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ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

अ.-१, आ.-३, का.-७ ] विमर्शिनीटीकोपेतम् [ ६१ इदमपि प्रवाहपतितम् ऊरीकार्यम्—यत् किल तत् आभास्यते तत् संविदो विच्छिद्यते, संविच्च ततः, संविच्च संविदान्तरात्, संवेद्यं च संवेद्यान्तरात्; नच विच्छेदनं वस्तुतः संभवति,— इति विच्छेदनस्य अवभासमात्रम् उच्यते । नच तत् इयता अपारमार्थिकम्, निर्मीयमाणस्य सर्वस्य अयमेव परमार्थो यतः । एष एव परितश्छेदनात् परिच्छेद उच्यते, तदवभासनसामर्थ्यम् अपोहन- शक्तिः । अनेन शक्तित्रयेण विश्वे व्यवहाराः । तच्च भगवत एव शक्तित्रयं—यत् तथाभूतानुभवितृ- स्मर्तृ-विकल्पयितृस्वभावचैत्रमैत्राद्यवभासनम् । स एव हि तेन तेन वपुषा जानाति, स्मरति विकल्पयति च । यथोक्तम् आचार्येणैव 'यद्यप्यर्थस्थितिः प्राणपुर्यष्टकनियन्त्रिते। जीवे निरुद्धा विश्व उससे परिपूर्ण हो जाता है, इससे कोई नयी-वस्तु आभासित या स्मृत नहीं होती है । यह जो आगे कहेंगे सबको स्वीकार करना होगा—वह आभासित होता है वह संवित् ज्ञान भिन्न है और संवित् ज्ञान भी उससे भिन्न होता है और संवित् ज्ञान अन्य संवित् ज्ञान से भिन्न होता है तथा संवेद्य भी दूसरे संवेद्य से भिन्न होता है; इसी से वहाँ विच्छेदन का आभासमात्र कहा जाता है और विच्छेदन इसी कारण अपारमार्थिक नहीं है; क्योंकि सब निर्मीयमाण पदार्थ परमार्थतः सत्य ही होते हैं। वह परिच्छिन्न होने के कारण ‘परिच्छिन्न'—संकुचित कहा जाता है—उसका ठीक-ठीक आभासित नहीं होना, अपोहन-शक्ति कही जाती है। भगवान् के जिस मायारूप स्वातन्त्र्य-शक्ति से मायीय जीव प्रमाता का विकल्परूप ज्ञान होता है वही अपोहन- शक्ति है। इन्हीं तीनों शक्तियों से सारे विश्व का व्यवहार-विचार आदि कार्य होते रहते हैं। ये तीनों शक्तियाँ भगवान् महेश्वर की ही हैं—जो कि स्वभाव से ही अनुभव करनेवाले, स्मरण करनेवाले और विकल्प करनेवाले चैत्र-मैत्र आदि का अवभासन करते हैं। वे ही उस-उस शरीर से जानते हैं, स्मरण करते हैं और विकल्प करते हैं। जैसे कि आचार्य ने कहा है—'यद्यपि १. देश, कालादि विशेष अवच्छेद से शून्य होने के कारण विचित्र इच्छा से अवबोधित, केवल आभास भेदसंस्कार के द्वारा उत्पन्न हुए विकल्परूप विज्ञानवाली अपोहन-शक्ति कहलाती है, पूर्व अवभासित वस्तु का, पूर्व में अवभासित हुए पदार्थ के साथ वर्तमान समय में प्रकाश होना ही प्रख्यापन-शक्ति है, अपोहन-शक्ति और स्मृति-शक्ति इन दोनों में यही भेद है । २. भगवान् की जिस स्वातन्त्र्य-शक्ति के द्वारा मायीय प्रमाता का विकल्परूप हो जाता है वही अपोहन- शक्ति है । ३. न वह्नेर्दाहिका शक्तिर्व्यतिरिक्ता विभाव्यते । केवलं ज्ञानसत्तायाः प्रारम्भोऽयं प्रवेशने ॥ “वह्नि में रहनेवाली जो वह्नि की दाहिका शक्ति है वह वह्नि से भिन्न देश-काल में नहीं रहती अपितु उसी में रहती है। यह केवल ज्ञान सत्तामें प्रवेश करने केलिए ही प्रारम्भ होता है ।” इस आगम के कथन से अग्नि दाहक, पाचक, प्रकाशक इत्यादि अनेक परामर्शों की प्रधानता में शक्ति का व्यवहार देखा जाता है। वह्नि में परामर्शोन की प्रधानता होने के कारण लोक में वह्नि का ही व्यवहार होता है ।

६२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-३, का.-७ तत्रापि परमात्मनि सा स्थिता ।।' इत्यादि । एतासां च ज्ञानादिशक्तीनाम् असंख्यप्रकारो वैचित्र्यविकल्पः, — इति तत्सामर्थ्यं स्वातन्त्र्यम्, अपराधीनं पूर्णं महदैश्वर्यं तन्निमित्तब्रह्म- विष्णुरुद्राद्यैश्वर्यापेक्षया उच्यते । तदेव 'चिद्वपुः' इत्येवं कृत्वा इयदायातम् 'विश्वरूपः' इति । तत एव च परिनिष्ठितैकरूपजडभाववैलक्षण्यात् ज्ञानादिशक्तियुक्ततामाहेश्वर्यम् उपसंप्राप्तः । एतदनुपगमे न किंचित् इदं भासेत, — इति प्रसङ्गः । भासते तु; तस्मात् एतत् अवश्यम् अङ्गीकर्तव्यम्, — इति प्रसङ्गविपर्ययः । नश्येज्जनस्थितिः, यद्येवं न स्यात्, — इति प्राक्तनेन श्लोकेन सह प्रसङ्गः 'चेत्' इत्यनेन तद्विपर्ययः सूचितः ॥ ७ ॥ आदितः ॥ २३ ॥ इति श्रीमदाचार्याभिनवगुप्तविरचितायां ईश्वरप्रत्यभिज्ञासूत्रविमर्शिन्यां ज्ञानाधिकारे परदर्शनानुपपत्तिर्नाम तृतीयमाह्निकम् ॥ ३॥ प्राण और पुर्यष्टक से बद्ध जीव में अर्थस्थिति नियन्त्रित रहती है तथापि वह परमात्मा में रहती है जीव में नहीं रहती ।' इन ज्ञानादिशक्तियों के असंख्य प्रकार से विचित्र विकल्प होते हैं, उसी के सामर्थ्य से स्वा- तन्त्र-शक्ति रहती है अर्थात् उसी का नाम सामर्थ्य एवं स्वातन्त्र्य है । ईश्वर का स्वातन्त्र्य पराधीन न होकर स्वाधीन रहता है और पूर्ण एवं महा ऐश्वर्य से संयुक्त है, क्योंकि ब्रह्मा, विष्णु एवं अन्य देवों में जो सामर्थ्य है उससे वह बढ़ा-चढ़ा रहता है अर्थात् इसके सामर्थ्य से ही ये सभी देवता आदि सामर्थ्यशाली होते हैं । वही 'चिद्वपुः' चेतन शरीरधारी ईश्वर है इतने निबन्ध से इनका विश्वरूपत्व सिद्ध होता है । इसी से परिनिष्ठित एक रूप में रहते हैं जड से विलक्षण इनका स्वरूप है तथा ज्ञानादि शक्तियों से युक्त होकर महा ऐश्वर्य को प्राप्त किये रहते हैं । इनको न मानने पर कुछ भी भासित नहीं होगा, ऐसा प्रसंग आ पड़ेगा । किन्तु भासित ही होता है; इसलिए इसे अवश्य स्वीकार करना चाहिए, यही प्रसंग का विपर्यय व्यतिरेक है। यदि ऐसा न हो तो लोक- व्यवहार विनष्ट हो जायेगा, पहले श्लोक के साथ प्रसंग लगाकर 'चेत्' इससे विपरीत प्रसंग विपर्यय कहा है यह सूचित हुआ ॥ १७ ॥ ॥ तृतीय आह्निक समाप्त ॥ १. न सा जीवकला काचित्संतानद्वयवर्तिनी । व्याप्त्री शिवकला यस्यामधिष्ठात्री न विद्यते ॥ दो सन्तानों से व्यवहृत होनेवाली [ ज्ञान सन्तान और क्रिया सन्तान ] कोई भी जीवकला ऐसी नहीं दिखती है कि जिसमें शिवकला अधिष्ठात्री होकर व्याप्त न रहती हो ।

अथ प्रथमे ज्ञानाधिकारे स्मृतिशक्तिनिरूपणाख्यं चतुर्थमाह्निकम् पदार्थरत्ननिकरं निजहृद्गञ्जपुञ्जितम् । ग्रन्थन्तं स्मृतिसूत्रान्तः संतत्यैव स्तुमः शिवम् ॥१॥ एवं ज्ञानपूर्विका स्मृतिः, तदुभयानुग्राहिणी अपोहनशक्तिः, —इति तावात् वस्तुसंभवक्रमेण प्रदर्शितम् । उपक्रमानुसारेण स्मृतिरेव सूचितप्रसङ्गविपर्ययसमर्थनदृशा विवेच्या । 'सत्यं किंतु स्मृतिज्ञानम्..............।' इति हि उपक्रान्तम् । तत्र संस्कारमात्रात् तावत् मा नाम उदपादि स्मृतिः, इदं तु वक्तव्यम्— तथाभूतभवदभ्युपगतभगवत्प्रभावोऽपि कथम् एनां कुर्यात् ?,—इति शङ्कां शमयितुं स्मृतितत्त्व- निरूपणाय 'स हि पूर्वानुभूतार्थोपलब्धा.........।' इत्यादि'............'अर्थो भातः प्रमातरि ।' इत्यन्तं श्लोकाष्टकम् । तत्र श्लोकेन स्वपक्षे स्मृतिरुपपन्ना,-इति कथितम् । द्वितीयेन स्मृतेः पूर्वानु- पदार्थरूपी रत्नसमूह [ सभी पदार्थसमूह को आभासित करनेवाले चिदानन्तसार ] को अपने हृदयरूपी स्थान [ आकर ] में एकत्रित किया गया है । स्मृतिरूपी सूत्र के भीतर क्रम से गूँथनेवाले उस शिव की हम स्तुति करते हैं ॥ १ ॥ इस प्रकार ज्ञानपूर्वक स्मृति होती है, ज्ञान और स्मृति को अन्तर में जगानेवाली अपोहन-शक्ति है, पहले किसी प्रकार वस्तु सम्भव हो सके उसे क्रमशः दिखलाया है । प्रारम्भ में जैसा कहा गया है उसके अनुसार स्मृति को ही सूचित किये गये प्रसङ्ग के विपरीत समर्थन की दृष्टि से विचार करना होगा । 'सत्यं किंतु स्मृतिज्ञानम्............ । [ पूर्वपक्ष में 'अथानुभवविध्वंसे स्मृतिः' तथा सिद्धान्तपक्ष में भी 'सत्यं किंतु' ठीक ही है 'न चेत्' इससे आत्म ईश्वर-सिद्धि में सातिशय अभिज्ञान माना है । गीता में भी भगवान् ने कहा है कि—'मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च' पहले देखी-सुनी या किसी प्रकार भी अनुभव की हुई वस्तु या घटनादि के स्मरण का नाम 'स्मृति' है । किसी भी वस्तु को यथार्थ जान लेने की शक्ति का नाम 'ज्ञान' है—तथा संशय-विपर्यय आदि वितर्क जाल का वाचक 'ऊहन' है और उससे दूर होने का नाम 