ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-२, का.-६ इह संस्कारे जायमाने, यदि आत्मनो विशेषः, स तर्हि अव्यतिरिक्तः—इति न नित्य आत्मा स्यात्; अथ न कश्चित् अस्य विशेषः, तेन तर्हि किम् । अथ संस्कार एव अस्य विशेषः, तर्हि न व्यतिरिक्तोऽसौ—इति, पुनरपि अनित्ये ज्ञाने संस्कारः—इत्यायातम् । अनुभवाद्द्विशिष्टं विशिष्टस्मृ- त्याख्यकार्यकारि ज्ञानं परम्परया जायते-इति इयानेव संस्कारार्थः । अथ संस्कारात्मा व्यतिरिक्तो विशेषः, तस्य तर्हि किमसौ । संबन्धश्च व्यतिरिक्तो निराकरिष्यते । एवं ज्ञानसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्न- धर्माधर्मा अपि विकल्पनीयाः । एतदाह—'ततः' इति आत्मनो 'भिन्नेषु धर्मेषु' अङ्गीक्रियमाणेषु तेषु सत्स्वपि, आत्मनः 'स्वरूपे' विशेषाभावात् स तावत् आत्मा स्मृतौ न व्याप्रियेत, अस्मर्तृरूपा- संस्कृतरूपादिप्राच्यरूपानपायात्—इति 'संस्कारादेव स्मृतेः सिद्धिः'—इति । अहं स्मरामि—इति अनित्य संस्कार जिसमें उत्पन्न हो जाय वह भी अनित्य क्यों न हो जाय, वह आत्मा तो संस्कार से भिन्न नहीं हुआ, इसीलिए आत्मा भी नित्य नहीं होगा; इसमें कोई विशेषता नहीं हुई, उस आत्मा से क्या लाभ होगा, संस्कार ही इसकी यदि विशेषता मानी जाय, तो वह आत्मा संस्कार से भिन्न नहीं हुआ; फिर भी अनित्य ज्ञान में संस्कार होता है यही बात सिद्ध हुई । अनुभव से विशिष्ट ज्ञान और विशिष्ट ज्ञान से स्मृति नामक कार्य करनेवाला ज्ञान परम्परा द्वारा उत्पन्न होता है, यही सब संस्कार का अर्थ है। यह संस्काररूप आत्मा भिन्न विशेष हुआ, उस संस्कार का आश्रय आत्मा कैसे बनेगा। और इन दोनों का सम्बन्ध भी भिन्न नहीं मानेंगे । इस प्रकार ज्ञान, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म को भी मानना होगा। इसी बात को लेकर कहा है कि 'ततः' आत्मा के 'भिन्नेषु धर्मेषु' भिन्न-भिन्न धर्मों को स्वीकार करने पर भी आत्मा के 'स्वरूपे' स्वरूप में कोई भेद न होने के कारण वह आत्मा स्मृति में सम्मिलित नहीं होगा, स्मरणकर्ता होने से, संस्काररूप पूर्व का धर्म न होने से, इसी कारण 'संस्कार से ही स्मृति होती है' यह बात सिद्ध हुई । स्मरण करता हूँ; जो स्मरण करने मैत्र को स्मृति हुई हो अर्थात् चैत्र-मैत्रादि प्रमाताओं के भेद होने के कारण ऐसा वृतान्त नहीं देखने में आया है । इसलिए अनुभव और संस्कार के अभेद को मानना पड़ता है, और वह स्वरूप से तो उपलब्ध होता नहीं देखा जाता है विलक्षण स्वभाव वाला होने के कारण—अतः आश्रय एक रहता है और अनुभव एवं संस्कार में आश्रय के द्वारा अभेद की सिद्धि हो जाने पर तो सुखादिकों की भी प्रतिसन्धि सिद्ध हो जाती है । इसलिए संस्कार का आश्रय एकमात्र आत्मा ही है और एक होने के कारण जो स्थिर है वही आत्मा है । पूर्वपक्षी के मत को लेकर शंका खड़ी करते हैं—आत्मा में संस्कार के अनुदित होने से तो पूर्व के समान अनित्य ही हो जायेगा, इसलिए संस्कार से ही पूर्वोक्त युक्ति से स्मृति की सिद्धि हो जाती है । जो कि मैं स्मरण करने वाला हूँ—ऐसा भासता है, तब तो अहं प्रतीति जो उसमें हो रही है वह आत्मा नहीं है क्षणिकता एवं अस्थिरता के कारण, वेद्य-वेदन से भिन्न कोई द्रष्टा या स्मर्ता रूप नहीं दिखायी देता है । संस्कार का उदय होने पर भी स्मृति में कोई बाधा नहीं पड़ती है उदित संस्कार होने पर तो उसके स्वरूप को अंश मात्र से भी विलक्षणता होने के कारण तथा वैलक्षण्य भाव तो संस्कार में ही रहता है यदि भिन्न होकर तो पूर्वापरी भाव नहीं बन सकता है क्योंकि तब तो अनित्य हो जायेगा भिन्न रहने पर तो वह कुछ भी नहीं रहेगा । इसलिए संस्कार का कुछ भी आश्रय न होने से स्मृति की उपपत्ति में बाधा पड़ेगी ।