ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-२, का.-८ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ४३ तर्हि परस्यापि अदो न प्रकाशः, स्वप्रकाशरूपावेशनं हि असौ परस्य विदधत् बोधः प्रकाशो भवति परस्यापि, ततः स्वपरप्रकाशताशून्यो न असौ अर्थस्य प्रकाशः स्यात्, भावान्तरवत् ॥ ७ ॥ जडोऽपि असौ इत्थम् अर्थस्य प्रकाशो भविष्यति — इति सांख्यमतम् आशङ्कते— अथार्थस्य यथा रूपं धत्ते बुद्धिस्तथात्मनः । चैतन्यं इह तावत् अर्थं जानामि — इत्यस्ति व्यवहारः । तत्र अर्थस्य प्रकाशः — इति एतावत्- परमार्थः । तत् न अर्थस्य स्वं रूपं, सर्वं प्रति तथात्वप्रसङ्गात्, न कंचित्प्रति वा — इति सर्वज्ञम् अज्ञं वा जगत् स्यात् । नापि अर्थे अन्यत एतद्रूपम् उपनिपतितम्, एष एव हि दोषः स्यात् । तत् नूनम् अन्यत्रैव अयं धर्मः तत्त्वान्तरे, तत्रापि कथम् अर्थस्य प्रकाशः स्यात् — इति नूनं तत्र तत्त्वान्तरे सोऽर्थः प्रतिबिम्बत्वेन उपसंक्रामति । तत् तत्त्वान्तरं सत्त्वप्रधानत्वात् प्रतिबिम्बोपग्रह- बोध नहीं हो पायेगा जिस कारण से यह अपना स्वप्रकाश बोध उसमें प्रवेश कर दूसरे घटादि को भी स्वप्रकाश से प्रकाशित करता हुआ अपने भीतर दूसरे का भी प्रकाश करता है । स्वप्रकाश का यही लक्षण है कि—अपने आपको प्रकाशित करता हुआ अन्य घटादि का भी अच्छी तरह प्रकाश करावे । यदि अपने को प्रकाशित करने में असमर्थ है तो अर्थ को भी प्रकाशित नहीं कर सकता । जैसे—एक पदार्थ दूसरे पदार्थ को प्रकाशित नहीं कर सकता ॥ ७ ॥ इस प्रकार जड भी अर्थ का प्रकाश करेगा—अब सांख्यदर्शन के सिद्धान्त की शंका लेकर कहते हैं— जैसे घट-प्रकाश में बुद्धि रूप को ग्रहण करती है उसी प्रकार आत्मा का चैतन्य प्रकाशक है..… पहले यही होता है कि मैं अर्थ को जानता हूँ—ऐसा व्यवहार होता है । तब अर्थ का प्रकाशक ज्ञान मानना पड़ेगा, यही निचोड़ है । इसलिए अर्थ का अपना रूप कुछ भी नहीं है; ज्ञान उसका रूप नहीं है, ज्ञान आत्मा का रूप है, यदि पदार्थ में स्वयं जनाने की शक्ति होती तो सभी को जनाया करता; सब के लिए वैसा ही प्रसङ्ग आजायेगा, अथवा किसी को कुछ भी नहीं कह सकते हो—इस प्रकार यह जगत् सर्वज्ञ या मूर्ख हो जायेगा । अर्थ में किसी दूसरी जगह से रूप नहीं आता है, क्योंकि यही दोष होगा । तब तो निश्चय ही अन्यत्र दूसरे तत्त्व में यही धर्म आजायेगा, क्योंकि ज्ञान और पदार्थ एक वस्तु नहीं है, दूसरे तत्त्व में कैसे अर्थ का प्रकाश संभव होगा—इसलिए निश्चित वहाँ पर वह अर्थ अन्य तत्त्व में प्रतिबिम्बित होकर संक्रान्त हो जाता है । ज्ञान अन्य तत्त्व के सत्त्व गुण की प्रधानता से प्रतिबिम्ब ग्रहण करने हुआ भी अजड जातीय का प्रकाश द्योतित करता है, इससे विपरीत होने में कोई कारण नहीं दिखता है । बाधक प्रमाण से व्याप्ति की सिद्धि में स्वभाव ही कारण होता है । अनुभवनिष्ठ निश्चयात्मक ज्ञान में जो किसी अन्य की उपेक्षा न रखने वाली विश्रान्ति है, वे नीलादि विषयों में व्यवस्थितियाँ विविधता- पूर्वक असंतीर्ण रूप से रहने वाली हैं, वे अचेतन-जड अर्थों की व्यवस्था कैसे करेंगे ?