ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ प्रथमे ज्ञानाधिकारे परदर्शनानुपपत्त्याख्यं तृतीयमाह्निकम् विना येन न किंचित्स्यात्समस्ता अपि दृष्टयः । अनस्तमितसंबोधस्वरूपं तं स्तुमः शिवम् ॥ एतस्मिन् पूर्वपक्षे यदुक्तं स्मृतेः संस्कारमात्रादेव सिद्धिः—इति, तदेव दूषयितुं ‘सत्यं ⋯ ।’ इत्यादि ‘⋯ ज्ञानस्मृत्यपोहनाशक्तिमान् ॥’ इत्यन्तं श्लोकसप्तकम् । क्रियायां संबन्धे च दूषणोद्धरणं जिसके बिना समस्त ज्ञानरूप दृष्टि कुछ भी प्रकट नही कर सकती है। हमलोग उस संतत आभासरूप बोधात्मा शिव की स्तुति करते हैं। पूर्वपक्ष में कहा गया था कि स्मृति की संस्कार मात्र से ही सिद्धि हो जाती है [ इस पूर्वपक्ष में दो अधिकार से सिद्धान्त का निरूपण किया जाता है जो कि ‘स्वलक्षणाभासं’ इत्यादि से पीठबन्ध—‘भूमिका’ बाँधकर ‘संस्कारात् स्मृतिसिद्धौ स्यात् स्मर्ता द्रष्टेव कल्पितः’ इसलिए यह ज्ञान विचार वाला अधिकार है, और क्रिया सम्बन्ध का विचार-विमर्श द्वितीय अधिकार में होगा। ज्ञानशक्ति के योग से ज्ञाता का ज्ञान-अधिकार में विचार होगा, क्रियाशक्ति के योग से कर्ता का क्रियाधिकारमें दृढ किया जाता है। वस्तुतः ज्ञानाधिकार के क्रम से समस्त शास्त्र के अर्थ का आक्षेप हो जाता है, ज्ञान के व्याज से कर्तृता का समर्थन शुद्ध स्वातन्त्र्यरूप ऐश्वर्य ‘कर्तरि ज्ञातरि आदि सिद्धे महेश्वरे’ इस कारिका रूपा सूत्र में दिखा दिया। जैसे ज्ञानविषय में यथारुचि संयोजन-वियोजनरूप स्वातन्त्र्य है उसे प्रकाश और विमर्शरूप से बताया है उसमें प्रकाश भाग मात्र को प्रधान बना कर ज्ञानाधिकार का विचार किया जाता है, और विमर्श को प्रधानता में क्रियाधिकार होगा। एक अंश के द्वारा धर्मी में पूर्णता का प्रवेश नहीं होता। इसलिए शुद्ध स्वातन्त्र्य रूप कर्तृत्व ही यहाँ पर पूर्ण है—ऐसा मानना चाहिए। ] बौद्धों ने कहा है कि स्मृति की सिद्धि संस्कार मात्र से हो सम्पन्न हो जायेगी; इसका खण्डन दोष देकर किया जायेगा। ‘सत्यं ⋯⋯⋯⋯⋯ इत्यादि से लेकर ‘ज्ञानस्मृत्यपोहनाशक्तिमान् ॥’ सात श्लोकों तक। क्रिया और सम्बन्ध में जो दोष दिया है उसका निराकरण क्रियाधिकार नामक द्वितीय भाग में अजडों में तो वह होती है, उसमें भी सम्बन्ध तो दो में ही होता है इस कारण वह एक वस्तु- पदार्थरूप में नहीं रहती; चूँकि इसका उपकार करना रूप ही सम्बन्ध मात्र कारण माना जाता है और अपेक्षित जो होता है वह तो कार्य ही कहलाता है, किन्तु ऐसा कहना युक्तियुक्त नहीं दिखायी पड़ता। जब कि इस विषय में कहा भी है। यदि अपेक्षा को ही सम्बन्ध माना जाय, तो वह सम्बन्ध के अभाव में कैसे अपेक्षा रख सकती है। इसलिए जिसका स्वभाव वैसा नहीं होता है उसका स्वभाव कैसे बन सकता है—ऐसा होना तो सम्भव नहीं दिखायी देता।