ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-३, का.-७ तत्रापि परमात्मनि सा स्थिता ।।' इत्यादि । एतासां च ज्ञानादिशक्तीनाम् असंख्यप्रकारो वैचित्र्यविकल्पः, — इति तत्सामर्थ्यं स्वातन्त्र्यम्, अपराधीनं पूर्णं महदैश्वर्यं तन्निमित्तब्रह्म- विष्णुरुद्राद्यैश्वर्यापेक्षया उच्यते । तदेव 'चिद्वपुः' इत्येवं कृत्वा इयदायातम् 'विश्वरूपः' इति । तत एव च परिनिष्ठितैकरूपजडभाववैलक्षण्यात् ज्ञानादिशक्तियुक्ततामाहेश्वर्यम् उपसंप्राप्तः । एतदनुपगमे न किंचित् इदं भासेत, — इति प्रसङ्गः । भासते तु; तस्मात् एतत् अवश्यम् अङ्गीकर्तव्यम्, — इति प्रसङ्गविपर्ययः । नश्येज्जनस्थितिः, यद्येवं न स्यात्, — इति प्राक्तनेन श्लोकेन सह प्रसङ्गः 'चेत्' इत्यनेन तद्विपर्ययः सूचितः ॥ ७ ॥ आदितः ॥ २३ ॥ इति श्रीमदाचार्याभिनवगुप्तविरचितायां ईश्वरप्रत्यभिज्ञासूत्रविमर्शिन्यां ज्ञानाधिकारे परदर्शनानुपपत्तिर्नाम तृतीयमाह्निकम् ॥ ३॥ प्राण और पुर्यष्टक से बद्ध जीव में अर्थस्थिति नियन्त्रित रहती है तथापि वह परमात्मा में रहती है जीव में नहीं रहती ।' इन ज्ञानादिशक्तियों के असंख्य प्रकार से विचित्र विकल्प होते हैं, उसी के सामर्थ्य से स्वा- तन्त्र-शक्ति रहती है अर्थात् उसी का नाम सामर्थ्य एवं स्वातन्त्र्य है । ईश्वर का स्वातन्त्र्य पराधीन न होकर स्वाधीन रहता है और पूर्ण एवं महा ऐश्वर्य से संयुक्त है, क्योंकि ब्रह्मा, विष्णु एवं अन्य देवों में जो सामर्थ्य है उससे वह बढ़ा-चढ़ा रहता है अर्थात् इसके सामर्थ्य से ही ये सभी देवता आदि सामर्थ्यशाली होते हैं । वही 'चिद्वपुः' चेतन शरीरधारी ईश्वर है इतने निबन्ध से इनका विश्वरूपत्व सिद्ध होता है । इसी से परिनिष्ठित एक रूप में रहते हैं जड से विलक्षण इनका स्वरूप है तथा ज्ञानादि शक्तियों से युक्त होकर महा ऐश्वर्य को प्राप्त किये रहते हैं । इनको न मानने पर कुछ भी भासित नहीं होगा, ऐसा प्रसंग आ पड़ेगा । किन्तु भासित ही होता है; इसलिए इसे अवश्य स्वीकार करना चाहिए, यही प्रसंग का विपर्यय व्यतिरेक है। यदि ऐसा न हो तो लोक- व्यवहार विनष्ट हो जायेगा, पहले श्लोक के साथ प्रसंग लगाकर 'चेत्' इससे विपरीत प्रसंग विपर्यय कहा है यह सूचित हुआ ॥ १७ ॥ ॥ तृतीय आह्निक समाप्त ॥ १. न सा जीवकला काचित्संतानद्वयवर्तिनी । व्याप्त्री शिवकला यस्यामधिष्ठात्री न विद्यते ॥ दो सन्तानों से व्यवहृत होनेवाली [ ज्ञान सन्तान और क्रिया सन्तान ] कोई भी जीवकला ऐसी नहीं दिखती है कि जिसमें शिवकला अधिष्ठात्री होकर व्याप्त न रहती हो ।