भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 343 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 76

अ.-१, आ.-३, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ५३ द्वितीये क्रियाधिकारे भविष्यति । यत्तु परेण व्यतिरिक्तं ज्ञानं काणादसांख्यादिदृष्टौ निराकृतं तदभिमतमेव । ग्रन्थकृतः—इति तत् दूषणान्तमेव । तत्र श्लोकद्वयेन ज्ञानस्य स्वसंवेदनरूपतया अनुभवस्य स्मृतौ अप्रकाश्यत्वं दर्शितं संस्कारजत्वेऽपि । ततः श्लोकद्वयेन स्मृतेः भ्रान्तित्वम् आशङ्कापूर्वकं पराकृत्य तृतीयेन प्रसङ्गात् सर्वाध्यवसायानामपि भ्रान्तित्वाशङ्का शमिता । ततः सत्यपि संस्कारे स्मृत्यनुपपत्तौ व्यवहारोच्छेदः,—इति श्लोकेन उक्त्वा स्वपक्षे तदुपपत्तिः,—इति श्लोकेन उक्तम्—इति तात्पर्यम् । ग्रन्थार्थस्तु निरूप्यते— सत्यं किंतु स्मृतिज्ञानं पूर्वानुभवसंस्कृतेः । जातमप्यात्मनिष्ठं तन्नाद्यानुभववेदकम् ॥ १ ॥ पूर्वपक्षमध्यात् मया तावत् बहु अङ्गीकर्तव्यम्,—इति 'सत्यम्' इत्यनेन दर्शितम्, यत्तु न अङ्गीकर्तव्यं तत् दूष्यते,—इत्येतदुक्तं 'किंतु' इत्यनेन विशेषाभिधायिना । इह स्मृतौ विषयमात्रस्य प्रकाशो न समर्थनीयो वर्तते यः संस्कारादेव सिद्धयेत्, किंतु अनुभवप्रकाशेन विना 'तत्' इत्येवं- रूपा कथं स्मृतिः स्यात्, कथं च तया विना अभिलाषेण [ पेन ] व्यवहारः स्यात् ?, अनुभवेन हि अस्य सुखसाधनता निश्चिता, तत उपादानम्; तत्र पूर्वानुभवजनितात् संस्कारात् एतावत् जातम्- होगा । काणाद और सांख्यादि की दृष्टि में ज्ञान एक भिन्न वस्तु है । इस विषय में बौद्धोंने दोष दिखलाया है, यह तो शैवाद्वैत-सिद्धान्त के लिए अभीष्ट ही है जो दोष हमें उन्हें देना था वह तो बौद्धोंने ही दे दिया है । दो श्लोकों से ज्ञान का स्वसंवेदनरूपता से अनुभव की स्मृति में अप्रकाशयता दिखायी, संस्कार से उत्पन्न होने पर भी अनुभव के बिना हो जाती है अनुभव की कोई स्मृति में आवश्यकता नहीं होती । इसके बाद दो श्लोकों से स्मृति में भ्रान्तिता की शङ्का को लेकर खण्डन कर, तृतीय श्लोक से प्रसङ्गवशात् समस्त अध्यवसायों में भी भ्रान्तिता की शङ्का का उपशमन करेंगे । अनन्तर संस्कार के रहने पर भी स्मृति की सिद्धि न होने से व्यवहार का उच्छेद हो जायेगा ऐसा एक श्लोक से कहकर अपने पक्ष में उसकी उपपत्ति हो गयी, जो बात हमने उठायी थी उसे एक श्लोक से कह दिया । यही इस आह्निक का सारांश है । अब ग्रन्थ के अर्थ का निरूपण किया जाता है । कणाद और सांख्यदर्शनों में ज्ञान भिन्न नहीं होता है ऐसा उनका मानना तो हमें अभीष्ट ही है; इस प्रकार आर्य पूर्वपक्षो के प्रति सुहृद् होकर प्रसन्न होते हैं 'सत्यं' इस शब्द द्वारा प्रयोग कर 'सत्य है' परन्तु वह स्मृतिज्ञान है । क्योंकि पूर्व अनुभव के संस्कार से वह उत्पन्न होता है । स्मृतिरूप ज्ञान पूर्वानुभव संस्कार से यद्यपि उत्पन्न होता है और उत्पन्न होकर अपने में ही रहता है वह आद्य अनुभव का वेदक नहीं होता है ॥ १ ॥ पूर्वपक्ष के बीच से हमें बहुत कुछ लेना है, यह बात 'सत्यम्' शब्द से दिखाई गयी है । जिसको स्वीकार नहीं करना है उस विषय को 'किन्तु' इस विशेष शब्द से दूषित किया गया है । स्मृति में विषय भाग के प्रकाश का समर्थन नहीं किया जाता जो कि संस्कार से सिद्ध हो जाता है, किन्तु अनुभव प्रकाश के बिना वह इस प्रकार स्मृति कैसे होगी ? और कैसे उसके बिना व्यवहार सम्भव हो सकेगा ? अनुभव से तो इसकी सुख-साधनता का ही निश्चय होता है तब उसका ग्रहण भी होता है; उसमें पूर्वानुभव के संस्कार से वह उत्पन्न होता है यद्यपि वह