ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-१, का.-४ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २५ प्रकाशप्राणितदेशीयं विमर्शम् आश्रित्य समुन्मेषात्, अविमृष्टं हि यदि वस्तु तन्न नीलं न पीतं न सत् न असदिति, कुत ? —इति पर्यनुयोगे किम् उत्तरं स्यात् । तेन यद् यथा यावत् अबाधितं विमृश्यते तत् तथा तावत् अस्ति, तत एव देशकालाकारविततात्मानोऽपि द्रव्यक्रियासंबन्धादयः एकत्वेन परमार्थसन्त-इति वक्ष्यते 'क्रिया संबन्धसामान्य (२ आ० २ आ० १ श्लो०) ।' इत्यादिना, ततश्च विततमपि इदं विश्वं संक्षेपविमर्शदशाधिरोहे जडं जीवच्च—इत्येतावता द्वयरूपेण अस्ति । तत्र जडा अपि विमृश्यमाना न स्वतन्त्रा भवन्ति, विमृश्यमानता हि तेषां न स्वशरीर- विश्रान्तः कोऽपि धर्मः जडत्वाभावप्रसंगात्, मम नीलं भाति मया नीलं ज्ञायते इति । तेषां 'जडभूतानां चिन्मयत्वेऽपि मायाख्यया ईश्वरशक्त्या जाड्यं प्रापितानां 'जीवन्तं' प्रमातारमाश्रित्य 'प्रतिष्ठा' तत्प्रमात्राभिमुख्येन अवस्थानं, ततो जडा नाम न पृथक् सन्ति । यथोक्तं ग्रन्थकृतैव 'एवमात्मन्यसत्कल्पाः प्रकाशस्यैव सन्त्यमी । जडाः ........................॥' इति । स एव हि स्वात्मा सन् वक्तव्यो यस्य अन्यानुपाहितं रूपं चकास्ति; न च भारू- पामुपाहितं जडं नाम किञ्चित्, तेन जडानां हि शक्तिराविष्क्रियते जडान्प्रति—इत्येतत् तावत् निरुत्थानमेव । ये तु अन्ये जडेभ्यो जीवन्त—इति नाम प्रसिद्धाः तेषामपि शरीरप्राणपुर्यष्टक- शून्याकाराः तावत् जडा एव—इति तेषामपि किमुच्यते । एवं घटशरीरप्राणसुखतदभावरूपं आश्रय लेने वाले प्रकाश से जीवित प्रायः विमर्श के आश्रित होकर उन्मेष होने के कारण, जिसका विमर्श नहीं किया गया है ऐसी वस्तु न तो नील है और न तो पीत ही है; और न सत् है और न असत् है ऐसा क्यों है ? इस तरह से प्रश्न करने पर उत्तर क्या देंगे । इसलिए जो जितना भी अबाधित परामर्श होता है; वह वैसा उतना ही रहता है इससे देश-काल-आकार आदि विस्तृत स्वभाव वाले द्रव्य क्रिया के सम्बन्धादि यथार्थ सत् हैं—ऐसा आगे बताया जायेगा 'क्रिया सम्बन्ध सामान्य' ( २ अ० २ आ० १ श्लोक ) इस स्थल में । इसलिए विस्तृत होता हुआ भी यह संसार विमर्श दशा में आरूढ़ होने पर जड और चेतन इन्हीं दो रूपों में रहता है । जडवर्ग भी विमर्श दशा में आ जाने पर स्वतंत्र नहीं रहते, विमृष्ट होना कोई उनका अपने स्वरूप में विश्राम लेने वाला धर्म नहीं है तब तो फिर जडभाव का अभाव प्रसंग आ जायेगा, मुझे नील भासता है । अथवा मेरे द्वारा नील का ज्ञान होता है । उन जड- पदार्थों के चिन्मयरूप होने पर भी माया नामक ईश्वर की शक्ति से जडता को प्राप्त हुए 'जीवन्तम्' जीवित प्रमाता का आश्रय लेकर 'प्रतिष्ठा' उस प्रमाता के अभिमुख वर्तमानरूप से स्थित रहता है, इसलिए जडवर्ग कोई उससे अलग नहीं है जब कि ग्रन्थकार ने स्वयं इसका प्रतिपादन किया है । "इस प्रकार ये सभी पदार्थ अपने में असत् कल्प [ नहीं रहने के बराबर ] प्रकाशक के ही अन्तर्भूत हैं ।" उसी आत्मा को सत्य कहना चाहिए जिसका रूप अन्य किसी से युक्त न होता हुआ स्वयं प्रकाशित होता हो । जड कोई ज्योतिरूप से संयुक्त नहीं रहता, इसी कारण जडपदार्थों के लिए ही जडवस्तुओं की शक्ति दिखाई जाती है किन्तु ऐसा घटित होना तो असंभव्य ही दीखता है । जो लोग जडभावों से भिन्न जीते हुए कहे जाते हैं उनमें भी बहुत से शरीर-प्राण पुर्यष्टक [ शब्द-स्पर्श- रूप-रस-गंध-मन-बुद्धि और अहंकार को पुर्यष्टक कहते हैं ] से शून्य ही आकार होते हैं और उनके भी शरीरादि जडरूप ही तो हैं इस विषय में अधिक और क्या कहा जाय । इस प्रकार घट-शरीर- ४