भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

५६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-३, का.-३-४ न तद्दर्शनं नापि तद्विषयः स्मृतेर्विषयः, तथापि तु उभयम् अध्यवसीयते, भ्रमरूपतया स्मृतेः॥ एतत् निराकरोति— तदेतदसमञ्जसम् ॥ ३ ॥ अत्र कारिकया उपपत्तिम् आह— स्मृतिर्तैव कथं तावद्भ्रान्तेश्चार्थस्थितिः कथम् । पूर्वानुभवसंस्कारापेक्षा च किमितीष्यते ॥ ४ ॥ अनुभूतस्य अनुभवप्रकाशितस्य विषयस्य अप्रमोषोऽनपहारः तथैव प्रकाशनं यत् एतत् स्मृतेः आत्मीयं रूपं तथाप्रकाशनाभावे विघटेततमाम् । किंच भ्रान्तौ असद्वा आत्माकारो वा प्रख्याति, नतु तया अर्थः स्वीक्रियते तस्य अप्रकाशनात्—इति तया अर्थो न व्यवस्थापित एव । प्रकाशनात्मा हि व्यवस्थापना, ततश्च स्मरणादभिलापेन कथम् अर्थविषयो व्यवहारः ?; नच तदप्रकाशने संस्कारजत्वेन किंचित् कृत्यं, तद्धि सादृश्यं लब्धुम् अवलम्ब्यते; नच अनुभवेन यदि अनुभव और उसके विषय को स्मृति विषय नहीं करेंगी तो अन्ततोगत्वा प्रत्यक्ष- प्रमाण के आलम्बन करने से उसकी भ्रान्ति हो जाती है, इसका निराकरण करना सन्देह में डूब जायेगा । अनुभव को देखना और उसके विषय को देखना यद्यपि यह स्मृति का विषय नहीं है फिर भी दोनों भ्रमरूप से स्मृति के द्वारा देखे जाते हैं। उनका निराकरण करना असमञ्जस हो जायेगा ॥ ३ ॥ यहाँ पर कारिका के द्वारा उपपत्ति दिखाते हैं—पहले स्मृति कैसे होगी और भ्रान्ति से पदार्थ की स्थिति कैसे होगी ? पूर्व अनुभव के संस्कार की अपेक्षा ही फिर किसके लिए होगी ॥ ४ ॥ जो अनुभव से प्रकाशित विषय है उसका भुलावा नहीं होता उसी प्रकार यह प्रकाशन जो स्मृति का अपना रूप है उसके प्रकाशन का अभाव होने पर ये दोनों अत्यन्त विघटित हो जायेंगे । और भी सुनो, भ्रान्ति होने पर अभाव या उसका अपना आकार प्रकट होता है, उससे पदार्थ का ग्रहण नहीं होता, क्योंकि वह अप्रकाशित रहता है, इसीलिए उस प्रख्याति से अर्थ व्यवस्थित ही नहीं हुआ । प्रकाशित होना ही व्यवस्थित होना है, इसलिए स्मरण के कहनेसे अर्थविषयक व्यवहार कैसे होगा ? और उसके अप्रकाशित रहने पर संस्कार से उत्पन्न होनेवाला कोई कृत्य ही नहीं रह जाता, फिर भी वह सादृश्य खोजता है; और विषय-प्रकाश करने वाले अनुभव के १. अनुभूत विषय का विनष्ट नहीं होना और बीच में कुछ काल लुप्त होने के समान पूर्ण रूप से नहीं छिप जाना, प्रकाश के बल से पुनः प्राप्त हो जाना ही स्मृति का मुख्य रूप है।

विषयप्रकाशनात्मना स्मृत्यभिधानाया भ्रान्तेः किंचिदपि सादृश्यम् अस्ति, सर्वथा विषयम- स्पृशन्त्याः ॥ ४ ॥ ननु योऽनुभवो यश्च तद्विषयः स यतः तया अध्यवसीयते, ततः अंशात् सादृश्यम् अनुभवेन स्मृतेः, तत्सिद्धये च संस्कारपरिग्रहः । 'अध्यवसीयते' इति किम् उच्यते ? 'प्रकाशयते' इति चेत् न भ्रान्तित्वं; 'न प्रकाश्यते' इति चेत् पुनरपि विषयो न स्पृष्ट एव अनया,—इति सादृश्यमपि शब्दगडुमात्रम्; तदेतत् दर्शयितुमाह— भ्रान्तित्वे चावसायस्य न जडाद्विषयस्थितिः । इह स्मृतेः अन्यस्य वा भ्रान्तिबोधस्य स्वसंवेदनांशे प्रकाशमाने न भ्रान्तिता, तत्र वैपरीत्याभावात्; यस्तु तत्र अध्यवसीयते स्वाकारः स विपरीततया अस्वाकारत्वेन अर्थतया,— इति तत्र अंशे भ्रान्तिता । स च अंशोऽर्थलक्षणो न स्मृत्या अन्यया वा भ्रान्त्या स्पृश्यते, तत्र असौ तूष्णीका,—इति बलादेव तत्र अंशे जडत्वम् अस्या आयातं घटज्ञानस्येव पटे । नच जडेन विषयस्य किंचित् कृत्यम्, ततश्च अर्थविषयो व्यवहारो विलुप्येत । ततोऽजाड्ये निजोल्लेखनिष्ठान्नान्नार्थस्थितिस्ततः ॥ ५ ॥ साथ स्मृति कही जाने वाली भ्रान्ति का कोई सादृश्य नहीं है, क्योंकि वह विषय को स्पर्श नहीं करती है ॥ ४ ॥ अब शंका करते हैं कि जो अनुभव और उसका विषय जितना जाना जाता है उतने अंश में तो अनुभव का स्मृति से सादृश्य सिद्ध हुआ, और उसकी सिद्धि के लिए संस्कार का भी ग्रहण करना पड़ेगा । 'अध्यवसीयते' इसका आप क्या अर्थ करते हैं ? यदि 'प्रकाशयते' ऐसा इसका अर्थ करते हो तो फिर भ्रान्ति नहीं हुई 'न प्रकाश्यते' प्रकाशित नहीं है ऐसा अर्थ यदि करते हो तो भी स्मृति द्वारा विषय का स्पर्श नहीं हुआ, सादृश्य भी तो निरर्थक मात्र शब्द रह गया; इसीको दिखाने के लिए कहते हैं— भ्रान्ति होनेपर ज्ञान की जड से विषय स्थिति नहीं होती है । यहाँ स्मृति का या उससे भिन्न भ्रान्ति के ज्ञान का अपना ज्ञानांश प्रकाशित होनेपर भ्रान्तिता कहाँ रहेगी; क्योंकि उसमें विपरीतता नहीं है; जब कि उसमें अपनी आकारता का भान होता है वह विपरीत होकर अपना आकारत्व ही भिन्न अर्थरूप द्वारा उस अंश में भ्रान्ति ही होती है । और अर्थरूप वह अंश स्मृति से या भ्रान्ति से नहीं स्पृष्ट होता है, वह वहाँ मौन है, इसलिए बलात् उस अंश में उसकी जड़ता आ जाती है । जैसे घटज्ञान की घटमें और जड वस्तुका विषय के साथ कोई सम्बन्ध नहीं रहता है, इससे भी अर्थविषयक व्यवहार लुप्त हो जायेगा । इसलिए चैतन्य में अपनी और उल्लेख को निष्ठा से अर्थ की स्थिति नहीं रहती है ॥ ५ ॥ ८

५८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-३, का.-६ अथ तु तम् अवसायरूपं स्वसंवेदनांशं स्वाकारं वा अवलम्ब्य अजडत्वम् अस्याः, एवमपि 'अजाड्ये निजं' स्वसंवेदनम् 'उल्लेखश्च' स्वाकारः-इति इयति एषा परिनिष्ठिता स्मृतिः, - इति विषयस्य नामापि ग्रहीतुम् अशक्नुवतः 'ततः' स्मृत्यध्यवसायात् कथं विषयस्य व्यवस्थापनं व्यवहार्यत्वसंपादनसामर्थ्यम् ? ॥ ५ ॥ संस्कारे सत्यपि स्मृतिः न कथंचन घटते, ततश्च परस्परसङ्गतिहीनानि सकलानि ज्ञानानि, - इति यदुक्तं श्लोकपञ्चकेन तत् इदानीं प्रकृते योजयति- एवमन्योन्यभिन्नानामपरस्परवेदिनाम् । ज्ञानानामनुसंधानजन्मा नश्येज्जनस्थितिः ॥ ६ ॥ 'जनस्य' लोकस्य या काचन 'स्थितिः' व्यवहारः सा सर्वज्ञानानां यत् 'अनुसंधान' एक- विषयभावोपपन्नस्मृतिताप्राप्तिरूपं, तत्र आयत्ता । तथा हि-स्मरणनिबन्धनः सर्वो व्यवहारः । प्रथममपि हि प्रत्यक्षज्ञानम् 'अहम्' इति पूर्वापररूपानुसंधानेन स्मरणानुप्राणितेन बिना न घटते, प्रमातरि विश्रान्त्यभावात् अप्रत्यक्षत्वप्रसङ्गात् । एवं सुखादौ मन्तव्यम् । हानादानप्रेरणा- भ्युपगमादयस्तु व्यवहाराः स्मरणमया एव । 'एवं ज्ञानानां' यत् 'अनुसंधानं' ततो जायमाना 'जनस्थितिः' 'एवम्' इति पराभ्युपगमे सति 'नश्येत्' नश्यति-इति संभाव्यते । कुतः ?-इति ज्ञानरूप स्वसंवेदन अंश का अवलम्बन कर, या अपने आकार का अवलम्बन करके इस स्मृति को चेतन मानोगे तो, ऐसा भी 'अजाड्ये निजं' जो चेतन में अपना ज्ञान या उल्लेख अर्थात् अपने आकार का ज्ञान-इतने में ही यह स्मृति निश्चित हो जाती है, जिस विषय का नाम लेनेमें भी असमर्थ होते हैं 'ततः' उसी कारण स्मृति के ज्ञान से कैसे विषय का व्यवस्थापन होगा और व्यवहार के सम्पादन में सामर्थ्य होगा ? ॥ ५ ॥ संस्कार के रहने पर स्मृति किसी प्रकार से भी नहीं घटती है, इसलिए सकल ज्ञान परस्पर सङ्गति से शून्य होते हैं, जिसको पाँच श्लोकों से कहा गया था; उसको अब प्रकृत प्रसङ्ग से बता देते हैं- इस प्रकार परस्पर एक दूसरे को न जाननेवाले ज्ञानों के अनुसन्धान से उत्पन्न होनेवाला लोक-व्यवहार विनष्ट हो जायेगा ॥ ६ ॥ 'जनस्य' लोगों का बाहर और भीतर की जो 'स्थितिः' व्यवहार वह सब ज्ञानों का 'अनुसन्धान' जो अनुसन्धान करना है वह एकविषयकभाव की स्मृति प्राप्त करना ही है, क्योंकि वह उसी के आधीन रहती है । जैसे कि स्मरणमूलक ही सब व्यवहार होते हैं । प्रथम अनुभव काल में भी प्रत्यक्ष ज्ञान होता है कि 'मैं यह जानता हूँ' इस तरह स्मरण से अनुप्राणित पूर्वोत्तररूप अनुसन्धान के बिना नहीं घटता, क्योंकि प्रमाता में उसका विश्राम नहीं होगा । साथ ही अप्रत्यक्ष का प्रसङ्ग उपस्थित हो जायेगा । इसी प्रकार सुख-दुःखादि में भी समझना चाहिए । छोड़ना, ग्रहण करना, प्रेरणा करना और स्वीकार करना रूप जितने भी व्यवहार हैं वे सभी स्मरणजन्य ही होते हैं । 'एवं ज्ञानानां' इस प्रकार ज्ञानों का जो अनुसन्धान है उससे होने- वाला 'जनस्थितिः' लोक-व्यवहार 'एवं' ऐसा बौद्ध सिद्धान्त के स्वीकार करने पर 'नश्येत्' विनष्ट हो जायेगा यह सम्भव है ।

