ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
२४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-१, का.-४ मोहमात्रमपसार्यते । यश्चायं मोहस्तदपसारणं च यत्, तदुभयमपि भगवत एव विजृम्भामार्चं, न तु अधिकं किंचित्—इत्युक्तं वक्ष्यते च ॥ ३ ॥ ननु परिदृश्यमाने भावराशौ किमीया शक्तिराविष्क्रियते कं च प्रति ? इति, जडानां तावत् न ज्ञानात्मिका शक्तिरस्ति, क्रियात्मिकापि स्वातन्त्र्यप्राणा स्वातन्त्र्यव्यपगमाद् असंभावना- भूमिरैव; तथा च रथो गच्छति—इत्यादौ उपचारं केचन प्रतिपन्नाः, न च जडान्प्रति व्यवहार- साधनम् उचितम्; अथ अजडजीवज्जनताधिकारेण उभयमपि, तर्हि सर्वस्य स्वात्मा महेश्वर— इति दूरतरं विप्रकर्षिता प्रत्याशा, तदेतद् आशङ्क्य निरूपयति— तथाहि जडभूतानां प्रतिष्ठा जीवदाश्रया । ज्ञानं क्रिया च भूतानां जीवतां जीवनं मतम् ॥ ४ ॥ ‘तथाहि’ इति युक्त्युपक्रमं द्योतयति, दृश्यतां किल इत्यर्थः । ‘तथा’ इत्यनेन साध्यं सूच्यते, ‘हिना’ हेतुरित्यन्ये, प्रकृतं साध्यं हेतुसिद्ध्यायत्तमुपक्रम्यते इत्यर्थः । तेन इति बुद्धिवर्तिना, अत एव स्मर्यमाणेन ग्रन्थेन वर्णयिष्यमाणेन प्रकारेण यस्मात् सर्वमेतद् युक्तम् इति ‘तथाहि’ इति शब्दस्य वार्थः । इह तावत् भावराशियथा विमृश्यते तथा अस्ति, अस्तित्वस्य प्रकाशं शरणोकूर्वतः जायेगा, मात्र मोह दूर करना ही इसका कार्य है। अब जिज्ञासा होती है कि यह क्या वस्तु है ? और उसे कहाँसे हटाना है ? ये दोनों ही भगवान् की इच्छा का कार्य है—इससे अधिक कोई चीज नहीं है—इस विषय में हम कह भी चुके हैं और आगे भी कहेंगे ॥ ३ ॥ अब शंका करते हैं कि दिखलाई देने वाली जो भाव राशियाँ हैं उनमें कौन सी शक्ति आविर्भूत की जाती है और किसके प्रति को जाती है ? यदि जड-पदार्थों को लेकर कहते हो; तो जड-पदार्थों में थोड़ी सी भी ज्ञानशक्त नहीं रहती है, क्रियात्मक शक्ति जिसका परम स्वात॑त्र्य ‘जीवन’ माना जाता है, स्वात॑त्र्य के न रहने से तो उसकी सम्भावना ही नहीं की जा सकती है; जैसा कि ‘रथो गच्छति’ रथ जाता है, इससे रथ में गमनात्मक क्रिया का रहना असम्भव है क्योंकि रथ जड पदार्थ है; कुछ लोग रथ पर बैठे हुए की भी क्रिया को स्वीकार करते हैं और जड- पदार्थों का व्यवहार होता हुआ देखा भी नहीं जाता और समुचित भी नहीं है; चेतन जीवित हुए जीवों के ही अधिकार द्वारा ये दोनों प्रकार के कार्य होते हैं तब तो फिर सबकी आत्मा महेश्वर है, ऐसी आशा करना बहुत दूर की बात हो जायेगी, इस पर आशङ्का कर विवेचन करते हैं— इसलिए वैसा ही सिद्ध होता है कि जडभूतों की प्रतिष्ठा जीवित जीवों के आश्रित होती है। ज्ञान और क्रिया जीवित प्राणियों का जीवन है—ऐसा माना जाता है ॥ ४ ॥ ‘तथाहि’ इस शब्द से युक्ति का उपक्रम द्योतित हो रहा है, दृढ़ता पूर्वक देखो—ऐसा इसका भावार्थ निकलता है। ‘तथा’ इससे साध्य सूचित होता है ‘हिना’ इस शब्द के द्वारा हेतु सूचित होता है दूसरे लोगों की ऐसी मान्यता है, प्रकृत जो साध्य है वह हेतु सिद्धि के अधीन है इसलिए हम उसका उपक्रम करते हैं ‘तेन’ यह बुद्धि में रहने वाले होने के कारण है, इसलिए आगे स्मरण किये जाने वाले ग्रन्थ के द्वारा यह वर्णन समुचित है ऐसा ‘तथाहि’ शब्द का विकल्प अर्थ है यहाँ पर भाव राशि का जैसा विचार किया जाता है वैसा ही है क्योंकि अस्तित्व के प्रकाश का
अ.-१, आ.-१, का.-४ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २५ प्रकाशप्राणितदेशीयं विमर्शम् आश्रित्य समुन्मेषात्, अविमृष्टं हि यदि वस्तु तन्न नीलं न पीतं न सत् न असदिति, कुत ? —इति पर्यनुयोगे किम् उत्तरं स्यात् । तेन यद् यथा यावत् अबाधितं विमृश्यते तत् तथा तावत् अस्ति, तत एव देशकालाकारविततात्मानोऽपि द्रव्यक्रियासंबन्धादयः एकत्वेन परमार्थसन्त-इति वक्ष्यते 'क्रिया संबन्धसामान्य (२ आ० २ आ० १ श्लो०) ।' इत्यादिना, ततश्च विततमपि इदं विश्वं संक्षेपविमर्शदशाधिरोहे जडं जीवच्च—इत्येतावता द्वयरूपेण अस्ति । तत्र जडा अपि विमृश्यमाना न स्वतन्त्रा भवन्ति, विमृश्यमानता हि तेषां न स्वशरीर- विश्रान्तः कोऽपि धर्मः जडत्वाभावप्रसंगात्, मम नीलं भाति मया नीलं ज्ञायते इति । तेषां 'जडभूतानां चिन्मयत्वेऽपि मायाख्यया ईश्वरशक्त्या जाड्यं प्रापितानां 'जीवन्तं' प्रमातारमाश्रित्य 'प्रतिष्ठा' तत्प्रमात्राभिमुख्येन अवस्थानं, ततो जडा नाम न पृथक् सन्ति । यथोक्तं ग्रन्थकृतैव 'एवमात्मन्यसत्कल्पाः प्रकाशस्यैव सन्त्यमी । जडाः ........................॥' इति । स एव हि स्वात्मा सन् वक्तव्यो यस्य अन्यानुपाहितं रूपं चकास्ति; न च भारू- पामुपाहितं जडं नाम किञ्चित्, तेन जडानां हि शक्तिराविष्क्रियते जडान्प्रति—इत्येतत् तावत् निरुत्थानमेव । ये तु अन्ये जडेभ्यो जीवन्त—इति नाम प्रसिद्धाः तेषामपि शरीरप्राणपुर्यष्टक- शून्याकाराः तावत् जडा एव—इति तेषामपि किमुच्यते । एवं घटशरीरप्राणसुखतदभावरूपं आश्रय लेने वाले प्रकाश से जीवित प्रायः विमर्श के आश्रित होकर उन्मेष होने के कारण, जिसका विमर्श नहीं किया गया है ऐसी वस्तु न तो नील है और न तो पीत ही है; और न सत् है और न असत् है ऐसा क्यों है ? इस तरह से प्रश्न करने पर उत्तर क्या देंगे । इसलिए जो जितना भी अबाधित परामर्श होता है; वह वैसा उतना ही रहता है इससे देश-काल-आकार आदि विस्तृत स्वभाव वाले द्रव्य क्रिया के सम्बन्धादि यथार्थ सत् हैं—ऐसा आगे बताया जायेगा 'क्रिया सम्बन्ध सामान्य' ( २ अ० २ आ० १ श्लोक ) इस स्थल में । इसलिए विस्तृत होता हुआ भी यह संसार विमर्श दशा में आरूढ़ होने पर जड और चेतन इन्हीं दो रूपों में रहता है । जडवर्ग भी विमर्श दशा में आ जाने पर स्वतंत्र नहीं रहते, विमृष्ट होना कोई उनका अपने स्वरूप में विश्राम लेने वाला धर्म नहीं है तब तो फिर जडभाव का अभाव प्रसंग आ जायेगा, मुझे नील भासता है । अथवा मेरे द्वारा नील का ज्ञान होता है । उन जड- पदार्थों के चिन्मयरूप होने पर भी माया नामक ईश्वर की शक्ति से जडता को प्राप्त हुए 'जीवन्तम्' जीवित प्रमाता का आश्रय लेकर 'प्रतिष्ठा' उस प्रमाता के अभिमुख वर्तमानरूप से स्थित रहता है, इसलिए जडवर्ग कोई उससे अलग नहीं है जब कि ग्रन्थकार ने स्वयं इसका प्रतिपादन किया है । "इस प्रकार ये सभी पदार्थ अपने में असत् कल्प [ नहीं रहने के बराबर ] प्रकाशक के ही अन्तर्भूत हैं ।" उसी आत्मा को सत्य कहना चाहिए जिसका रूप अन्य किसी से युक्त न होता हुआ स्वयं प्रकाशित होता हो । जड कोई ज्योतिरूप से संयुक्त नहीं रहता, इसी कारण जडपदार्थों के लिए ही जडवस्तुओं की शक्ति दिखाई जाती है किन्तु ऐसा घटित होना तो असंभव्य ही दीखता है । जो लोग जडभावों से भिन्न जीते हुए कहे जाते हैं उनमें भी बहुत से शरीर-प्राण पुर्यष्टक [ शब्द-स्पर्श- रूप-रस-गंध-मन-बुद्धि और अहंकार को पुर्यष्टक कहते हैं ] से शून्य ही आकार होते हैं और उनके भी शरीरादि जडरूप ही तो हैं इस विषय में अधिक और क्या कहा जाय । इस प्रकार घट-शरीर- ४
