ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-१, का.-५ किं तत्र अन्यत् विचार्यते, तदप्रकाशे हि विश्वम् अन्धतमसं स्यात्, तदपि वा न स्यात्, बालोऽपि हि प्रकाशविश्रान्तिमेव संवेदयते । तदुक्तम् 'विज्ञातारमरे केन विजानीयात्।' ( बृ० २.५.१९ ) इति । तन्निह्नवे हि कः प्रश्नः, किम् उत्तरं च स्यात् - इति । तत्र जानामि - इत्यन्तः संरम्भयोगोऽपि भाति, येन शुक्लादेर्गुणात् अत्यन्तजडात् जानामि- इति वपुः चित्स्वभावताम् अभ्येति, स च संरम्भो विमर्शः क्रियाशक्तिरुच्यते । यदुक्तम् अस्मत्परमेष्ठिश्रीसोमानन्दपादैः 'घटादिग्रहकालेऽपि घटं जानाति सा क्रिया ।' इति । तेन आन्तरीयक्रियाशक्तिः ज्ञानवदेव स्वतः- प्रकाश न रहने पर तो यह सारा का सारा विश्व अन्धकारमय हो जायेगा, या विश्व ही नहीं रहेगा, क्योंकि बालक भी तो प्रकाश में ही विश्रान्ति का ज्ञान करता है । उसके विषय में कहा भी गया है-जानने वाले को किससे जाना जा सकता है' ( बृ० २.५.१९ ) उसके छिप जाने पर क्या प्रश्न ओर क्या उत्तर हो सकता है । 'मैं जानता हूँ' ऐसा अन्तःकरण में ज्ञान का प्रकाश भासता है, जबकि प्रकाश शुक्लादि गुणों से अत्यन्त जड रहता है, उससे भिन्न ही मैं जानता हूँ ऐसा वपु चित्स्वभाव को प्राप्त करता है उससे बढ़े हुए विमर्श को ही क्रिया-शक्ति कहा जाता है। जो कि हमारे दादा गुरु सोमानन्दपाद ने कहा है- 'घटादि के ग्रहण काल में ही मैं घट को जानता हूँ इसी का नाम क्रिया है।' इसलिए अन्तःकरण में होने १. असिद्धौ च प्रकाशस्य कोऽहं किं त्वं तमोऽपि किम् । न किञ्चिदपि वा किं स्यात्तूष्णीं स्यादपि वा कथम् ॥ किञ्च अयं घटोऽयं पट इत्येवं नानाप्रतीतिषु । अर्कप्रभेव स्वज्ञानं स्वयमेव प्रकाशते ॥ ज्ञान न चेत्स्वयंसिद्धं जगदन्धं ततो भवेत् । इति प्रकाश की सिद्धि न होने पर ही व्यक्ति अपने आपको नहीं जान पाता है वास्तव में मैं कौन हूँ और तुम क्या हो तथा अज्ञान क्या है ? कुछ भी नहीं तो भी-कैसे चुपचाप रहेगा, क्या होगा या रहेगा भी कैसे-बैठा चुपचाप और भी इस विषय में सुनो-यह घट है और यह पट है इस प्रकार की विविध प्रतीतियों में सूर्य की प्रभा के समान अपना ज्ञान स्वयं प्रकाशित रहता है। यदि ज्ञान स्वयं सिद्ध नहीं होता तो यह सारा-का-सारा संसार अन्धा हो जायगा- २. वेदान्त दर्शन का यह मत है कि जैसा वह जानता है, इसमें अन्तःकरण की वृत्ति विशेषरूप क्रिया ही "ज्ञा" धातु का वाच्यार्थ है क्योंकि 'ज्ञा' धातु अवबोध रूप में पढ़ी गयी है और चित्तत्व के प्रतिबिम्ब रूप आभास से युक्त होकर ही 'तिङ्' प्रत्यय का अर्थ होता है। परस्पर अध्यास को प्राप्त हुए आभास और बुद्धि के भेद का ग्रहण नहीं होता; ये दोनों आभास में मिल जाने के कारण मालूम नहीं पड़ते इस विषय में आचार्य ने कहा है- आत्माभासस्तु तिङ्वाच्यो धात्वर्थश्रधियः क्रिया । उभयं चाविवेकेन जानातीत्युच्यते मृषा ॥ बुद्धेः कर्तृत्वमध्यक्ष्य जानातीति ज्ञ उच्यते । तथा चैतन्यमध्यस्य ज्ञत्वं बुद्धेरिहोच्यते ॥