ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-१, का.-४ सत् यल्लग्नं भाति तदेव जीवरूपभूतं सत्यम्; तस्य च आपाते यद्यपि बहुत्वं भाति तथापि तत् जडात्मकवेद्यशरीराद्युपाधेः । ततस्तत् अपारमार्थिकम् अन्योन्याश्रयात्, जीवा हि जडभेदात् भेदभागिनः जडाश्च जीवभेदात्, एतद्देहोऽयम् एतद्वेद्योऽयम्—इति भेदम् उपेयुः, नीलपीतादिभेदस्तु प्रमातृसंलग्नतया अभेदभूमिमेव परमारूढ इति किं तेन । तदयं जीवानांमभेद एव संपन्न, इति जीवन् प्रमाता—इति जातं । जीवनं च जीवनकर्तृत्वं तच्च ज्ञानक्रियात्मकं, यो हि जानाति च करोति च स जीवति—इत्युच्यते । तदयं प्रमाता ज्ञानक्रियाशक्तियोगाद् ईश्वर—इति व्यवहर्तव्यः प्राण-सुख और उन सबों का अभाव दुःखदिरूप सत् वस्तु को कुछ संसक्त मिला हुआ भासता है और वही जीवरूप में सत्य भी है; यद्यपि उसे देखने पर पहले-पहल बहुत से मालूम पड़ते हैं तो भी वह संबद्ध जडात्मक वेद्य शरीरादि की उपाधि से है। इसीलिए इसे पारमार्थिक रूप नहीं कहा जा सकता, क्योंकि परस्पर एक दूसरे के आश्रित होने के कारण, जीव जड से भिन्न भेद भागी होने से और जड जीव से भिन्न है, इसीलिए यह देह है एवं यह वेद्य है—ऐसे भेद-भाव को प्राप्त करना होगा, नील-पीतादि के भेद तो प्रमाता के संसक्त मिले हुए रहने के कारण अभेदात्मक भूमि में आरूढ़ रहता है उससे क्या प्रयोजन सिद्ध करना है। इसलिए जीवों का अभेद ही सिद्ध सम्पन्न हुआ, इसलिए जीवन प्रमाता कहा जाता है और जीवन जीव का कर्तापन है और इसी कारण उसे ज्ञान-क्रियात्मक कहा जाता है, जो जैसा जानता है उसे वैसा ही करता भी है और जीता है। इसलिए यह प्रमाता ज्ञान क्रियात्मक शक्ति के योग से ईश्वर हो जाता है—ऐसा पुराण- १. परिच्छिन्नप्रकाशत्वं जडस्य किल लक्षणम् । जडाद्विलक्षणो बोधो यतो न परिमीयते ॥ परिच्छिन्न प्रकाशत्व होना जड का लक्षण है। ज्ञान तो जड से विलक्षण होता है इसलिए उसका परिच्छेद नहीं होता । २. इच्छा-ज्ञान-क्रियापूर्वा यस्मात्सर्वाः प्रवृत्तयः । सर्वेपि जन्तवस्तस्मादीश्वरा इति निश्चिताः ॥ इति । ज्ञानक्रियाशक्तिलक्षणं च— स्वप्रकाशे निजे धाम्नि भास्येद्भावविश्रमान् । भासना च क्रिया शक्तिरिति शास्त्रेषु कथ्यते ॥ यया विचित्रतन्वादिकल्पना प्रविभज्यते । भासनानभाते च कथं नामप्रकल्पनम् ॥ तदस्यान्तःस्थितं भानं ज्ञानशक्तिरहं स्मृता । ‘इच्छा एवं क्रिया ज्ञानपूर्वक ही हुआ करती है और तभी प्रवृत्तियां देखी जाती हैं। सभी प्राणीवर्ग ईश्वर का ही स्वरूप है यह दृढ़तापूर्वक मानना चाहिए ।’ ज्ञान-क्रियाशक्ति का स्वरूप दिखाते हैं —‘सब भावों को अपने बोध में जो भासित करते हैं वहां पर उसका भासना है और उसी क्रिया-शक्ति को शास्त्रों में भी कहा गया है जिससे विचित्र शरीरादि की स्थिति का विभाग होता है, यदि ऐसा उसका भासना नहीं भासित होता हो तो, कल्पना का होना असम्भव हो जायेगा; इसलिए उसका अन्तःकरण में रहकर भासित होना ज्ञान-शक्ति कहलाती है जिसका अहं विमर्श होता रहता है ।’