२६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-१, का.-४ सत् यल्लग्नं भाति तदेव जीवरूपभूतं सत्यम्; तस्य च आपाते यद्यपि बहुत्वं भाति तथापि तत् जडात्मकवेद्यशरीराद्युपाधेः । ततस्तत् अपारमार्थिकम् अन्योन्याश्रयात्, जीवा हि जडभेदात् भेदभागिनः जडाश्च जीवभेदात्, एतद्देहोऽयम् एतद्वेद्योऽयम्—इति भेदम् उपेयुः, नीलपीतादिभेदस्तु प्रमातृसंलग्नतया अभेदभूमिमेव परमारूढ इति किं तेन । तदयं जीवानांमभेद एव संपन्न, इति जीवन् प्रमाता—इति जातं । जीवनं च जीवनकर्तृत्वं तच्च ज्ञानक्रियात्मकं, यो हि जानाति च करोति च स जीवति—इत्युच्यते । तदयं प्रमाता ज्ञानक्रियाशक्तियोगाद् ईश्वर—इति व्यवहर्तव्यः प्राण-सुख और उन सबों का अभाव दुःखदिरूप सत् वस्तु को कुछ संसक्त मिला हुआ भासता है और वही जीवरूप में सत्य भी है; यद्यपि उसे देखने पर पहले-पहल बहुत से मालूम पड़ते हैं तो भी वह संबद्ध जडात्मक वेद्य शरीरादि की उपाधि से है। इसीलिए इसे पारमार्थिक रूप नहीं कहा जा सकता, क्योंकि परस्पर एक दूसरे के आश्रित होने के कारण, जीव जड से भिन्न भेद भागी होने से और जड जीव से भिन्न है, इसीलिए यह देह है एवं यह वेद्य है—ऐसे भेद-भाव को प्राप्त करना होगा, नील-पीतादि के भेद तो प्रमाता के संसक्त मिले हुए रहने के कारण अभेदात्मक भूमि में आरूढ़ रहता है उससे क्या प्रयोजन सिद्ध करना है। इसलिए जीवों का अभेद ही सिद्ध सम्पन्न हुआ, इसलिए जीवन प्रमाता कहा जाता है और जीवन जीव का कर्तापन है और इसी कारण उसे ज्ञान-क्रियात्मक कहा जाता है, जो जैसा जानता है उसे वैसा ही करता भी है और जीता है। इसलिए यह प्रमाता ज्ञान क्रियात्मक शक्ति के योग से ईश्वर हो जाता है—ऐसा पुराण- १. परिच्छिन्नप्रकाशत्वं जडस्य किल लक्षणम् । जडाद्विलक्षणो बोधो यतो न परिमीयते ॥ परिच्छिन्न प्रकाशत्व होना जड का लक्षण है। ज्ञान तो जड से विलक्षण होता है इसलिए उसका परिच्छेद नहीं होता । २. इच्छा-ज्ञान-क्रियापूर्वा यस्मात्सर्वाः प्रवृत्तयः । सर्वेपि जन्तवस्तस्मादीश्वरा इति निश्चिताः ॥ इति । ज्ञानक्रियाशक्तिलक्षणं च— स्वप्रकाशे निजे धाम्नि भास्येद्भावविश्रमान् । भासना च क्रिया शक्तिरिति शास्त्रेषु कथ्यते ॥ यया विचित्रतन्वादिकल्पना प्रविभज्यते । भासनानभाते च कथं नामप्रकल्पनम् ॥ तदस्यान्तःस्थितं भानं ज्ञानशक्तिरहं स्मृता । ‘इच्छा एवं क्रिया ज्ञानपूर्वक ही हुआ करती है और तभी प्रवृत्तियां देखी जाती हैं। सभी प्राणीवर्ग ईश्वर का ही स्वरूप है यह दृढ़तापूर्वक मानना चाहिए ।’ ज्ञान-क्रियाशक्ति का स्वरूप दिखाते हैं —‘सब भावों को अपने बोध में जो भासित करते हैं वहां पर उसका भासना है और उसी क्रिया-शक्ति को शास्त्रों में भी कहा गया है जिससे विचित्र शरीरादि की स्थिति का विभाग होता है, यदि ऐसा उसका भासना नहीं भासित होता हो तो, कल्पना का होना असम्भव हो जायेगा; इसलिए उसका अन्तःकरण में रहकर भासित होना ज्ञान-शक्ति कहलाती है जिसका अहं विमर्श होता रहता है ।’
अ.-१, आ.-१, का.-५ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २७ पुराणगमादिप्रसिद्धेश्वरवत्; तदप्रसिद्धावपि सर्वविषयज्ञानक्रियाशक्तिमत्त्वस्वभावमेव ऐश्वर्यं तन्मात्रानुबन्धित्वादेव सिद्धं; तदपि च कल्पितेश्वरे राजादौ तथा व्याप्तिग्रहणात्, यो यावति ज्ञाता कर्ता च स तावति ईश्वरो राजेव, अनीश्वरस्य ज्ञातृत्वकर्तृत्वे स्वभावविरुद्धे यतः, आत्मा च विश्वत्र ज्ञाता कर्ता च—इति सिद्धा प्रत्यभिज्ञा । ज्ञानक्रियाशक्ती एव स्वाभाविक्यौ अप्ररूढभेदोन्मेषे सदाशिवेश्वरौ, भेदस्य सामान्यतः प्ररोहे विद्याकले, विशेषतः प्ररोहे बुद्धिकर्मेन्द्रियगण—इति भविष्यति । जडा इति अजीवन्तः, अन्ये च जीवन्त—इत्यापाते तावत् भाति न तु संविदापाते भाति । जीवतामिति जङ्गमा एव अमी इत्थं निर्दिष्टाः ॥ ४ ॥ ननु ज्ञानक्रिये एव कथं सिद्धे यत ऐश्वर्यव्यवहारः प्रसाध्येत ?,—इति शङ्कां शमयितुमाह- तत्र ज्ञानं स्वतःसिद्धं क्रिया कायाश्रिता सती । परैरप्युपलक्ष्येत तयान्यज्ञानमूह्यते ॥ ५ ॥ अहं जानामि, मया ज्ञातं ज्ञास्यते च-इत्येवं प्रकाशाहंपरामर्शपरिनिष्ठितमेव इदं ज्ञानं नाम, आगमशास्त्रों में प्रसिद्ध ईश्वर के तुल्य व्यवहार में आता है; उसका ऐश्वर्य प्रसिद्ध न होने पर भी सब प्रकार से ज्ञान-क्रियाशक्ति का अपने में आ जाना ही ऐश्वर्य माना हुआ है; ये सभी बातें चिद्रूप में मिलने के कारण ही ऐश्वर्य वाले कहते हैं; और यह सिद्ध भी होता है एवं ये सारी की सारी बातें कल्पित ईश्वर-राजा आदि में भी मिलती हैं, जो जितने का ज्ञाता और कर्ता है वह उतने का स्वामी कहलाता है, जो ईश्वर नहीं है उसमें ज्ञातृत्व और कर्तृत्व का रहना अपने स्वभाव के विरुद्ध भी है, और आत्मा सर्वत्र ज्ञाता और कर्ता के रूप में रहता है इसलिए प्रत्य- भिज्ञा सिद्ध होती है । ज्ञान और क्रिया की शक्ति स्वाभाविक है । जबतक भेद नहीं प्रस्फुटित होता है तबतक सदाशिव और ईश्वर भाव होता है, भेद भाव के सामान्यतः स्फुटित होने पर विद्या और कला का भाव आता है और अधिक विशेषरूप से बढ़ जाने पर बुद्धि और कर्मेन्द्रिय- गण का भाव होने लग जायेगा । जडपदार्थ निर्जीव है और चेतन तत्त्व तो सजीव जीवित होता है । दूसरे जीते हैं—ऐसा तो पहले-पहल ही देखने में आता है किन्तु ज्ञान के रहने पर नहीं भासता । ‘जीवताम्’ इससे चेतन जीवों का निर्देश किया हुआ है ॥ ४ ॥ अब शंका करते हैं कि ज्ञान और क्रिया कैसे सिद्ध होगी जिससे कि इन्हीं दोनों क्रियाओं का ऐश्वर्य-व्यवहार सिद्ध हो सके ? इस आशंका के समाधान में उत्तर देते हैं— ज्ञान और क्रिया के बीच ज्ञान अपने आप सिद्ध है और क्रिया शरीर से सम्बन्ध रखती हुई दूसरे के द्वारा भी वह उपलक्षित होती है तथा क्रिया के द्वारा अन्यज्ञान को भी जान सकते हैं ॥ ५ ॥ मैं जानता हूँ, मेरे द्वारा जाना गया और मुझ से जाना जायेगा—इस प्रकार अहं परामर्श से परिनिष्ठित हो यह ज्ञान होता है, इससे अधिक वहाँ दूसरा क्या विचार किया जाय, उसका
२८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-१, का.-५ किं तत्र अन्यत् विचार्यते, तदप्रकाशे हि विश्वम् अन्धतमसं स्यात्, तदपि वा न स्यात्, बालोऽपि हि प्रकाशविश्रान्तिमेव संवेदयते । तदुक्तम् 'विज्ञातारमरे केन विजानीयात्।' ( बृ० २.५.१९ ) इति । तन्निह्नवे हि कः प्रश्नः, किम् उत्तरं च स्यात् - इति । तत्र जानामि - इत्यन्तः संरम्भयोगोऽपि भाति, येन शुक्लादेर्गुणात् अत्यन्तजडात् जानामि- इति वपुः चित्स्वभावताम् अभ्येति, स च संरम्भो विमर्शः क्रियाशक्तिरुच्यते । यदुक्तम् अस्मत्परमेष्ठिश्रीसोमानन्दपादैः 'घटादिग्रहकालेऽपि घटं जानाति सा क्रिया ।' इति । तेन आन्तरीयक्रियाशक्तिः ज्ञानवदेव स्वतः- प्रकाश न रहने पर तो यह सारा का सारा विश्व अन्धकारमय हो जायेगा, या विश्व ही नहीं रहेगा, क्योंकि बालक भी तो प्रकाश में ही विश्रान्ति का ज्ञान करता है । उसके विषय में कहा भी गया है-जानने वाले को किससे जाना जा सकता है' ( बृ० २.५.१९ ) उसके छिप जाने पर क्या प्रश्न ओर क्या उत्तर हो सकता है । 'मैं जानता हूँ' ऐसा अन्तःकरण में ज्ञान का प्रकाश भासता है, जबकि प्रकाश शुक्लादि गुणों से अत्यन्त जड रहता है, उससे भिन्न ही मैं जानता हूँ ऐसा वपु चित्स्वभाव को प्राप्त करता है उससे बढ़े हुए विमर्श को ही क्रिया-शक्ति कहा जाता है। जो कि हमारे दादा गुरु सोमानन्दपाद ने कहा है- 'घटादि के ग्रहण काल में ही मैं घट को जानता हूँ इसी का नाम क्रिया है।' इसलिए अन्तःकरण में होने १. असिद्धौ च प्रकाशस्य कोऽहं किं त्वं तमोऽपि किम् । न किञ्चिदपि वा किं स्यात्तूष्णीं स्यादपि वा कथम् ॥ किञ्च अयं घटोऽयं पट इत्येवं नानाप्रतीतिषु । अर्कप्रभेव स्वज्ञानं स्वयमेव प्रकाशते ॥ ज्ञान न चेत्स्वयंसिद्धं जगदन्धं ततो भवेत् । इति प्रकाश की सिद्धि न होने पर ही व्यक्ति अपने आपको नहीं जान पाता है वास्तव में मैं कौन हूँ और तुम क्या हो तथा अज्ञान क्या है ? कुछ भी नहीं तो भी-कैसे चुपचाप रहेगा, क्या होगा या रहेगा भी कैसे-बैठा चुपचाप और भी इस विषय में सुनो-यह घट है और यह पट है इस प्रकार की विविध प्रतीतियों में सूर्य की प्रभा के समान अपना ज्ञान स्वयं प्रकाशित रहता है। यदि ज्ञान स्वयं सिद्ध नहीं होता तो यह सारा-का-सारा संसार अन्धा हो जायगा- २. वेदान्त दर्शन का यह मत है कि जैसा वह जानता है, इसमें अन्तःकरण की वृत्ति विशेषरूप क्रिया ही "ज्ञा" धातु का वाच्यार्थ है क्योंकि 'ज्ञा' धातु अवबोध रूप में पढ़ी गयी है और चित्तत्व के प्रतिबिम्ब रूप आभास से युक्त होकर ही 'तिङ्' प्रत्यय का अर्थ होता है। परस्पर अध्यास को प्राप्त हुए आभास और बुद्धि के भेद का ग्रहण नहीं होता; ये दोनों आभास में मिल जाने के कारण मालूम नहीं पड़ते इस विषय में आचार्य ने कहा है- आत्माभासस्तु तिङ्वाच्यो धात्वर्थश्रधियः क्रिया । उभयं चाविवेकेन जानातीत्युच्यते मृषा ॥ बुद्धेः कर्तृत्वमध्यक्ष्य जानातीति ज्ञ उच्यते । तथा चैतन्यमध्यस्य ज्ञत्वं बुद्धेरिहोच्यते ॥
