ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-२, का.-८ ततश्च सा बुद्धिरेव चिन्मयी स्यात्, किं पुरुषेण । एवम् अर्थप्रतिबिम्बकद्वारेण अर्थमयी--इत्यपि आयातो विज्ञानवादः । कुत एव अस्याः तद्रूपत्वम् ? --इति, पूर्वकारणपरम्परातः--इति उत्तरं वाच्यम् । एवं सैव चेत् चिद्रूपा, प्राग्वत् नित्यताप्रसङ्गः; न चेत् चिद्रूपस्यापि नित्यता, र्तार्ह आत्मा न नित्यः कश्चिदस्ति, यस्य ज्ञानं नाम शक्तिः स्यात्-इति ज्ञानमात्रमेव अस्ति । योऽर्थ- प्रकाशरूपो बोधो, यश्च विकल्पस्मृत्यादिरूपः, तावता अर्थव्यवहारसिद्धेः--इति प्रसङ्गविपर्ययलाभे 'ज्ञानं च चित्स्वरूपं चेत्' इत्यादेः श्लोकद्वयस्य तात्पर्यम् ॥ ८ ॥ एवं ज्ञानं परीक्ष्य, क्रियां परीक्षते- फैलाता है, इसी कारण बुद्धि ही चिन्मय हो जाती है, पुरुष से कौन सा प्रयोजन फिर सिद्ध होने वाला है जब बुद्धि ही अपना कार्य सम्पादन कर लेती है । एवं पदार्थ के प्रतिबिम्ब को द्वार बनाकर बुद्धि पदार्थविषयक हो गयी, इस ढंग से भी विज्ञानवाद आ जाता है । विज्ञानवादियों में निराकार ज्ञान का अर्थप्रतिबिम्ब द्वारा साकारतापन बन जाना ही माना है और यह योगाचार मतवाले भी मानते हैं। इसलिए यह कैसे चेतनरूपता हो सकती है ? पूर्व कारण परम्परा से चैतन्ययुक्त हो जाती है, यही उत्तर दे देना चाहिए । इस प्रकार यदि वह बुद्धि चैतन्य वाली है तब तो पहले के जैसा ही आत्मा नित्य है वैसा ही नित्यता का प्रसङ्ग बुद्धि में भी आ पड़ेगा । बुद्धि भी, आत्मा के जैसी नित्य हो जायेगी, चैतन्य के प्रतिबिम्ब योग से यदि अजड चिद्रूप की नित्यता मानोगे-तब तो, पुरुष नाम की कोई नित्य वस्तु हो नहीं रह जायेगी। ऐसी बुद्धि की नित्यता मानना कोई युक्तियुक्त नहीं बैठता है, जिस पुरुष की ज्ञान नाम की शक्ति सम्भव हो सकेगी जो स्वयं ज्ञानप्रकाशरूप हो है । जो कि अर्थप्रकाशवाला बोधात्मा है और विकल्प स्मृति वाला है, उतने से ही अर्थव्यवहार की सिद्धि हो जाती है। प्रसङ्ग से विपरीत लाभ "ज्ञानं चित्स्वरूपं चेत्" हो जाय इत्यादि जो दो श्लोक से कहा था उसका यही आशय है ॥ ८ ॥ इस प्रकार अब ज्ञान की परीक्षा कर क्रिया की परीक्षा करते हैं- १. विज्ञानवादी लोग निराकार ज्ञान की अर्थ के प्रतिबिम्ब द्वारा साकारता मानते हैं और यही योगाचार- वालों का भी मत है। इस विषय में कहा गया है- अथ स्वच्छतया पुंसो बुद्धिवृत्यनुपातिता । बुद्धेर्वा चेतनाकारसंस्पर्श इव लक्ष्यते ॥ एवं सति स्ववाचैव मिथ्यात्वं कथितं भवेत् । चिद्धर्मो हि मृषा बुद्धौ बुद्धिधर्मश्रितौ मृषा ॥ साकारज्ञानवादाच्च नातीवैष विशिष्यते । स्वपक्षः .........................................॥ पुरुष तत्त्व के स्वच्छ होने के कारण बुद्धिवृत्ति में प्रतिबिम्ब पड़ता है अथवा बुद्धि में चेतन आकार का संस्पर्श सा प्रतीत होता है। वही ज्ञान है; ऐसा मानने पर तो फिर अपने ही वचन से मिथ्यात्व सिद्ध कर देना होगा । जैसा कि बुद्धि में चित्तत्व का धर्म मिथ्या और चित्तत्त्व के धर्म में बुद्धित्त्व का मिथ्या होना, इससे साकारवादियों के सिद्धान्त में कौन सी विशेषता रही ?