ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-३, का.-३ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ५५ किं र्तार्ह संस्कारेण कृतं स्यात्, रूपज्ञानं न रसज्ञानजात् संस्कारात् जातं, तत् कथम् अयं प्रसङ्गः, तस्मात् संस्कार एव भवत्संभावितदोषभङ्गाय प्रभवेत्; नैतत्, यतो हि असौ तत्संस्कारसंस्कृतात् समनन्तरप्रत्ययात् उत्थितः स्मृतिबोधः, तेन तत्सदृशो भवतु शाखासंनिवेश इव पूर्वसंनिवेशतुल्यः, नतु यो यत्संस्कारात् जातः स तस्य वेदनस्वभावो भवति—इति युक्तम् । सदृशत्वस्यापि गति- रवगमः कथम् ?, नहि अनुभवज्ञानं सादृश्यं गमयति, नापि स्मृतिज्ञानं, परस्परम् असंवेदने द्वयनिष्ठसादृश्याध्यवसायायोगात्, अन्यस्य च तदुभयवेदनरूपस्य अभावात्,—इति संस्कारात् परं सविषयतामात्रं स्मृतेः सिद्धं, नतु अनुभवविषयत्वं, नापि अस्य विषयस्य पूर्वानुभवविषयीकृत- त्वम्—इति निश्चय एषः ॥ २ ॥ ननु यदि स्मृतिज्ञाने अनुभवस्य सत्यतः प्रकाशः स्यात्, तन्मुखेन च तद्विषयस्य, तदा भवेत् भवदुक्तेरवकाशः, यावता स्मृतिर्विकल्परूपत्वात् केवलमप्रकाशमानमेव अनुभवं तद्विषयं च अध्यवस्यति, तत् इयं भ्रान्तिस्वभावा, तत्र कोऽयं निर्बन्धः ?, तदेतत् दर्शयति शङ्क्यमानत्वेन— अथातद्विषयत्वेऽपि स्मृतेस्तदवसायतः । दृष्टालम्बनता भ्रान्त्या जब कि इष्ट नहीं है । चक्षु-इन्द्रिय से जन्य ज्ञान रूप का प्रकाश करता है अर्थात् चक्षु रूपविषयक ज्ञान को ही पैदा करता है—दूसरा नहीं करा सकता है । पुनः शंका करते हुए कहते हैं कि यदि स्मरण में अनुभव नहीं होता है तो उसमें संस्कार फिर क्या काम करेगा, रूपज्ञान रसज्ञान से होनेवाले संस्कार से नहीं उत्पन्न होता है, तब फिर ऐसा प्रसंग कैसे उपस्थित होगा । इसलिए संस्कार ही आपके प्रदर्शित दोष को दूर करने के लिए समर्थ होगा । यह तो हो ही नहीं सकता है, क्योंकि वह बाद के ज्ञान से होनेवाला स्मृति ज्ञान है, इसलिए उसके समान भले ही हो, जैसे—खींची हुई वृक्ष का शाखा पुनः छोड़ देने पर अपने नियत स्थान में वापस चली जाती है, जो संस्कार से उत्पन्न होता है उसका वैसा स्वभाव नहीं होता है वह ज्ञानस्वरूप वाला होता है—ऐसा कहना तो युक्ति-युक्त भी है । सदृशका ज्ञान होना भी तो बड़ा कठिन है ? अनुभव-ज्ञान, सादृश्य-ज्ञान का बोध नहीं कराता है और न तो स्मृतिज्ञान ही बोध कराता है, अज्ञान में ही सादृश्य दो के ज्ञान से होता है और दूसरे में तो दोनों के ज्ञान का अभाव रहता है, इसलिए संस्कार के बाद ही दूसरा स्वविषयता मात्र स्मृति से सिद्ध होता है—न तो वह अनुभव का विषय होता है, और न उसके विषय का पूर्व का अनुभव ही विषय करता है—यही इसका निश्चय है ॥ २ ॥ यदि अनुभव का स्मृति के ज्ञान में सत्य रूपसे ठीक-ठीक प्रकाश होता है—तब तो, उसके द्वारा विषय का भी प्रकाश होता है इससे फिर आपकी युक्ति को अवकाश ( स्थान ) मिलेगा, जब कि स्मृति विकल्प रूप से केवल अप्रकाशित ही अनुभव और उसके विषय को देखती है, इसलिए यह भ्रम का स्वभाव है फिर उसमें क्या विचार करना होगा ? इसी बात को शंका कर दिखाते हैं । सामर्थ्य बल से ज्ञान का नियम है; क्योंकि नेत्र-इन्द्रिय से उत्पन्न ज्ञान ही रूप का प्रकाश करनेवाला होता है । इन्द्रिय की योग्यता ही इसी में होती है कि नेत्र रूपसम्बन्धी ही ज्ञान पैदा करे दूसरा कुछ नहीं ।