अ.-१, आ.-१, का.-५ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २९ सिद्धा स्वप्रकाशा, सैव तु स्वशक्त्या प्राणपुर्यष्टकक्रमेण शरीरमपि संचरमाणा स्पन्दनरूपा सती व्यापारव्याहारात्मिका मायापदेऽपि प्रमाणस्य प्रत्यक्षादेर्विषयः । सा च परशरीरादिसाहित्येन अवगता स्वं स्वभावं ज्ञानात्मकं गमयति, न च ज्ञानम् इदन्तया भाति, इदन्ता हि अज्ञानत्वं, न च अन्यत् अन्येन वपुषा भातं भातं भवेत्, तत् ज्ञानं भात्येव परं, भाति च यत् तदेव अह- मित्यस्य वपुः,—इति परज्ञानमपि स्वात्मैव; परत्वं केवलम् उपाधेर्देहादेः, स चापि विचारितो यावत् न अन्य इति विश्वः प्रमातृवर्गः परमार्थत एकः प्रमाता, स एव च अस्ति। यदुक्तम्— ‘...प्रकाश एवास्ति स्वात्मनः स्वपरात्मभिः ।’ इति । ततश्च भगवान् सदाशिवो जानाति इत्यतः प्रभृति क्रिमिरपि जानाति—इत्यन्तम् एक एव प्रमाता—इति फलतः सर्वज्ञत्वं प्रमातुः । एवं कर्तृत्वेऽपि वाच्यम् । यदुक्तम् अस्मत्पर- वाली क्रिया-शक्ति ही ज्ञान के जैसे सिद्ध होती है और स्वयं अपने आप प्रकाशित भी रहती है, वही अपनी शक्ति द्वारा प्राण-पुर्यष्टकके क्रम से शरीर में रहती हुई स्पन्दरूप होकर व्यापाररूप व्यवहार को सम्पादन कराती हुई मायामय पद में भी प्रत्यक्षादि प्रमाणों का विषय बनती है। और वह किसी अन्य के शरीरादि में ज्ञात होकर अपने ज्ञानात्मक स्वभावको जनाती है। ज्ञान 'इदन्तया' नहीं भासता है, क्योंकि इदन्ता तो अज्ञान का स्वरूप माना जाता है, और दूसरा कोई दूसरे के स्वरूप से भासित होने पर स्वयं भासित होना यह नहीं कहा जाता, वही अहंभाव का वपु है, इसलिए दूसरे का ज्ञान भी आत्मस्वरूप ही होता है; दूसरे का ज्ञान मात्र देहादि की उपाधि है, और उसके विषय में विचार करने पर वह दूसरा है ऐसा सिद्ध ही नहीं होगा, इसलिए विश्व के सारे प्रमातृगण परमार्थरूप से एक ही परमेश्वर के प्रमाता हैं। कहा भी है—इस विषय में ‘...प्रकाश एवास्ति स्वात्मनः परात्मभिः ।’ अपने आपका प्रकाश ही दूसरे की आत्मा से मिलकर रहता है।’ जो भगवान् सदाशिव जिस वस्तु-पदार्थ को जैसा भी सूक्ष्म-स्थूल रूप से जानता है उसे पहले से लेकर आखिरी तक कीट-पतंग भी जानते ही हैं, यहाँ तक एक ही प्रमाता है इससे प्रमाता की सर्वज्ञता सिद्ध हुई । उसी प्रकार कर्तृता में भी जान लेना चाहिए । जिसका प्रतिपादन परमेष्ठी “तिङ्” प्रत्ययका वाच्यार्थ आभास है और “ज्ञा” धातुका अर्थ है बुद्धि की क्रिया । ये दोनों आपसमें मिले हुए रहनेके कारण और भेद ज्ञानके नहीं रहनेसे ही कहा जाता है कि यह ज्ञान असत्य है । बुद्धिके कर्तृत्वका अध्यास कहकर, यह “ज्ञाता जानता है” ऐसा बोला भी जाता है । इस प्रकार चैतन्यके ज्ञानका अध्यास होनेके कारण बुद्धिका ज्ञान कहा जाता है । आभास, बुद्धि, और उसकी जो क्रियाएँ हैं इन तीनों का व्यवहार भी मिथ्या है । सकल बुद्धि का समष्टि रूप माया अवच्छिन्न चैतन्य ही ईश्वर है । उस-उस बुद्धिमें प्रतिबिम्बित होने वाले को जीव शब्द से कहा जाता है । उपाधि से रहित जो पूर्ण चैतन्य है वह ब्रह्म है । इस तरह चिति शक्ति के तीन भेद हो जाते हैं । १. प्रश्न उठता है कि ईश्वर सर्वज्ञ क्यों नहीं है ? यदि यह कहो कि-प्रमातृ-गत भेद के होने के कारण ऐसा मैं कहता हूँ, वह भी ठीक नहीं बैठता क्योंकि प्रमाताओं का भेद पारमार्थिक नहीं है । स्वातन्त्र्य-शक्ति के द्वारा ही मात्र उसमें भेद दिखायी पड़ता है । वस्तुतः शिव आदि से लेकर
३० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-१, का.-५ मेष्टिभिः शिवदृष्टौ— 'घटो मदात्मना वेत्ति वेद्म्यहं च घटात्मना । सदाशिवात्मना वेद्मि स वा वेत्ति मदात्मना ॥ नानाभावैः स्वमात्मानं जानन्नास्ते स्वयं शिवः ।' इत्यादि । 'ऊह्यते' इत्यनेन ज्ञानस्य प्रमेयत्वं न निर्वहति—इति दर्शयति, अन्यथा हि अनुमीयते—इति ब्रूयात् । तदेवं येषां तार्किकप्रवादपांसुपातधूसरीभावो न वृत्तोऽस्मिन् संवेदनपथे, ते इयतैव आत्मानमीश्वरं विद्वांसो घटशरीरप्राणसुखतदभावान् तत्रैव निमज्जयन्त ईश्वरसमा- विष्टा एव भवन्ति । ततोऽयम् उपोद्घातः ।—उप इति आत्मनः समीपे टङ्कवत् ईश्वराभिज्ञानलक्षण उत्कर्षो हन्यते विश्राम्यते येन; एतावदेव च अस्य ग्रन्थस्य तात्पर्यम्,—इति । ततोऽपि अयम् उपोद्घातः ।—उपांशु अविततं कृत्वा उदिति शास्त्रस्य ऊर्ध्वं एव हन्यते अपसार्यते प्रमेयविषयो व्यामोहो येन—इति । गत्यर्थत्वाद्वा हन्तेर्ज्ञानमर्थः, ज्ञायते प्रमेयं येन इति । केचित्तु र्गति गुरु ने शिव दृष्टि शास्त्र में भी किया है— 'घट अपने आपको हमारे रूप से जानता है और मैं घट रूपमें जानता हूँ । मैं सदाशिव को सदाशिव के रूप में जानता हूँ और वह मेरे रूप से मुझे जानता है । इस प्रकार अनेक रूपों में अपने आपको जानते हुए स्वयं भगवान् शिव विराजमान है ।' 'ऊह्यते' इस पद से ज्ञान की प्रमेयरूपता नहीं बनती, अर्थात् ज्ञान प्रमेयरूप नहीं होता, उसे तो प्रमाता का स्वरूप माना गया है—ऐसा 'ऊह्यते' क्रिया द्वारा दिखाया जाता है, नहीं तो अनुमान किया जाता है—ऐसा कहो । इसलिए इस ज्ञान मार्गमें जो लोग तार्किक प्रवाद की धूलि से दूषित नहीं हुए हैं वे लोग इतने ही ज्ञान से अपने आपको ईश्वर मानते हुए घट-शरीर-प्राण सुखादि को और उन सबोंके अभावों को उन्हीं में डुबाते हुए—ईश्वर परमात्मा में ही समाविष्ट हो जाते हैं । इस कारण से ही यह उपोद्घात शब्द सिद्ध होता है 'उप' शब्द का अर्थ यह होता है कि—आत्मा के समीप में टंकना के सदृश ईश्वर का अभिज्ञान-पहचान रूप उत्कर्ष जिससे पहुँचा दिया जाय उसी की उपोद्घात संज्ञा होती है, और इतना ही इस ग्रन्थ का तात्पर्य है, इसलिए भी यह उपोद्घात है । उपांशु = एकान्त में फैलने न देकर सभी शास्त्रों के ऊपर प्रमेय विषय को हटाते हुए जिससे आत्मा को उठाया जाय वही उपोद्घात है । गतिरूप अर्थ होने के कारण 'हन्' धातु स्थावरपर्यन्त वह सर्वज्ञ शिव ही एक प्रमाता है । इसलिये रामावतार कालमें मैं नहीं था यह बात नहीं है अपितु मैं उस समय में भी था जो कि दूसरे प्रमाता में संवेदन ज्ञान से वक्ता ही उस काल का अनुभव करने वाला है । १. चिन्तां प्रकृतसिद्ध्यर्थामुपोद्घातं प्रचक्षते । प्रसक्तानुप्रसक्तादि प्रस्तुतादुपजायते ॥ बुद्धि में प्रतिपाद्य विषय का संग्रह कर उसके अर्थ को अर्थान्तर से कहना ही उपोद्घात कहलाता है । प्रकृत प्रसंग के विचार-विमर्श को सिद्ध करने के लिए यथाक्रम वर्णन करते हुए रखना ही उपोद्घात है ।
