भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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४४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-२, का.-८ योग्यं तमसाऽऽच्छादितत्वात् सकलप्रतिबिम्बनतो व्यावर्तितनं, भागे रजसा तमसोऽपसारणात् किंचिदेव प्रतिबिम्बकं गृह्णाति, तदेव बुद्धितत्त्वम् उच्यते । अर्थप्रतिबिम्बोपग्रहश्च ज्ञानम् अस्य वृत्तिरूपं पूर्वव्यपदेशतिरोधायकदध्यादिपरिणामदिलक्षणपरिणतिविशेषात्मकम् । एवम् 'अर्थस्य' तावत् 'रूपं बुद्धिः' धारयति । इयच्च सत्त्वादीनां सुखदुःखमोहतया भोग्यत्वात् जडम्—इति दर्पणवत् अप्रकाशम् । नच भोग्यस्य अप्रकाशस्य तद्विरुद्धभोक्तृतारूपप्रकाशात्मकस्वभावसंभवो युक्त्यनुपाती—इति तद्विलक्षणेन भोक्त्रा भवितव्यम् । स च प्रकाशः—इत्येतावत्स्वभावः, स्वभा- वान्तरं हि अप्रकाशरूपं भोग्यं कथं भोक्तुः स्वभावतया संभाव्येत । स च प्रकाशमात्रस्वभावत्वेनैव यदि विश्वस्य प्रकाशः, तर्हि विश्वं युगपदेव प्रकाशेत, घटप्रकाशोऽपि पटप्रकाशः स्यात्—इति विश्वं संकीर्येत । स च अर्थात् अर्थप्रतिबिम्बात्, तदाधाराच्च बुद्धितत्त्वात् अन्यः कथम् अर्थस्य प्रकाशः स्यात्, असंबन्धात् । तस्मात् बुद्धिरेव स्वच्छत्वात् प्रकाशप्रतिबिम्बमपि परिगृह्णाति । ततः प्रकाशः प्रतिबिम्बपरिग्रहमहिमोपन्नतप्रकाशावेशबुद्धितत्त्वावेशितप्रतिबिम्बकनोलाद्यर्थपर्यन्तसंक्रान्तेः प्रका- योग्य हो जाता है, अज्ञानरूपी अन्धकार से ढके रहने के कारण सम्पूर्ण प्रतिबिम्ब से हट जाता है, रजोगुण से तमोगुण हटा देने के कारण थोड़े कुछ अंश में ही प्रतिबिम्ब ग्रहण करनेवाला होता है—इसी को बुद्धितत्त्व कहा जाता है । और अर्थ के प्रतिबिम्ब को उपग्रहण करने वाला ज्ञान इसका वृत्तिरूप परिणामविशेष पूर्व की स्थिति को बदलकर दधि इत्यादि पदार्थरूप में परिणत हो जाता है । इस प्रकार 'अर्थस्य' अर्थ के 'रूपं बुद्धिः' रूप को बुद्धि धारण करती है । और इतना ही जोवों का सुख, दुःख और मोह जनक होने के कारण भोग्य जड कहलाता है— इसलिए पदार्थ दर्पण की भाँति प्रकाश नहीं करता है। भोग्य प्रकाशक नहीं है, किन्तु भोक्ता आत्मा हो प्रकाशक है; क्योंकि सत्त्व प्रकाश बाहरी आलोक के समान जड है और भोग्य जड पदार्थ होनेके कारण प्रकाशक नहीं हो सकता उसमें स्वयं प्रकाश का अभाव रहता है; किन्तु भाक्ता आत्मा हो प्रकाशक है भोग्य पदार्थ के विरुद्ध भोक्ता रूप प्रकाश स्वभाव से ही युक्तिरूप भोग्य से मिले हुए होने के कारण भोग्य से विलक्षण ही कोई अवश्य भोक्तारूप आत्मा है— ऐसा समझना चाहिए। अप्रकाश जो भोग्य पदार्थ है उसके विरुद्ध स्वभाववाला भोक्ता होता हुआ भी उससे विलक्षण भोक्ता नहीं हो सकता है; जब कि होना चाहिए। और भोक्ता का स्वभाव तो प्रकाश है; क्योंकि दूसरा स्वभाव जो अप्रकाश भोग्य है वह भोक्ता का स्वभाव कैसे हो सकता है अर्थात् यह बात नहीं घट सकती है। जैसे अन्धकार प्रकाश नहीं हो सकता है और न तो प्रकाश ही अन्धकार हो सकेगा और वह प्रकाश मात्र स्वभाववाला होने के कारण यदि सारे विश्व का प्रकाशक है तो फिर वह एक ही साथ सारे के सारे विश्व को प्रकाशित कर दे, अपने स्वप्रकाश से, ऐसी स्थिति में तो घट प्रकाश भी पट का प्रकाशक हो जायेगा यूँ हि सारा का सारा विश्व संकीर्ण होता चला जायेगा । अर्थात् एक दूसरे आपस में मिल जायेंगे और वे भोक्ता अर्थ के प्रतिबिम्ब से; उसके आधार बुद्धितत्त्व से भिन्न होने के कारण अर्थ को प्रकाशित कैसे करेंगे ? क्योंकि उसके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है । इसीलिए बुद्धि ही स्वच्छ-निर्मल स्फटिक जैसी होने के कारण प्रकाश के प्रतिबिम्ब को ग्रहण करती है । उसके बाद प्रकाश के प्रतिबिम्ब को ग्रहण करने के प्रभाव से आया हुआ प्रकाश का प्रवेश है जो कि बुद्धितत्त्वमें प्रतिबिम्बित