अ.-१, आ.-३, का.-७ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ५९ चेत्, विशेषणद्वारेण हेतुमाह 'अन्योन्यं' तावत् 'भिन्नानि' ज्ञानानि-अन्यत् अनुभवज्ञानं, अन्यत् इदानीन्तनं ज्ञानं विकल्पाभिमतं, अन्यत् स्मरणसंमतं ज्ञानं । तत् एतानि स्वविषयप्रकाशमात्र- रूपाणि परविषये जडान्धानेडमूककल्पानि, नच अन्योन्यस्य प्रकाशरूपाणि । एवं न स्वरूपतो न वेद्यतो वा एकीभावरूपम् अनुसंधानम् अस्ति । अन्योन्यं च विषयविषयिभावो नास्ति । नै२च तुर्यं ज्ञातेयनिबन्धनम् अनुसंधानाद्यापि संभाव्यते,–इति ध्वंसेरन् व्यवहाराः । न च ध्वंसन्तामिति भवदभीष्टापमात्रान् ते ध्वंसन्ते प्रकाशन्ते यतः तत एतत् आपद्यते, एतदेव समर्थयितुम् उद्यन्तव्यम्-इति ॥ ६ ॥ तच्च अस्मदभिमतप्रकारेण विना विधेरपि अशक्यसमर्थनम्-इति दर्शयति- न चेदन्तःकृतानन्तविश्वरूपो महेश्वरः । स्यादेकश्चिद्वपुर्ज्ञानस्मृत्यपोहनशक्तिमान् ॥ ७ ॥ 'संवित् तावत् प्रकाशते' इति तावत् न केचित् अपह्नुवते । सा तु संवित् यदि स्वात्म- दूसरे को यथार्थ बोध हो जाये इसलिए पञ्चावयववाक्य का उत्थापन किया जाता है 'कुतः' अर्थात् किससे ? यदि ऐसा कहते हो, तो विशेषण के द्वारा हेतु को दिखाते हैं-'अन्योन्यं' परस्पर 'भिन्नानि' भिन्न-भिन्न ज्ञान एक प्रमाता में विश्रान्त होनेवाले ज्ञान के बिना जो दूसरा शुद्ध अनुभवात्मक ज्ञान है, दूसरा इस समय का ज्ञान जो विकल्प से युक्त होता है, 'अन्यत्' शब्द का दूसरा अर्थ यह है कि स्मरणजन्य ज्ञान । इसी कारण वे सभी ज्ञान अपने विषय का प्रकाश मात्र करते हैं दूसरे के विषय में तो जड अन्धे और बहरे के समान हो जाते हैं और एक दूसरे का प्रकाश नहीं कर सकते हैं। इसीलिए न स्वरूपतः स्मृति अनुभव को विषय कर सकती है और न तो अनुभूत को वेद्यरूप से विषय करती है। वेद्य और स्वरूप से भी एकीभावरूप होकर अनुसन्धान नहीं हो सकता है और परस्पर विषय-विषयीभाव भी नहीं हो सकता है । चौथा परस्पर भिन्नों का एक में ज्ञातेयरूप अनुसन्धान भी नहीं हो सकता, क्योंकि उनका होना सम्भव नहीं है इसलिए जगत् के सारे व्यवहार नष्ट हो जायेंगे और 'ध्वंसन्ताम्' ध्वस्त हो जायें ऐसा आपके कहने मात्र से तो न ध्वंस ही हो सकेंगे और न प्रकाशित ही हो सकेंगे, क्योंकि जिससे यह होता है उसीसे उदय भी होता है ॥ ६ ॥ इसीलिए हमारी अभीष्ट इच्छा के बिना विधाता का भी समर्थन अशक्य ही है-इसको दिखाया जाता है-जिसने अनन्त विश्व अपने भीतर कर लिया है, जो ज्ञान, स्मृति और अपोहन शक्तिरूप तथा चेतन शरीरवाला है ऐसा महेश्वर यदि नहीं होता तो (जनस्थिति नष्ट हो जाती ) ॥ ६ ॥ 'संवित् तावत् प्रकाशते' पहले जब तक संवित्-ज्ञान प्रकाशित रहता है तब तक कोई ज्ञान १. स्मृति न तो अनुभव को विषय करती है, न वेद्य से अनुभूत विषय को विषय करती है । २. चकार शब्द अत्यन्त असम्भावना अर्थ में दिया है ।

६०/] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-३, का.-७ मात्रविश्रान्ता अर्थस्य सा कथं प्रकाशः ?, स हि अर्थधर्म एव तथा स्यात्; ततश्च अर्थप्रकाशः तावत्येव पर्यवसितः,--इति गलितो ग्राह्यग्राहकभावः। अतोऽर्थप्रकाशरूपां संविदम् इच्छता बलादेव अर्थोऽपि तद्रूपान्तर्गत एव अङ्गीकर्तव्यः; स च अर्थप्रकाशो यदि अन्यश्च अन्यश्च, तत् न स्मरणम् उपपन्नम्,--इति अत एक एव असौ,--इति एकत्वात् सर्वो वेद्यराशिः तेन क्रोडीकृतः,--इत्येतदपि अनिच्छता अङ्गीकार्यम्। एवमपि सततमेव उन्मग्ने निमग्ने वा विश्वात्मना प्रकाशेत, तथास्वभावत्वात्। न चैवम्, अतः स्वरूपान्तर्बुडितम् अर्थराशिम् अपरमपि भिन्नाकारम् आत्मनि परिगृह्य, कांचिदेव अर्थं स्वरूपात् उन्मग्नम् आभासयति,-इति आपतितम्। सैषा ज्ञानशक्तिः। उन्मग्नाभाससंभिन्नं च चित्स्वरूपं बहिर्मुखत्वात् तच्छायानुरागात् नवं नवं ज्ञानमुक्तम्। एवमपि नवनवाभासाः प्रतिक्षणम् उदयव्ययभाजः,--इति सैव व्यवहारनिवह- हानिः। तेन क्वचित् आभासे गृहीतपूर्वे यत् संवेदनं बहिर्मुखम् अभूत्, तस्य यत् अन्तर्मुखं चित्स्वरूपत्वं तत् कालान्तरेऽपि अवस्थासु स्वात्मगतं तद्विषयविशेषे बहिर्मुखत्वं परामृशति,— इति एषा स्मृतिशक्तिः। यच्च तत् नवं भासयति स्मरति वा तत् वस्तुतः संविदा विश्वमय्या तादात्म्यवृत्ति,--इति विश्वमयं पूर्णमेव,--इति नवं न किंचित् आभासितं स्मृतं वा स्यात् । छिपा नहीं रहता है। यदि वह संवित् = ज्ञान अपने स्वरूप मात्र में विश्रान्त होता हो तो फिर वह अर्थविषय को प्रकाशित कैसे करेगा ? पदार्थधर्म ही उसी प्रकार होता हो तो, पदार्थों का प्रकाश उतने में ही लीन रहता। इससे फिर जितने भी ग्राह्य-ग्राहक भाव हैं, वे सब समाप्त हो जाते हैं। इसीलिए अर्थविषयक प्रकाश करनेवाली संवित् को माननेवाले बौद्ध को हठात् अर्थ का प्रकाश भी उसी (संवित्) के अन्तर्गत मानना पड़ेगा और यदि वह अर्थ प्रकाश कोई दूसरा है और वह उससे भी भिन्न है तब तो फिर स्मरण नहीं बनेगा, इसलिए एक ही यह है, भिन्न नहीं है। एक होने के कारण सब वेद्य-राशि को अपने भीतर सम्मिलित कर लिया, इस प्रकार नहीं चाहते हुए भी मानना पड़ेगा। इसी तरह सर्वदा उन्मग्न और निमग्न होनेवाला विश्वरूपसे प्रकाशित होगा; क्योंकि उसी प्रकार का अपना उसका स्वभाव है और ऐसा नहीं देखा जाता है, इसीलिए अपने स्वरूप से अर्थराशि उसी में डूबी रहती है और दूसरे भी विभिन्न आकारवाले को अपने में सम्मिलित करके स्वरूप से अलग कुछ ही पदार्थ भासित करता है—यही कहना पड़ेगा। वही यह ज्ञान-शक्ति है और शरीरादि से अवच्छिन्न संकुचित प्रकाशरूप बहिर्मुख होने के कारण उसकी छाया के सम्पर्क से नया-नया ज्ञान प्रकाशित होता है—ऐसा कहा गया है। इस तरह ज्ञान-शक्तिके समर्थन करने में नये-नये बहिर्मुखी आभास प्रतिक्षण उदय एवं अस्त होते रहेंगे, वही व्यवहारसमूह का लोप कहा जायेगा। इसलिए कहीं आभास पहले गृहीत होने पर जो ज्ञान बहिर्मुख हुआ था, उसका जो अन्तर्मुख चेतनस्वरूपज्ञान है वह कालान्तर में एवं दूसरी अवस्था में भी अपने विषय विशेष में बहिर्मुखता का परामर्श करता है—इसी का नाम स्मृति-शक्ति है। नया रूप भासित करती है या स्मरण करती है। वस्तुतः वह विश्वमय संवित् से तादात्म्यवृत्ति प्राप्त कर रहती है, इसलिए १. शरीरादि में माया प्रमाता अवच्छिन्न संकुचित स्वभाववाला होकर अपनी अपेक्षा से भिन्न-भिन्न पदार्थों को प्रकाशित करते हैं उसका बहिर्मुखी ज्ञान नया-नया कहा जाता है और उसमें जो ऐश्वर्य, स्वातन्त्र्य है वही ज्ञान-शक्ति है।

