भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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पृष्ठ 86

अथ प्रथमे ज्ञानाधिकारे स्मृतिशक्तिनिरूपणाख्यं चतुर्थमाह्निकम् पदार्थरत्ननिकरं निजहृद्गञ्जपुञ्जितम् । ग्रन्थन्तं स्मृतिसूत्रान्तः संतत्यैव स्तुमः शिवम् ॥१॥ एवं ज्ञानपूर्विका स्मृतिः, तदुभयानुग्राहिणी अपोहनशक्तिः, —इति तावात् वस्तुसंभवक्रमेण प्रदर्शितम् । उपक्रमानुसारेण स्मृतिरेव सूचितप्रसङ्गविपर्ययसमर्थनदृशा विवेच्या । 'सत्यं किंतु स्मृतिज्ञानम्..............।' इति हि उपक्रान्तम् । तत्र संस्कारमात्रात् तावत् मा नाम उदपादि स्मृतिः, इदं तु वक्तव्यम्— तथाभूतभवदभ्युपगतभगवत्प्रभावोऽपि कथम् एनां कुर्यात् ?,—इति शङ्कां शमयितुं स्मृतितत्त्व- निरूपणाय 'स हि पूर्वानुभूतार्थोपलब्धा.........।' इत्यादि'............'अर्थो भातः प्रमातरि ।' इत्यन्तं श्लोकाष्टकम् । तत्र श्लोकेन स्वपक्षे स्मृतिरुपपन्ना,-इति कथितम् । द्वितीयेन स्मृतेः पूर्वानु- पदार्थरूपी रत्नसमूह [ सभी पदार्थसमूह को आभासित करनेवाले चिदानन्तसार ] को अपने हृदयरूपी स्थान [ आकर ] में एकत्रित किया गया है । स्मृतिरूपी सूत्र के भीतर क्रम से गूँथनेवाले उस शिव की हम स्तुति करते हैं ॥ १ ॥ इस प्रकार ज्ञानपूर्वक स्मृति होती है, ज्ञान और स्मृति को अन्तर में जगानेवाली अपोहन-शक्ति है, पहले किसी प्रकार वस्तु सम्भव हो सके उसे क्रमशः दिखलाया है । प्रारम्भ में जैसा कहा गया है उसके अनुसार स्मृति को ही सूचित किये गये प्रसङ्ग के विपरीत समर्थन की दृष्टि से विचार करना होगा । 'सत्यं किंतु स्मृतिज्ञानम्............ । [ पूर्वपक्ष में 'अथानुभवविध्वंसे स्मृतिः' तथा सिद्धान्तपक्ष में भी 'सत्यं किंतु' ठीक ही है 'न चेत्' इससे आत्म ईश्वर-सिद्धि में सातिशय अभिज्ञान माना है । गीता में भी भगवान् ने कहा है कि—'मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च' पहले देखी-सुनी या किसी प्रकार भी अनुभव की हुई वस्तु या घटनादि के स्मरण का नाम 'स्मृति' है । किसी भी वस्तु को यथार्थ जान लेने की शक्ति का नाम 'ज्ञान' है—तथा संशय-विपर्यय आदि वितर्क जाल का वाचक 'ऊहन' है और उससे दूर होने का नाम 'अपोहन' है । ये तीनों मुझसे ही होते हैं । ] क्योंकि ऐसा ही प्रारम्भ में कहा गया है । उस जगह भले ही संस्कारमात्र से स्मृति उत्पन्न होती हो, किन्तु यह तो कहना ही पड़ेगा कि—आपके कल्पना किये हुए भगवान् का प्रभाव इसको तैयार कर खड़ा कैसे करेगा ? [ प्रभाव उसी वस्तु-पदार्थ को कहा जाता है जो असम्भव को भी सम्भव कर सकने में समर्थ हो । ] इस शङ्का के शमनार्थ स्मृतितत्त्व का निरूपण करने के लिए 'स हि पूर्वानुभूतार्थो- पलब्धा......।' यहाँ से लेकर'.....'अर्थो भातः प्रमातरि ।' पर्यन्त आठ श्लोक कहे गये हैं । प्रथम श्लोक से अपने सिद्धान्त पक्ष में स्मृति उत्पन्न होती है, यह कहा गया है । द्वितीय श्लोक से