ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-२, का.-७ पराभ्युपगमेन प्रसङ्गापादनम् एतत् पूर्वपक्षवादी करोति-प्रसङ्गविपर्यलाभो मे भविष्यति- इति । तत्र आत्मवादी नित्यत्वम् आत्मन इत्थं ब्रूते-इह कालो नाम इदंभावविशिष्टस्य विशेषण- ताम् अवलम्बमानः तं विशिष्टीकुर्वन् तत्संकोचात् अनित्यं संपादयति, आत्मनश्च चित्स्वभावत्वात् इदम्-इति प्रथनाभावेन विशेष्यत्वं नास्ति, विशेषणविशेष्यभावो हि योजकायत्तः, नच स्वप्रकाशे योजकान्तरम् अस्ति । स इत्थं ब्रुवाणः पर्यनुयुज्यते- 'ज्ञानमपि' तर्हि स्वप्रकाशम्-इति, तत्रापि एषैव वार्ता-इति । तदपि कस्मात् न नित्यम् ?, नच द्वयोर्नित्ययोः कश्चित् संबन्धः, कार्यकारण- भावो हि असौ नान्यः, तत आत्मनो ज्ञानं शक्तिः-इति अवसन्नम् अदः । अथ न स्वप्रकाशं ज्ञानं, दूसरे के सिद्धान्त को मानकर पूर्वपक्षी प्रसंग उठाते हैं कि प्रसंग से विपरीत लाभ मुझे प्राप्त होगा अर्थात् जिसने नित्य रूप आत्मा माना है ऐसे सिद्धान्ती को उससे उलटा अनित्यत्व का लाभ होगा । आत्मतत्त्व की सत्ता को माननेवाले सिद्धान्ती लोग आत्मा का अस्तित्व इस प्रकार से कहते हैं- काल उसी वस्तु का नाम है जो किसी वस्तु-पदार्थ का विशेषण होकर आता है और वस्तु-पदार्थ को विशिष्ट बनाता हुआ संकोच से उसे अनित्य बना देता है, संकोचित परिच्छिन्न भाव उसमें आ जाने से वह अनित्य हो जाता है और आत्मा चेतन रूप होने के कारण 'इदम्' यह परिच्छिन्न भाव आत्मा का विशेषण नहीं हो सकता है, क्योंकि विशेष और विशेषण ये दोनों संयोजक व्यक्ति के आधीन होता है, स्वप्रकाश आत्मा में कोई दूसरा योजक नहीं हो सकता है। ऐसा कहने पर पुनः उससे प्रश्न किया जाता है कि-'ज्ञानमपि' ज्ञान को भी प्रकाश कहो और उसे भी नित्य मानो, तब तो वहाँ पर भी वही बात हुई। वह ज्ञान भी क्यों न नित्य हो जाय ? ज्ञान और आत्मा ये दोनों यदि नित्य होंगे तो कोई सम्बन्ध नहीं बैठता । ज्ञान और आत्मा में कोई कार्य-कारण-भाव भी नहीं बनता है, इसलिए मानो कि आत्मा की शक्ति ज्ञान है। यह प्रसंग यहाँ पर समाप्त हुआ । यदि स्वप्रकाश ज्ञान नहीं होगा, तब तो फिर दूसरे घट-पटादि है उन सबों का १. 'अथ' इत्यादि से कारिका के द्वितीय अर्धभाग की व्याख्या करते हैं- यदि ज्ञान स्वप्रकाशरूप नहीं है, तो दूसरे घटादिकों का भी प्रकाश नहीं कर सकेगा, जिस कारण से वह बोध स्वकीय जो प्रकाश रूप बोध को उसमें प्रवेश करता हुआ घटादिकों का भी अपने प्रकाश के भीतर किये गये दूसरे को प्रकाशित करता है । यह कहा जाता है कि जो नित्यत्व, व्यापित्व और अद्वैत तत्त्व है, इन सबों का प्रसंग बलात् ही आ पड़ेगा, वही दोष अपने पक्ष का उपमर्दन करने के कारण आ जाता है इससे डरपोक आत्मवादी ने यदि ज्ञान को जडरूप मात्र स्वीकार कर लिया, तब तो नील पदार्थ जैसे पीत को प्रकाशित नहीं करता है, उसी प्रकार ज्ञान भी तो अपने से भिन्न पदार्थ को प्रकाशित नहीं कर सकेगा। अब प्रश्न उठता है कि अग्नि आदि जड भी तो वस्तु-पदार्थ को प्रकाशित करते हैं, ऐसी बात नहीं है, प्रकाश के रहने पर ही तो इन दीप, सूर्य, रत्न, प्रभा आदि से प्रकाश निकलता है, प्रभाता के रहने पर ही अर्थ का प्रकाश होता है, न रहने पर नहीं होगा, सैकड़ो प्रदीप के प्रज्ज्वलित करने पर भी जो अर्थ नहीं भासता था वह ज्ञान से वैसा ही क्यों भासने लगता है, जो पदार्थ जातीय सन्निधान के रहने पर जैसा नहीं होता है वह उस विलक्षण जातीय सन्निधान के सम्पर्क में आ जाने पर वैसा ही हो जाता है, जैसे- शीतल जल एवं हिमवायु के सन्निधान में घट अरक्त अनुभूत होता था, वही ऊष्ण- वह्नि की सन्निधि पाकर रक्त [ लाल ] रूप में अनुभूत हो रहा है । जड पदार्थों के साथ में दिखता