अ.-१, आ.-३, का.-७ ] विमर्शिनीटीकोपेतम् [ ६१ इदमपि प्रवाहपतितम् ऊरीकार्यम्—यत् किल तत् आभास्यते तत् संविदो विच्छिद्यते, संविच्च ततः, संविच्च संविदान्तरात्, संवेद्यं च संवेद्यान्तरात्; नच विच्छेदनं वस्तुतः संभवति,— इति विच्छेदनस्य अवभासमात्रम् उच्यते । नच तत् इयता अपारमार्थिकम्, निर्मीयमाणस्य सर्वस्य अयमेव परमार्थो यतः । एष एव परितश्छेदनात् परिच्छेद उच्यते, तदवभासनसामर्थ्यम् अपोहन- शक्तिः । अनेन शक्तित्रयेण विश्वे व्यवहाराः । तच्च भगवत एव शक्तित्रयं—यत् तथाभूतानुभवितृ- स्मर्तृ-विकल्पयितृस्वभावचैत्रमैत्राद्यवभासनम् । स एव हि तेन तेन वपुषा जानाति, स्मरति विकल्पयति च । यथोक्तम् आचार्येणैव 'यद्यप्यर्थस्थितिः प्राणपुर्यष्टकनियन्त्रिते। जीवे निरुद्धा विश्व उससे परिपूर्ण हो जाता है, इससे कोई नयी-वस्तु आभासित या स्मृत नहीं होती है । यह जो आगे कहेंगे सबको स्वीकार करना होगा—वह आभासित होता है वह संवित् ज्ञान भिन्न है और संवित् ज्ञान भी उससे भिन्न होता है और संवित् ज्ञान अन्य संवित् ज्ञान से भिन्न होता है तथा संवेद्य भी दूसरे संवेद्य से भिन्न होता है; इसी से वहाँ विच्छेदन का आभासमात्र कहा जाता है और विच्छेदन इसी कारण अपारमार्थिक नहीं है; क्योंकि सब निर्मीयमाण पदार्थ परमार्थतः सत्य ही होते हैं। वह परिच्छिन्न होने के कारण ‘परिच्छिन्न'—संकुचित कहा जाता है—उसका ठीक-ठीक आभासित नहीं होना, अपोहन-शक्ति कही जाती है। भगवान् के जिस मायारूप स्वातन्त्र्य-शक्ति से मायीय जीव प्रमाता का विकल्परूप ज्ञान होता है वही अपोहन- शक्ति है। इन्हीं तीनों शक्तियों से सारे विश्व का व्यवहार-विचार आदि कार्य होते रहते हैं। ये तीनों शक्तियाँ भगवान् महेश्वर की ही हैं—जो कि स्वभाव से ही अनुभव करनेवाले, स्मरण करनेवाले और विकल्प करनेवाले चैत्र-मैत्र आदि का अवभासन करते हैं। वे ही उस-उस शरीर से जानते हैं, स्मरण करते हैं और विकल्प करते हैं। जैसे कि आचार्य ने कहा है—'यद्यपि १. देश, कालादि विशेष अवच्छेद से शून्य होने के कारण विचित्र इच्छा से अवबोधित, केवल आभास भेदसंस्कार के द्वारा उत्पन्न हुए विकल्परूप विज्ञानवाली अपोहन-शक्ति कहलाती है, पूर्व अवभासित वस्तु का, पूर्व में अवभासित हुए पदार्थ के साथ वर्तमान समय में प्रकाश होना ही प्रख्यापन-शक्ति है, अपोहन-शक्ति और स्मृति-शक्ति इन दोनों में यही भेद है । २. भगवान् की जिस स्वातन्त्र्य-शक्ति के द्वारा मायीय प्रमाता का विकल्परूप हो जाता है वही अपोहन- शक्ति है । ३. न वह्नेर्दाहिका शक्तिर्व्यतिरिक्ता विभाव्यते । केवलं ज्ञानसत्तायाः प्रारम्भोऽयं प्रवेशने ॥ “वह्नि में रहनेवाली जो वह्नि की दाहिका शक्ति है वह वह्नि से भिन्न देश-काल में नहीं रहती अपितु उसी में रहती है। यह केवल ज्ञान सत्तामें प्रवेश करने केलिए ही प्रारम्भ होता है ।” इस आगम के कथन से अग्नि दाहक, पाचक, प्रकाशक इत्यादि अनेक परामर्शों की प्रधानता में शक्ति का व्यवहार देखा जाता है। वह्नि में परामर्शोन की प्रधानता होने के कारण लोक में वह्नि का ही व्यवहार होता है ।

६२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-३, का.-७ तत्रापि परमात्मनि सा स्थिता ।।' इत्यादि । एतासां च ज्ञानादिशक्तीनाम् असंख्यप्रकारो वैचित्र्यविकल्पः, — इति तत्सामर्थ्यं स्वातन्त्र्यम्, अपराधीनं पूर्णं महदैश्वर्यं तन्निमित्तब्रह्म- विष्णुरुद्राद्यैश्वर्यापेक्षया उच्यते । तदेव 'चिद्वपुः' इत्येवं कृत्वा इयदायातम् 'विश्वरूपः' इति । तत एव च परिनिष्ठितैकरूपजडभाववैलक्षण्यात् ज्ञानादिशक्तियुक्ततामाहेश्वर्यम् उपसंप्राप्तः । एतदनुपगमे न किंचित् इदं भासेत, — इति प्रसङ्गः । भासते तु; तस्मात् एतत् अवश्यम् अङ्गीकर्तव्यम्, — इति प्रसङ्गविपर्ययः । नश्येज्जनस्थितिः, यद्येवं न स्यात्, — इति प्राक्तनेन श्लोकेन सह प्रसङ्गः 'चेत्' इत्यनेन तद्विपर्ययः सूचितः ॥ ७ ॥ आदितः ॥ २३ ॥ इति श्रीमदाचार्याभिनवगुप्तविरचितायां ईश्वरप्रत्यभिज्ञासूत्रविमर्शिन्यां ज्ञानाधिकारे परदर्शनानुपपत्तिर्नाम तृतीयमाह्निकम् ॥ ३॥ प्राण और पुर्यष्टक से बद्ध जीव में अर्थस्थिति नियन्त्रित रहती है तथापि वह परमात्मा में रहती है जीव में नहीं रहती ।' इन ज्ञानादिशक्तियों के असंख्य प्रकार से विचित्र विकल्प होते हैं, उसी के सामर्थ्य से स्वा- तन्त्र-शक्ति रहती है अर्थात् उसी का नाम सामर्थ्य एवं स्वातन्त्र्य है । ईश्वर का स्वातन्त्र्य पराधीन न होकर स्वाधीन रहता है और पूर्ण एवं महा ऐश्वर्य से संयुक्त है, क्योंकि ब्रह्मा, विष्णु एवं अन्य देवों में जो सामर्थ्य है उससे वह बढ़ा-चढ़ा रहता है अर्थात् इसके सामर्थ्य से ही ये सभी देवता आदि सामर्थ्यशाली होते हैं । वही 'चिद्वपुः' चेतन शरीरधारी ईश्वर है इतने निबन्ध से इनका विश्वरूपत्व सिद्ध होता है । इसी से परिनिष्ठित एक रूप में रहते हैं जड से विलक्षण इनका स्वरूप है तथा ज्ञानादि शक्तियों से युक्त होकर महा ऐश्वर्य को प्राप्त किये रहते हैं । इनको न मानने पर कुछ भी भासित नहीं होगा, ऐसा प्रसंग आ पड़ेगा । किन्तु भासित ही होता है; इसलिए इसे अवश्य स्वीकार करना चाहिए, यही प्रसंग का विपर्यय व्यतिरेक है। यदि ऐसा न हो तो लोक- व्यवहार विनष्ट हो जायेगा, पहले श्लोक के साथ प्रसंग लगाकर 'चेत्' इससे विपरीत प्रसंग विपर्यय कहा है यह सूचित हुआ ॥ १७ ॥ ॥ तृतीय आह्निक समाप्त ॥ १. न सा जीवकला काचित्संतानद्वयवर्तिनी । व्याप्त्री शिवकला यस्यामधिष्ठात्री न विद्यते ॥ दो सन्तानों से व्यवहृत होनेवाली [ ज्ञान सन्तान और क्रिया सन्तान ] कोई भी जीवकला ऐसी नहीं दिखती है कि जिसमें शिवकला अधिष्ठात्री होकर व्याप्त न रहती हो ।

अथ प्रथमे ज्ञानाधिकारे स्मृतिशक्तिनिरूपणाख्यं चतुर्थमाह्निकम् पदार्थरत्ननिकरं निजहृद्गञ्जपुञ्जितम् । ग्रन्थन्तं स्मृतिसूत्रान्तः संतत्यैव स्तुमः शिवम् ॥१॥ एवं ज्ञानपूर्विका स्मृतिः, तदुभयानुग्राहिणी अपोहनशक्तिः, —इति तावात् वस्तुसंभवक्रमेण प्रदर्शितम् । उपक्रमानुसारेण स्मृतिरेव सूचितप्रसङ्गविपर्ययसमर्थनदृशा विवेच्या । 'सत्यं किंतु स्मृतिज्ञानम्..............।' इति हि उपक्रान्तम् । तत्र संस्कारमात्रात् तावत् मा नाम उदपादि स्मृतिः, इदं तु वक्तव्यम्— तथाभूतभवदभ्युपगतभगवत्प्रभावोऽपि कथम् एनां कुर्यात् ?,—इति शङ्कां शमयितुं स्मृतितत्त्व- निरूपणाय 'स हि पूर्वानुभूतार्थोपलब्धा.........।' इत्यादि'............'अर्थो भातः प्रमातरि ।' इत्यन्तं श्लोकाष्टकम् । तत्र श्लोकेन स्वपक्षे स्मृतिरुपपन्ना,-इति कथितम् । द्वितीयेन स्मृतेः पूर्वानु- पदार्थरूपी रत्नसमूह [ सभी पदार्थसमूह को आभासित करनेवाले चिदानन्तसार ] को अपने हृदयरूपी स्थान [ आकर ] में एकत्रित किया गया है । स्मृतिरूपी सूत्र के भीतर क्रम से गूँथनेवाले उस शिव की हम स्तुति करते हैं ॥ १ ॥ इस प्रकार ज्ञानपूर्वक स्मृति होती है, ज्ञान और स्मृति को अन्तर में जगानेवाली अपोहन-शक्ति है, पहले किसी प्रकार वस्तु सम्भव हो सके उसे क्रमशः दिखलाया है । प्रारम्भ में जैसा कहा गया है उसके अनुसार स्मृति को ही सूचित किये गये प्रसङ्ग के विपरीत समर्थन की दृष्टि से विचार करना होगा । 'सत्यं किंतु स्मृतिज्ञानम्............ । [ पूर्वपक्ष में 'अथानुभवविध्वंसे स्मृतिः' तथा सिद्धान्तपक्ष में भी 'सत्यं किंतु' ठीक ही है 'न चेत्' इससे आत्म ईश्वर-सिद्धि में सातिशय अभिज्ञान माना है । गीता में भी भगवान् ने कहा है कि—'मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च' पहले देखी-सुनी या किसी प्रकार भी अनुभव की हुई वस्तु या घटनादि के स्मरण का नाम 'स्मृति' है । किसी भी वस्तु को यथार्थ जान लेने की शक्ति का नाम 'ज्ञान' है—तथा संशय-विपर्यय आदि वितर्क जाल का वाचक 'ऊहन' है और उससे दूर होने का नाम 'अपोहन' है । ये तीनों मुझसे ही होते हैं । ] क्योंकि ऐसा ही प्रारम्भ में कहा गया है । उस जगह भले ही संस्कारमात्र से स्मृति उत्पन्न होती हो, किन्तु यह तो कहना ही पड़ेगा कि—आपके कल्पना किये हुए भगवान् का प्रभाव इसको तैयार कर खड़ा कैसे करेगा ? [ प्रभाव उसी वस्तु-पदार्थ को कहा जाता है जो असम्भव को भी सम्भव कर सकने में समर्थ हो । ] इस शङ्का के शमनार्थ स्मृतितत्त्व का निरूपण करने के लिए 'स हि पूर्वानुभूतार्थो- पलब्धा......।' यहाँ से लेकर'.....'अर्थो भातः प्रमातरि ।' पर्यन्त आठ श्लोक कहे गये हैं । प्रथम श्लोक से अपने सिद्धान्त पक्ष में स्मृति उत्पन्न होती है, यह कहा गया है । द्वितीय श्लोक से