अ.-१, आ.-२, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ३१ स्त्रियं गच्छति—इत्येतद्विषयामेव हन्त्यर्थमाहुः । एवं श्लोकचतुष्टयार्थभावनादार्ढ्यादेव लभ्यते परमशिवः—इति शिवम् ॥ ५ ॥ इति श्रीमदाचार्योत्पलदेवशिष्य—श्रीमदाचार्यलक्ष्मणगुप्तदत्तोपदेश—श्रीमदाचार्या- भिनवगुप्तविरचितायां श्रीप्रत्यभिज्ञाविमर्शिन्यां ज्ञानाधिकारे उपोद्घाताख्यं प्रथममाह्निकम् ॥ १ ॥ अथ प्रथमे ज्ञानाधिकारे पूर्वपक्षविवृत्याख्यं द्वितीयमाह्निकम् पूर्वपक्षतया येन विश्वमाभास्य भेदतः । अभेदोत्तरपक्षान्तर्नीयते तं स्तुमः शिवम् ॥ इह यत् परमार्थरूपं तद् आशङ्क्यमानप्रतिपक्षप्रतिक्षेपेण निरूप्यिष्यमाणं सुष्ठुतमां स्पष्टी- कृतं भवति । यदाह भट्टनारायणः । ‘नमस्ते भवसंभ्रान्तभ्रान्तिमुद्भाव्य भिन्दते । ज्ञानानन्दं च निर्द्वन्द्वं देव वृत्वा विवृण्वते ॥’ तत्रेह अनात्मानिश्वरवादिनां भ्रान्तिभेदनपूर्वकं परमार्थं विवरीष्यन् तदुद्भावनं तावत् एकादशभिः श्लोकैः करोति ‘ननु स्वलक्षणाभासम् ....’ इत्यादिभिः ‘....तेन कर्तापि कल्पितः ॥’ इत्यन्तैः । तत्र श्लोकद्वयेन आत्मनो ध्रुवस्य दृश्यानुपलब्ध्या अभाव उक्तः प्रत्यक्षात्मवादिनः का ज्ञान रूप भी अर्थ निकलता है, जिसके द्वारा प्रमेय विषय का ज्ञान होता हो । कुछ लोग तो स्त्री के समीप जाने में ही ‘हन्’ को गति-अर्थक मानते हैं । इस प्रकार चारों श्लोकों की अर्थ भावना को हृदय में दृढ कर देने से परम शिव की प्राप्ति होती है ॥ ५ ॥ प्रथम आह्निक समाप्त जो पूर्वपक्ष के द्वारा विश्व को भेद पूर्वक आभासित कर उत्तरपक्ष को अद्वैत-अभेद के भीतर ले जाता है उस शिवकी हम स्तुति करते हैं । यहाँ पर जो परमार्थ रूप है उस पर आशंका करने वाले प्रतिपक्षी का उत्तर देकर निरूपण किया जाना अच्छा होता है । जैसा कि भट्टनारायण ने भी इस विषय में कहा है ‘हे देव ? आपको नमस्कार हो ।’ आप संसार की भ्रान्ति को बनाकर फिर उसका विनाश करते हैं तथा सुख-दुख के द्वन्द्वों से विनिर्मुक्त ज्ञानानन्द को विवरण करके प्राप्त करा देते हैं ।’ अनात्मा के विषय में अनीश्वर-वादियों की जो भ्रान्ति है उसे दूर करते हुए परमार्थ स्वरूप का विवरण करेंगे और उसका उत्थापन ग्यारह श्लोकोंसे करते हैं ‘ननु स्वलक्षणाभासम् ....’ इत्यादि से लेकर ‘...तेन कर्तापि कल्पितः ॥’ दो श्लोक से नित्य आत्मा का दृश्य के अभाव की
प्रति । तत्र श्लोकत्रयेण स्मृत्यनुसंधानं संस्कारात् सिद्धम्—इति अन्यथासिद्धत्वात् आत्मानुमानाय न पर्याप्तम्—इति प्रोक्तम् अनुमेयात्मवादिनः प्रति । तत्र श्लोकेन ज्ञानादिगुणैर्गुणििन प्रतिपत्तिः— इति अनुमानं निरस्तम्। एवम् आत्मानं निराकृत्य, ततो ज्ञानक्रियाशक्तिसंबन्धरूपमैश्वर्यं निराकर्तुं ज्ञानस्य स्वरूपमेव व्यतिरिक्तं वाद्यन्तरमते, सांख्यमते च अयुज्यमानम्—इति निरूपितं श्लोकद्वयेन । तत एकेन क्रिया नाम न काचित् क्वचिदपि अस्ति—इति कथितं । तत्र साधकं प्रतिक्षिप्य बाधकं च उपन्यस्यति । ततः संबन्धस्य श्लोकेन नास्तित्वं प्रतिपादितं प्रमाणाभावं वदता। श्लोकेनैव तत्र बाधकं प्रमाणमुक्त्वा, न आत्मा स्थिरो, नापि ज्ञातृत्वकर्तृत्वलक्षणम् अस्य ऐश्वर्यम्—इति स्वपक्ष उपसंहृतः—इति पूर्वपक्षस्य पिण्डार्थः । अथ ग्रन्थो व्याख्यायते ननु स्वलक्षणाभासं ज्ञानमेकं परं पुनः । साभिलापं विकल्पाख्यं बहुधा नापि तद्द्वयम् ॥ १ ॥ नित्यस्य कस्यचिद्द्रष्टुस्तस्यात्रानवभासतः । अहंप्रतीतिरप्येषा शरीराद्यवसायिनी ॥ २ ॥ उपलब्धि से अभाव कहा गया है, मानसप्रत्यक्षात्म-अद्वैत-शैव-मतावलम्बियों के लिए। तीन श्लोकोंसे संस्कार के द्वारा स्मृति का अनुसन्धान सिद्ध किया जायेगा—अन्यथा सिद्ध होने के कारण आत्मा के विषय में अनुमान करना पर्याप्त नहीं होगा—यह अनुमेय आत्मवादी नैयायिकों के लिए कहा हुआ है। अनन्तर एक श्लोक से ज्ञानादि गुणों के द्वारा गुणवान् आत्मा का ज्ञान होता है तार्किक मत से । इस प्रकार से अनुमान को निरस्त कर दिया गया। आत्मा का निरास करके ज्ञान, क्रिया-शक्ति के सम्बन्ध रूप ऐश्वर्य को निरस्त करने के लिए ज्ञान का स्वरूप भिन्न होता है यह दूसरे वादियों के सिद्धान्त की बात है। और इसके पश्चात् दो श्लोक से यह अयुक्त है सांख्यमत में इसका निरूपण किया जायेगा। इसके बाद क्रिया नाम की कोई चीज ही नहीं है जो कि कहीं पर किसी को देखने में आयी हो—ऐसा बताया है। साधक प्रमाण का खण्डन करके बाधक प्रमाण का उपपादन करेंगे। इसके बाद एक श्लोक से ज्ञान-क्रिया के सम्बन्ध का अभाव प्रमाणाभाव के कारण से होता है यह बताया गया है। और एक श्लोक से बाधक प्रमाण कहकर, आत्मा स्थिर नहीं है और न तो उसका ( ज्ञातृत्व-कर्तृत्व ) जानना और करना घटित होता है और इसका ऐश्वर्य है, यह अपने पक्ष का उपसंहार किया हुआ है और यही पूर्वपक्ष का निचोड़ है। अब ग्रन्थकी व्याख्या करते हैं—अपने आप ही भासित होने वाला स्वयंप्रकाश ज्ञान ही एक श्रेष्ठ पदार्थ है विकल्प रूप अपना ही अभिलाप है बहुतसे या दो प्रकार के भी विकल्प नहीं होते हैं ॥ १ ॥ क्योंकि नित्य द्रष्टा यहाँ कोई भासित नहीं होता है। अहंप्रतीति यह जो होती है वह शरीर को ही विषय करती है ॥ २ ॥
अ.-१, आ.-२, का.-१-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ३३ 'ननु' इति आक्षेपे; इह आत्मा संवित्स्वभावः स्थिरः-इति तावदयुक्तम्, स्थिरस्य स्वप्रकाशस्य अप्रकाशनात् । तथाहि—घटप्रकाशो, घटविकल्पो, घटप्रत्यभिज्ञा, घटस्मृतिः, घटोत्प्रेक्षा—इत्यादिरूपेण ज्ञानान्येव प्रकाशन्ते, भिन्नकालानि भिन्नविषयाणि भिन्नाकाराणि च । तत्र नीलप्रकाशः 'स्वलक्षणाभासं ज्ञानं' । 'स्वम्' अन्याननुयायि स्वरूपसंकोचभागि 'लक्षणं' देशकालाकाररूपं यस्य तस्य 'आभासः' प्रकाशनम् अन्तर्मुखं यस्मिन् बहिर्मुखीनस्वरूपधारिणि ज्ञाने तत् अविकल्पकं, विषयभेदेऽपि एकजातीयं स्वरूपे, तद्वैचित्र्ये कारणाभावात् । विकल्पे हि वैचित्र्यकारणम् अभिलापः, स च अत्र नास्ति; नहि अभिलापो नीलस्य धर्मः, नच चक्षुर्ग्राह्यः, ततोऽसौ प्राच्यः स्मर्तव्यः, अप्रबुद्धे च संस्कारे न स्मृतिः, तत्प्रबोधश्च वस्तुदर्शनोत्थितः-इति वस्तुदर्शनसमयेऽभिलापस्मृतिर्नास्ति । ततः 'परं' विकल्पकं ज्ञानं, सर्वस्य विकल्पस्य साक्षात्, पारम्पर्येण वा निर्विकल्पकमूलत्वात् । 'परम्' इति च अन्यरूपं सामान्यलक्षणं तस्य विषयः, स्वलक्षणेऽतिसंकोचिनि विततविकल्पसाध्यस्य वृद्धव्यावहारिकस्य, औपदेशिकस्य वा संकेतस्य कर्तुम् अशक्यत्वात्, कृतस्यापि वैयर्थ्यात्, तेन हि अननुयायिना न पुनर्व्यवहारः । तच्च बहुभेदं, 'ननु' शब्द का प्रयोग कहे हुए सिद्धान्त का निराकरण करने के लिए किया गया है। ज्ञान, क्रिया-शक्ति से युक्त संवित् ज्ञान का स्वरूप है। 'ननु' आक्षेप अर्थ में भी है; आत्मा संविद्रूप स्वभाव वाला एवं स्थिर नित्य है यह कहना कोई युक्तियुक्त नहीं है, स्थिर स्वभाव वाला जो स्वप्रकाश है उसका प्रकाश न होने के कारण। देखो—घट का प्रकाश हुआ, घट का विकल्प हुआ, घट की प्रत्यभिज्ञा हुई और घट की स्मृति हुई एवं घट की उत्प्रेक्षा हुई—इत्यादि जो कुछ है वह सब ज्ञानरूप से भासित होता है, जो कि भिन्न कालवाले, भिन्न विषयवाले और भिन्न आकार-प्रकारवाले हैं। [क्योंकि ज्ञानों की क्षणिकता होने से] नील प्रकाश निर्विकल्परूप है 'स्वलक्षणाभासं ज्ञानं' वह अपने स्वरूप का आभासरूप ज्ञान है। दूसरों का अनुकरण नहीं करता है अपने स्वरूप का संकोच करनेवाला होता है 'लक्षण' देश, काल और आकाररूप लक्षण है जिसका। उसी का आभास-प्रकाश अन्तर्मुख रहता है, बहिर्मुख स्वरूपधारी ज्ञान में अविकल्प स्थिर रहता है, विषय के भेद होने पर भी अपने स्वरूप में एक जातीय ही रहता है, उसकी विचित्रता में कारण का अभाव होने से। क्योंकि विकल्प में विचित्रता का कारण अभिलाप होता है और वह इसमें नहीं है; अभिलाप नीलका धर्म नहीं है और चक्षु इन्द्रिय से ग्रहण भी नहीं होता, इसलिए वह समयरूप से स्मरणीय है और जबतक संस्कार उद्बुद्ध नहीं होता तबतक स्मृति नहीं होती है, उसका ज्ञान वस्तु के दर्शन से ही होता है—इस प्रकार वस्तु-पदार्थ के दर्शन के समय में अभिलाप की स्मृति नहीं होती है। इसलिए 'परं विकल्पं ज्ञानं' सब से अच्छा ज्ञान विकल्प का होता है; क्योंकि वह सभी विकल्पों का साक्षात् या परम्परा रूप से निर्विकल्पमूलक रहता है। 'परं' इसका तात्पर्य यह है कि अन्यरूप सामान्यलक्षण उसका विषय है, अपने लक्षण में जो अति संकोचशील है जिसका विकल्प साध्य वृद्धजनों से व्यवहार करने योग्य या औपदेशिक संकोच करने के लिए अशक्य होता है, संकोच करना भी उसका निरर्थक है, क्योंकि वह किसी का अनुयायी नहीं होता और उसका फिर से व्यवहार भी नहीं हो सकता एवं उसमें अनेक भेद भी मिलेंगे; क्योंकि सङ्कल्पात्मक अभिलाप होने से वह कथन रूप होने के कारण साथ में हो रहता है ५
