ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-२, का.-७ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ४१ यः 'स्मर्ता' सोऽपि शरीरसंतानो, ज्ञानसंतानश्च अध्यवसीयते, यथा 'द्रष्टा' । पूर्वं हि उक्तम्— 'अहंप्रतीतिरप्येषा शरीराद्यवसायिनी ।' ( १।२।२ ) इति । एवम् आत्मनि साधकं प्रमाणं प्रत्यक्षम्रनुमानं च पराकृतं, बाधकं च सूचितं—धर्मयोगे नित्यताहानिः, अन्यथा किं तेन । तदुक्तम्— 'वर्षातपाभ्यां किं व्योम्नश्चर्मण्यस्ति तयोः फलम् । चर्मोपमश्चेत्सोऽनित्यः खतुल्यश्चेदसत्समः ।।' इति ॥ ६ ॥ इत्थम् आत्मानं निराकृत्य, तस्य ऐश्वर्यमपि निराकर्तुं, ज्ञानशक्तिमेव परीक्षितुमाह— ज्ञानं च चित्स्वरूपं चेत् तद् अनित्यं किमात्मवत् । अथापि जडमेतस्य कथमर्थप्रकाशता ॥ ७ ॥ वाला है वह भी शरीर सन्तान-प्रवाह और ज्ञान-सन्तान-प्रवाह है, यही निश्चय किया जाता है। जैसा कि 'दृष्टा' हमारे यहाँ सन्तान-प्रवाह है। क्योंकि यह बात हमने पूर्व में ही कह दी है “अहं प्रतीतिरप्येषा शरीराद्यवसायिनी ।” (१-२-२) इस प्रकार आत्मा के विषय में साधक प्रमाण प्रत्यक्ष और अनुमान को हटा दिया, और बाधक प्रमाण को सूचित कर दिया। ज्ञानादि धर्म के योग होने पर नित्यता की हानि होगी, ये सभी नहीं रहेंगे तो, आत्मा भी नहीं रहेगा। इस विषय में कहा भी गया है— वर्षा और ताप से आकाश का क्या बिगड़ता है। चूँकि वर्षा और ताप का फल तो चमड़े पर पड़ता है। यदि आत्मा चमड़े के समान है तो फिर आत्मा अनित्य हो जायेगा एवं आकाश के समान है तो फिर नहीं के बराबर होगा ॥ ६ ॥ इस प्रकार आत्मा नाम की कोई वस्तु नहीं है, इस बात का निराकरण कर, उसके ऐश्वर्य निराकरणार्थ अब ज्ञान शक्ति की परीक्षा करने के लिए कहते हैं— यदि ज्ञान चित्स्वरूप है तो क्या वह आत्मा की तरह अनित्य है और यदि उसे जडरूप मानोगे तो फिर पदार्थों का प्रकाश कैसे करेगा ॥ ७ ॥ १. कल्पित जिसकी सिद्धि के लिए सम्भव नहीं होता है, तब फिर उसकी सिद्धि के लिए कल्पना नहीं हो सकेगी, जैसे अंकुर की सिद्धि के लिए आकाशपुष्प, इसलिए कोई नित्य आत्मा है—ऐसा मानना पड़ेगा, जो कि स्मरण का प्रतिसन्धान कराता है। इसमें कल्पना का नियमन करने वाला व्यापक ही होता है, नहीं तो, वह नहीं ठहर सकती, यदि वह समर्थ तभी उसकी सिद्धि के लिए कल्पना हो सकेगी। अन्यथा नहीं हो पायेगी। ऐसा न होने पर व्यापकत्व इसका विनष्ट ही हो जायेगा। इसीलिए इसकी सिद्धि के लिए कल्पना की जाती है और वह प्रभवविष्णु विषयत्व से व्याप्त है। इसी कारण व्यापकत्व नहीं दिखायी देता और व्यापक की अनुपलब्धि हो रही है। अतः 'वर्षातपाभ्यामिति' इस वाक्य से ऐसा कहा है। जिसके रहने पर ही दूसरे की कल्पना होती है। उसी को हेतु बनाकर सब जगह हेतु मानना चाहिए क्योंकि हेतुओं की अनवस्था हो जायेगी। ६