६४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-४, का.-१ भवविषयीकृतस्वलक्षणप्रकाशनसामर्थ्यमुक्तम् । तृतीयेन अनुभवेन तद्विषयेण च एकीभाव पर्यन्त आवेशः स्मरणस्य उक्तः। तुरीयेण अनुभवस्य न विषयतया स्मृत्या प्रकाशनम्, —इति निरूपितम् । पञ्चमेन योगिज्ञानमपि अनुभवं पृथग्भावेन न विषयीकरोति, —इति वदता तुर्यश्लोकार्थ एव उपोद्वलितः । षष्ठेनाशङ्क्यमानम् अनुभवस्य स्मृत्या पृथग्विषयीकरणं काल्पनिकम्,—इत्यवास्तविकृतम् । सप्तमेन स्मृतिप्रसङ्गात् विकल्पेऽपि पूर्वानुभवेन ऐक्यात्मावेशो दर्शितः अष्टमेन स्मर्त्तव्यस्य, स्मृतेः स्मर्तुश्च एकचित्तत्त्वविश्रान्तिः उक्ता; प्रसङ्गाच्च दृश्यस्य, दर्शनस्य द्रष्टुश्च,—इति तात्पर्यार्थः । अथ क्रमेण श्लोकार्थ उच्यते । स हि पूर्वानुभूतार्थोपलब्धा परतोऽपि सन् । विमृशन्स इति स्वैरी स्मरतीत्यपदिश्यते ॥ १ ॥ 'पूर्वमनुभूतस्य अर्थस्य' य 'उपलब्धा' अन्तर्मुखो बोधः स तावत् अद्यापि 'परतः' स्मृति- पूर्व के अनुभव से विषय किया हुआ स्वलक्षण प्रकाशन-सामर्थ्य कहा है। तृतीय श्लोक से अनुभव और उसके विषय से स्मरण का एक में जबतक मिल नहीं जाता है यह बताया है। चतुर्थ श्लोक से अनुभव विषयरूप से स्मृति द्वारा अलग नहीं भासता है ऐसा निरूपण हुआ है। पञ्चम श्लोक से योगिजन का ज्ञान भी अनुभव को भिन्नरूप से विषय नहीं करता है, इसको आचार्य ने चतुर्थ श्लोक के अर्थ में ही दृढ कर दिया है। षष्ठ श्लोक से शङ्का किये हुए अनुभव का स्मृति से 'इदन्तया' भेदयुक्त ज्ञान कल्पना का विषयमात्र है, जब कि वह वास्तविक नहीं है। सप्तम श्लोक से स्मृति के प्रसङ्ग से विकल्प ज्ञान में भी अनुभव के द्वारा एकता में मिल जाना यह दिखलाया है। अष्टम श्लोक से स्मर्त्तव्य विषय का, स्मृतिज्ञान और स्मरण करनेवाला स्मर्ता पारमार्थिक एक चित्तत्त्व महाप्रकाश की प्रमाता में विश्रान्ति होना बताया है; और प्रसङ्ग से दृश्य का, दर्शन का और द्रष्टा का, इतना ही इसका तात्पर्यार्थ है। इसके पश्चात् अब क्रम से श्लोकार्थ कहा जाता है। वही पूर्व के अनुभूत अर्थ को प्राप्त करनेवाला पूर्वानुभवकाल से अन्य स्मरण काल में कारण विद्यमान रहता है। वह स्वतन्त्ररूप बोधात्मा विचार करता हुआ स्मरण करता है—ऐसा उपदेश दिया जाता है ॥ १ ॥ 'पूर्वमनुभूतस्य अर्थस्य' जिसने पूर्व अनुभूत अर्थ का अन्तर्मुख बोध प्राप्त किया था, वह वर्तमान समय में भी रहता ही है, संविद्रूपमात्रस्वरूप का काल से किये हुए संकोचरूप विशेषात्मक रूप से विच्छेद का सम्बन्ध नहीं हो सकता । जिस स्थितिमें है उसीमें वह रहेगा, [ क्योंकि उससे अभिन्न एक रूप होने के कारण पूर्व की अनुभूत वस्तु की स्थिति सम्भव नहीं होगी। इससे फिर स्मरण कैसे बनेगा। स्मृति का सर्व आकारवाला स्वातन्त्र्य होता है ऐसा दिवाकर भट्ट ने कहा है— सर्वेऽनुभूता यदि नान्तरर्थास्त्वदात्मसात्कारसुरक्षिताः स्युः । विज्ञातवस्त्वप्रतिमोषरूपा काचित्स्मृतिर्नाम न सम्भवेत्तत् ॥ “यदि अन्तर्वर्ती अनुभूत अर्थ तुम्हारी आत्मा में सुरक्षित नहीं रहेगा, विज्ञात वस्तु के असदृशरूप होने से कुछ भी स्मृति सम्भव नहीं होगी।”]

अ.-१, आ.-४, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ६५ कालेऽपि अस्त्येव, संविन्मात्रस्वरूपस्य कालकृतसङ्कोचरूपविशेषात्मकविच्छेदायोगात् । अनुभवस्य च अन्तः अर्थोऽपि अपृथग्भावेन अवस्थितः—इत्येतदपि अयत्नसिद्धम् । इदं तु चिन्त्यम्—अकाल- कलिते संवेदने तदन्तर्वर्तिनि च विश्वत्र भावजाते यदि तावत् चिन्मयतापरामर्शः, तत् 'अहम्' इति एतावतैव पूर्णेन विमर्शेन भाव्यम्; अथ इदन्तया पृथग्भावावभासनेन, तथापि तत्र द्वयी गतिः । 'अहम्' इत्यंशे यदि विश्राम्यति इदन्ता, तदा 'अहमिदम्' इति सदाशिवदशया भाव्यम्; अथ न रोहति, तत् 'इदम्' इत्येव आभासनेन भवितव्यम्; अपूर्वताभासनाच्च तत् अनुभवनमेव स्यात् न स्मरणम्,— इत्याशङ्क्याह 'स्वैरी' इति । 'स्वम्' आत्मीयम् उपकरणम् ईरयति कर्तव्येषु अवश्यं तच्छीलश्च; 'स्वं'१ च आत्मानम् ईरयति न पुनः स्वकर्तव्ये प्रेरकमपेक्षते,—इति 'स्वैरी' स्वतन्त्रः । तेन स्वतन्त्रत्वात् 'स' इत्येवं विमृशति । स इति विमर्शनस्य च इयद्रूपम्—यत् सर्वथा अकालकलितस्वरूपपरामर्शनमेव न, नापि अत्यन्तभेदपरामर्शनमेव; अपि तु यो भावः पूर्वमनुभवकाले तद्देशकालप्रमात्रन्तरसाचिव्येन पृथक्कृतो न च अहन्तायामेव विलीनीकृतः, स तादृगेव तमसेव आच्छाद्य अवस्थापितः संस्कारशब्दवाच्यः, तस्य तमाच्छादकम् अपहस्तयति; तत्र अपहस्तिते स पूर्ववत् पृथक्कृत इवावभाति । ननु च इदन्तया अवभासेत पूर्ववदेव, नैवम् अर्थ भी अनुभव के भीतर अभिन्न एकरूपसे रहता है, यह बात तो अयत्न ही सिद्ध है किन्तु यह विचारणीय है कि—'अकालकलित्' काल-विच्छेद-शून्य संवेदन ज्ञान में और उसके अन्तर्वर्त्ती विश्व के समस्त भावपदार्थों में यदि चिन्मयपरामर्श होता हो तब तो 'अहम्' इतने से ही पूर्ण विमर्श हो जाना चाहिए; बाद में इदन्ता भिन्नरूप से अवभासमान होती है, फिर भी उस समय में 'अहमिदम्' सदाशिव-ईश्वर दो 'गति स्थिति' रहती है। 'अहम्' इस भाग में यदि इदन्ता की विश्रान्ति होती हो, तो 'अहमिदम्' सदाशिवस्थिति होगी, इदन्ता नहीं विश्रामित होती हो तो 'इदम्' यही आभासरूप होना चाहिए; और अपूर्वरूप से आभासन होने से तो अनुभवन ही होगा, स्मरण फिर नहीं हो सकेगा, इस पर आशंका कर कहते हैं कि—'स्वैरी' परमेश्वर के स्वातन्त्र्य पद को ही स्वैरी पद से द्योतित किया है। 'स्वम्' अपनी सामग्री को अवश्य कर्त्तव्यों में लगाता है और लगाने के स्वभाववाला भी है तथा 'स्वम्' अपने आपको ही उन्हीं में लगाता है, किसी अन्य प्रेरक की अपेक्षा नहीं रखता अर्थात् किसी दूसरे के मुख की ओर देखना नहीं पड़ता, सर्वतन्त्र स्वतन्त्र रहता है, इसलिए 'स्वैरी' वह स्वतन्त्र है । स्वतन्त्ररूप होने से 'स' वह विमर्शन करता है। 'स' [ उससे भी क्या ? ] विमर्शन का इतना मात्र ही रूप है। नहीं, ऐसी बात नहीं है। जिसका सर्वथा काल से असंकुचित परामर्शरूप ही 'अहम्' स्वरूप है, और उनमें न तो इदन्तरूप से अत्यन्त भेद परामर्शन ही है; अपितु जो भाव पूर्व अनुभव काल में था वह देश, काल अन्य प्रमाता के साथ होने से अलग किया हुआ है अहन्ता में ही विलीन नहीं किया हुआ है, वह उसी प्रकार ही अज्ञानतम से आच्छादित (ढक) कर रखा गया संस्कार शब्द से कहा गया है, उसका अज्ञानतम आच्छादन करनेवाला है वही उसे छिपा देता है, उसमें छिप जाने पर वह पूर्व के जैसा पृथक् किये हुए की भाँति ही भासता है। १. स्व शब्द आत्मा एवं आत्मीय का वाची है; गणपाठ वृत्ति के अनुसार । २. 'तत्' पद से अनुभव लिया गया है, ९

