ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 72, कुल 343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-२, का.-९ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ४९ तत्तत्पूर्वकेन अनुमानेन, कार्यं च ग्रामप्राप्त्याद्युत्तरक्षणरूपं तद्देशवस्तुरूपादि, — इति कार्यान्यथा- नुपपत्त्यापि न सा कल्प्या । एवं प्रत्यक्षानुमानाभ्यां तस्या अदृष्टिः, — इति साधकप्रमाणाभाव उक्तः, बाधकमपि आह— न साप्येका क्रमिकैकस्य चोचिता ॥ ९ ॥ तत्र पूर्वापररूपता क्षणानां, न तु स्वात्मनि किंचित् पूर्वम् अपरं वा, वस्तुमात्रं हि तत्, अतो विकल्पप्राणितं पूर्वापरीभूतत्वं क्रमरूपता क्रियाया लक्षणं न वस्तु किंचित् स्पृशति, ते हि क्षणा न अन्योन्यस्वरूपाविष्टाः — इति कथम् 'एका' क्रिया ?, क्रमो हि भेदेन व्याप्तः अभिन्ने तदभावात्, भेदस्य विरुद्धम् ऐक्यम् — इति कथं 'क्रमिका एका च' इति स्यात् ? । अथ एकत्र आश्रयेऽवस्थानात् एका, तत्रापि तत्क्षणातिरिक्तो न कश्चित् आश्रयोऽनुभूयते, क्षणा एव हि प्रबन्धवृत्तयो भान्ति । किंच तथाभूतैर्भिन्नदेशकालाकारैः क्रियाक्षणैराविष्ट आश्रयः कथमेकः प्रमाण से भी दृष्टिगोचर नहीं होती, और कार्य क्या वस्तु है दूसरे क्षण में ग्रामप्राप्ति और उस वस्तु का उस देश के अनुकूलरूप आदि माना जाता है, अन्यथा कार्य नहीं सिद्ध हो सकता, इसलिए क्रिया की कल्पना नहीं कर सकते हैं। उत्तर क्षण में होनेवाला ग्रामप्राप्तिरूप आदि जो भी कार्य है, उस देश वस्तुरूपादि का माना जाता है, अन्यथा कार्य की सिद्धि न होने से भी क्रिया की कल्पना असम्भव होगी। स्वस्थ देवदत्त दिन में भोजन नहीं करता है यहाँ पर जैसे स्थूलस्वरूप कार्य को देखकर रात्रि के भोजन की अवश्य अर्थापत्तिप्रमाण से अनुमान की कल्पना होती है उसी प्रकार यहाँ पर क्रिया की कल्पना नहीं कर सकते हो। इस प्रकार प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाण से क्रिया की प्रतीति दृष्टिगत नहीं होती, इससे साधक प्रमाण कहा गया। अब बाधक प्रमाण भी दिखाते हैं— ......'वह क्रिया भी एक नहीं होती; क्योंकि क्रिया तो अनन्त हैं और क्रमशः एक क्रिया का होना समुचित नहीं है ॥ ९ ॥ क्रिया में क्षणों की पूर्वोत्तररूपता रहती है किन्तु अपनी निजी क्रिया में कुछ पूर्वोत्तर- रूपता नहीं है। क्रिया तो केवल वस्तु का स्वरूप ही है, इसलिए विकल्प ही प्राण-जीवन है जिसका ऐसी आगे-पीछे होनेवाली क्रमरूपता यह क्रिया का लक्षण नहीं है जो किसी वस्तु-पदार्थ को स्पर्श करती हो, वे ही सभी क्षण एक दूसरे में नहीं मिली हुई हैं किन्तु भिन्न-भिन्न ही रहती हैं—तब तुम ही बताओ एक क्रिया कैसे होगी ? क्योंकि क्रम भेद से व्याप्त रहता है एक में क्रम का अभाव रहने से, भेद के विरुद्ध एकता है इस प्रकार कैसे 'क्रमिका एका च' एक भी हो और क्रमपूर्वक भी होगी ? इसके समाधान में कहते हैं कि एक आश्रय में रहने के कारण क्रिया एक है, उसमें उन क्षणों से भिन्न कोई आश्रय अनुभूत नहीं होता है; क्योंकि वे क्षण ही एकाकाररूप से प्रतीत होते हैं अन्य किसी की भी प्रतीति नहीं होती। यदि यह मानोगे तो इस प्रकार भिन्न देश, काल और आकारवाली क्रिया के क्षणों से युक्त आश्रय कैसे एक हो सकेगा ? इसी कारण 'देवदत्तोऽयम्' यह ७