३४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-२, का.-१-२ यतस्तत् अभिलापेन संजल्पात्मना शब्दनरूपेण सह वर्तते । शब्दनं च इदम्—इति, तत्—इति, तदिदम्—इति, भवेदिदम्—इति, इदं वा इदम्—इत्यादि 'बहुधा' भिद्यते । तच्च न विषयपक्षे वर्तते, अपि तु तस्य विकल्पस्य स्वरूपमेव विचित्रीकुर्वत् प्रतिभाति—इति विकल्पो बहुभेदः । एवम् अनुभवविकल्पपरम्परा तावत् स्वप्रकाशत्वेन भाति । स्यादेतत्, यल्लग्नासौ परम्परा सोऽपि आभाति—इति; तन्न, यतो द्वयमपि एतद् अविकल्पेतररूपं न अन्यस्य 'कस्यचित्' एतदतिरिक्तस्य 'द्रष्टुः' अनुभवितुः सम्बन्धि, दृश्यस्य तु भवतु बाह्यार्थवादे । अत्र हेतुः—यतः 'तस्य' द्रष्टुः, अत एव संवित्स्वभावतोपगमात् स्वप्रकाशतायोग्यत्वात् आपन्नोपलब्धिलक्षणप्राप्तेः; 'अत्र' एतद्बोधद्वयमध्ये नास्ति अवभासः । ननु अस्त्येव अवभासः—इति असिद्धा दृश्यानुपलब्धिः । तथाहि-अहं वेद्मि, निश्चिनोमि, स्मरामि इदम्-इति विदादिप्रकृत्यर्थरूपात् ज्ञानस्मृत्यादेः, इदम्—इति च कर्मरूपात् विषयात् अतिरिक्तमेव अहम्—इति अनुयायिनि प्रकाशे अनुयायि रूपं भाति । क एवमाह भाति—इति ? । भानं हि अविकल्पकम्, अहम्—इति शब्दानुविद्धो और इसका कथन भी यही होता है, वही यह है, यह ऐसा होगा, इस तरह इसके बहुत से 'बहुधा' भेद हो जाते हैं और वह प्रतिद्वन्द्वी के पक्ष में नहीं है अपितु, उस विकल्प के स्वरूप को ही चित्र- विचित्र करता हुआ स्वरूप से भासित होता है—इस प्रकार विकल्प भी बहुत भेदवाला होता है। एवं अनुभव-विकल्पों की धारा पहले स्वप्रकाशरूप से भासती है । यह हो सकता है, इसकी अपेक्षा जो उसमें मिला रहता है वह भी भासित होता है; क्योंकि ये दोनों अविकल्प और विकल्प से भिन्न रूप में किसी 'द्रष्टुः' द्रष्टा का अथवा तो अनुभव करनेवाले का सम्बन्धी नहीं हो सकता, किन्तु दृश्य का तो बाह्यार्थवादी के मत में हो सकता है। इसमें हेतु दिखाते हैं—क्योंकि 'तस्य' उस द्रष्टा का हो सकता है, इसलिए होता है कि संविद्रूप ज्ञान स्वभाव की प्राप्ति कर लेने के कारण अपने प्रकाश की योग्यता होने से, उपलब्धि की प्राप्ति होने से; 'अत्र' इन दोनों के ज्ञान के बीच में आभास नहीं है । 'ननु' कहकर शंका उठाते हैं कि अवभास रहता ही है दृश्य की अनुपलब्धि [ अप्राप्ति ] असिद्ध हो गयी जो सिद्ध है तब फिर दृश्य की उपलब्धि कैसे होगी । उसी प्रकार से होती है कि मैं जानता हूँ, मैं निश्चय करता हूँ और इसको मैं स्मरण करता हूँ—इत्यादि जो विदादि धातुओं के प्रकृत्यर्थ ज्ञान, स्मृति वगैरह है उन कर्मरूप विषयों से 'अहं' अतिरिक्त- भिन्न वस्तु है—इस प्रकार इच्छा करनेवाले के प्रकाश में अनुयायी रूप से भासता है। कौन कहता है कि भासता है ? क्योंकि भान तो अविकल्प ही होता है अहं जो है वह तो अहं शब्द से अनुविद्ध- १. अभिलाप विषय की परवशता का त्याग करा कर बोध स्वातन्त्र्य रूप होने के कारण विषय को तादात्म्यरूप में ले आता है, व्यक्तरूप से प्रमाता का साक्षात्कार करने तक परामर्श किया जाना ही अभिलाप है, आन्तर शब्द वाला संजल्प कहलाता है। श्री भर्तृहरि ने भी कहा है— सोऽयमित्यभिसम्बन्धाद्रूपमेकीकृतं यदा । शब्दस्यार्थेन तं शब्दमभिजल्पं प्रचक्षते ॥
अ.-१, आ.-२, का.-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ३५ विकल्पप्रत्ययः । ननु तथापि किम् अनेन विकल्प्यते, शरीरसन्तानो वा कृशोऽहम्—इत्यादि- प्रत्ययात्, ज्ञानसन्तानो वा सुख्यहम्—इत्यादिप्रतीतेः । मत्वर्थीयश्च सन्तानमेव स्पृशति नातिरिक्तम् । तदेतदुक्तम्—'अहंप्रतीतिरपि' शरीरम्, आदिग्रहणात् ज्ञानम् अवस्यति, सन्तान- रूपतया विकल्पयति अवश्यं; सदृशापरापरभावभेदग्रहणसामर्थ्यवासनाविष्टत्वात्—इति । 'एषा' इति न अस्माभिर्निह्नुता, 'साभिलापं विकल्पाय्यम्' इत्यनेन संगृहीतत्वात् । एतदुक्तं भवति— अहंप्रतीतिरेव तावत् न आत्मा, तस्या अपि विकल्परूपत्वात् अस्थैर्याच्च । एतत्प्रतीतिप्रत्ययोऽपि नास्ति अन्यः शरीरादेः, भवन्नपि वा वेद्यपक्षपतितः स्यात्—इति । तथापि संवित्संवेद्यव्यति- अनुगत होकर विकल्प का बोध कराता है । प्रश्न करते हैं कि इससे तुम क्या विकल्प करते हो, 'मैं कृश हूँ' इत्यादि प्रत्यय से शरीर-सन्तान का विकल्प करते हो ? या 'मैं सुखी हूँ' इत्यादि ज्ञान सन्तान का विकल्प करते हो ? क्योंकि मत्वर्थीय जो प्रत्यय है वह सन्तान को ही स्पर्श करता है किसी अन्य को नहीं । इसीलिए यही कहा जाता है कि अहं-प्रतीति भी शरीर को ही स्पर्श करती है आदि ग्रहण से ज्ञान को भी लिया जाता है, सन्तान रूप से अवश्य विकल्पित किया जा सकता है, सदृश अन्य-अन्य भाव-भेद के ग्रहण-सामर्थ्य की वासना से आविष्ट होने के कारण । 'एष' शब्द से साभिलाप जो विकल्प है हमने उसको नहीं छिपाया है किन्तु उसका संग्रह कर दिया है । इसका यह निचोड़ निकलता है कि अहं शब्द से जो प्रतीति होती है वह आत्मा को विषय नहीं करती; क्योंकि वह भी तो विकल्परूप है और अस्थिर है । शरीरादि से भिन्न इस प्रतीति का दूसरा कोई विषय नहीं होता यदि हो तो भी वेद्य का ही पक्षपात करनेवाला होगा । फिर भी १. अनादि अनवच्छिन्न धारा से प्रवृत्त हुए ज्ञानों का कार्य-कारण-भावरूप प्रवाह ही सन्तान है । 'अहं' प्रतीति से मैं जानता हूँ, मैं देखता हूँ—इस प्रकार अनुभव से शरीर-सन्तान अथवा ज्ञान-सन्तान का निश्चय करता है, इससे अतिरिक्त कोई ज्ञाता अथवा द्रष्टा का ज्ञापन नहीं हो रहा है—ऐसा सौगतों का कहना है । २. आत्मानमात्मनात्मैव लिङ्गादनुमिनोति हि । तन्न नूनमुपेतव्या कर्तृता कर्मतास्य च ॥ तत्रानुमानज्ञानस्य यथात्मा याति कर्मताम् । तथाऽहं-प्रत्ययस्यैव प्रत्यक्षस्यापि गच्छतु ॥ देहादिव्यतिरिक्तश्च यथा लिङ्गेन गम्यते । तथाऽहं प्रत्ययेनापि गम्यतां तद्विलक्षणः ॥ अपने ही लिङ्ग से आत्मा का अनुमान होता है । इसलिए उसमें निश्चय ही उसकी कर्तृता और कर्मता को मानना पड़ेगा । जैसा कि आत्मा अनुमान ज्ञान का कर्म होता है उसी प्रकार ही वह प्रत्यक्ष अहंप्रत्यय की कर्मता को प्राप्त करे । देहादि से भिन्न आत्मा जिस प्रकार अपने लिङ्ग से जाना जाता है उसी प्रकार अहं प्रत्यय से भी उसको विलक्षण होने के कारण जाना जाय । अब प्रश्न करते हैं कि आत्मा का जो रूप है क्या वह प्रत्यय साक्षात् किया जाता है, यदि सुखादि आत्मा का रूप है तो उसका मानस प्रत्यक्ष होगा ? शंका होती है कि आनन्दादि स्वभाव प्रसिद्ध ही रूप सुखादि का है, तब तो उसको आधारता से अपनी आत्मा का भी रूप जानना चाहिए—
३६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-२, का.-३ रिक्तस्य आत्मनो न सिद्धिः—इत्येतत् अपिशब्देन द्योतितम् । एवं नास्ति आत्मा संवित्संवेद्य- व्यतिरिक्तो दृश्यस्य अनुपलब्धेः—इति ॥ २ ॥ अत्र आत्मवाद्यनुमानमुत्थापयितुमाह— अथानुभवविध्वंसे स्मृतिस्तदनुरोधिनी । कथं भवेन्न नित्यः स्यादात्मा यद्यनुभावकः ॥ ३ ॥ इह स्मृतिकाले सुस्मूर्षितोऽर्थो भवतु, ध्वंसतां वा—इति किम् अनेन, अनुभवस्तावत् ध्वस्तः—इत्यत्र सर्वस्य अविवादः, तमेव च अनुरुन्धाना स्मृतिर्जायते । तथाहि—स्मृतौ न अर्थस्य प्रकाशः, न अध्यवसायः, नापि अनुभवस्य, अर्थस्य च अङ्गुलिद्वयवत्, नापि अनुभवविशिष्टस्य ज्ञान-संवित् संवेद्य से भिन्न आत्मा की सिद्धि नहीं हो सकेगी। यह ‘अपि’ शब्द से द्योतित होता है। [ संवित् ज्ञान-सन्तान और संवेद्य शरीर-सन्तान है, उन दोनों से भिन्न है । ] इसलिए मानना पड़ेगा कि दृश्य की अनुपब्धि के कारण संवित् संवेद्य से भिन्न आत्मा नहीं है ॥ २ ॥ आत्मवादी अनुमान का उत्थापन करने के लिए कहते हैं— अनुभव के ध्वंस हो जाने पर भी स्मृति उस अनुभव को स्थिर रखती है । यदि आत्मा अनुभव करने वाला नित्य न होता तो स्मृति किसी भी प्रकार से नहीं हो सकती है ॥ ३ ॥ स्मृतिकाल में सूक्ष्मरूप से अर्थ स्मृत हो जाय अथवा ध्वस्त हो जाय—इससे क्या प्रयोजन, अनुभव तो विनष्ट हो जाता है इस विषय में किसी को भी विवाद नहीं है, और उसी अनुभव को स्थिर करती हुई स्मृति पैदा होती है। जैसा कि—स्मृति में अर्थ का प्रकाश नहीं होता है, और न निश्चय रूप से अध्यवसाय ही होता है, एवं अनुभव भी नहीं होता है, और अर्थ का दो अङ्गुली के जैसा समानरूप से प्रकाश होता है, न तो अनुभव विशिष्ट अर्थ का सुखादि चेत्यमानं हि स्वतंत्रं नानुभूयते । मतुबर्थानुवेधस्तु सिद्धं ग्रहणमात्मनः ॥ इदं सुखमिदं ज्ञानं दृश्यते न घटादिवत् । अहं सुखीति तु ज्ञप्तिरात्मनोऽपि प्रकाशिका ॥ अपि च ज्ञातृज्ञानविशिष्टार्थग्रहणं किल भाष्यकृत् । स्वयं प्रादीदृशत्तच्च किं वा युक्तमुपेक्षितुम् ॥ विशेष्यबुद्धिमिच्छन्ति नागृहीतविशेषणाम् । अनुभव में आया हुआ सुखादि भी स्वतन्त्र रूप से अनुभूत नहीं होता है ‘मतुप्’ को लगा देने पर तो आत्मा का ग्रहण होना सम्भव है । यह सुख है, यह ज्ञान है ऐसा घटादि के समान नहीं दिखता है किन्तु मैं सुखी हूँ, मैं ज्ञाता हूँ, यह प्रकाशित होता है । इस बात को भाष्यकार ने भी बताया है—ज्ञाता के ज्ञान से विशिष्ट ही अर्थ ग्रहण होता है । स्वयं उन्होंने इसको बता दिया है इसलिए यह उपेक्षा करने योग्य नहीं है । अत एव विशेष बुद्धि को ही चाहते हैं विशेषण को नहीं ग्रहण करना चाहिए ।
अ.-१, आ.-२, का.-३ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ३७ अर्थस्य दण्डिवत्, सर्वत्र अयम्—इति प्रत्ययप्रसङ्गात्; किन्तु अनुभवप्रकाश एव स्मृतौ प्रधानम्, अनुभवस्य तु अर्थप्रकाशात्मकत्वात् अनुभवप्रकाशनान्तरीकयोऽर्थावभासः—इति। सर्वथा यदि अनुभवो ध्वस्तः, तदा तत्प्रकाशरूपा कथं स्मृतिस्तद्वारेण अर्थविषया स्यात्, तया च सर्वो व्यवहारः क्रियमाणो दृष्टः—इत्यसौ स्वरूपेण अनपह्नवनीया, सति अनुभवस्य नाशे, किञ्चित् अविनष्टम् आवेदयति। तदेव च अनुभवकर्तृ अनुभवितृरूपम्, आत्मा अनुभावको नित्यः—इति इयदेव च आत्मसिद्धेर्जीवितम्। तत्तु न अधिकम् इहैव उन्मीलितम् आचार्येण, वक्तव्यशेषविवक्षया पूर्वपक्षो मा तावत् समापत्—इत्याशयेन 'कथं भवेत्' इति। अर्थस्तावत् तस्याम् अकिञ्चित्करः। अनुभवश्च ध्वस्तः—इति न केनचित्प्रकारेण स्मृतिः स्यात्, तदभावे च संकेतशब्दस्मृत्या- यत्ता अपि अस्तङ्गताः सर्वे विकल्पाः, निर्विकल्पं च अन्धमूकबधिरप्रायम्—इति हन्त निराक्रन्दम् अवसीदेत् विश्वम्—इति ॥ ३ ॥ इह कार्यव्यतिरेकेण तादृक् कल्पनीयं यत् कार्यसिद्धये पर्याप्नोति, न चैवम् आत्मा, अर्थो हि तावत् स्मर्यते, स च अनुभवप्रकाशमुखेन, अनुभवश्च ध्वस्तः-इत्युक्तं; यदि आत्मा कश्चिदस्ति, किं तेन। एतदपि हि वक्तव्यम्—आकाशमपि अस्ति—इति। अथ उच्यते—न केवलेन आत्मना दण्डीपुरुष की तरह प्रकाश होता है, किन्तु स्मृति में अनुभव प्रकाश ही प्रधान है, अनुभव तो अर्थप्रकाशात्मक है अनुभव प्रकाश के बिना अर्थ का अवभास नहीं होता, यदि सब प्रकार से अनुभव का ध्वंस हो जायेगा, तब तो अनुभवसे प्रकाशित होनेवाली स्मृति अर्थविषयक कैसे सम्भव हो सकेगी, और उस स्मृति से ही समस्त क्रियमाण व्यवहार होता हुआ देखा जाता है, इसलिए इसको स्वरूप से हटा नहीं सकते हो, अनुभव के नाश हो जाने पर कुछ अविनष्ट संस्कार का ज्ञापन होता है, इसीलिए उसे अनुभवकर्ता और अनुभविता कहा जायेगा, आत्मा अनुभव करने वाला नित्य है और इतना ही आत्मसिद्धि का जीवन है। इससे अधिक नहीं है, इसी में आचार्य ने दिखाया है, अभी करने के लिए कुछ शेष रह गया है इस विवक्षा से पूर्वपक्ष प्रायः समाप्त न हो जाय; इस अभिप्राय से 'कथं भवेत्' यह पद दिया गया है। अर्थ उस स्मृति में कुछ भी नहीं है, विषय की सत्ता स्मृति में अनपेक्षणीय है, और अनुभव तो विनष्ट हो गया, तब फिर स्मृति कैसे सम्भव हो सकेगी, अर्थात् स्मृतिका किसी भी प्रकारसे होना सम्भव नहीं दीखता, और स्मृति का अभाव हो जाने पर संकेत शब्द स्मृति के आधीन होता हुआ भी सभी विकल्प नष्ट ही हो जाते हैं, और निर्विकल्प तो फिर अन्धे एवं बहरे के जैसा ही प्रायः हो जाता है; बड़े दुःख की बात है। अब इसके लिए चिल्लाना निरर्थक ही है यह विश्व दुःखमय हो जायेगा ॥ ३ ॥ कार्य से भिन्न ऐसा जो कार्यानुकूल उस कार्यको पैदा करनेवाले कारण की कल्पना करनी चाहिए जो कि सिद्धि के लिए पर्याप्त हो, और जो आत्मा नहीं है, अर्थ विषय का ही स्मरण किया जाता है और वह अर्थप्रकाश अनुभवप्रकाश के माध्यम से होना चाहिए, किन्तु अनुभवप्रकाश विनष्ट हो जाता है, इस विषय में जो कहना था सो कह दिया गया है; यदि आत्मा नाम की कोई वस्तु है तो फिर उससे किसी का कुछ भी प्रयोजन सिद्ध होता नहीं
३८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-२, का.-४-५ एतत् सिद्धयति, अपितु अनुभवसंस्कारोऽपि अत्र उपयोगी—इति, तर्हि स एवास्तु, किम् आत्मना ?—तत् एतत् दर्शयति— सत्याप्यात्मनि दृङ्नाशात्तद्द्वारा दृष्टवस्तुषु । स्मृतिः केन 'दृष्टेषु' अनुभूतेषु 'वस्तुषु' या 'स्मृतिः' तस्याम् अनुभवो दृगात्मा 'द्वारम्' अर्थांशस्पर्शी, स च 'सत्यपि आत्मनि' नष्टोऽनुभवः तस्य हि अनाशे इदम्—इत्येष एव अत्रुटितः प्रकाशः—इति का स्मृतिः, तदनुभविता किं स्मृतेः कुर्यात्—इति ॥ अथ यत्रैवानुभवस्तत्पदैव सा ॥ ४ ॥ 'यत्रैव' विषये 'अनुभवो' वृत्तः 'तदेव' तस्या स्मृतेः 'पदं' स्मर्यमाणम् । तत्पदा—इति बहुव्रीहिः, 'सा' इति स्मृतिः ॥ ४ ॥ ननु ज्ञानान्तरस्य विषयेण कथं तस्याः विषयित्वाभिमानः—इत्याशङ्कयाह— यतो हि पूर्वानुभवसंस्कारात्स्मृतिसंभवः । दिखाई देता; यह भी कहना चाहिए कि आकाश भी कोई वस्तु है ? ऐसी स्थिति में यही कहा जाता है कि—आत्मा से कुछ भी सिद्ध होनेवाला नहीं है, अपितु अनुभव संस्कार ही इसमें उपयोगी होगा, तब तो, अनुभव संस्कार ही स्मृति में उपयोगी रहे, आत्मा से क्या सिद्ध होने वाला होगा ? उसे दिखाया जाता है— आत्मा के ही रहने से दृष्टि के नष्ट हो जाने पर भी दृष्ट वस्तु का स्मरण होता है, यदि आत्मा को नहीं मानते हो तो फिर कौन स्मरण करेगा ॰॰॰॰॥ 'दृष्टेषु' दृष्ट—अनुभूत वस्तुओं में जो स्मृति होती है उस स्मृति में अनुभव ज्ञानात्मा अर्थविषयक अंश का द्वार है, और वह 'सत्यपि आत्मनि' आत्मा के रहने पर भी अनुभव नष्ट हो जाता है, उस अनुभव के नित्य रहने पर यह घट-पद है—ऐसा लगातार प्रकाश होता रहेगा । अतः स्मृति की क्या जरूरत रह जायेगी ? हम अनुभव को ही नित्य मान लेंगे और इसीसे हमारा कार्य सम्पन्न हो जायेगा । स्मृति में अनुभवकर्ता को मान कर क्या करागे । जिस अर्थ विषय में अनुभव होता है उस विषय के अर्थ की ही स्मृति होती है ॥ ४ ॥ 'यत्रैव' जिस विषय में अनुभव होता है । जैसे घट-पद का अनुभव हुआ तो घट-पद का स्मरण भी घट-पद से हो होगा । और उसी विषय का स्मरण होता है, जो पद अनुभव का विषय है वही पद स्मृति का भो विषय होता है, 'तत्पदं यस्यां स्मृतौ सा तत्पदा स्मृतिः', कारिका में 'सा' यह स्मृतिपद से लिया हुआ है ॥ ४ ॥ अब शङ्का करते हैं कि जो अनुभव का विषय है वह स्मृति का विषय कैसे बनेगा, क्योंकि अनुभव तो नष्ट हो गया फिर उसका विषय स्मृति नहीं बनेगी, इस आशङ्का के उत्तर में कहते हैं— क्योंकि पूर्व के अनुभव-संस्कार से ही स्मृति सम्भव है ।
