ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-२, का.-९ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ४७ क्रियोप्यर्थस्य कायादेस्तत्तद्देशादिजातता । नान्याऽदृष्टेः इह परिस्पन्दरूपं तावत् गच्छति, चलति, पतति--इत्यादि यत् प्रतिभासगोचरः, तत्र गृहदेशगतदेवदत्तस्वरूपात् अनन्तरं बाह्यदेशवर्तिदेवदत्तस्वरूपम्--इत्येतावत् उपलभ्यते, नतु तत्स्वरूपातिरिक्तां कांचिद् अन्यां क्रियां प्रतीमः । 'देवदत्तो दिनं तिष्ठति' इत्यत्र तु प्रभातकाला- विष्टदेवदत्तस्वरूपं ततः प्रहरकालालिङ्गिततत्स्वरूपम्--इत्यादि भाति, 'दुग्धं परिणमते' इत्यत्र मधुरवस्तुरूपम् अम्लवस्तुरूपं द्रवरूपं कठिनरूपम्--इत्यादि । एवं तद्देशतया तत्कालतया तदा- कारतया च भाव एव भाति । सादृश्याच्च तत्र प्रत्यभिज्ञा भिन्नेऽपि कायकेशनखादाविव । देशा- न्तरान्यत्वे तु कालान्यत्वम् अवश्यंभावि देशकालान्यत्वेपि स्वरूपस्यैव देशत्वात्, कालभेदे च स्वरूपभेदात्, देशकालाकारा आकार एव यद्यपि पर्यवस्यन्ति, तथापि स्थूलदृष्ट्या अस्ति भेदः-- क्रिया भी शरीरादि पदार्थ के उन-उन स्थानों में गमनादि से उत्पन्न होती है। इससे अतिरिक्त दूसरा कुछ नहीं है; क्योंकि वह दृष्ट नहीं होता, यदि होता तो अवश्य किसी न किसी रूप में दृष्ट हो जाता । जो स्पन्दन, गमन, चलन और पतन इत्यादि क्रियाएँ हैं उनका बोध होता है, घर में रहनेवाला देवदत्त से भिन्न बाहर में रहनेवाला देवदत्त का ही स्वरूप है, उसमें अतिरिक्त दूसरी कोई क्रिया मालूम नहीं पड़ती है। 'देवदत्तो दिनं तिष्ठति' देवदत्त दिन भर बैठा रहता है यहाँ पर प्रभात काल से मिला हुआ देवदत्त का स्वरूप प्रहरकाल से मिला रहता है, ऐसा भासता है। 'दुग्धं परिणमते' दुग्ध दही के रूप में बदल जाता है इसमें दुग्ध अपने मधुर स्वभाव को छोड़कर अम्ल-खट्टापन को और तरलता से काठिन्यरूप प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार उस-उस देशरूप से, उस-उस कालरूप से और उस-उस आकार से पदार्थभाव ही भासता है। और सादृश्य-ज्ञान से तो वही यह है ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है। जैसे शरीर, केश और नखादि में प्रतिक्षण भिन्नता होने पर भी ये ही सभी हैं ऐसी ही एक प्रकार से प्रत्यभिज्ञा होती है कि वे ही शरीर, केश और नखादि हैं जो पहले हुए थे। देश आकार के अन्य रहने पर तो काल भी अवश्य बदल जाता है और देशकाल के भिन्न रहने पर भी स्वरूप उसी देश का होने से भिन्नता नही आयेगी, १. क्रिया की परीक्षा करने के लिए पहले तो उन मतावलम्बियों के सिद्धान्त में वस्तु का स्वरूप दर्शन होता है। उसके बाद कारक पद सिद्धि का कारण रूप क्रिया के कारण का ज्ञान होता है। उस क्रिया की अपेक्षा से कर्त्ता का जो सम्बन्धी ज्ञान है उसका स्मरण हो जाता है। व्यापार में जो अपनी क्रिया है उसके स्वरूप का बोध करना ही क्रिया है। जिसमें पूर्वोत्तर क्रमवृत्तियाँ रहती है। इस विषय में भर्तृहरि ने कहा है-- यावत्सिद्धमसिद्धं वा साध्यत्वेनाभिधीयते । आश्रितक्रमरूपत्वादभिधानं प्रतीयते ॥ गुणभूतैरवयवैः समूहः क्रमजन्मनाम् । बुद्धया प्रकल्पिताभेदः क्रियेति व्यपदिश्यते ॥