६६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-४, का.-१ तदानीन्तनावभासनपृथक्कृतशरीरादिसंबन्धमनवधूयैव हि तत्प्रकाशः; ततश्च इदानीन्तनावभासन- कालपरामर्शोऽपि न निमीलति, —इति एतत्परामर्श भित्तिप्राधान्येन पूर्वकालपरामर्शः, —इति विरुद्धपूर्वापरपरामर्शस्वभाव एव 'स' इति परामर्श उच्यते। एवं च स एव परमेश्वरः 'स्मरति' । एतदेव हि तस्य स्मरणम्—यत् एवंप्रकारपरामर्शोचितकालकलादिस्पर्शसहिष्णुमायाप्रमातृभाव- परिग्रहः,—इति मायाविद्याद्वयाद्वैधमयम् । तत एव सकलसिद्धिवितरणचतुरचिन्तामणिप्रख्यम् आगमिकाः स्मरणमेव मन्त्रादिप्रमाणित मन्यन्ते । तथा च— 'ध्यानादिभावं स्मृतिरेव लब्ध्वा चिन्तामणिस्त्वद्विभवं व्यनक्ति।' इति। अलं तावत् अनेन । तृन्नन्तसमासेन यत्नतोऽनुभवस्यार्थमुखेन कालस्पर्शम्, अर्थविश्रान्ततां, द्वयोरपि प्रमातरि निरूढिं भेदाभेदाभ्यां दर्शयति, वृत्तौ एकार्थीभावात् तस्य च भेदाभेदमयत्वम्— इति वक्ष्यामः ॥ १ ॥ अब शङ्का करते हैं कि इदन्ता रूप से पूर्व में जैसा अलग से भासित होता था वैसा ही अलग किया हुआ जो शरीरादि अभी भी भासित होगा, ऐसी बात नहीं है । उस अनुभव काल में अवभासन से अलग किया हुआ शारीरादि सम्बन्ध उसे न हटाता हुआ ही उस स्मर्यमाण का प्रकाश रहता ही है और इससे इस समय में होनेवाला अवभासन काल का परामर्श भी नष्ट नहीं होता है, इस स्मरणकालिक परामर्श को आधार मानकर पूर्वकाल का भी परामर्श रहता है, इसी को पूर्वोत्तर विरुद्ध स्वभाव वाला परामर्श कहा जाता है और इस प्रकार वही परमेश्वर 'स्मरति' स्मरण करता है। यही उसका स्मरण है एवं पूर्वोत्तर विरुद्ध स्वभाववाला परामर्श के समुचित काल-कलादि को सहनेवाला माया प्रमाता का भावपरिग्रह ग्रहण करना कहलाता है। जो माया—'भेदप्रथा' और विद्या—'शुद्धविद्या' है यही दोनों का ऐक्यभाव है। इससे ही सकल सिद्धि देनेवाली चतुर चिन्तामणि के तुल्य आगमिक लोग [ शुद्ध विद्या परामर्श प्राणित ] मन्त्रादि जीवित स्मरण मानते हैं और वैसा कहा भी है— 'स्मृति ध्यानादिभाव को उपलब्ध करानेवाली है। स्वातन्त्र्य के ऐश्वर्य विभव को स्मरणात्मिका चिन्तामणि व्यक्त करती है।' इस विषय में इतना ही कहना पर्याप्त है। [ पूर्वानुभूतोपलब्धा इसमें 'न लोकाव्यय- निष्ठाखलर्थतृनाम्' इस पाणिनीय सूत्र से षष्ठी समास का निषेध कर 'द्वितीयाश्रितातीतेति' इस सूत्र में द्वितीया पद का योगविभागादि करके अनायास तृन्नन्त समास कर लिया जाता है ] यत्न पूर्वक तृन्नन्त समास के द्वारा अनुभव का अर्थ प्रधानतया काल से सम्बन्ध रखता है, अर्थ में विश्रान्ति होती है, अर्थात् अनुभव और अर्थ इन दोनों का ही प्रमाता में बैठ जाना भेद एवं अभेद द्वारा दिखाता है, समास में एकार्थीभाव हो जाने के कारण उसका भेद और अभेदमयत्व हो जाता है— इस विषय में हम कहेंगे ॥ १ ॥ १. माया = भेद प्रथा, माया, कला, विद्या, राग, नियति, काल ये छः तत्त्वसमुदाय भेद प्रथा को बढ़ानेवाले हैं इसका दूसरा नाम शास्त्रीय भाषा में 'षट् कंचुक' भी कहा जाता है। विद्या = शुद्ध विद्या, इसका छत्तीस तत्त्वों के मध्य में पञ्चम स्थान है। इस विद्यातत्त्व में इदं च एवं अहं च ये दोनों समान रूप से दृष्टि गोचर होते हैं। यद्यपि इसमें अनेकत्व का अनुभव होता है फिर भी एकत्वभाव रहता है। इसमें आरूढ होनेवाले साधक को मन्त्र शब्द से कहा जाता है।

अ.-१, आ.-४, का.-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ६७ एतदेव स्मृतितत्त्वमुपपादयितुं श्लोकान्तराणि । तत्र यदि कश्चिद्ब्रूयात्—इह स्मृतिर्विकल्पः, न च अनेनार्थः प्रकाश्यते, अर्थासंस्पर्शिनो हि विकल्पाः, अनुभवेन च येन सोऽर्थः प्रकाशतां नीतः स इदानीं कीर्तिमात्रमूर्तिर्जातः, न च सोऽपि स्मृत्या प्रकाश्यते—ज्ञानस्य ज्ञानान्तरेणासंवेद्यत्वात् असत्त्वाच्च—इति अर्थस्य प्रकाशनाभावात् ‘इदं स्मरामि’ इति ज्ञानं भ्रान्तिमात्रमेव—इति पुनरपि आपतितम्—इति, तदा तं प्रति उच्यते— भासयेच्च स्वकालेऽर्थात्पूर्वाभासितमामृशन् । स्वलक्षणं घटाभासमात्रेणाथाखिलात्मना ॥ २ ॥ इसी स्मृतितत्त्व के उपपादनार्थं दूसरे श्लोक भी हैं । उस पर यदि कोई बोले कि—स्मृति विकल्प है, इस विकल्प से अर्थ प्रकाशित नहीं होता, क्योंकि वस्तु का संस्पर्श न करने वाला ही विकल्प कहलाता है । जिस अनुभव से उस अर्थ का प्रकाशन होता है वह उस समय में केवल कीर्तिरूप ही रह गया, अर्थात् विनष्ट हो चुका है, और वह भी स्मृति से प्रकाशित नहीं होता क्योंकि एक ज्ञान दूसरे ज्ञान से नहीं जाना जा सकता है, न रहने के कारण; इसलिए कि अर्थ का प्रकाशन न होने से, “इदं स्मरामि” मैं यह स्मरण करता हूँ—यह ज्ञान भ्रान्तिमात्र है । अतः फिर भी वही बात आ जायेगी, तब उसके प्रति कहा जाता है— [ वह महेश्वर भगवान् चिदात्मा तबतक स्मृति में अर्थ को विकल्पित करता है और ऐसा मानने पर उस अर्थ का पूर्व देश-काल के द्वारा अवच्छेद होने के कारण इसी से देश-काल संकोच वशात् पदार्थ के रूप का परामर्श करता है यही इसका निचोड़ है और परामर्श भी परमार्थरूप ही है अर्थात् दूसरा कोई नहीं है, अप्रकाशमानता रहने पर क्या परामर्श होगा ? वह अप्रकाशित है और परामृष्ट भी है ऐसा बोलना अन्धे का बोलना जैसा ही प्रायः है । परामर्श ही प्रकाशक स्वभाववाला है, स्वभाववाले के न रहने से किसका स्वभाव होगा, इसलिए कहिये—परामर्श हेतु से या परामर्श के उपलक्षण से उस स्वलक्षण का अवश्य रहना मानना पड़ेगा । अर्थात् सामर्थ्य होने से परामर्श के बिना अन्यथा नहीं बन सकता, घटाभास हो अकेला या लाल-पीला, ऊँचा- नीचा, छोटा-बड़ा आदि आभास के सम्बन्ध से या वह सब पूर्वाभास से युक्त होकर बहुत प्रकाश से भासित होता है, सब कुछ वह देश-काल के आभास के भेद से अपना स्वरूप ही है । यदि तुम कहो कि पूर्व वाला ही अर्थ प्रकाशित होता हो, तो उस अनुभव से कौन सा भेद है, कौन इस प्रकार कहता है कि प्रकाशित होता है । अरे ! वह प्रकाशित होता है वही पूर्व का काल इसके वेद्य को स्वीकार करनेवाले अवभास अंश में अपने लक्षण का कारण है और इस समय में भी स्मर्ता के देह, प्राण आदि से होनेवाला वर्तमान काल विमर्श भाग में भासता है, यही दोनों काल का स्पर्शन उस विमर्श का हेतु है । ] स्मृति काल में अर्थ सामर्थ्य से युक्त होकर पूर्व अवभासित स्वलक्षणरूप अर्थ को विमर्शन करता हुआ अखिलाभास से मिश्रित वपु केवल घटाभासतया भासित होगा ॥ २ ॥

६८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-४, का.-२ इह स्मृतिकाले तावत् अर्थोऽध्यवसीयते, अन्यथा सुप्तमूर्च्छितकल्पतापत्तेः । एवं च यावत् अध्यवसायोऽर्थस्य तावत् 'अर्थात्' इति सामर्थ्यात् इयत् अभ्युपगन्तव्यम्-यत् सोऽर्थः प्रकाशते, अप्रकाशमानेऽध्यवसाव्येऽध्यवसायोऽन्धप्रायः स्यात् । प्रकाशनं च न तदानीन्तनकालस्य त्यागेन, नापि स्वीकारेण इदम् इत्येवावभासनप्रसङ्गात् तस्मात् अतीतानुभवकालः पूर्वानुभूत- भावस्वालक्षण्याक्षेपकतवेनापेक्षणीयो वेद्यभागे प्रकाशात्मकावभासाभिनिवेशितया, स्मर्तुर्देह- प्राणाद्यवभासकालश्चावलम्बनीयो वेदकभागे विमर्शांशाभिनिवेशित्वेन । आभासमात्रं हि भावस्य स्वरूपं, प्रत्याभासं प्रमाणस्य व्यापारात् । तदेव आभासान्तरव्यामिश्रणया दीपसहस्रप्रभासंमूर्च्छ- नवत् स्फुटीभवति । आभासान्तरव्यामिश्रणाभावेऽपि तु कालाभाससंभेदेनैव स्वालक्षण्यं तस्य आभासस्य करोति-कालशक्तेरेव भेदकत्वात् इति वक्ष्यते । एवं तावत् स्वलक्षणीभावः प्राक्तन- देहाभाससाचिव्याद्युदितकालाभासयोजनया घटाभासस्य इति । तावत्येव वा स्मृतिः आभासान्तरै- रपि व्यामिश्रा अतिस्फुटा । अत्यन्तस्फुटीभावेऽपि तदानीन्तनकालता न त्रुट्यति अन्यसाधारण्येन अनवभासनात् । तथावभासे तु योगिनस्तन्निर्माणमेव । ब्रह्मभाषितादौ तु नैवमेव अवभासनम् स्मृतिकाल में ही स्वलक्षणरूप अर्थ का अध्यवसाय होता है, यह बात न मानोगे तो सुप्त और मूर्च्छित व्यक्ति को जैसे अर्थ का अध्यवसाय नहीं होता है वैसे ही होने लगेगा, और भी जितना अर्थ सम्बन्धी अध्यवसाय होता है उतना अर्थात् अर्थ सामर्थ्य से ही सम्भव हो सकता है यह सभी के लिए स्वीकार करने योग्य होना चाहिए जो वह अर्थ प्रकाशित है, अध्यवसाय का प्रकाश नहीं होने पर प्रायः अन्धे के समान हो जायेगा और प्रकाशन में उस काल का न त्याग करने से, न तो, स्वीकार करने से काम चलेगा केवल 'इदम्' इतना ही कहना पड़ेगा । इस हेतु से अतीत अनुभव काल और पूर्वानुभूतभाव का जो अपना स्वरूप है उसकी वेद्यभाग में अपेक्षा करनेवाले से अपेक्षणीय है प्रकाशरूप में अवभासित होने के अभिनिवेश से स्मर्ता के देह-प्राणादि का अवभासकाल भी वेदक भाग में अवलम्बन करना पड़ेगा, विमर्श अंश का अभिनिवेश होने से आभासमात्र ही भाव का स्वरूप है; क्योंकि प्रत्याभास प्रत्यक्षादि प्रमाण का प्रमाणरूप व्यापार है । वही भावरूप दूसरे आभास के मिल जाने से सहस्र प्रदीप की प्रभा के मिलावट के तुल्य स्फुट हो जाता है । किन्तु दूसरे आभास के न मिलने पर भी कालाभास के पृथक कर देने से ही उस आभास का अपना स्वरूप प्रकट हो जाता है-क्योंकि भेद कराने वाली काल-शक्ति ही है-इस विषय में आगे बताया जायेगा । इस प्रकार पूर्ववर्ती शरीराभास के साथ उदित काल के आभास को जोड़ने से घटाभास का यही अपना लक्षण करना है, तबतक ही स्मृति भी दूसरे आभास के साथ मिली हुई अत्यन्त स्फुट होती है । अत्यन्त स्फुटीभाव होने पर भी उस समय होने वाले काल का स्वरूप नहीं टूटता है; क्योंकि अन्य के सदृश वह अवभासित नहीं होता है । यदि वैसा भासता तो भी वह योगी का निर्माण ही होगा । ब्रह्मा के द्वारा भासित होने वाली वस्तुओ में नया ही १. अर्थ = स्वभाव लक्षण । २. उस काल में होने के कारण ये प्रमातावर्ग सर्वज्ञ कहलाते हैं, अथवा संसारी होते हैं, अनुमान, आगमादि प्रमाणों से आया हुआ उसका विषयप्रकाश अपूर्व रूप से देखते हैं अर्थात् विमर्शन करते हैं उसमें जो ज्ञान का आभास है उसके साथ उस अंश में ही भगवान् की इच्छा से ऐक्यभाव हो जाता है। स्मरण

