भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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अ.-१, आ.-१, का.-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २१ एव, अन्यथा स्मृत्ययोगात्; प्रकाशस्य च नित्यत्वात् विच्छेदहेतोरभावेन, अन्यप्रमात्रपेक्षया च प्रकाशमानत्वात्, स्वपरप्रमातृविभागस्य तत्सृष्टस्य मायीयत्वेन वक्ष्यमाणत्वात् । स चायं स्वतन्त्रः । स्वातन्त्र्यं च अस्य अभेदे भेदनं, भेदिते च अन्तरनुसंधानेन अभेदनम्—इति बहुप्रकारं वक्ष्यामः । तदेव अस्य पारमेश्वयं मुख्यमानन्दमयं रूपम्-इति पूर्वमुपात्तं 'कर्तरि' इति । तदेव तु स्वातन्त्र्यं विभज्य वक्तुं 'ज्ञातरि' इति पश्चान्निर्दिष्टम् । ज्ञानपल्लवस्वभावैव हि क्रिया-इति वक्ष्यते । तेन सर्वक्रियास्वतन्त्रे सर्वशक्तिके-इति यावद् उक्तं, भवेत् तावदेव 'कर्तरि ज्ञातरि'इति । इयमेव च संवित्स्वभावता । संविदिति तु उच्यमाना विकल्प्यत्वेन प्रमेयतां स्पृशन्ती सृष्टत्वात् न परमार्थ- संवित्-इति वक्ष्यामः । कर्ता ज्ञाता च महेश्वर—इत्यभिधानेऽपि स एव प्रकार आपतेत्, इति— यथा यथा प्रमेयभूमिकापादनन्यक्कारकलङ्कपरिहारः शक्यः तथा तथा यावद्गति यतितव्यम्,— इति भूतविभक्त्या निर्देशः कृतः । उपदेशावसरे हि सर्वात्मना तावत् सा प्रमेयता अस्य परिहर्तुम् अशक्या । 'स्वात्मनि' इति, स्वस्मिन् अनपायिरूपे स्वभावे इत्यनेन वैशेषिकाद्यभिमतजडात्मवा- दनिरासः । 'आदिसिद्धे' इति, अविच्छिन्नप्रकाशे इत्यर्थः । 'महेश्वरे' इति, एतदेव माहेश्वर्यं— प्रकाशित होता रहता है, एवं गहन निद्रा में सोनेवाले व्यक्ति को भी प्रकाशित करता है यदि ऐसा न माना जाय तो स्मृति कैसे हो पायेगी अर्थात् इससे फिर स्मृति नहीं हो सकती है, क्योंकि प्रकाश के नित्य होने से वहाँ पर विच्छेद का कोई कारण नहीं मिलता, और दूसरे प्रमाता की अपेक्षा से प्रकाशमान होने के कारण, अपना और अपने से भिन्न दूसरे प्रमाता का विभाग जो कि उसी से बनाया गया है वे सभी मायीय प्रमाता हैं। इसको विवक्षा आगे की जायेगी और वह सर्वतंत्र स्वतंत्र है। इसका स्वातंत्र्य अभेद में भेद कर भासित करता है और भेद करने पर भी भीतर अनुसंधानरूप से एक अभेदरूप रहता है यह बहुत प्रकार का है इसका हम आगे निरूपण करेंगे। वही इसका परम ऐश्वर्य है एवं मुख्य आनन्दमय स्वरूप है इसको पूर्व में हमने 'कर्तरि' में और उसी का स्वातंत्र्यरूप से विभाग कर कहने के लिए 'ज्ञातरि' ज्ञाता में है यह पीछे से निर्देश किया है। क्रिया क्या चीज है ? इसके विषय में हम आगे दिखायेंगे कि ज्ञान स्वभाव के ही विस्तारवाली क्रिया होती है अर्थात् ज्ञान के विस्तार को ही क्रिया कहा जाता है। इस कारण सब क्रियाओं की स्वतन्त्रता में और सब शक्ति सम्पन्न वाली क्रियाओं के विषय में और जो कुछ कहा गया है यह सब 'कर्तरि-ज्ञातरि' में ही रहता है और यही ज्ञान का वास्तविक स्वरूप भी है। संवित् इतना कहने पर तो विकल्पित होकर प्रमेयरूप बन जाती है किन्तु सृष्टिरूप होने के कारण परमार्थ संवित् नहीं कहलाती है। इस विषय में हम कहेंगे। कर्त्ता और ज्ञाता के रूप में महेश्वर को बताने पर भी उसी प्रकार करना पड़ेगा, इसलिये जैसे-जैसे प्रमेय भूमिका को प्राप्त कर लेने से कलङ्क का परिहार करना शक्य हो सके वैसे-वैसे प्रयत्न करना चाहिए, इस बात को भूतकाल की विभक्तिसे दिखाया गया है। क्योंकि उपदेश अवस्था में इसका सब प्रकार से तो प्रमेयता का परिहार करना शक्य नहीं हो सकता है। 'स्वात्मनि' शब्द जो श्लोक में दिया है इसका यह आशय है कि अपने निरूपायरूप स्वभाव में रहते हैं इससे वैशेषिकों के जडात्मवाद सिद्धान्त का खण्डन हो जाता है। 'आदिसिद्धे' इस शब्द से यह भाव प्रकट होता है कि वह अनवच्छिन्न प्रकाशरूपमें स्थित है। 'महेश्वरे' इससे यह सार निकलता है कि यही महेश्वर का

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