ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-३, का.-७ ] विमर्शिनीटीकोपेतम् [ ६१ इदमपि प्रवाहपतितम् ऊरीकार्यम्—यत् किल तत् आभास्यते तत् संविदो विच्छिद्यते, संविच्च ततः, संविच्च संविदान्तरात्, संवेद्यं च संवेद्यान्तरात्; नच विच्छेदनं वस्तुतः संभवति,— इति विच्छेदनस्य अवभासमात्रम् उच्यते । नच तत् इयता अपारमार्थिकम्, निर्मीयमाणस्य सर्वस्य अयमेव परमार्थो यतः । एष एव परितश्छेदनात् परिच्छेद उच्यते, तदवभासनसामर्थ्यम् अपोहन- शक्तिः । अनेन शक्तित्रयेण विश्वे व्यवहाराः । तच्च भगवत एव शक्तित्रयं—यत् तथाभूतानुभवितृ- स्मर्तृ-विकल्पयितृस्वभावचैत्रमैत्राद्यवभासनम् । स एव हि तेन तेन वपुषा जानाति, स्मरति विकल्पयति च । यथोक्तम् आचार्येणैव 'यद्यप्यर्थस्थितिः प्राणपुर्यष्टकनियन्त्रिते। जीवे निरुद्धा विश्व उससे परिपूर्ण हो जाता है, इससे कोई नयी-वस्तु आभासित या स्मृत नहीं होती है । यह जो आगे कहेंगे सबको स्वीकार करना होगा—वह आभासित होता है वह संवित् ज्ञान भिन्न है और संवित् ज्ञान भी उससे भिन्न होता है और संवित् ज्ञान अन्य संवित् ज्ञान से भिन्न होता है तथा संवेद्य भी दूसरे संवेद्य से भिन्न होता है; इसी से वहाँ विच्छेदन का आभासमात्र कहा जाता है और विच्छेदन इसी कारण अपारमार्थिक नहीं है; क्योंकि सब निर्मीयमाण पदार्थ परमार्थतः सत्य ही होते हैं। वह परिच्छिन्न होने के कारण ‘परिच्छिन्न'—संकुचित कहा जाता है—उसका ठीक-ठीक आभासित नहीं होना, अपोहन-शक्ति कही जाती है। भगवान् के जिस मायारूप स्वातन्त्र्य-शक्ति से मायीय जीव प्रमाता का विकल्परूप ज्ञान होता है वही अपोहन- शक्ति है। इन्हीं तीनों शक्तियों से सारे विश्व का व्यवहार-विचार आदि कार्य होते रहते हैं। ये तीनों शक्तियाँ भगवान् महेश्वर की ही हैं—जो कि स्वभाव से ही अनुभव करनेवाले, स्मरण करनेवाले और विकल्प करनेवाले चैत्र-मैत्र आदि का अवभासन करते हैं। वे ही उस-उस शरीर से जानते हैं, स्मरण करते हैं और विकल्प करते हैं। जैसे कि आचार्य ने कहा है—'यद्यपि १. देश, कालादि विशेष अवच्छेद से शून्य होने के कारण विचित्र इच्छा से अवबोधित, केवल आभास भेदसंस्कार के द्वारा उत्पन्न हुए विकल्परूप विज्ञानवाली अपोहन-शक्ति कहलाती है, पूर्व अवभासित वस्तु का, पूर्व में अवभासित हुए पदार्थ के साथ वर्तमान समय में प्रकाश होना ही प्रख्यापन-शक्ति है, अपोहन-शक्ति और स्मृति-शक्ति इन दोनों में यही भेद है । २. भगवान् की जिस स्वातन्त्र्य-शक्ति के द्वारा मायीय प्रमाता का विकल्परूप हो जाता है वही अपोहन- शक्ति है । ३. न वह्नेर्दाहिका शक्तिर्व्यतिरिक्ता विभाव्यते । केवलं ज्ञानसत्तायाः प्रारम्भोऽयं प्रवेशने ॥ “वह्नि में रहनेवाली जो वह्नि की दाहिका शक्ति है वह वह्नि से भिन्न देश-काल में नहीं रहती अपितु उसी में रहती है। यह केवल ज्ञान सत्तामें प्रवेश करने केलिए ही प्रारम्भ होता है ।” इस आगम के कथन से अग्नि दाहक, पाचक, प्रकाशक इत्यादि अनेक परामर्शों की प्रधानता में शक्ति का व्यवहार देखा जाता है। वह्नि में परामर्शोन की प्रधानता होने के कारण लोक में वह्नि का ही व्यवहार होता है ।