भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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इति, ते हि भेदेन बौद्धैरुच्यन्ते--इति तात्पर्यम् । एवं प्रत्यक्षेण न दृश्यते क्वचित् क्रिया, तदभावात् [ देवदत्त सम्बन्धी गमनात्मक क्रिया में देश का भेद है, बाहरी देश का सम्बन्ध और भीतरी देश का सम्बन्ध देवदत्त से सम्भव हो सकता है, कालभेद भी क्रमशः गमनादि क्रिया का अनुमेय होता है, और आकारभेद एवं स्वरूपभेद दूसरे का पर्यायवाची सम्भव हो सकता है, क्योंकि नील होता है, श्वेत होता है, शोभायमान होता है और प्रकाशित होता है, इसमें देवदत्त का स्वरूप भेद मालूम पड़ता है, गमनक्रिया में देश, काल और आकारादि के विषय में किसी का भो विवाद नहीं है। परिणाम क्रिया में तो मधुर-अम्लादि के स्वरूपभेद से ही कालभेद होता है, किन्तु उसमें भेद गोचर नहीं होता है। यद्यपि थोड़ी देर के लिए मान लो फिर भी तो देश की ही स्वरूपता है। अतः देशभेद का कालभेद से अनादर हो गया ] और कालभेद से स्वरूप में भेद आ जाता है। यद्यपि देश, काल और आकारवाली वस्तुएं केवल आकाररूप में संसक्त रहती हैं, फिर भी स्थूल दृष्टि को लेकर अवश्य उसमें भेद कुछ रहता है। देश, काल और आकार के ही भेद से बौद्ध लोग भेद मानते हैं यही अभिप्राय है। एवं प्रत्यक्ष प्रमाण से कोई क्रिया नहीं दृष्टिगोचर होती हुई दिखाई पड़ती है, प्रत्यक्ष प्रमाण के न रहने पर प्रत्यक्षमूलक अनुमान श्वेतं श्वेतत इत्येतच्छ्रैत्यत्वेन प्रकाशते । आश्रितक्रमरूपत्वादभिधानं प्रवर्तते ॥ कार्यकारणभावेन ध्वनतीत्याश्रितक्रमः । ध्वनिः क्रमनिबृत्तौ तु ध्वनिरित्येष कथ्यते ॥ इति । एवं-भूता च क्रिया आत्मनोऽस्येव गच्छति जानाति यतते - इति पूर्वापरीभूततत्तद्धर्मप्रतीतेः, अङ्गीकृता च ईश्वरात्मवादिभिः । यदाहुः ग्रन्थकारगुरुपादाः— ‘तदिच्छा तावती तावज्ज्ञानं तावत् क्रिया हि सा ।’ इति । ‘एवं न जातुचित् तस्य वियोगस्त्रितयात्मना । शक्या .................................... ॥’ इति । ‘घटादिग्रहकालेऽपि घटं जानाति सा क्रिया ।’ इत्यादि च । जितने भी सिद्ध या असिद्ध वस्तु पदार्थ है उन सबको साध्यरूप से ही कहा जाता है। क्रम का आश्रय लेने से उसका अभिधान ही मालूम पड़ता है। उन क्रमों के समूह को गुण रूपी अवयवों से बुद्धिपूर्वक कल्पित भेद मिटाकर एक क्रिया कही जाती है। सफेदी चमक रही है इसमें तो सफेदी रूप से क्रिया ही प्रकाशित हो रही है ऐसा कहा जाता है। कार्यकारण-भाव से क्रिया ही ध्वनित होती है यही आश्रित क्रम इसका है, और ध्वनि की निवृत्ति हो जाने पर तो ध्वनि रुक गयी ऐसा ही कहा जाता है। इस प्रकार क्रिया ही अपने आप में रहती है, जानती है और यत्न करती है। उन-उन धर्मों से पूर्वोत्तर क्षण में प्रतीत होती है, और ईश्वरात्मवादीने इसको माना भी है। ग्रन्थकार स्वयं इसे कहते हैं। इसलिए इच्छा और ज्ञान ही बाद में क्रिया बन जाते हैं ।' ‘इस प्रकार कभी भी उसका अभाव नहीं रहता; घटादि के ग्रहण काल में भी मैं घट को जानता हूँ—उसीका नाम क्रिया है ।'