भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

पृष्ठ 62, कुल 343 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 62

अ.-१, आ.-२, का.-५-६ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ३९ अनुभवेन हि संस्कारो जन्यते स्वोचितः, संस्कारश्च प्राक्तनरूपां स्थितिं स्थापयति, आकृष्ट- शाखादेश्चिरसंवर्तितस्य विवर्त्यमानस्य भूर्जादेः । तेन अत्रापि संस्कारः तां स्मृतिं पूर्वानुभवानु- कारिणीं करोति—इति तद्विषय एव स्मृतेर्विषयः ॥ यद्येवमन्तर्गण्डुना कोऽर्थः स्यात्स्थायिनात्मना ॥ ५ ॥ एवं तर्हि ‘अन्तर्गण्डुः’ यथा आयासाय परं, तद्वत् आत्मा स्थिरः कल्पनायासमात्रफलः— इति किं तेन, सर्वं हि संस्कारेण जगद्व्यवहारकुटुम्बकं कृतकरावलम्बम्—इति ॥ ५ ॥ ननु तस्यैव संस्कारस्य आश्रयो वक्तव्यः, स हि गुणत्वाद् आश्रयम्पेक्षते, य आश्रयः स आत्मा स्यात्—इत्याशङ्क्योचाह— ततो भिन्नेषु धर्मेषु तत्स्वरूपाविशेषतः । संस्कारात्स्मृतिसिद्धौ स्यात्स्मर्ता द्रष्टेव कल्पितः ॥ ६ ॥ अनुभव से संस्कार उत्पन्न होता है, यही उचित भी है। जैसा हमारा देखा रहेगा वैसा ही संस्कार होता है और वही संस्कार पूर्वकालीन स्थिति को स्थिर रखता है। किसी शाखा को खींचकर बड़ी देर तक रोके रखें तो भी वह बाद में जब छोड़ देते हैं तब पुनः अपने स्थान पर चली जाती है। इसलिए यहाँ पर भी संस्कार उस स्मृति को पूर्व अनुभव के अनुसार ही कराता है, अनुभव का विषय ही स्मृति का विषय है। यदि ऐसी बात है तो केवल संस्कार से काम चल जायेगा एक स्थायी आत्मा को मानने से कौन सा प्रयोजन सिद्ध होनेवाला है। घेघ बढ़े हुए गले के रोग के समान व्यर्थ ही आत्मा की सत्ता मानना है ॥ ५ ॥ जैसे 'घेघ' गले का फूल जाना केवल पीड़ा ही देता है, उसी प्रकार आत्मा को स्थिर मानना केवल कल्पना का कष्ट सहना है। उस आत्मा से क्या प्रयोजन सिद्ध होगा, समस्त जगत का व्यवहार-परिवार संस्कार से ही हाथ में आजायेगा ॥ ५ ॥ 'ननु' कहकर प्रश्न करते हैं कि तब फिर उस संस्कार का आश्रय कौन है यह कहना होगा, वही संस्कार गुण होने के कारण अपने आश्रय द्रव्य की अपेक्षा रखता है। उसका आश्रय द्रव्य है वही आत्मतत्त्व है—ऐसी आशङ्का कर उत्तर में कहते हैं कि—भिन्न-भिन्न धर्मों के रहते हुए आत्मा के स्वरूप में भेद न होने से संस्कारमात्र से ही स्मृति सिद्ध हो जाने पर द्रष्टा के समान स्मरण करनेवाला भी वही आत्मा है ॥ ६ ॥ १. जो संस्कार धर्मरूपी गुण है वह स्वतन्त्र नहीं होता है—इसका कोई न कोई धर्मी अवश्य होगा, यदि ज्ञान-सन्तान को ही संस्कार का धर्मी मान लिया जाये, तो पहले ज्ञानों से भिन्न कोई सन्तान ही नहीं बन पाता है जिससे ज्ञान सन्तान हो सके, यदि वह सन्तान ज्ञानों में ही संस्कार रूप से रहता है तो भी ऐसा कहना संगत नहीं हो सकता, अन्यत्र किया हुआ अनुभव का विषय, किसी अन्य में संस्कार रूप होकर स्मृति को पैदा नहीं कर सकता है, यह लोक में प्रसिद्ध नहीं है कि चैत्र को अनुभव हो और