भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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पृष्ठ 87

६४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-४, का.-१ भवविषयीकृतस्वलक्षणप्रकाशनसामर्थ्यमुक्तम् । तृतीयेन अनुभवेन तद्विषयेण च एकीभाव पर्यन्त आवेशः स्मरणस्य उक्तः। तुरीयेण अनुभवस्य न विषयतया स्मृत्या प्रकाशनम्, —इति निरूपितम् । पञ्चमेन योगिज्ञानमपि अनुभवं पृथग्भावेन न विषयीकरोति, —इति वदता तुर्यश्लोकार्थ एव उपोद्वलितः । षष्ठेनाशङ्क्यमानम् अनुभवस्य स्मृत्या पृथग्विषयीकरणं काल्पनिकम्,—इत्यवास्तविकृतम् । सप्तमेन स्मृतिप्रसङ्गात् विकल्पेऽपि पूर्वानुभवेन ऐक्यात्मावेशो दर्शितः अष्टमेन स्मर्त्तव्यस्य, स्मृतेः स्मर्तुश्च एकचित्तत्त्वविश्रान्तिः उक्ता; प्रसङ्गाच्च दृश्यस्य, दर्शनस्य द्रष्टुश्च,—इति तात्पर्यार्थः । अथ क्रमेण श्लोकार्थ उच्यते । स हि पूर्वानुभूतार्थोपलब्धा परतोऽपि सन् । विमृशन्स इति स्वैरी स्मरतीत्यपदिश्यते ॥ १ ॥ 'पूर्वमनुभूतस्य अर्थस्य' य 'उपलब्धा' अन्तर्मुखो बोधः स तावत् अद्यापि 'परतः' स्मृति- पूर्व के अनुभव से विषय किया हुआ स्वलक्षण प्रकाशन-सामर्थ्य कहा है। तृतीय श्लोक से अनुभव और उसके विषय से स्मरण का एक में जबतक मिल नहीं जाता है यह बताया है। चतुर्थ श्लोक से अनुभव विषयरूप से स्मृति द्वारा अलग नहीं भासता है ऐसा निरूपण हुआ है। पञ्चम श्लोक से योगिजन का ज्ञान भी अनुभव को भिन्नरूप से विषय नहीं करता है, इसको आचार्य ने चतुर्थ श्लोक के अर्थ में ही दृढ कर दिया है। षष्ठ श्लोक से शङ्का किये हुए अनुभव का स्मृति से 'इदन्तया' भेदयुक्त ज्ञान कल्पना का विषयमात्र है, जब कि वह वास्तविक नहीं है। सप्तम श्लोक से स्मृति के प्रसङ्ग से विकल्प ज्ञान में भी अनुभव के द्वारा एकता में मिल जाना यह दिखलाया है। अष्टम श्लोक से स्मर्त्तव्य विषय का, स्मृतिज्ञान और स्मरण करनेवाला स्मर्ता पारमार्थिक एक चित्तत्त्व महाप्रकाश की प्रमाता में विश्रान्ति होना बताया है; और प्रसङ्ग से दृश्य का, दर्शन का और द्रष्टा का, इतना ही इसका तात्पर्यार्थ है। इसके पश्चात् अब क्रम से श्लोकार्थ कहा जाता है। वही पूर्व के अनुभूत अर्थ को प्राप्त करनेवाला पूर्वानुभवकाल से अन्य स्मरण काल में कारण विद्यमान रहता है। वह स्वतन्त्ररूप बोधात्मा विचार करता हुआ स्मरण करता है—ऐसा उपदेश दिया जाता है ॥ १ ॥ 'पूर्वमनुभूतस्य अर्थस्य' जिसने पूर्व अनुभूत अर्थ का अन्तर्मुख बोध प्राप्त किया था, वह वर्तमान समय में भी रहता ही है, संविद्रूपमात्रस्वरूप का काल से किये हुए संकोचरूप विशेषात्मक रूप से विच्छेद का सम्बन्ध नहीं हो सकता । जिस स्थितिमें है उसीमें वह रहेगा, [ क्योंकि उससे अभिन्न एक रूप होने के कारण पूर्व की अनुभूत वस्तु की स्थिति सम्भव नहीं होगी। इससे फिर स्मरण कैसे बनेगा। स्मृति का सर्व आकारवाला स्वातन्त्र्य होता है ऐसा दिवाकर भट्ट ने कहा है— सर्वेऽनुभूता यदि नान्तरर्थास्त्वदात्मसात्कारसुरक्षिताः स्युः । विज्ञातवस्त्वप्रतिमोषरूपा काचित्स्मृतिर्नाम न सम्भवेत्तत् ॥ “यदि अन्तर्वर्ती अनुभूत अर्थ तुम्हारी आत्मा में सुरक्षित नहीं रहेगा, विज्ञात वस्तु के असदृशरूप होने से कुछ भी स्मृति सम्भव नहीं होगी।”]