अ.-१, आ.-४, का.-३ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ६९ इति । तत्र तु आगमादिमानान्तरानुभूतब्रह्मादिस्वरूपस्मरणपरम्परा अभ्युपायः । 'भासयेत्' इति विधिरूपेण नियोगेन नियमो लक्ष्यते, न भासयति इत्येतत् न, अपि तु भासयत्येव इति । 'स्वकाले' इति स्मरणकाले । 'आमृशन्' इति वेदकभागनिवेशी वर्तमानकाल उक्तः । 'पूर्वाव- भासितं स्वलक्षणम्, इति वेद्यांशस्पर्शी भूतकालो घटाभासस्यापि केवलस्य स्वालक्षण्यापत्ति- हेतुर्दर्शितः । इयदेव स्मृतेः अव्यभिचारि वपुः, अर्थितातिशयात् तु स्फुटत्वम् इति 'अथ' शब्दो द्योतयति । तदेवाह 'अखिलात्मना' इति सर्वाभासमिश्रेण वपुषा इत्यर्थः ॥ २ ॥ ननु एवं स्वलक्षणस्य प्रकाशने भेदेन बहिरस्तदवभासेत । एतदेव हि बहिरवभासनम्— यत् स्वलक्षणप्रकाशनम् इति शङ्काशमनाय निरूपयति— न च युक्तं स्मृतेर्भेदे स्मर्यमाणस्य भासनम् । तेनैक्यं भिन्नकालानां संविदां वेदितैष सः ॥ ३ ॥ भासन है। वहाँ पर तो आगम आदि दूसरे प्रमाणों से अनुभूत ब्रह्मादि स्वरूप का स्मरण-परम्परा उपाय है । 'भासयेत्' इस विधिलिङ् के प्रयोग से मालूम पड़ता है कि—नहीं भासित करता है यह बात नहीं है, अपितु भासन करता ही है। 'स्वकाले' स्मरण काल में। 'आमृशन्' विमर्शन करता हुआ वेदक अंश को बतलानेवाला वर्तमानकाल का प्रयोग कहा गया है। 'पूर्वाभासितं स्वलक्षणम्' वेद्यांश का स्पर्श करनेवाला भूतकाल केवल घटाभास का भी स्वलक्षण आ पड़ेगा; इसका हेतु भी दिखा दिया । इतना ही स्मृति का अव्यभिचारी वपु है, जो कि अभीष्ट वस्तु को अत्यन्त चाहने के कारण उससे भी अधिक स्फुरता आ जायेगी, यह 'अथ' शब्द द्योतित करता है । उसी बात को कहते हैं कि 'अखिलात्मना' समस्त आभास से मिला हुआ शरीर है। क्योंकि परमार्थ अन्धे के समान नहीं होता है ॥ २ ॥ अब शंका करते हैं कि इस प्रकार अपने स्वरूप का प्रकाशन करने पर भेद से वह बाहर की ओर प्रकाशित होगा । क्योंकि यही बाहर का अवभासन है जो अपने स्वरूप का प्रकाशन है । इस शंका के समाधान में उत्तर देते हैं—यह स्मर्ता है वही अनुभव करनेवाला है, भिन्नकाल में होनेवाले ज्ञानों की उस हेतु से एकता है। स्मर्यमाण विषय का स्मृति से भेद हो जाने पर भासित होना उचित नहीं है ॥ ३ ॥ में तो पूर्व प्रमाताओं का जो ज्ञानाभास है उस स्मरण करनेवाले का पूर्व अनुभव से मिला हुआ रहता है और वही इस समय उन्मिलित हो जाता है । यही दोनों में भेद है । १. नियोग का अर्थ आज्ञा है और नियम का आवश्यभाव । क्योंकि मर्यादा ज्ञान आज्ञा करना रूपी है, स्वयं मर्यादा को जानकर दूसरों को उसका ज्ञान कराते हुए आज्ञा करना यही इसका तात्पर्य है, 'अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकामः' इसमें स्वर्गकाम के लिए यह अवश्य "जुहोति" हवन करना ही है, नहीं तो स्वर्गकाम का पारमार्थिक रूप नहीं रह जायेगा । इसलिए "भासयेत्" इस क्रिया में लिङ् लकार है । २. 'स्मृतेः' इस प्रयोग में पञ्चमी विभक्ति है ।

७० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-४, का.-३ स्मरणज्ञानात् भिन्नत्वेन बहीरूपतया यदि सोऽर्थो भासेत 'स्मर्यमाणस्य' च यत् 'भासनं' तदेव न स्यात् स्मर्यमाणमेव तत् न स्यात्, अनुभूयमानमेव तत् भवेत् इति यावत् । ननु चैवं कथं स्वलक्षणस्य प्रकाशनम् ? उक्तमेतत्—न इदानीं प्रकाशनम् अपि तु पूर्वकाले एव, तदा चासौ बहिरवभासत । ननु चेदानीं तर्हि किम् ?—विमर्शनम् इति ब्रूमः । ननु प्रकाशनविमर्शनयोः भिन्नकालत्वम् आपतितम् अतः किम् उभयमपि न किंचित् स्यात् अन्योन्यजीवितत्वात् अस्य ?, मैवम्, यस्य हि संवेदनान्येव भिन्नानि तत्त्वम् तस्य इदम् अप्रतिसमाधेयमेव, अस्मद्दर्शने तु भिन्न- काला अपि संविदः तत्कालात्यागेनैव एकताभासनेन स्वतन्त्रः प्रमाता यावदन्तर्मुखतया तावत्यंशे विमृशति तावत् प्रकाशस्य तात्कालिकबहिर्भावावभासो, विमर्शस्य इदानीन्तनान्तर्मुखा स्थितिरेव, एतदेव वेदनाधिकं वेदितृत्वं—वेदनेषु संयोजनवियोजनयोः यथारुचि करणं स्वातन्त्र्यम्, कर्तृत्वं च एतदेव उच्यते घटमहमन्वभूवम् इति वा, स घटः इति वा 'ऐक्यम्' अनुसंधानम् अनुसंधातुरभिन्नम् इति दर्शयितुं यदेव ऐक्यं 'स एव वेदिता' इति सामानाधिकरण्येन दर्शितम् । स्मरण ज्ञान से भिन्न होने के कारण बाहररूप से यदि वह अर्थ स्मरण ज्ञान से भिन्न होकर बाहर में भासित होगा 'स्मर्यमाण' स्मर्यमाण विषय का तो 'भासन' भासित होना होता है, वह स्मर्यमाण विषय हो नहीं होगा, उसे तो अनुभूयमान ही कहा जायेगा । तब फिर स्वलक्षण का प्रकाश कैसे बनेगा ? इस प्रश्न के उत्तर में कहते हैं कि प्रकाशन है वह इस समय का नहीं है अपितु पूर्व काल का ही है इस बात को हम पहले कह चुके हैं, तभी यह बाहर में अवभासित होता है। अब शंका करते हैं कि अभी जो वर्तमानकाल में प्रकाशमान हो रहा है वह क्या चीज है ?—यह तो विमर्शन है—ऐसा हम कहते हैं। जब ऐसी बात है तब तो प्रकाशन और विमर्शन में भिन्न- कालत्व आ पड़ेगा; दोनों का भी कुछ अर्थ नहीं है उससे फिर क्या लाभ होगा जब एक दूसरे परस्पर जीवित हैं तो कुछ भी दोनों से होनेवाला नहीं है ? ऐसी बात नहीं है, क्योंकि जिसका संवेदन ही भिन्न-भिन्न तत्त्व होता है उस बौद्ध के लिए यह अशक्य समर्थन ही है। हमारे शैवाद्वैत दर्शन में तो भिन्न काल के रहते हुए भी संविद्रूप के उस काल को नहीं छोड़ने से ही ऐक्यरूप के आभास होने से स्वतन्त्र प्रभाता माना जाता है, जहाँतक 'संवित्' अन्तर्मुखरूप से रहता है उतने अंश में ही विमर्शन करता है और वहाँतक ही प्रकाश का भी तात्कालिक बाहरी भाव में अवभास होता है, किन्तु विमर्शन की वर्तमानकाल में ही अन्तर्मुखी स्थिति रहती है, यही ज्ञान से अधिक बढ़ा-चढ़ा हुआ ज्ञाता का स्वरूप है एवं ज्ञानों में संयोजन और वियोजन अर्थात् मिलाने-हटाने की जैसी अपनी अभिरुचि है तदनुकूल करना ही स्वातन्त्र्य है, और इसीको कर्तृत्व भी कहा जाता है। या मैंने घट का अनुभव किया, 'वह घट है' ऐसा जो 'ऐक्य' वह अनुसंधानरूप स्वातन्त्र्य है वही ऐक्य अनुसन्धान करनेवाले से अभिन्न है, उसे बताने के लिए जो ऐक्यभाव का अनुसन्धान करनेवाला है 'स एव वेदिता' वही जाननेवाला आत्मा है; ऐसा एक विभक्ति से सामानाधिकरण्य दोनों में बताया गया है। 'एष स' 'यही वह है' इस कथन से जो १. वेदिता = आत्मा ।

