ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-१, का.-३ यद् अनवच्छिन्नप्रकाशत्वेन ज्ञातृ-कर्तृत्वधारोपारोहः । 'अजडात्मा' इति, यस्य तु वैशेषिकादेर्जड आत्मा स सिद्धिं करोतु ईश्वरविषयाम्; अन्यस्तु सांख्यादिर्निषेधं; सांख्योऽपि विषयावभासनरूपं ज्ञानं बुद्धिधर्ममिच्छन् आत्मानं वस्तुतो जडमेव उपैति; न च जडात्मा स्वात्मन्यपि दुर्लभप्रका- शस्वातन्त्र्यलेशः किंचित् साधयितुं निषेद्धुं वा प्रभविष्णुः पाषाण इव; न च अजडात्मनोऽपि एतद् उचितं, तथाहि—स स्वात्मनि सिद्धिमित्थं कुर्यात्—यदि अस्य सोऽभिनवत्वेन भासमानः पूर्वं न भासते, अनाभासनं चेत् जडतैव । निषेधं च इत्थं विदध्यात्—यदि स न प्रकाशते तथा च जडः, न च जडस्य एतत् युक्तम्—इत्युक्तं, नापि अजडस्य; तस्मात् संवित्प्रकाश एव घटादि- प्रकाशः, न त्वसौ स्वतन्त्रः कश्चित् वास्तवः; प्रकाश एव च आत्मा; तत् न तत्र कारकव्यापारवत् प्रमाणव्यापारोऽपि नित्यत्ववत् स्वप्रकाशत्वस्यापि तत्र भावात् ॥ २ ॥ ननु कारकव्यापारः प्रमाणव्यापारश्च यदि ईश्वरे न संभवति, तर्हि प्रत्यभिज्ञापयामि— इति यो व्यापार उक्तः स कतमो व्यापार ?,—इत्याशङ्क्याह— किंतु मोहवशादस्मिन्दृष्टेऽप्यनुपलक्षिते । शक्त्याविष्करणेनेयं प्रत्यभिज्ञोपदर्श्यते ॥ ३ ॥ ऐश्वर्य है जो अनवच्छिन्न प्रकाश रूप होकर ज्ञातृत्वरूप और कर्तृरूप धारा के ऊपर आरूढ रहता है । 'अजडात्मा' इस शब्द से वैशेषिकों के मत में आत्मा को जड माना है । यदि वे लोग ऐसा मानते हैं तो ईश्वर विषयक सिद्धि करें; और दूसरे सांख्यादि लोग निषेध करते रहें; सांख्य-सिद्धान्तवाले भी तो विषय को अवभासित करने वाले ज्ञान को ही बुद्धि का धर्म और आत्मा के रूप में मानते हैं और वह भी एक प्रकार से जड को ही आत्मा मानना हुआ; और जो जडरूप है उससे अपने में दुर्लभ प्रकाश की स्वतन्त्रता का लेशमात्र भी सिद्ध नहीं कर सकेगा या निषेध कर पायेगा; क्योंकि वह एक तरह से पत्थर जैसा ही है; और अजडरूप चेतन का होना समुचित भी नहीं है । वे लोग इस प्रकार से अपने आत्मा को सिद्धि करेंगे—यदि इसका वह आत्मा कोई नये रूप से भासित होने वाला है जो कि पूर्व में नहीं भासता था, तब तो वह फिर जड ही हो गया । और निषेध इस प्रकार करेंगे कि यदि वह प्रकाशित नहीं होता है तो वह जडरूप ही है और जड स्वभाव वाले का ऐसा होना उचित भी नहीं है, इसी कारण हमने कहा है कि अजड- रूप चेतन आत्मा की सिद्धि नहीं कर सकता है; इसलिए यह मान लो कि संवित् प्रकाश ही घट-पटादि का प्रकाश है, वह स्वतन्त्र रूप से किसी वस्तु का स्वरूप नहीं है और प्रकाश ही आत्मा है । वहाँ पर कोई कारकव्यापार के समान प्रमाणव्यापार भी नहीं रहता; क्योंकि नित्यत्व के समान होनेके कारण स्वयं अपने प्रकाश से भासित रहता है ऐसी स्थिति में वहाँ पर कारक व्यापार क्या कर सकता है ॥ २ ॥ अब 'ननु' कहकर प्रश्न करते हैं कि कारकव्यापार और प्रमाणव्यापार यदि ईश्वर में न सम्भव होते हों तो, मैं प्रत्यभिज्ञा करता हूँ—ऐसा जो व्यापार कहा गया है वह कौन सा व्यापार है ? इस विषय में आशंका कर उत्तर में कहते हैं कि— किन्तु मोह से वशीभूत हो जाने के कारण देखते हुए भी स्वरूप को नहीं देखते हैं । इसी कारण विद्याशक्ति का आविष्कार कर इस प्रत्यभिज्ञा को दिखाते हैं ॥ ३ ॥