अ.-१, आ.-२, का.-५-६ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ३९ अनुभवेन हि संस्कारो जन्यते स्वोचितः, संस्कारश्च प्राक्तनरूपां स्थितिं स्थापयति, आकृष्ट- शाखादेश्चिरसंवर्तितस्य विवर्त्यमानस्य भूर्जादेः । तेन अत्रापि संस्कारः तां स्मृतिं पूर्वानुभवानु- कारिणीं करोति—इति तद्विषय एव स्मृतेर्विषयः ॥ यद्येवमन्तर्गण्डुना कोऽर्थः स्यात्स्थायिनात्मना ॥ ५ ॥ एवं तर्हि ‘अन्तर्गण्डुः’ यथा आयासाय परं, तद्वत् आत्मा स्थिरः कल्पनायासमात्रफलः— इति किं तेन, सर्वं हि संस्कारेण जगद्व्यवहारकुटुम्बकं कृतकरावलम्बम्—इति ॥ ५ ॥ ननु तस्यैव संस्कारस्य आश्रयो वक्तव्यः, स हि गुणत्वाद् आश्रयम्पेक्षते, य आश्रयः स आत्मा स्यात्—इत्याशङ्क्योचाह— ततो भिन्नेषु धर्मेषु तत्स्वरूपाविशेषतः । संस्कारात्स्मृतिसिद्धौ स्यात्स्मर्ता द्रष्टेव कल्पितः ॥ ६ ॥ अनुभव से संस्कार उत्पन्न होता है, यही उचित भी है। जैसा हमारा देखा रहेगा वैसा ही संस्कार होता है और वही संस्कार पूर्वकालीन स्थिति को स्थिर रखता है। किसी शाखा को खींचकर बड़ी देर तक रोके रखें तो भी वह बाद में जब छोड़ देते हैं तब पुनः अपने स्थान पर चली जाती है। इसलिए यहाँ पर भी संस्कार उस स्मृति को पूर्व अनुभव के अनुसार ही कराता है, अनुभव का विषय ही स्मृति का विषय है। यदि ऐसी बात है तो केवल संस्कार से काम चल जायेगा एक स्थायी आत्मा को मानने से कौन सा प्रयोजन सिद्ध होनेवाला है। घेघ बढ़े हुए गले के रोग के समान व्यर्थ ही आत्मा की सत्ता मानना है ॥ ५ ॥ जैसे 'घेघ' गले का फूल जाना केवल पीड़ा ही देता है, उसी प्रकार आत्मा को स्थिर मानना केवल कल्पना का कष्ट सहना है। उस आत्मा से क्या प्रयोजन सिद्ध होगा, समस्त जगत का व्यवहार-परिवार संस्कार से ही हाथ में आजायेगा ॥ ५ ॥ 'ननु' कहकर प्रश्न करते हैं कि तब फिर उस संस्कार का आश्रय कौन है यह कहना होगा, वही संस्कार गुण होने के कारण अपने आश्रय द्रव्य की अपेक्षा रखता है। उसका आश्रय द्रव्य है वही आत्मतत्त्व है—ऐसी आशङ्का कर उत्तर में कहते हैं कि—भिन्न-भिन्न धर्मों के रहते हुए आत्मा के स्वरूप में भेद न होने से संस्कारमात्र से ही स्मृति सिद्ध हो जाने पर द्रष्टा के समान स्मरण करनेवाला भी वही आत्मा है ॥ ६ ॥ १. जो संस्कार धर्मरूपी गुण है वह स्वतन्त्र नहीं होता है—इसका कोई न कोई धर्मी अवश्य होगा, यदि ज्ञान-सन्तान को ही संस्कार का धर्मी मान लिया जाये, तो पहले ज्ञानों से भिन्न कोई सन्तान ही नहीं बन पाता है जिससे ज्ञान सन्तान हो सके, यदि वह सन्तान ज्ञानों में ही संस्कार रूप से रहता है तो भी ऐसा कहना संगत नहीं हो सकता, अन्यत्र किया हुआ अनुभव का विषय, किसी अन्य में संस्कार रूप होकर स्मृति को पैदा नहीं कर सकता है, यह लोक में प्रसिद्ध नहीं है कि चैत्र को अनुभव हो और
४० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-२, का.-६ इह संस्कारे जायमाने, यदि आत्मनो विशेषः, स तर्हि अव्यतिरिक्तः—इति न नित्य आत्मा स्यात्; अथ न कश्चित् अस्य विशेषः, तेन तर्हि किम् । अथ संस्कार एव अस्य विशेषः, तर्हि न व्यतिरिक्तोऽसौ—इति, पुनरपि अनित्ये ज्ञाने संस्कारः—इत्यायातम् । अनुभवाद्द्विशिष्टं विशिष्टस्मृ- त्याख्यकार्यकारि ज्ञानं परम्परया जायते-इति इयानेव संस्कारार्थः । अथ संस्कारात्मा व्यतिरिक्तो विशेषः, तस्य तर्हि किमसौ । संबन्धश्च व्यतिरिक्तो निराकरिष्यते । एवं ज्ञानसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्न- धर्माधर्मा अपि विकल्पनीयाः । एतदाह—'ततः' इति आत्मनो 'भिन्नेषु धर्मेषु' अङ्गीक्रियमाणेषु तेषु सत्स्वपि, आत्मनः 'स्वरूपे' विशेषाभावात् स तावत् आत्मा स्मृतौ न व्याप्रियेत, अस्मर्तृरूपा- संस्कृतरूपादिप्राच्यरूपानपायात्—इति 'संस्कारादेव स्मृतेः सिद्धिः'—इति । अहं स्मरामि—इति अनित्य संस्कार जिसमें उत्पन्न हो जाय वह भी अनित्य क्यों न हो जाय, वह आत्मा तो संस्कार से भिन्न नहीं हुआ, इसीलिए आत्मा भी नित्य नहीं होगा; इसमें कोई विशेषता नहीं हुई, उस आत्मा से क्या लाभ होगा, संस्कार ही इसकी यदि विशेषता मानी जाय, तो वह आत्मा संस्कार से भिन्न नहीं हुआ; फिर भी अनित्य ज्ञान में संस्कार होता है यही बात सिद्ध हुई । अनुभव से विशिष्ट ज्ञान और विशिष्ट ज्ञान से स्मृति नामक कार्य करनेवाला ज्ञान परम्परा द्वारा उत्पन्न होता है, यही सब संस्कार का अर्थ है। यह संस्काररूप आत्मा भिन्न विशेष हुआ, उस संस्कार का आश्रय आत्मा कैसे बनेगा। और इन दोनों का सम्बन्ध भी भिन्न नहीं मानेंगे । इस प्रकार ज्ञान, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म को भी मानना होगा। इसी बात को लेकर कहा है कि 'ततः' आत्मा के 'भिन्नेषु धर्मेषु' भिन्न-भिन्न धर्मों को स्वीकार करने पर भी आत्मा के 'स्वरूपे' स्वरूप में कोई भेद न होने के कारण वह आत्मा स्मृति में सम्मिलित नहीं होगा, स्मरणकर्ता होने से, संस्काररूप पूर्व का धर्म न होने से, इसी कारण 'संस्कार से ही स्मृति होती है' यह बात सिद्ध हुई । स्मरण करता हूँ; जो स्मरण करने मैत्र को स्मृति हुई हो अर्थात् चैत्र-मैत्रादि प्रमाताओं के भेद होने के कारण ऐसा वृतान्त नहीं देखने में आया है । इसलिए अनुभव और संस्कार के अभेद को मानना पड़ता है, और वह स्वरूप से तो उपलब्ध होता नहीं देखा जाता है विलक्षण स्वभाव वाला होने के कारण—अतः आश्रय एक रहता है और अनुभव एवं संस्कार में आश्रय के द्वारा अभेद की सिद्धि हो जाने पर तो सुखादिकों की भी प्रतिसन्धि सिद्ध हो जाती है । इसलिए संस्कार का आश्रय एकमात्र आत्मा ही है और एक होने के कारण जो स्थिर है वही आत्मा है । पूर्वपक्षी के मत को लेकर शंका खड़ी करते हैं—आत्मा में संस्कार के अनुदित होने से तो पूर्व के समान अनित्य ही हो जायेगा, इसलिए संस्कार से ही पूर्वोक्त युक्ति से स्मृति की सिद्धि हो जाती है । जो कि मैं स्मरण करने वाला हूँ—ऐसा भासता है, तब तो अहं प्रतीति जो उसमें हो रही है वह आत्मा नहीं है क्षणिकता एवं अस्थिरता के कारण, वेद्य-वेदन से भिन्न कोई द्रष्टा या स्मर्ता रूप नहीं दिखायी देता है । संस्कार का उदय होने पर भी स्मृति में कोई बाधा नहीं पड़ती है उदित संस्कार होने पर तो उसके स्वरूप को अंश मात्र से भी विलक्षणता होने के कारण तथा वैलक्षण्य भाव तो संस्कार में ही रहता है यदि भिन्न होकर तो पूर्वापरी भाव नहीं बन सकता है क्योंकि तब तो अनित्य हो जायेगा भिन्न रहने पर तो वह कुछ भी नहीं रहेगा । इसलिए संस्कार का कुछ भी आश्रय न होने से स्मृति की उपपत्ति में बाधा पड़ेगी ।
अ.-१, आ.-२, का.-७ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ४१ यः 'स्मर्ता' सोऽपि शरीरसंतानो, ज्ञानसंतानश्च अध्यवसीयते, यथा 'द्रष्टा' । पूर्वं हि उक्तम्— 'अहंप्रतीतिरप्येषा शरीराद्यवसायिनी ।' ( १।२।२ ) इति । एवम् आत्मनि साधकं प्रमाणं प्रत्यक्षम्रनुमानं च पराकृतं, बाधकं च सूचितं—धर्मयोगे नित्यताहानिः, अन्यथा किं तेन । तदुक्तम्— 'वर्षातपाभ्यां किं व्योम्नश्चर्मण्यस्ति तयोः फलम् । चर्मोपमश्चेत्सोऽनित्यः खतुल्यश्चेदसत्समः ।।' इति ॥ ६ ॥ इत्थम् आत्मानं निराकृत्य, तस्य ऐश्वर्यमपि निराकर्तुं, ज्ञानशक्तिमेव परीक्षितुमाह— ज्ञानं च चित्स्वरूपं चेत् तद् अनित्यं किमात्मवत् । अथापि जडमेतस्य कथमर्थप्रकाशता ॥ ७ ॥ वाला है वह भी शरीर सन्तान-प्रवाह और ज्ञान-सन्तान-प्रवाह है, यही निश्चय किया जाता है। जैसा कि 'दृष्टा' हमारे यहाँ सन्तान-प्रवाह है। क्योंकि यह बात हमने पूर्व में ही कह दी है “अहं प्रतीतिरप्येषा शरीराद्यवसायिनी ।” (१-२-२) इस प्रकार आत्मा के विषय में साधक प्रमाण प्रत्यक्ष और अनुमान को हटा दिया, और बाधक प्रमाण को सूचित कर दिया। ज्ञानादि धर्म के योग होने पर नित्यता की हानि होगी, ये सभी नहीं रहेंगे तो, आत्मा भी नहीं रहेगा। इस विषय में कहा भी गया है— वर्षा और ताप से आकाश का क्या बिगड़ता है। चूँकि वर्षा और ताप का फल तो चमड़े पर पड़ता है। यदि आत्मा चमड़े के समान है तो फिर आत्मा अनित्य हो जायेगा एवं आकाश के समान है तो फिर नहीं के बराबर होगा ॥ ६ ॥ इस प्रकार आत्मा नाम की कोई वस्तु नहीं है, इस बात का निराकरण कर, उसके ऐश्वर्य निराकरणार्थ अब ज्ञान शक्ति की परीक्षा करने के लिए कहते हैं— यदि ज्ञान चित्स्वरूप है तो क्या वह आत्मा की तरह अनित्य है और यदि उसे जडरूप मानोगे तो फिर पदार्थों का प्रकाश कैसे करेगा ॥ ७ ॥ १. कल्पित जिसकी सिद्धि के लिए सम्भव नहीं होता है, तब फिर उसकी सिद्धि के लिए कल्पना नहीं हो सकेगी, जैसे अंकुर की सिद्धि के लिए आकाशपुष्प, इसलिए कोई नित्य आत्मा है—ऐसा मानना पड़ेगा, जो कि स्मरण का प्रतिसन्धान कराता है। इसमें कल्पना का नियमन करने वाला व्यापक ही होता है, नहीं तो, वह नहीं ठहर सकती, यदि वह समर्थ तभी उसकी सिद्धि के लिए कल्पना हो सकेगी। अन्यथा नहीं हो पायेगी। ऐसा न होने पर व्यापकत्व इसका विनष्ट ही हो जायेगा। इसीलिए इसकी सिद्धि के लिए कल्पना की जाती है और वह प्रभवविष्णु विषयत्व से व्याप्त है। इसी कारण व्यापकत्व नहीं दिखायी देता और व्यापक की अनुपलब्धि हो रही है। अतः 'वर्षातपाभ्यामिति' इस वाक्य से ऐसा कहा है। जिसके रहने पर ही दूसरे की कल्पना होती है। उसी को हेतु बनाकर सब जगह हेतु मानना चाहिए क्योंकि हेतुओं की अनवस्था हो जायेगी। ६