अ.-१, आ.-४, का.-४ ] विमर्शिनीटीकोपेत [ ७१ ‘एष स’ इति आच्छादितस्येव प्रमातृतत्त्वस्य स्फुटावभासनं कृतम् इदम् इति विस्मयगर्भया भक्त्या प्रत्यभिज्ञानमेव सूचितम्। यदाह ग्रन्थकार एव- इत्थं स्वसंवित्तिमपह्नुवानैर्यनैर्दुरद्भिः कलुषीकृतं यत्। प्रमातृतत्त्वं स्फुटयुक्तिभिस्तान्मूकान्विधाय प्रकटीकृतं तत् ॥ इति ॥ ३ ॥ ननु च प्राच्य एव अनुभवो यदि स्मर्यमाणस्य बहिरवभासनरूपः प्रकाशः र्तार्ह इयत् उच्यताम्-सोऽनुभव इदानीं स्मरणेन विषयीक्रियते-इति, ऐक्येन तु अलौकिकेन कोऽर्थः इति व्यामोहं विहन्तुमाह- नैव ह्यनुभवो भाति स्मृतौ पूर्वोऽर्थवत्पृथक् । प्रागन्वभूवमहमित्यात्मारोहणभासनात् ॥ ४ ॥ वैधर्म्यसाधर्म्याभ्यां दृष्टान्तः ‘प्राक्’ इति अनुभवकाले यथा स ‘पूर्वो’ घटादिः अर्थः ‘पृथक्’ इति इदन्तया भाति स्म नैवं स्मरणकाले स्मृतिज्ञानात् पृथक्त्वेन इदं पूर्वमनुभवनम् इति ‘भाति’ । यथा च स्मृतिकाले तस्मात् स्मृतिज्ञानात् सोऽर्थः ‘प्राक्’ इति ‘पूर्वस्वभावो न भेदेन आभाति, स्मृतिकाले बहिरवभासाभावात् । एवं तत एव हेतोः ‘पूर्वोऽपि अनुभवो’ न भेदेन आभाति, कथं र्तार्ह उभयं भाति !-अन्वभूवम् इत्येवम् । एतत् किमुच्यते ?-इति चेत्, ढका हुआ सा था उस प्रमातृतत्त्व का स्फुट अवभासन कर दिया इस विस्मयगर्भ युक्ति से पहचान करा दिया कि यही वह है। ग्रन्थकार ने स्वयं इस विषय में कहा है- इस प्रकार छिपानेवाले बकवासियों के द्वारा जिस स्वसंवित् ज्ञान को कलुषित कर दिया है। उन्हें प्रस्फुट युक्तियों से मूक बनाकर प्रमातृतत्त्व को प्रकट कर दिया। अब शंका करते हैं कि पूर्व का ही अनुभव यदि स्मर्यमाण विषय का बाहर में अवभासित होनेवाला प्रकाश है तो इतना ओर कहिये कि वही अनुभव इस समय स्मरण का विषय किया जाता है यह जो अलौकिक ऐक्यभाव है उससे कौन सा प्रयोजन सिद्ध होगा; ऐसा जो बौद्धों का मोह (अज्ञान) है उसे दूर करने का उपाय बताते हैं। पूर्व का अनुभव स्मृति में अर्थ की भाँति अलग से नहीं भासित होता, मैंने पहले अनुभव किया था, उसी का कर्ता को आगे चलकर भान होता है ॥४॥ उस समय जैसे वस्तु-पदार्थ भासता था वैसे इस वर्तमान समय में नहीं भासता है, यह साधर्म्य है, जिसे अन्वयव्याप्तिक कहा जाता है, इस वर्तमान समय में जैसे एकरूप में अभेदरूप से भासता है वैसे उस काल में नहीं भासता था यह वैधर्म्य दृष्टान्त है। वैधर्म्य और साधर्म्य को दृष्टान्त देकर बताते हैं 'प्राक्' पूर्वकाल में जैसे वह 'पूर्वो' घटादि अर्थ 'पृथक्' भिन्न इदन्तया भासता था, वही इस समय स्मरणकाल में स्मृतिकाल से पृथक्त्वेन यह पूर्व का अनुभव नहीं 'भाति' भासता है। और अब साधर्म्य दृष्टान्त को बताते हैं। स्मृतिकाल में स्मृतिज्ञान से वह अर्थ 'प्राक्' पूर्व स्वभाववाला भेद से नहीं भासता है, क्योंकि स्मरणकाल में बाहरी अवभास का अभाव है। ऐसी अवस्था रहने पर उसी हेतु से [बाहरी अवभास का अभावरूप कारण होने से ] 'पूर्वोऽपि अनुभवः' पूर्व का भी अनुभव भेद से नहीं भासता है, तब उस समय अर्थ और अनुभव ये दोनों कैसे भासते हैं? इसके समाधान में इतना

७२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-४, का.-४ 'अहम्'—इत्येवं स्वभावो य 'आत्मा' पूर्वापरसंविदन्तर्मुखस्वभावः तत्र यत् 'आरोहणं' विश्रमः तेन हेतुना पूर्वसंविद्रूपतयाः स्वप्रकाशाया 'भासनात्' तल्लीनेस्यापि घटस्य स्वप्रकाशदेशीयत्वेन अवभासनम् । 'आत्मनि च आरोहणं' विश्रमणा अनुभवस्य अर्थस्य च । प्रकृतिप्रत्ययौ प्रत्ययार्थं सह ब्रूतः—इति न्यायात् संख्याक्षिप्ते तद्गते वा कर्तृभूतेऽस्मदर्थे प्रत्ययार्थेऽनुभवो बुङ्गितः तद्द्वारेण अर्थोऽपि च, न तु स्वातन्त्र्येणैव असौ, तदर्थमेव कर्म न निर्दिष्टम् । घटादिः पुनः अनुभवकाले न अस्मदर्थमारोहति, 'हि' यस्मात् नैव भाति पूर्वोऽनुभवः पृथक् अपरार्थोक्त्वात् हेतोः, तस्मात् संविदामैक्यम् इति पूर्वेण संबन्धः । लुङा भूतकालस्य द्योतितत्वात्, 'प्राक्' इति भिन्नक्रमः, उत्तमपुरुषेण अस्मदर्थस्य 'अहम्' इत्यपि, आरोहणम् इति रहिरपि णिजन्तोऽपि ॥ ४ ॥ ननु क एवमाह—अनुभवः पृथक् न भाति ?—इति, घटवत् न भाति—इति चेत् किं ततः ? घटोऽपि हि न अनुभवभङ्ग्या भाति—इति, किं न भाति ? स्वभावेन भाति—इति तु उभयत्रापि समानम् । तथाहि—अतीतानागतसूक्ष्मादि यथा योगिज्ञाने विषयोभवति इति अभ्युपगतम्, तथा परचित्तमपि 'प्रत्ययस्य परचित्तज्ञानम् ।' (योगद० ३ पा० १९ सू०) इत्यादौ । ही कहते हैं कि मैंने अनुभव किया था । तब ऐसा है, 'अहम्' ऐसा स्वभाववाला जो 'आत्मा' पूर्व-अपर [ अर्थका अनुभव और स्मृति ] ज्ञान को अपने भीतर रखनेवाले स्वभाव से युक्त होकर वहाँ जो 'आरोहण' विश्रम स्थिर हो जाना उस हेतु से पूर्व पदार्थ का ज्ञान संविद्रूप में स्वयं प्रकाशित है, उसीमें लीन हुए घट का भी स्वप्रकाश के तुल्य अवभासन है । 'आत्मनि च आरोहणम्, अर्थ का और अनुभव का आत्मा में आरोहण हो जाना ही विश्रमण कहलाता है । प्रकृति 'श्रम' धातु और 'युच्' प्रत्यय येही दोनों साथ रहकर अर्थ करते हैं [ इसमें 'ण्यासश्रन्थो युच्' ( पाणिनीय व्याकरण ३ अ-३ पाद० १९ सूत्र से युच् प्रत्यय हुआ है ] इन न्याय से विश्रमणा में एक वचन संख्या आक्षेप करने से उस संख्यावाले आत्मा में जो 'अस्मत्' शब्द का अर्थ कर्तृभूत है वह प्रत्ययार्थ है उसीमें अनुभव डूब जाता है और उसके द्वारा अर्थ भी डूब गया, अब वह स्वातन्त्र्यरूप से नहीं है, इसलिए कर्म का निर्देश नहीं किया है । पुनः घटादि अनुभव- काल में 'अस्मद्' अर्थ के ऊपर नहीं आरोहित होता है, 'हि' जिससे श्लोक में ऊपर कहे हुए हेतु से, जो कि हमने कहा है कि अनुभव पृथक् नहीं भासता इसलिए संवित् ज्ञानों को एकता है यह पूर्व के श्लोक से सम्बन्ध रखता है । 'अन्वभूवम्' इस क्रिया में 'लुङ्' लकार से भूतकाल झलकता है, 'प्राक्' इसका भिन्नक्रम अर्थ है, 'अस्मत्' शब्द का अर्थ 'अहम्' है उसके साथ 'प्राक्' का अन्वय है, आरोहण में 'रुहि' धातु का अर्थ 'णिजन्त' चढ़ा देना भी है ॥ ४ ॥ अब प्रश्न करते हैं कि ऐसा कौन कहता है अनुभव अलग से नहीं भासता है ? अनुभव घट की तरह अलग नहीं भासता है ऐसा यदि कहो, तो उससे क्या होना है [ स्मृति में नहीं भासता है ] घट भी तो अनुभवभंगी रीति से नहीं भासता है, क्यों नहीं भासता है ? अपने स्वभाव से भासता है; ऐसा यदि कहते हो, तो अनुभव और अर्थ में अन्तर ही नहीं रहा, तब तो फिर दोनों में समानता ही रह जायेगी । जैसे कि भूत और भविष्यगत सूक्ष्म परमाणु आदि योगी को प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर हो जाते हैं—यह बात स्वीकार की जाती है, उसी प्रकार दूसरों के चित्त का भी साक्षात्कार हो जाता है— 'प्रत्ययस्य परचित्तज्ञानम्'ति । ( पा० योगदर्शन ३ पा० १९ सूत्र )

अ.-१, आ.-४, का.-५ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ७३ तत्र ज्ञानवृत्तिपरिणतमेव सत्त्वं चित्तशब्देनोक्तम्, अन्यथा प्रत्ययस्य संयमविषयीकार्यत्वं किमुच्यते, आलम्बनयोगश्च कथं शङ्क्येत, — 'न च सालम्बनमिति —' तस्मात् परकीयमनुभवमिव निजमपि विषयीक्रियताम् इत्याशङ्क्य दृष्टान्त एवासिद्धः इति, 'भान्ति' इत्यन्तेन अभ्युपगमेन वा सिद्धत्वेऽपि प्रकृतेऽर्थे विषमः इति शेषेण दर्शयति— योगिनामपि भासन्ते न दृशो दर्शनान्तरे । स्वसंविदेकमानास्ता भान्ति मेयपदेऽपि वा ॥ ५ ॥ 'योगिनां' यत् एतत् 'दर्शनान्तरं' भावनाद्युद्भवः परचित्तविषयो ज्ञानविशेषः, तत्र 'दृशः' इति उपलब्धयो न भान्ति । तथाहि — सौगतानां तावत् स्वप्रकाशैकरूपं ज्ञानं, तत् चेत् ज्ञानान्तरेण वेद्यं, तर्हि यत् अस्य निजं वपुः अनन्यवेद्यतया प्रकाशनं नाम, न तत्प्रकाशितं स्यात् । परपुरुष की वृत्ति में ध्यानसंयम करने से उसके साक्षात्कार हो जाने पर उसके चित्त का बोध होता है कि उसका चित्त अभी रागयुक्त है अथवा वैराग्यवाला है अर्थात् दूसरे चित्त प्रविष्ट धर्मों को जानता है । 'न च तत्सालम्बनं तस्याविषयीभूतत्वात्' रागयुक्त वृत्ति को तो जान लेता है किन्तु इस आश्रय में रक्त है ऐसा ज्ञान का बोध योगी नहीं कर सकता, क्योंकि दूसरे पुरुष के चित्त का आलम्बन अविषय होता है । इसका चित्त नीलरंग विषयक है या पोतरंग विषयक है यह नहीं जानता है। जो ग्रहण नहीं किया है उसमें संयम करना असम्भव होने के कारण, दूसरे के चित्त का जो विषय है उसका ज्ञान नहीं होता उसी कारण दूसरे के चित्त को आलम्बन सहित नहीं ग्रहण किया जाता है, क्योंकि उसका आलम्बन अगृहीत होता है । परन्तु चित्त के धर्म ग्रहण किये जाते हैं। इसके चित्त से क्या वस्तु आलम्बित है जब ऐसा ध्यान किया जाता है तब ऐसा ध्यान संयम उसका करने से उस विषय का ज्ञान भी पैदा होता है। उसमें ज्ञानवृत्ति का परिणाम प्राप्त होनेवाले सत्त्व [ अन्तःकरण ] को चित्त शब्द से कहा गया है, अन्यथा ज्ञान का संयम करना क्या माने रखेगा, और तब फिर आलम्बन योग के विषय में शंका कैसे खड़ी होती है, 'न च सालम्बनमिति' — दूसरे के अनुभव जैसा अपना अनुभव भी [ सविषय ] सालम्बन करो ऐसी शंका करके योगी अर्थात् प्रत्ययरूप दृष्टान्त दिया है, वह असिद्ध हो जायेगा, इस बात को 'भान्ति' प्रकाशित होते हैं, यहाँ तक मान करके या प्रकृत अर्थ के सिद्ध हो जाने पर बचे हुए [ मेय ] पद से दिखाते हैं— दूसरे के विषय में योगी लोगों का ज्ञान भी नहीं भासता है। अथवा वे स्वसंवित् एकता को प्राप्त हुए विषयपद में भी प्रकाशित होते हैं ॥ ५ ॥ 'योगिनाम्' जो यह 'दर्शनान्तरम्' दूसरे के विषय में योगिजन को भूतार्थ-भावना पर्यन्त अन्य के चित्त का ज्ञान विशेष होता है, वहाँ पर 'दृशः' ज्ञान वेद्यरूप से नहीं भासित होते हैं। जैसा कि 'सौगत' बौद्धों का स्वप्रकाशरूप एकमात्र ज्ञान ही है, वह यदि दूसरे ज्ञान से वेद्य है, तो इसका अनन्य वेद्यतया प्रकाशित होना कैसे माना जायेगा, स्वयं प्रकाशित होने वाला ज्ञान दूसरे ज्ञान से प्रकाशित नहीं हो सकता। सांख्यों के मत में भी पुरुष का प्रतिबिम्ब ही ज्ञान [ बुद्धि, १०

