ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-३, का.-२ यद्यपि तज्ज्ञानं विषयेण न जनितं, तथापि तद्विषयम्—इति । नच एतावता किंचित्, आत्मनिष्ठे स्वप्रकाशज्ञाने विषयस्येव अनुभवस्य प्राच्यस्य अप्रकाशनात् ॥ १ ॥ ननु संस्कारजत्वादेव प्राच्यमनुभवमपि विषयीकुरुतां स्मृतिः— इत्याशङ्कयाह— दृक्स्वाभासैव नान्येन वेद्या रूपदृशेव दृक् । रसे संस्कारजत्वं तु तत्तुल्यत्वं न तद्गतिः ॥ २ ॥ ‘दृक्’ ज्ञानं, तच्च जडात् विभिद्यते स्वप्रकाशैकरूपतया, जडो हि प्रकाशात् पृथग्भूतो वक्तव्यः, तेन दृक् ‘स्वाभासा’ आभासः प्रकाशमानता सा स्वं रूपमव्यभिचारि यस्याः, स्वस्य च आभासनं रूपं यस्याः । सत्यपि बाह्ये तच्छरीरसंक्रान्तं न प्रकाशनं ज्ञानस्य रूपं भवितुमर्हति, परप्रकाशनात्मकनिजरूपप्रकाशनमेव हि स्वप्रकाशत्वं ज्ञानस्य भण्यते । ननु स्वाभासमेव सत् तत् अनुभवज्ञानं स्मरणे भासिष्यते, न—इत्याह ‘नान्येन वेद्या’ । परत्र यदि दृक् भासेत तर्हि न सा स्वाभासा, इदमेव हि स्वप्रकाशस्य लक्षणं—स्वयं हि यदि प्रकाशेत तदा परेण सह असंबन्धात् संबन्धप्राणा कथं ‘परत्र’ इति सप्तमी संगच्छताम्; तथा च रूपज्ञानेन ‘रसे दृक्’ रसविषयं ज्ञानं न वेद्यते, एवं हि चक्षुषैव रसः फलतो गृहीत एव स्यात् । ननु यदि न आभाति स्मरणेऽनुभवः ज्ञान विषय से पैदा हुआ है फिर भी वही उसका विषय है यह आत्मनिष्ठ अपने प्रकाश ज्ञान में जैसा विषय का भान होता है वैसा पूर्वानुभव का नहीं होता ॥ १ ॥ अब शङ्का करते हैं कि—संस्कार से पैदा होने के कारण स्मृति यदि पूर्व के अनुभव को भी विषय करे तो इसका उत्तर देते हैं— ज्ञान के स्वभाव से ही रूप की दृष्टि के समान वह दृष्टि भी वेद्य है किसी दूसरे से नहीं । इसमें संस्कार से पैदा होना तो है किन्तु उसको समानता को प्राप्त करना नहीं है ॥ २ ॥ ‘दृक्’ दृष्टिज्ञान जडवस्तु से अत्यन्त भिन्न होता है, क्योंकि ज्ञान अपने प्रकाश से प्रकाशित है और जड वस्तु तो प्रकाश से भिन्न होती है ऐसा जड वस्तु के विषय में कहना समुचित ही है, इसलिए ‘दृक्’ ज्ञान अपने आभास से आभासित रहता है उसका अर्थ यही है कि—जो स्वयं अव्यभिचरत रूप से प्रकाशित है और जिसका स्वरूप अपने से भासित है। बाह्य शरीर में जो संक्रान्त रहता है वह प्रकाशन ज्ञान का स्वरूप नहीं हो सकता, दूसरे अन्य को प्रकाशित करना एवं अपने स्वयं प्रकाशित रहना यही ज्ञान का स्वप्रकाशत्व कहलाता है । ‘ननु’ कहकर शंका करते हैं कि—अपना आभास ही यदि अनुभव ज्ञान के रूप में मानते हो, तो वही स्मरणमें भी भासित होगा, ऐसा नहीं हो सकता है ‘नान्येन वेद्या’ वह दूसरे किसो से वेद्य नहीं होता । यदि दूसरी जगह ‘दृक्’ ज्ञान भासित होता हो तो उसे स्वाभास ( अपने आभास से आभासित होने वाला ) नहीं कहा जा सकता है । यही स्वप्रकाश का लक्षण है, स्वयं यदि प्रकाशित होता हो तो दूसरे से सम्बन्ध नहीं होने के कारण उसे सम्बन्धप्राण कैसे कहेंगे, ‘परत्र’ में सप्तमी विभक्ति कैसे संघटित होगी; इसलिए रूपज्ञान के साथ ‘रसे दृक्’ रस विषयक ज्ञान नहीं जाना जा सकता है, ऐसा कहने पर तो फिर चक्षु-इन्द्रिय से भी रसका ग्रहण होने लगेगा। १. परस्पर एक-दूसरों के संवेदन ज्ञान में अन्योऽन्य एक-दूसरों का विषय ज्ञान भी होता है। वैसा स्वीकार करने से तो इन्द्रियों के नियम विनष्ट हो जायेंगे । वह नियम तीन प्रकार का होता है। इन्द्रिय के