४२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-२, का.-७ पराभ्युपगमेन प्रसङ्गापादनम् एतत् पूर्वपक्षवादी करोति-प्रसङ्गविपर्यलाभो मे भविष्यति- इति । तत्र आत्मवादी नित्यत्वम् आत्मन इत्थं ब्रूते-इह कालो नाम इदंभावविशिष्टस्य विशेषण- ताम् अवलम्बमानः तं विशिष्टीकुर्वन् तत्संकोचात् अनित्यं संपादयति, आत्मनश्च चित्स्वभावत्वात् इदम्-इति प्रथनाभावेन विशेष्यत्वं नास्ति, विशेषणविशेष्यभावो हि योजकायत्तः, नच स्वप्रकाशे योजकान्तरम् अस्ति । स इत्थं ब्रुवाणः पर्यनुयुज्यते- 'ज्ञानमपि' तर्हि स्वप्रकाशम्-इति, तत्रापि एषैव वार्ता-इति । तदपि कस्मात् न नित्यम् ?, नच द्वयोर्नित्ययोः कश्चित् संबन्धः, कार्यकारण- भावो हि असौ नान्यः, तत आत्मनो ज्ञानं शक्तिः-इति अवसन्नम् अदः । अथ न स्वप्रकाशं ज्ञानं, दूसरे के सिद्धान्त को मानकर पूर्वपक्षी प्रसंग उठाते हैं कि प्रसंग से विपरीत लाभ मुझे प्राप्त होगा अर्थात् जिसने नित्य रूप आत्मा माना है ऐसे सिद्धान्ती को उससे उलटा अनित्यत्व का लाभ होगा । आत्मतत्त्व की सत्ता को माननेवाले सिद्धान्ती लोग आत्मा का अस्तित्व इस प्रकार से कहते हैं- काल उसी वस्तु का नाम है जो किसी वस्तु-पदार्थ का विशेषण होकर आता है और वस्तु-पदार्थ को विशिष्ट बनाता हुआ संकोच से उसे अनित्य बना देता है, संकोचित परिच्छिन्न भाव उसमें आ जाने से वह अनित्य हो जाता है और आत्मा चेतन रूप होने के कारण 'इदम्' यह परिच्छिन्न भाव आत्मा का विशेषण नहीं हो सकता है, क्योंकि विशेष और विशेषण ये दोनों संयोजक व्यक्ति के आधीन होता है, स्वप्रकाश आत्मा में कोई दूसरा योजक नहीं हो सकता है। ऐसा कहने पर पुनः उससे प्रश्न किया जाता है कि-'ज्ञानमपि' ज्ञान को भी प्रकाश कहो और उसे भी नित्य मानो, तब तो वहाँ पर भी वही बात हुई। वह ज्ञान भी क्यों न नित्य हो जाय ? ज्ञान और आत्मा ये दोनों यदि नित्य होंगे तो कोई सम्बन्ध नहीं बैठता । ज्ञान और आत्मा में कोई कार्य-कारण-भाव भी नहीं बनता है, इसलिए मानो कि आत्मा की शक्ति ज्ञान है। यह प्रसंग यहाँ पर समाप्त हुआ । यदि स्वप्रकाश ज्ञान नहीं होगा, तब तो फिर दूसरे घट-पटादि है उन सबों का १. 'अथ' इत्यादि से कारिका के द्वितीय अर्धभाग की व्याख्या करते हैं- यदि ज्ञान स्वप्रकाशरूप नहीं है, तो दूसरे घटादिकों का भी प्रकाश नहीं कर सकेगा, जिस कारण से वह बोध स्वकीय जो प्रकाश रूप बोध को उसमें प्रवेश करता हुआ घटादिकों का भी अपने प्रकाश के भीतर किये गये दूसरे को प्रकाशित करता है । यह कहा जाता है कि जो नित्यत्व, व्यापित्व और अद्वैत तत्त्व है, इन सबों का प्रसंग बलात् ही आ पड़ेगा, वही दोष अपने पक्ष का उपमर्दन करने के कारण आ जाता है इससे डरपोक आत्मवादी ने यदि ज्ञान को जडरूप मात्र स्वीकार कर लिया, तब तो नील पदार्थ जैसे पीत को प्रकाशित नहीं करता है, उसी प्रकार ज्ञान भी तो अपने से भिन्न पदार्थ को प्रकाशित नहीं कर सकेगा। अब प्रश्न उठता है कि अग्नि आदि जड भी तो वस्तु-पदार्थ को प्रकाशित करते हैं, ऐसी बात नहीं है, प्रकाश के रहने पर ही तो इन दीप, सूर्य, रत्न, प्रभा आदि से प्रकाश निकलता है, प्रभाता के रहने पर ही अर्थ का प्रकाश होता है, न रहने पर नहीं होगा, सैकड़ो प्रदीप के प्रज्ज्वलित करने पर भी जो अर्थ नहीं भासता था वह ज्ञान से वैसा ही क्यों भासने लगता है, जो पदार्थ जातीय सन्निधान के रहने पर जैसा नहीं होता है वह उस विलक्षण जातीय सन्निधान के सम्पर्क में आ जाने पर वैसा ही हो जाता है, जैसे- शीतल जल एवं हिमवायु के सन्निधान में घट अरक्त अनुभूत होता था, वही ऊष्ण- वह्नि की सन्निधि पाकर रक्त [ लाल ] रूप में अनुभूत हो रहा है । जड पदार्थों के साथ में दिखता
अ.-१, आ.-२, का.-८ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ४३ तर्हि परस्यापि अदो न प्रकाशः, स्वप्रकाशरूपावेशनं हि असौ परस्य विदधत् बोधः प्रकाशो भवति परस्यापि, ततः स्वपरप्रकाशताशून्यो न असौ अर्थस्य प्रकाशः स्यात्, भावान्तरवत् ॥ ७ ॥ जडोऽपि असौ इत्थम् अर्थस्य प्रकाशो भविष्यति — इति सांख्यमतम् आशङ्कते— अथार्थस्य यथा रूपं धत्ते बुद्धिस्तथात्मनः । चैतन्यं इह तावत् अर्थं जानामि — इत्यस्ति व्यवहारः । तत्र अर्थस्य प्रकाशः — इति एतावत्- परमार्थः । तत् न अर्थस्य स्वं रूपं, सर्वं प्रति तथात्वप्रसङ्गात्, न कंचित्प्रति वा — इति सर्वज्ञम् अज्ञं वा जगत् स्यात् । नापि अर्थे अन्यत एतद्रूपम् उपनिपतितम्, एष एव हि दोषः स्यात् । तत् नूनम् अन्यत्रैव अयं धर्मः तत्त्वान्तरे, तत्रापि कथम् अर्थस्य प्रकाशः स्यात् — इति नूनं तत्र तत्त्वान्तरे सोऽर्थः प्रतिबिम्बत्वेन उपसंक्रामति । तत् तत्त्वान्तरं सत्त्वप्रधानत्वात् प्रतिबिम्बोपग्रह- बोध नहीं हो पायेगा जिस कारण से यह अपना स्वप्रकाश बोध उसमें प्रवेश कर दूसरे घटादि को भी स्वप्रकाश से प्रकाशित करता हुआ अपने भीतर दूसरे का भी प्रकाश करता है । स्वप्रकाश का यही लक्षण है कि—अपने आपको प्रकाशित करता हुआ अन्य घटादि का भी अच्छी तरह प्रकाश करावे । यदि अपने को प्रकाशित करने में असमर्थ है तो अर्थ को भी प्रकाशित नहीं कर सकता । जैसे—एक पदार्थ दूसरे पदार्थ को प्रकाशित नहीं कर सकता ॥ ७ ॥ इस प्रकार जड भी अर्थ का प्रकाश करेगा—अब सांख्यदर्शन के सिद्धान्त की शंका लेकर कहते हैं— जैसे घट-प्रकाश में बुद्धि रूप को ग्रहण करती है उसी प्रकार आत्मा का चैतन्य प्रकाशक है..… पहले यही होता है कि मैं अर्थ को जानता हूँ—ऐसा व्यवहार होता है । तब अर्थ का प्रकाशक ज्ञान मानना पड़ेगा, यही निचोड़ है । इसलिए अर्थ का अपना रूप कुछ भी नहीं है; ज्ञान उसका रूप नहीं है, ज्ञान आत्मा का रूप है, यदि पदार्थ में स्वयं जनाने की शक्ति होती तो सभी को जनाया करता; सब के लिए वैसा ही प्रसङ्ग आजायेगा, अथवा किसी को कुछ भी नहीं कह सकते हो—इस प्रकार यह जगत् सर्वज्ञ या मूर्ख हो जायेगा । अर्थ में किसी दूसरी जगह से रूप नहीं आता है, क्योंकि यही दोष होगा । तब तो निश्चय ही अन्यत्र दूसरे तत्त्व में यही धर्म आजायेगा, क्योंकि ज्ञान और पदार्थ एक वस्तु नहीं है, दूसरे तत्त्व में कैसे अर्थ का प्रकाश संभव होगा—इसलिए निश्चित वहाँ पर वह अर्थ अन्य तत्त्व में प्रतिबिम्बित होकर संक्रान्त हो जाता है । ज्ञान अन्य तत्त्व के सत्त्व गुण की प्रधानता से प्रतिबिम्ब ग्रहण करने हुआ भी अजड जातीय का प्रकाश द्योतित करता है, इससे विपरीत होने में कोई कारण नहीं दिखता है । बाधक प्रमाण से व्याप्ति की सिद्धि में स्वभाव ही कारण होता है । अनुभवनिष्ठ निश्चयात्मक ज्ञान में जो किसी अन्य की उपेक्षा न रखने वाली विश्रान्ति है, वे नीलादि विषयों में व्यवस्थितियाँ विविधता- पूर्वक असंतीर्ण रूप से रहने वाली हैं, वे अचेतन-जड अर्थों की व्यवस्था कैसे करेंगे ?