भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

पृष्ठ 74, कुल 343 में से

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अ.-१, आ.-२ का.-११ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ५१ द्विष्ठस्यानेकरूपत्वात्सिद्धस्यान्यानपेक्षणात् । पारतन्त्र्याद्ययोगाच्च तेन कर्तापि कल्पितः ॥ ११ ॥ संबन्धस्तावत् परस्परप्राप्तिरूपो द्वयोः प्राप्तिभाजोरेकस्तिष्ठति, — इति सामान्यलक्षणम् । तच्च कथं, ? नहि एकत्र विश्रमिताशेषशरीरसारोऽन्यत्र विश्रमितुम् अलं, स्वरूपभेदप्रसङ्गात् । एतेन संयोगसमवायौ तन्मूलाश्च अन्येऽपि संबन्धा बाधविधुरां धुरम् अध्यारोपिता मन्तव्याः । योऽपि चेतनेषु तत्कल्पनया च अचेतनेषु पारतन्त्र्यात्मा संबन्धो व्यवह्रियते, तत्र सिद्धस्य न पारतन्त्र्यम् अस्ति सिद्धत्वादेव, असिद्धस्य नतरां निःस्वरूपस्य ताद्धर्म्यायोगात् । एवमपेक्षायामपि वाच्यम् । द्वे च रूपे कथं श्लिष्यतो ? द्वयोरेकत्वानुपपत्तेः; एकत्वे वा कः श्लेषः, ? तस्मात् ज्ञानसंबन्धात् 'ज्ञाता' इति यथा विकल्पकल्पितोऽर्थो न वस्तु तथा क्रियासंबन्धात् 'कर्ता' इत्यपि कल्पनामात्रम् — इति पूर्वपक्षः ॥ आदितः ॥ १६ ॥ इति श्रीमदाचार्याभिनवगुप्तविरचितायां प्रत्यभिज्ञासूत्रविमर्शिन्यां ज्ञानाधिकारे पूर्वपक्षविवृतिर्नाम द्वितीयमाह्निकम् ॥ २ ॥ • अनेक रूप होने से सम्बन्ध दो पदार्थों का होता है, सिद्ध को किसी अन्य की अपेक्षा नहीं होने के कारण और परतन्त्रता का योग होने से कर्ता भी कल्पित है ॥ ११ ॥ परस्पर प्राप्तिरूप सम्बन्ध दो पदार्थों का होता है प्राप्त करनेवाले दोनों के बीच में एक ही रहता है यही सामान्य लक्षण है और वह कैसे है ? एक जगह में पूरा थका हुआ शरीर दूसरी जगह परिश्रम करने के लिए समर्थ नहीं होता, स्वरूप का भेद होना चाहिए । तभी वह कार्य सम्बन्ध रख सकता है । इसी कारण संयोग और समवाय एवं तन्मूलक दूसरे सभी सम्बन्ध बाध से खण्डित होनेवाले में से हैं उससे आरोप किया गया है यह बात माननी पड़ेगी । जो चेतन में कल्पित की कल्पना भी अचेतन में पारतन्त्र्यरूप सम्बन्ध का व्यवहार होता है; क्योंकि सिद्ध वस्तु में परतन्त्रता नहीं रह सकती, सिद्ध होने के कारण । असिद्ध वस्तु में कोई रूप न होने से निश्चय हो कर्तृत्वादि धर्म का योग रहता है, इस प्रकार अपेक्षा में भी कहना चाहिए । दो रूप एक में कैसे रहेंगे ? क्योंकि दो रूप एक नहीं बन सकता; या एकता में कौन-सा सम्बन्ध रहेगा ? इसलिए ज्ञान सम्बन्ध से ज्ञाता कल्पित है । इसी प्रकार विकल्प से कल्पित अर्थ वस्तु पदार्थ सत्य नहीं होता तथा क्रिया सम्बन्ध से 'कर्ता' यह भी कल्पना मात्र है ॥ ११ ॥ द्वितीय आह्निक समाप्त १. 'राज्ञः' ऐसा कहने पर निराकांक्षा की प्रतीति राजा के जैसी नहीं होती, अपि तु 'राजा' इस कथन में अन्य की आकांक्षा राजा शब्द रखता है, इसलिए वह आकांक्षा किसी सम्बन्ध की आकांक्षा रखती हुई सब जगह से व्यवस्थित होकर रहती है—इससे सिद्ध होता है कि अपेक्षा ही सम्बन्ध है, ऐसा लोक में व्यवहार भी देखा जाता है और करना भी चाहिए—इस पर आशंका कर उत्तर में कहते हैं— 'अपेक्षायामिति' ऐसा—'अपेक्षा में कहना चाहिए।' जैसा कि कहा भी गया है। अपेक्षा का स्वरूप तो पराधीन-परतन्त्र रहता है वह किसी दो में सम्बन्ध स्थापित नहीं कर सकता है । अर्थात् जड और अजड इन दोनों में सम्बन्ध नहीं होता; असम्भव होने से…………।'

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