ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-१, का.-५ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २७ पुराणगमादिप्रसिद्धेश्वरवत्; तदप्रसिद्धावपि सर्वविषयज्ञानक्रियाशक्तिमत्त्वस्वभावमेव ऐश्वर्यं तन्मात्रानुबन्धित्वादेव सिद्धं; तदपि च कल्पितेश्वरे राजादौ तथा व्याप्तिग्रहणात्, यो यावति ज्ञाता कर्ता च स तावति ईश्वरो राजेव, अनीश्वरस्य ज्ञातृत्वकर्तृत्वे स्वभावविरुद्धे यतः, आत्मा च विश्वत्र ज्ञाता कर्ता च—इति सिद्धा प्रत्यभिज्ञा । ज्ञानक्रियाशक्ती एव स्वाभाविक्यौ अप्ररूढभेदोन्मेषे सदाशिवेश्वरौ, भेदस्य सामान्यतः प्ररोहे विद्याकले, विशेषतः प्ररोहे बुद्धिकर्मेन्द्रियगण—इति भविष्यति । जडा इति अजीवन्तः, अन्ये च जीवन्त—इत्यापाते तावत् भाति न तु संविदापाते भाति । जीवतामिति जङ्गमा एव अमी इत्थं निर्दिष्टाः ॥ ४ ॥ ननु ज्ञानक्रिये एव कथं सिद्धे यत ऐश्वर्यव्यवहारः प्रसाध्येत ?,—इति शङ्कां शमयितुमाह- तत्र ज्ञानं स्वतःसिद्धं क्रिया कायाश्रिता सती । परैरप्युपलक्ष्येत तयान्यज्ञानमूह्यते ॥ ५ ॥ अहं जानामि, मया ज्ञातं ज्ञास्यते च-इत्येवं प्रकाशाहंपरामर्शपरिनिष्ठितमेव इदं ज्ञानं नाम, आगमशास्त्रों में प्रसिद्ध ईश्वर के तुल्य व्यवहार में आता है; उसका ऐश्वर्य प्रसिद्ध न होने पर भी सब प्रकार से ज्ञान-क्रियाशक्ति का अपने में आ जाना ही ऐश्वर्य माना हुआ है; ये सभी बातें चिद्रूप में मिलने के कारण ही ऐश्वर्य वाले कहते हैं; और यह सिद्ध भी होता है एवं ये सारी की सारी बातें कल्पित ईश्वर-राजा आदि में भी मिलती हैं, जो जितने का ज्ञाता और कर्ता है वह उतने का स्वामी कहलाता है, जो ईश्वर नहीं है उसमें ज्ञातृत्व और कर्तृत्व का रहना अपने स्वभाव के विरुद्ध भी है, और आत्मा सर्वत्र ज्ञाता और कर्ता के रूप में रहता है इसलिए प्रत्य- भिज्ञा सिद्ध होती है । ज्ञान और क्रिया की शक्ति स्वाभाविक है । जबतक भेद नहीं प्रस्फुटित होता है तबतक सदाशिव और ईश्वर भाव होता है, भेद भाव के सामान्यतः स्फुटित होने पर विद्या और कला का भाव आता है और अधिक विशेषरूप से बढ़ जाने पर बुद्धि और कर्मेन्द्रिय- गण का भाव होने लग जायेगा । जडपदार्थ निर्जीव है और चेतन तत्त्व तो सजीव जीवित होता है । दूसरे जीते हैं—ऐसा तो पहले-पहल ही देखने में आता है किन्तु ज्ञान के रहने पर नहीं भासता । ‘जीवताम्’ इससे चेतन जीवों का निर्देश किया हुआ है ॥ ४ ॥ अब शंका करते हैं कि ज्ञान और क्रिया कैसे सिद्ध होगी जिससे कि इन्हीं दोनों क्रियाओं का ऐश्वर्य-व्यवहार सिद्ध हो सके ? इस आशंका के समाधान में उत्तर देते हैं— ज्ञान और क्रिया के बीच ज्ञान अपने आप सिद्ध है और क्रिया शरीर से सम्बन्ध रखती हुई दूसरे के द्वारा भी वह उपलक्षित होती है तथा क्रिया के द्वारा अन्यज्ञान को भी जान सकते हैं ॥ ५ ॥ मैं जानता हूँ, मेरे द्वारा जाना गया और मुझ से जाना जायेगा—इस प्रकार अहं परामर्श से परिनिष्ठित हो यह ज्ञान होता है, इससे अधिक वहाँ दूसरा क्या विचार किया जाय, उसका