ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-१, का.-५ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २९ सिद्धा स्वप्रकाशा, सैव तु स्वशक्त्या प्राणपुर्यष्टकक्रमेण शरीरमपि संचरमाणा स्पन्दनरूपा सती व्यापारव्याहारात्मिका मायापदेऽपि प्रमाणस्य प्रत्यक्षादेर्विषयः । सा च परशरीरादिसाहित्येन अवगता स्वं स्वभावं ज्ञानात्मकं गमयति, न च ज्ञानम् इदन्तया भाति, इदन्ता हि अज्ञानत्वं, न च अन्यत् अन्येन वपुषा भातं भातं भवेत्, तत् ज्ञानं भात्येव परं, भाति च यत् तदेव अह- मित्यस्य वपुः,—इति परज्ञानमपि स्वात्मैव; परत्वं केवलम् उपाधेर्देहादेः, स चापि विचारितो यावत् न अन्य इति विश्वः प्रमातृवर्गः परमार्थत एकः प्रमाता, स एव च अस्ति। यदुक्तम्— ‘...प्रकाश एवास्ति स्वात्मनः स्वपरात्मभिः ।’ इति । ततश्च भगवान् सदाशिवो जानाति इत्यतः प्रभृति क्रिमिरपि जानाति—इत्यन्तम् एक एव प्रमाता—इति फलतः सर्वज्ञत्वं प्रमातुः । एवं कर्तृत्वेऽपि वाच्यम् । यदुक्तम् अस्मत्पर- वाली क्रिया-शक्ति ही ज्ञान के जैसे सिद्ध होती है और स्वयं अपने आप प्रकाशित भी रहती है, वही अपनी शक्ति द्वारा प्राण-पुर्यष्टकके क्रम से शरीर में रहती हुई स्पन्दरूप होकर व्यापाररूप व्यवहार को सम्पादन कराती हुई मायामय पद में भी प्रत्यक्षादि प्रमाणों का विषय बनती है। और वह किसी अन्य के शरीरादि में ज्ञात होकर अपने ज्ञानात्मक स्वभावको जनाती है। ज्ञान 'इदन्तया' नहीं भासता है, क्योंकि इदन्ता तो अज्ञान का स्वरूप माना जाता है, और दूसरा कोई दूसरे के स्वरूप से भासित होने पर स्वयं भासित होना यह नहीं कहा जाता, वही अहंभाव का वपु है, इसलिए दूसरे का ज्ञान भी आत्मस्वरूप ही होता है; दूसरे का ज्ञान मात्र देहादि की उपाधि है, और उसके विषय में विचार करने पर वह दूसरा है ऐसा सिद्ध ही नहीं होगा, इसलिए विश्व के सारे प्रमातृगण परमार्थरूप से एक ही परमेश्वर के प्रमाता हैं। कहा भी है—इस विषय में ‘...प्रकाश एवास्ति स्वात्मनः परात्मभिः ।’ अपने आपका प्रकाश ही दूसरे की आत्मा से मिलकर रहता है।’ जो भगवान् सदाशिव जिस वस्तु-पदार्थ को जैसा भी सूक्ष्म-स्थूल रूप से जानता है उसे पहले से लेकर आखिरी तक कीट-पतंग भी जानते ही हैं, यहाँ तक एक ही प्रमाता है इससे प्रमाता की सर्वज्ञता सिद्ध हुई । उसी प्रकार कर्तृता में भी जान लेना चाहिए । जिसका प्रतिपादन परमेष्ठी “तिङ्” प्रत्ययका वाच्यार्थ आभास है और “ज्ञा” धातुका अर्थ है बुद्धि की क्रिया । ये दोनों आपसमें मिले हुए रहनेके कारण और भेद ज्ञानके नहीं रहनेसे ही कहा जाता है कि यह ज्ञान असत्य है । बुद्धिके कर्तृत्वका अध्यास कहकर, यह “ज्ञाता जानता है” ऐसा बोला भी जाता है । इस प्रकार चैतन्यके ज्ञानका अध्यास होनेके कारण बुद्धिका ज्ञान कहा जाता है । आभास, बुद्धि, और उसकी जो क्रियाएँ हैं इन तीनों का व्यवहार भी मिथ्या है । सकल बुद्धि का समष्टि रूप माया अवच्छिन्न चैतन्य ही ईश्वर है । उस-उस बुद्धिमें प्रतिबिम्बित होने वाले को जीव शब्द से कहा जाता है । उपाधि से रहित जो पूर्ण चैतन्य है वह ब्रह्म है । इस तरह चिति शक्ति के तीन भेद हो जाते हैं । १. प्रश्न उठता है कि ईश्वर सर्वज्ञ क्यों नहीं है ? यदि यह कहो कि-प्रमातृ-गत भेद के होने के कारण ऐसा मैं कहता हूँ, वह भी ठीक नहीं बैठता क्योंकि प्रमाताओं का भेद पारमार्थिक नहीं है । स्वातन्त्र्य-शक्ति के द्वारा ही मात्र उसमें भेद दिखायी पड़ता है । वस्तुतः शिव आदि से लेकर