भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

पृष्ठ 73, कुल 343 में से

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५० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-२, का.-१० स्यात् ?, अत एव 'देवदत्तोऽयं, स एव ग्रामं प्राप्तः' इति सादृश्यात् भवन्ती प्रत्यभिज्ञा न ऐक्यं वास्तवं गमयितुमलम् ॥ ९ ॥ एवं ज्ञानं क्रियां च परीक्ष्य, यस्मिन् सति ते संबद्धे सर्वज्ञत्व-सर्वकर्तृत्वरूपैश्वर्यप्रसाधनाय प्रभवतः, तं संबन्धं ध्वंसयितुं तद्विषयं प्रमाणाभावं तावदाह— तत्र तत्र स्थिते तत्तद्भवतीत्येव दृश्यते । नान्यन्नान्योऽस्ति संबन्धः कार्यकारणभावतः ॥ १० ॥ मृत्पिण्डे सति स्तूपकः, तत्र सति शिविको यावत् घटः—इत्येवं भावक्षणा एव उपलभ्यन्ते, न अधिकं किंचित् प्रत्यक्षेण अवभासते, नापि अनुमानेन—इति क्रियायामिव वाच्यम् । सर्वत्र आधाराधेयभावादौ अयमेव पन्थाः—पृथग्व्रकुण्डबदरक्षणानन्तरं निरन्तरात्मकविशिष्टकुण्ड- बदरोदयः इति । अयमेव च भावो भावान्तरेण सह नियतपूर्वापरतया विकल्पेन व्यवह्रियमाणः कार्यकारणभावः—इति अभिधीयते । नच ज्ञानक्रियाभ्यां सह आत्मनः कार्यकारणभावः आत्मनस्तत्कार्यत्वाभावात्, ज्ञानस्य च स्वसामग्रीकार्यत्वात्, क्रियायाश्च अभावात्,—इति न ज्ञानक्रियासंबन्धो यतो ज्ञातृत्व-कर्तृत्वे स्याताम् ॥ १० ॥ एवं प्रमाणं पराकृत्य, संबन्धे बाधकं सामान्यविशेषमुखेन निरूपयति— जिसने गाँव को प्राप्त कर लिया है। इस प्रकार सादृश्य ज्ञान होनेवाली 'प्रत्यभिज्ञा' एकता को जनाने में समर्थ नहीं हो सकती ॥ ९ ॥ इस तरह ज्ञान और क्रिया की परीक्षा कर जिसके रहने पर उन ज्ञान और क्रियाओं का सम्बन्ध सर्वज्ञत्व-सर्वकर्तृत्वरूप ऐश्वर्य प्रसाधनार्थ उत्पन्न होते हैं उस सम्बन्ध को ध्वंस करने के लिए सम्बन्ध के विषय में प्रमाण का अभाव बताते हैं— उस-उस कारण के रहने पर वह-वह कार्य होता है यही देखा जाता है । कार्य-कारणभाव से दूसरा कोई अन्य सम्बन्ध नहीं है ॥ १० ॥ मृत्पिण्ड के रहने पर दण्ड और दण्ड रहने पर शिविका [ डोरी जो तैयार हुए घट को चक्र से अलग करने के लिए रखी जाती है ] घट के तैयार होने तक, ये सभी भावरूपी क्षण ही उपलब्ध होते हैं, उससे कुछ अधिक वहाँ पर प्रत्यक्षरूप से अवभासित नहीं होता और जिस प्रकार से क्रिया में अनुमान कर लेते हो वैसा यहाँ पर अनुमान से भी काम नहीं होगा। इसी ढंग से आधार- आधेयभावादि फल रहा, जब पुनः कुछ क्षणों के बाद बेर फल रख दिया गया तब लगातार रूप से विशिष्ट कुण्डवाले बेर फल की व्युत्पत्ति होने लगती है और यही पदार्थभाव के बिना दूसरे भाव के साथ विकल्प द्वारा ठीक पूर्वोत्तर रूप से व्यवहार किया हुआ कार्य-कारणभाव कहा जाता है । ज्ञान और क्रिया के साथ आत्मा का कार्य-कारणभावरूप सम्बन्ध नहीं है; क्योंकि आत्मा उसका कार्य नहीं है । ज्ञान अपने उत्पादक सामग्री की अपेक्षा रखता है; क्रिया का भाव न होने से, इसीलिए ज्ञान और क्रिया का सम्बन्ध नहीं है जिससे ज्ञातृत्व-कर्तृत्व हो ॥ १० ॥ इस प्रकार सम्बन्ध में साधक प्रमाण को हटाकर, अब सम्बन्ध में जो बाधक प्रमाण दिये हुए हैं उन्हें भी सामान्य-विशेषरूप से निरूपण करते हैं—

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