७४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-४, का.-५ सांख्यानामपि पुरुषच्छायायैव उपलब्धिः, पुरुषश्च असंवैद्यपर्वा इति कथं वेद्यः स्यात् । वैशेषिकाणा- मपि आत्मनि अभेदेन समवायि संवेदनं परगतं मनसा कथं गृह्येत अन्तःशरीरवृत्तिना, तच्छरीरान्तरऽनुप्रवेशे तु तस्यैव अहम् इति शरीरीकरणात् अहन्तावभासितत्वात् आत्मनो भेदो विगलेत्, नित्यानुमेयत्वं तु न आत्मन उपपद्यते, ज्ञानस्य च ज्ञानान्तरवेद्यत्वेऽनवस्थादि उक्तम् । तस्मात् योगिनः परचित्तवेदनावसरे इयान् प्रकाशः —एतद्देहप्रकाशसहचारी घटसुखादि- प्रकाशः —इति । तत्र घटसुखादिः इदन्तया भाति, तद्गतस्तु प्रकाशोऽहम्—इत्येव स्वप्रकाशतया प्रकाशते । प्रमात्रीकृतपरदेहप्राणादिसमवभाससंस्कारात् तु तन्निष्ठाद् इदन्तां प्रकाशभागोऽपि मन्यमान इदं परज्ञानम् इति अभिमन्यते अविगलितस्वपरविभागो योगी । प्राप्तप्रकर्षस्तु सर्वम् आत्मत्वेन पश्यन् स्वसृष्टमेव स्वपरविभागं पश्यति इति ज्ञानस्य न योगिज्ञानेन प्रकाश्यता, भवतु वा तथापि प्रकृते न एतत् समम् । तथाहि—अयमनुभवति इति परनिष्ठ एव असौ अनुभवे योगिनः प्रकाशो, न तु अहमनुभवामि इति आत्मारोहेण, इह तु अन्वभूवम् इति अहम्प्रशिश्रान्तिः अनालीढेदंभावैव अनुभवस्य इति युक्तमुक्तम्—यस्मात् अनुभवः पृथक् न भाति तस्मात् ऐक्यं भिन्नकालानां संविदां वेदिता इति ॥ ५ ॥ उपलब्धि ] माना जाता है, और स्वयं पुरुष भी असंवैद्यवर्ग की श्रेणी में है वह वेद्य कैसे हो सकता है ? वैशेषिक काणादों का भी आत्मा में अभेद समवाय-सम्बन्ध, समवायी संवेदन, अन्तः- शरीरवृत्ति मन के द्वारा दूसरे के विषय को कैसे ग्रहण करेगा, उसके शरीर के भीतर प्रवेश कर लेने पर तो उसका ही 'अहम्' ऐसा जीवात्मा का रूप धारण कर लेने से और उसकी अहन्ता से अवभासित हो जाने से अपना भेद गल जायेगा, आत्मा का नित्य अनुमेयत्व नहीं हो सकेगा और एकता से दूसरा ज्ञान प्रकाशित होता है तो, अनवस्थादि दोष से ग्रस्त हो जायेगा, यह हम कह चुके हैं। इसलिए योगी को दूसरों के चित्त का ज्ञान करते समय ये जो कहे जाने वाले प्रकाश दूसरों के देह के साथ रहनेवाला घटसुखादि प्रकाश है उसकी चिन्ता को देख सकते हैं किन्तु घट सुखादि को नहीं जान सकते हो । घटसुखादि इदन्तरूप से अलग ही भासता है, घटसुखादि तो 'अहम्' इसी प्रकाश में प्रकाशित रहता है । अर्थात् अपने स्वयं के प्रकाश से प्रकाशित होता है । बनाये गये प्रमाता के दूसरे देह, प्राणादि अवभास के संस्कार से उसमें हुई इदन्ता को प्रकाशभाग में भी मानता हुआ यही उत्कृष्ट ज्ञान है—ऐसा समझ लेता है; जिसमें कि योगो दूसरे के साथ अपना भेदभाव नहीं रखता । दृढरूप से अपना और दूसरे का संस्कार भी विनष्ट हो जाने से, योगी आत्मभाव से देखता हुआ स्व-पर-विभाग को भी अपने आप से सर्जन किया हुआ ही देखता है । ज्ञान की प्रकाशता योगी के ज्ञान से नहीं होती है, क्योंकि वैसा उसका विषय न होता है, चित्त- मात्र को ही योगी विषय करता है, भले ही प्रकृत में उसकी आवश्यकता नहीं है। यही बात है देखो, यह अनुभव करता है ऐसा दूसरों के लिए ही अनुभव में योगी का प्रकाश है । मैं अनुभव करता हूँ ऐसा अपने को लगाकर प्रकाश नहीं होता, यहाँ पर मैंने अनुभव किया, ऐसा आत्मा 'अहम्' का उल्लेख है इदं-भाव का अनुभव नहीं चढ़ा हुआ है; इसीलिए हमने ठीक ही कहा है— जिससे अनुभव अलग नहीं भासता है इसीलिए भिन्न कालों के संवित् ज्ञानों को भी एकरूप से जानने वाला वेदिता इत्यादि ॥ ५ ॥

अ.-१, आ.-४, का.-६ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ७५ यदि अहँ-भावविश्रान्तिवशात् अनुभवः स्मृतौ पृथक् न भाति इति उच्यते, तदा परामर्शान्तरं साक्षादेव इदन्तया अनुभवं परामृशत्, यदि वा इदं-भावोचितघटादिविश्रान्तताम् अनुभवस्य प्रथयत् उपलब्धम्, इति तदनुसारेणापि किं न व्यवह्रियते इति पराभिप्रायं प्रतिक्षिपति- स्मर्यते यद्दृगासीन्मे सैवमित्यपि भेदतः । तद्व्याकरणमेवास्या मया दृष्टमिति स्मृतेः ॥ ६ ॥ लोकस्य तावत् एवं न संवेदनं, स हि न पृथग्भूतां दृशं कांचिद् मन्यते—‘सा दृक् मे आसीत्’ इत्येवम्, अपि तु यत् स्मर्यते एवंभूतमपि यत् स्मरणं कस्यचित् विवेचकंमन्यस्य, तत् स्मृतेर्व्याकरणम्, पदस्येव प्रकृतिप्रत्ययार्थनिरूपणं काल्पनिकं विभज्य आकरणं परत्र प्रतिपादन- मात्रम् । सोऽपि यदि मूलप्रतेर्ति विमृशति पूर्वोक्तक्रमेण, तदा अनुभवं पृथग्भूतं न वेद, यत एव तत् राहोः शिरः इतिवत् कल्पितं भेदं मन्यते, अन्यथा स घटः इतिवत् ‘सा दृक्’ इत्यत्रापि प्राक्तनं दृगन्तरम् अपेक्षणीयं स्यात् । तत् इत्थनेन हि घटस्य वा दृशो वा पूर्वानुभवविषयापत्तिः यदि अहं [ आत्मा के आरोहण से भासित होने से ] भाव की विश्रान्ति के कारण अनुभव स्मृति में अलग नहीं भासता है—ऐसा कहते हो, तो दूसरा परामर्श साक्षात् ही इदन्तरूप से अनुभव को परामर्श करेगा । अथवा इदंभाव से मिला हुआ घटादि के अनुभव की उपलब्धि को बढ़ाता हुआ उसके अनुसार भी क्यों न व्यवहार हो यह दूसरे के अभिप्राय का हस्तक्षेप करना है— जो मेरा ज्ञान था वह भी ऐसा ही भेदसे स्मरण होता है । इसी स्मृति का जो विस्तार है उसी को मैंने देखा ॥ ६ ॥ घट के विषय में मेरा अनुभव था इस कथन में भी घट ही वेद्य होता जैसा कि इस विषय में कहते हैं—‘घटज्ञानमिति ज्ञानं घटज्ञानविलक्षणम् । घट इत्यपि यज्ज्ञानं विषयोपनिपातितत् ॥’ घट ज्ञान का ज्ञान घट ज्ञान से विलक्षण है । घट यह ज्ञान भी विषय को ग्रहण करता है । संसार का ऐसा ज्ञान नहीं होता है, वैसी दृष्टि थी, वह मेरा अनुभव था ऐसा स्मरण होता है, दृष्टि को अलग नहीं मानता है वह विषय से भिन्न किसी दृष्टि की नहीं मानता, ‘सा दृक् मे आसीत्’ वह ज्ञान मेरा था ऐसा नहीं बोलता है, अपि तु जो किया है जो कोई ऐसा भी स्मरण मानेगा जिसमें किसी दूसरे का विचार करना पड़ेगा, उसे स्मृति का विस्तार कहते हैं, पद के जैसा प्रकृति-प्रत्यय के अर्थ का निरूपण काल्पनिक विभाग करके दूसरे को समझना मात्र है । वह भी यदि मूलप्रकृति का विचार करेगा तो ‘अहम्’ आत्मा के आरोहण का ही विचार करेगा । पूर्वोक्त क्रम से मैंने अनुभव किया, तब तो, अनुभव को अलग नहीं जानेगा, क्योंकि ‘राहोः शिरः राहु का शिर है’ इस प्रकार ‘काल्पनिक’ कल्पित भेद मानना पड़ेगा, यदि नहीं मानते हो तो फिर जैसा यह घट है ‘सा दृक्’ वह ज्ञान है इसमें भी पहले का दूसरा ज्ञान मानना पड़ेगा । उसको घट कहो अथवा वह ज्ञान कहो इस प्रकार पूर्व का अनुभव ही विषय हो जायेगा, अन्यथा ज्ञान इतना १. घट के विषय में मेरा अनुभव था इस कथन में भी घट ही वेद्य होता है । अतः इस विषय में कहते हैं— ‘घटज्ञानमिति ज्ञानं घटज्ञानविलक्षणम् । घट इत्यपि यज्ज्ञानं विषयोपनिपाति तत् ॥’ घट ज्ञान का ज्ञान घटज्ञान से बिलक्षण है । घट यह ज्ञान भी विषय को ही ग्रहण करता है ।