होता रहता है ।’
अ.-१, आ.-१, का.-५ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २७ पुराणगमादिप्रसिद्धेश्वरवत्; तदप्रसिद्धावपि सर्वविषयज्ञानक्रियाशक्तिमत्त्वस्वभावमेव ऐश्वर्यं तन्मात्रानुबन्धित्वादेव सिद्धं; तदपि च कल्पितेश्वरे राजादौ तथा व्याप्तिग्रहणात्, यो यावति ज्ञाता कर्ता च स तावति ईश्वरो राजेव, अनीश्वरस्य ज्ञातृत्वकर्तृत्वे स्वभावविरुद्धे यतः, आत्मा च विश्वत्र ज्ञाता कर्ता च—इति सिद्धा प्रत्यभिज्ञा । ज्ञानक्रियाशक्ती एव स्वाभाविक्यौ अप्ररूढभेदोन्मेषे सदाशिवेश्वरौ, भेदस्य सामान्यतः प्ररोहे विद्याकले, विशेषतः प्ररोहे बुद्धिकर्मेन्द्रियगण—इति भविष्यति । जडा इति अजीवन्तः, अन्ये च जीवन्त—इत्यापाते तावत् भाति न तु संविदापाते भाति । जीवतामिति जङ्गमा एव अमी इत्थं निर्दिष्टाः ॥ ४ ॥ ननु ज्ञानक्रिये एव कथं सिद्धे यत ऐश्वर्यव्यवहारः प्रसाध्येत ?,—इति शङ्कां शमयितुमाह- तत्र ज्ञानं स्वतःसिद्धं क्रिया कायाश्रिता सती । परैरप्युपलक्ष्येत तयान्यज्ञानमूह्यते ॥ ५ ॥ अहं जानामि, मया ज्ञातं ज्ञास्यते च-इत्येवं प्रकाशाहंपरामर्शपरिनिष्ठितमेव इदं ज्ञानं नाम, आगमशास्त्रों में प्रसिद्ध ईश्वर के तुल्य व्यवहार में आता है; उसका ऐश्वर्य प्रसिद्ध न होने पर भी सब प्रकार से ज्ञान-क्रियाशक्ति का अपने में आ जाना ही ऐश्वर्य माना हुआ है; ये सभी बातें चिद्रूप में मिलने के कारण ही ऐश्वर्य वाले कहते हैं; और यह सिद्ध भी होता है एवं ये सारी की सारी बातें कल्पित ईश्वर-राजा आदि में भी मिलती हैं, जो जितने का ज्ञाता और कर्ता है वह उतने का स्वामी कहलाता है, जो ईश्वर नहीं है उसमें ज्ञातृत्व और कर्तृत्व का रहना अपने स्वभाव के विरुद्ध भी है, और आत्मा सर्वत्र ज्ञाता और कर्ता के रूप में रहता है इसलिए प्रत्य- भिज्ञा सिद्ध होती है । ज्ञान और क्रिया की शक्ति स्वाभाविक है । जबतक भेद नहीं प्रस्फुटित होता है तबतक सदाशिव और ईश्वर भाव होता है, भेद भाव के सामान्यतः स्फुटित होने पर विद्या और कला का भाव आता है और अधिक विशेषरूप से बढ़ जाने पर बुद्धि और कर्मेन्द्रिय- गण का भाव होने लग जायेगा । जडपदार्थ निर्जीव है और चेतन तत्त्व तो सजीव जीवित होता है । दूसरे जीते हैं—ऐसा तो पहले-पहल ही देखने में आता है किन्तु ज्ञान के रहने पर नहीं भासता । ‘जीवताम्’ इससे चेतन जीवों का निर्देश किया हुआ है ॥ ४ ॥ अब शंका करते हैं कि ज्ञान और क्रिया कैसे सिद्ध होगी जिससे कि इन्हीं दोनों क्रियाओं का ऐश्वर्य-व्यवहार सिद्ध हो सके ? इस आशंका के समाधान में उत्तर देते हैं— ज्ञान और क्रिया के बीच ज्ञान अपने आप सिद्ध है और क्रिया शरीर से सम्बन्ध रखती हुई दूसरे के द्वारा भी वह उपलक्षित होती है तथा क्रिया के द्वारा अन्यज्ञान को भी जान सकते हैं ॥ ५ ॥ मैं जानता हूँ, मेरे द्वारा जाना गया और मुझ से जाना जायेगा—इस प्रकार अहं परामर्श से परिनिष्ठित हो यह ज्ञान होता है, इससे अधिक वहाँ दूसरा क्या विचार किया जाय, उसका