ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-३, का.-३-४ न तद्दर्शनं नापि तद्विषयः स्मृतेर्विषयः, तथापि तु उभयम् अध्यवसीयते, भ्रमरूपतया स्मृतेः॥ एतत् निराकरोति— तदेतदसमञ्जसम् ॥ ३ ॥ अत्र कारिकया उपपत्तिम् आह— स्मृतिर्तैव कथं तावद्भ्रान्तेश्चार्थस्थितिः कथम् । पूर्वानुभवसंस्कारापेक्षा च किमितीष्यते ॥ ४ ॥ अनुभूतस्य अनुभवप्रकाशितस्य विषयस्य अप्रमोषोऽनपहारः तथैव प्रकाशनं यत् एतत् स्मृतेः आत्मीयं रूपं तथाप्रकाशनाभावे विघटेततमाम् । किंच भ्रान्तौ असद्वा आत्माकारो वा प्रख्याति, नतु तया अर्थः स्वीक्रियते तस्य अप्रकाशनात्—इति तया अर्थो न व्यवस्थापित एव । प्रकाशनात्मा हि व्यवस्थापना, ततश्च स्मरणादभिलापेन कथम् अर्थविषयो व्यवहारः ?; नच तदप्रकाशने संस्कारजत्वेन किंचित् कृत्यं, तद्धि सादृश्यं लब्धुम् अवलम्ब्यते; नच अनुभवेन यदि अनुभव और उसके विषय को स्मृति विषय नहीं करेंगी तो अन्ततोगत्वा प्रत्यक्ष- प्रमाण के आलम्बन करने से उसकी भ्रान्ति हो जाती है, इसका निराकरण करना सन्देह में डूब जायेगा । अनुभव को देखना और उसके विषय को देखना यद्यपि यह स्मृति का विषय नहीं है फिर भी दोनों भ्रमरूप से स्मृति के द्वारा देखे जाते हैं। उनका निराकरण करना असमञ्जस हो जायेगा ॥ ३ ॥ यहाँ पर कारिका के द्वारा उपपत्ति दिखाते हैं—पहले स्मृति कैसे होगी और भ्रान्ति से पदार्थ की स्थिति कैसे होगी ? पूर्व अनुभव के संस्कार की अपेक्षा ही फिर किसके लिए होगी ॥ ४ ॥ जो अनुभव से प्रकाशित विषय है उसका भुलावा नहीं होता उसी प्रकार यह प्रकाशन जो स्मृति का अपना रूप है उसके प्रकाशन का अभाव होने पर ये दोनों अत्यन्त विघटित हो जायेंगे । और भी सुनो, भ्रान्ति होने पर अभाव या उसका अपना आकार प्रकट होता है, उससे पदार्थ का ग्रहण नहीं होता, क्योंकि वह अप्रकाशित रहता है, इसीलिए उस प्रख्याति से अर्थ व्यवस्थित ही नहीं हुआ । प्रकाशित होना ही व्यवस्थित होना है, इसलिए स्मरण के कहनेसे अर्थविषयक व्यवहार कैसे होगा ? और उसके अप्रकाशित रहने पर संस्कार से उत्पन्न होनेवाला कोई कृत्य ही नहीं रह जाता, फिर भी वह सादृश्य खोजता है; और विषय-प्रकाश करने वाले अनुभव के १. अनुभूत विषय का विनष्ट नहीं होना और बीच में कुछ काल लुप्त होने के समान पूर्ण रूप से नहीं छिप जाना, प्रकाश के बल से पुनः प्राप्त हो जाना ही स्मृति का मुख्य रूप है।