ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-१, का.-४ मोहमात्रमपसार्यते । यश्चायं मोहस्तदपसारणं च यत्, तदुभयमपि भगवत एव विजृम्भामार्चं, न तु अधिकं किंचित्—इत्युक्तं वक्ष्यते च ॥ ३ ॥ ननु परिदृश्यमाने भावराशौ किमीया शक्तिराविष्क्रियते कं च प्रति ? इति, जडानां तावत् न ज्ञानात्मिका शक्तिरस्ति, क्रियात्मिकापि स्वातन्त्र्यप्राणा स्वातन्त्र्यव्यपगमाद् असंभावना- भूमिरैव; तथा च रथो गच्छति—इत्यादौ उपचारं केचन प्रतिपन्नाः, न च जडान्प्रति व्यवहार- साधनम् उचितम्; अथ अजडजीवज्जनताधिकारेण उभयमपि, तर्हि सर्वस्य स्वात्मा महेश्वर— इति दूरतरं विप्रकर्षिता प्रत्याशा, तदेतद् आशङ्क्य निरूपयति— तथाहि जडभूतानां प्रतिष्ठा जीवदाश्रया । ज्ञानं क्रिया च भूतानां जीवतां जीवनं मतम् ॥ ४ ॥ ‘तथाहि’ इति युक्त्युपक्रमं द्योतयति, दृश्यतां किल इत्यर्थः । ‘तथा’ इत्यनेन साध्यं सूच्यते, ‘हिना’ हेतुरित्यन्ये, प्रकृतं साध्यं हेतुसिद्ध्यायत्तमुपक्रम्यते इत्यर्थः । तेन इति बुद्धिवर्तिना, अत एव स्मर्यमाणेन ग्रन्थेन वर्णयिष्यमाणेन प्रकारेण यस्मात् सर्वमेतद् युक्तम् इति ‘तथाहि’ इति शब्दस्य वार्थः । इह तावत् भावराशियथा विमृश्यते तथा अस्ति, अस्तित्वस्य प्रकाशं शरणोकूर्वतः जायेगा, मात्र मोह दूर करना ही इसका कार्य है। अब जिज्ञासा होती है कि यह क्या वस्तु है ? और उसे कहाँसे हटाना है ? ये दोनों ही भगवान् की इच्छा का कार्य है—इससे अधिक कोई चीज नहीं है—इस विषय में हम कह भी चुके हैं और आगे भी कहेंगे ॥ ३ ॥ अब शंका करते हैं कि दिखलाई देने वाली जो भाव राशियाँ हैं उनमें कौन सी शक्ति आविर्भूत की जाती है और किसके प्रति को जाती है ? यदि जड-पदार्थों को लेकर कहते हो; तो जड-पदार्थों में थोड़ी सी भी ज्ञानशक्त नहीं रहती है, क्रियात्मक शक्ति जिसका परम स्वात॑त्र्य ‘जीवन’ माना जाता है, स्वात॑त्र्य के न रहने से तो उसकी सम्भावना ही नहीं की जा सकती है; जैसा कि ‘रथो गच्छति’ रथ जाता है, इससे रथ में गमनात्मक क्रिया का रहना असम्भव है क्योंकि रथ जड पदार्थ है; कुछ लोग रथ पर बैठे हुए की भी क्रिया को स्वीकार करते हैं और जड- पदार्थों का व्यवहार होता हुआ देखा भी नहीं जाता और समुचित भी नहीं है; चेतन जीवित हुए जीवों के ही अधिकार द्वारा ये दोनों प्रकार के कार्य होते हैं तब तो फिर सबकी आत्मा महेश्वर है, ऐसी आशा करना बहुत दूर की बात हो जायेगी, इस पर आशङ्का कर विवेचन करते हैं— इसलिए वैसा ही सिद्ध होता है कि जडभूतों की प्रतिष्ठा जीवित जीवों के आश्रित होती है। ज्ञान और क्रिया जीवित प्राणियों का जीवन है—ऐसा माना जाता है ॥ ४ ॥ ‘तथाहि’ इस शब्द से युक्ति का उपक्रम द्योतित हो रहा है, दृढ़ता पूर्वक देखो—ऐसा इसका भावार्थ निकलता है। ‘तथा’ इससे साध्य सूचित होता है ‘हिना’ इस शब्द के द्वारा हेतु सूचित होता है दूसरे लोगों की ऐसी मान्यता है, प्रकृत जो साध्य है वह हेतु सिद्धि के अधीन है इसलिए हम उसका उपक्रम करते हैं ‘तेन’ यह बुद्धि में रहने वाले होने के कारण है, इसलिए आगे स्मरण किये जाने वाले ग्रन्थ के द्वारा यह वर्णन समुचित है ऐसा ‘तथाहि’ शब्द का विकल्प अर्थ है यहाँ पर भाव राशि का जैसा विचार किया जाता है वैसा ही है क्योंकि अस्तित्व के प्रकाश का