भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

पृष्ठ 68, कुल 343 में से

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अ.-१, आ.-२, का.-८ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ४५ शावेशस्य अर्थः प्रकाशते—इति सिद्धो व्यवहारः । तदेवं ज्ञानं जडबुद्धितत्त्वाव्यतिरेकात् जडमपि चित्प्रतिबिम्बयोगात् विषयस्य प्रकाशः—इति । एतदेव तावत् अनुचितम्—यत् प्रकाशात्मा पुमान् बुद्धौ प्रतिबिम्बम् अर्पयति, समानगुणे बिम्बकापेक्षया च विमले प्रतिबिम्बसंक्रान्तिदर्शनात्, रूपवति आदर्श घटरूपप्रतिबिम्बवत्; आत्मबुद्धयोश्च अतिवैलक्षण्यम्, आत्मापेक्षया च न बुद्धि- र्विमला, तत् भवतु तावत् एतत्—इति 'अथ'शब्देन सूचयति । किंतु प्रतिबिम्बवादेनापि न किंचित् प्रतिसमाहितं भवेत्—इति दर्शयति अजडा सैवं जाड्ये नार्थप्रकाशता ॥ ८ ॥ चैतन्यप्रतिबिम्बयोगे यदि तावत् तत्प्रतिबिम्बकमपि मुख्यं प्रकाशरूपमेव न भवति, तेनापि न किंचित् कृतं स्यात्; नहि प्रतिबिम्बितवह्निपुञ्ज आदर्शो दाह्यं दहेत् । अथ मुख्यप्रकाशरूपमेव तत्प्रतिबिम्बकं, तत् तर्हि बुद्धेरव्यतिरिक्तम्—इति मुख्यप्रकाशरूपैव बुद्धिर्जाता--इति, यतो विरुद्धधर्माध्यासात् भीरुभिः एतत् कल्पितं स एव पुनः जाज्वल्यमानं निजम् ओजो जृम्भयति, हुआ था वही नीलादि पदार्थ पर्यन्त कायम रहने से, प्रकाश में आवेश विद्यमान होने से पदार्थ प्रकाशित होता है; इस प्रकार यह सारा का सारा जगत्-व्यवहार चलता रहता है । ठीक वैसे ही ज्ञान भी जड बुद्धितत्त्व से भिन्न न होने के कारण जड होता हुआ भी चित्प्रतिबिम्ब के योग से विषय को प्रकाशित करता है । यही समुचित नहीं है—[ बुद्धि में चेतनता और आत्मा में कर्तृता का आ जाना ] जिससे प्रकाशरूप पुरुष बुद्धि में प्रतिबिम्ब अर्पण करता है, इसी का नाम ‘अन्योन्याध्यास’ है और सत्त्वगुण में बिम्ब की अपेक्षा से ही शुद्ध निर्मल में प्रतिबिम्ब के संक्रमण का दर्शन होता है, जैसे रूपवाले दर्पण में घटरूप का प्रतिबिम्ब होता है; और आत्मा की अपेक्षा से बुद्धि निर्मल नहीं है, इसलिए यह मान लिया जाय । यह ‘अथ’ शब्द से सूचित किया जाता है । किन्तु सौत्रान्तिक लोग इस विषय में कुछ समाधान नहीं दे सकते हैं—इस विषय में दिखाया जाता है— इस प्रकार चैतन्य के प्रतिबिम्ब योग से वह बुद्धि अजड-संविद्रूप हो जाती है; क्योंकि जडता में अर्थप्रकाशता नहीं रहती है ॥ ८ ॥ उसमें चैतन्य का प्रतिबिम्ब योग रहने पर प्रतिबिम्बवाला भी मुख्य प्रकाशरूप नहीं हो सकता है, उससे फिर कुछ कार्य-सम्पादन करना भी असम्भव होगा; जैसे—अग्नि का प्रतिबिम्ब दर्पण में पड़ता है तो भी उसका प्रतिबिम्ब किसी वस्तुपदार्थ को जला नहीं सकता, उस चैतन्य का प्रतिबिम्ब मुख्यप्रकाशरूप ही है फिर भी कार्य नहीं करता है और वह प्रतिबिम्ब तो बुद्धि से भिन्न नहीं है, बुद्धि मुख्यप्रकाशरूप ही हो जाती है, क्योंकि विरुद्ध धर्म के अध्यास से भीरु लोगों ने ऐसी उलटी कल्पना कर ली है । वही पुनः अपना अत्यन्त उत्कट जाज्वल्यमान प्रकाश १. भोग्य पदार्थ में भोक्ता का अध्यास अथवा अचिद्रूप में चिद्रूपता का अध्यास कर लेना ही विरुद्ध धर्म का अध्यास कहा जाता है । इसलिए सांख्यों ने प्रकाश प्रतिबिम्ब वाले की कल्पना कर ली है ।

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