ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-१, का.-३ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २३ स ईश्वरस्वभाव आत्मा प्रकाशते तावत्, तत्र च अस्य स्वातन्त्र्यम्-इति न केनचिद्वपुषा न प्रकाशते, तत्र अप्रकाशात्मनापि प्रकाशते प्रकाशात्मनापि, तत्रापि प्रकाशात्मनि सर्वथा प्रकाशात्मना प्रकाशो भागशो वा; भागशः प्रकाशने सर्वस्य व्यतिरेकेण अव्यतिरेकेण वा, कतिपयस्य व्यतिरेकेण अव्यतिरेकेण वा, उक्तप्रकारपूर्णतया वा; तदमी सप्त प्रकाराः । तत्र प्रथमः प्रकारो जडोल्लासः, अन्त्यः परमशिवात्मा, मध्यमा जीवाभासाः, सैव भगवतो माया विमोहिनी नाम शक्तिः, तद्वशात् प्रकाशात्मतया सततम् अवभासमानेऽपि आत्मनि भागेन अप्रकाशनवशाद् ‘अनुपलक्षिते’ सर्वथा हृदयंगमीभावमप्राप्ते अत एव पूर्णतावभासनसाध्याम् अर्थक्रियाम् अकुर्वति, तत्पूर्णतावभासनात्मकामिमानविशेषसिद्धये ‘प्रत्यभिज्ञा’ व्याख्यातपूर्वा प्रदर्श्यते, कथं ‘शक्तेः’ ईश्वरनिष्ठत्वेन प्रसिद्धया दृक्क्रियात्मिकाया ‘आविष्करणेन’ प्रदर्शनेन अभिमानसाध्यार्थक्रियाणां तदभिमानसिद्ध्या विना असिद्धेः; तथा च दृष्टान्तं दर्शयति ‘तैस्तैरप्युपयाचितैः ( ४ अ० ३ अ० १७ श्लो० ) ।’ इति । एतदुक्तं भवति-न कारकव्यापारो भगवति, नापि ज्ञापकव्यापारोऽयम्, अपि तु मोहाप- सारणमात्रमेतत्, व्यवहारसाधनानां प्रमाणानां तावत्येव विश्रान्तेः । घटोऽयमग्रगः प्रत्यक्ष- त्वात्-इत्यनेन हि घटो न ज्ञाप्यते प्रत्यक्षेणैव प्रकाशमानत्वात्, अन्यथा पक्षे हेत्वसिद्धेः, केवलं वह ईश्वर स्वभाव वाला आत्मा प्रकाशित होता है, और उसमें ही इसका परम स्वातंत्र्य निहित है—इस प्रकार वह किसी शरीर से नहीं प्रकाशित होता, वह उसमें जड-शून्यभाव से भी भासित होता है और प्रकाशरूप से भी भासित होता है, उस प्रकाशात्मा में सब प्रकार के प्रकाश प्रकाशित होते हैं या कुछ अंश में प्रकाश रहता है आंशिक प्रकाश के मानने पर भी उसमें साधर्म्य रूप से रहता है; या वैधर्म्य रूप से रहता है, यह भी विकल्प हो सकता है, कहे हुए की पूर्णता से है, इस प्रकार ये सात विकल्प हो सकते हैं। इसमें पहला प्रकार तो यह है कि जड पदार्थों का जिसमें उल्लास होता हो, अन्त में परम शिव का स्वरूप हो और बीच में जीवात्माओं का आभास हो, वही भगवान् की माया-शक्ति है। जिससे कि प्राणी मोह पाश में बँध जाता है उसी कारण से प्रकाशरूप का निरन्तर प्रकाश होने पर भी आत्मा में कुछ अंश प्रकाशित न होने के कारण ‘अनुप- लक्षिते’ सभी प्रकारके हृदयंगमभाव नहीं प्राप्त करते हैं ऐसा होनेपर भी पूर्णता के अवभासन से होने वाली व्यवहार क्रिया नहीं करते रहने से, उस पूर्णता के अवभासनात्मक अभिमान की विशेष सिद्धि के लिए जिस ‘प्रत्यभिज्ञा’ की हमने पूर्व में ही व्याख्या कर दी है उसे दिखलाते हैं। उसे कैसे बताते हो; ऐसा यदि प्रश्न करते हो तो, इसके उत्तर में सुनो, ‘ईश्वर परमात्मामें रहनेवाली प्रसिद्ध ज्ञान-क्रियारूप शक्तिका ‘आविष्करणेन’ आविष्कार द्वारा दिखाना अभिमान साध्य अर्थक्रियाओं की अभिमानसिद्धि के बिना सिद्धि का होना सम्भव नहीं हो सकता है, उसे दृष्टान्त देकर दिखाते हैं—तैस्तैरप्युपयाचितैः ( ४ अ० ३ आ० १७ श्लोक ) उन-उन मनौतियों के द्वारा भी जब दमयन्ती नल को प्रत्यक्ष होते हुए भी नहीं पहचान सकी । यह कहा गया है कि—उस परमेश्वर में न तो कारक व्यापार घटता है और न जनानेका कोई व्यापार कर सकता है, किन्तु यहाँ पर तो केवल मोह दूर करनेसे ही प्रयोजन सिद्ध हो जाता है, व्यवहार को सिद्ध करने वाले का प्रमाण भी तो इतने कार्य करके विश्रान्त हो जाते हैं। देखो—जैसा कि हमारे सामने घट प्रत्यक्षरूपसे विद्यमान है चूँकि प्रकाशमान होनेके कारण यदि ऐसा मानते हो; तो फिर पक्ष में हेतु का रहना असिद्ध हो