'अपोहन' है । ये तीनों मुझसे ही होते हैं । ] क्योंकि ऐसा ही प्रारम्भ में कहा गया है । उस जगह भले ही संस्कारमात्र से स्मृति उत्पन्न होती हो, किन्तु यह तो कहना ही पड़ेगा कि—आपके कल्पना किये हुए भगवान् का प्रभाव इसको तैयार कर खड़ा कैसे करेगा ? [ प्रभाव उसी वस्तु-पदार्थ को कहा जाता है जो असम्भव को भी सम्भव कर सकने में समर्थ हो । ] इस शङ्का के शमनार्थ स्मृतितत्त्व का निरूपण करने के लिए 'स हि पूर्वानुभूतार्थो- पलब्धा......।' यहाँ से लेकर'.....'अर्थो भातः प्रमातरि ।' पर्यन्त आठ श्लोक कहे गये हैं । प्रथम श्लोक से अपने सिद्धान्त पक्ष में स्मृति उत्पन्न होती है, यह कहा गया है । द्वितीय श्लोक से

६४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-४, का.-१ भवविषयीकृतस्वलक्षणप्रकाशनसामर्थ्यमुक्तम् । तृतीयेन अनुभवेन तद्विषयेण च एकीभाव पर्यन्त आवेशः स्मरणस्य उक्तः। तुरीयेण अनुभवस्य न विषयतया स्मृत्या प्रकाशनम्, —इति निरूपितम् । पञ्चमेन योगिज्ञानमपि अनुभवं पृथग्भावेन न विषयीकरोति, —इति वदता तुर्यश्लोकार्थ एव उपोद्वलितः । षष्ठेनाशङ्क्यमानम् अनुभवस्य स्मृत्या पृथग्विषयीकरणं काल्पनिकम्,—इत्यवास्तविकृतम् । सप्तमेन स्मृतिप्रसङ्गात् विकल्पेऽपि पूर्वानुभवेन ऐक्यात्मावेशो दर्शितः अष्टमेन स्मर्त्तव्यस्य, स्मृतेः स्मर्तुश्च एकचित्तत्त्वविश्रान्तिः उक्ता; प्रसङ्गाच्च दृश्यस्य, दर्शनस्य द्रष्टुश्च,—इति तात्पर्यार्थः । अथ क्रमेण श्लोकार्थ उच्यते । स हि पूर्वानुभूतार्थोपलब्धा परतोऽपि सन् । विमृशन्स इति स्वैरी स्मरतीत्यपदिश्यते ॥ १ ॥ 'पूर्वमनुभूतस्य अर्थस्य' य 'उपलब्धा' अन्तर्मुखो बोधः स तावत् अद्यापि 'परतः' स्मृति- पूर्व के अनुभव से विषय किया हुआ स्वलक्षण प्रकाशन-सामर्थ्य कहा है। तृतीय श्लोक से अनुभव और उसके विषय से स्मरण का एक में जबतक मिल नहीं जाता है यह बताया है। चतुर्थ श्लोक से अनुभव विषयरूप से स्मृति द्वारा अलग नहीं भासता है ऐसा निरूपण हुआ है। पञ्चम श्लोक से योगिजन का ज्ञान भी अनुभव को भिन्नरूप से विषय नहीं करता है, इसको आचार्य ने चतुर्थ श्लोक के अर्थ में ही दृढ कर दिया है। षष्ठ श्लोक से शङ्का किये हुए अनुभव का स्मृति से 'इदन्तया' भेदयुक्त ज्ञान कल्पना का विषयमात्र है, जब कि वह वास्तविक नहीं है। सप्तम श्लोक से स्मृति के प्रसङ्ग से विकल्प ज्ञान में भी अनुभव के द्वारा एकता में मिल जाना यह दिखलाया है। अष्टम श्लोक से स्मर्त्तव्य विषय का, स्मृतिज्ञान और स्मरण करनेवाला स्मर्ता पारमार्थिक एक चित्तत्त्व महाप्रकाश की प्रमाता में विश्रान्ति होना बताया है; और प्रसङ्ग से दृश्य का, दर्शन का और द्रष्टा का, इतना ही इसका तात्पर्यार्थ है। इसके पश्चात् अब क्रम से श्लोकार्थ कहा जाता है। वही पूर्व के अनुभूत अर्थ को प्राप्त करनेवाला पूर्वानुभवकाल से अन्य स्मरण काल में कारण विद्यमान रहता है। वह स्वतन्त्ररूप बोधात्मा विचार करता हुआ स्मरण करता है—ऐसा उपदेश दिया जाता है ॥ १ ॥ 'पूर्वमनुभूतस्य अर्थस्य' जिसने पूर्व अनुभूत अर्थ का अन्तर्मुख बोध प्राप्त किया था, वह वर्तमान समय में भी रहता ही है, संविद्रूपमात्रस्वरूप का काल से किये हुए संकोचरूप विशेषात्मक रूप से विच्छेद का सम्बन्ध नहीं हो सकता । जिस स्थितिमें है उसीमें वह रहेगा, [ क्योंकि उससे अभिन्न एक रूप होने के कारण पूर्व की अनुभूत वस्तु की स्थिति सम्भव नहीं होगी। इससे फिर स्मरण कैसे बनेगा। स्मृति का सर्व आकारवाला स्वातन्त्र्य होता है ऐसा दिवाकर भट्ट ने कहा है— सर्वेऽनुभूता यदि नान्तरर्थास्त्वदात्मसात्कारसुरक्षिताः स्युः । विज्ञातवस्त्वप्रतिमोषरूपा काचित्स्मृतिर्नाम न सम्भवेत्तत् ॥ “यदि अन्तर्वर्ती अनुभूत अर्थ तुम्हारी आत्मा में सुरक्षित नहीं रहेगा, विज्ञात वस्तु के असदृशरूप होने से कुछ भी स्मृति सम्भव नहीं होगी।”]

अ.-१, आ.-४, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ६५ कालेऽपि अस्त्येव, संविन्मात्रस्वरूपस्य कालकृतसङ्कोचरूपविशेषात्मकविच्छेदायोगात् । अनुभवस्य च अन्तः अर्थोऽपि अपृथग्भावेन अवस्थितः—इत्येतदपि अयत्नसिद्धम् । इदं तु चिन्त्यम्—अकाल- कलिते संवेदने तदन्तर्वर्तिनि च विश्वत्र भावजाते यदि तावत् चिन्मयतापरामर्शः, तत् 'अहम्' इति एतावतैव पूर्णेन विमर्शेन भाव्यम्; अथ इदन्तया पृथग्भावावभासनेन, तथापि तत्र द्वयी गतिः । 'अहम्' इत्यंशे यदि विश्राम्यति इदन्ता, तदा 'अहमिदम्' इति सदाशिवदशया भाव्यम्; अथ न रोहति, तत् 'इदम्' इत्येव आभासनेन भवितव्यम्; अपूर्वताभासनाच्च तत् अनुभवनमेव स्यात् न स्मरणम्,— इत्याशङ्क्याह 'स्वैरी' इति । 'स्वम्' आत्मीयम् उपकरणम् ईरयति कर्तव्येषु अवश्यं तच्छीलश्च; 'स्वं'१ च आत्मानम् ईरयति न पुनः स्वकर्तव्ये प्रेरकमपेक्षते,—इति 'स्वैरी' स्वतन्त्रः । तेन स्वतन्त्रत्वात् 'स' इत्येवं विमृशति । स इति विमर्शनस्य च इयद्रूपम्—यत् सर्वथा अकालकलितस्वरूपपरामर्शनमेव न, नापि अत्यन्तभेदपरामर्शनमेव; अपि तु यो भावः पूर्वमनुभवकाले तद्देशकालप्रमात्रन्तरसाचिव्येन पृथक्कृतो न च अहन्तायामेव विलीनीकृतः, स तादृगेव तमसेव आच्छाद्य अवस्थापितः संस्कारशब्दवाच्यः, तस्य तमाच्छादकम् अपहस्तयति; तत्र अपहस्तिते स पूर्ववत् पृथक्कृत इवावभाति । ननु च इदन्तया अवभासेत पूर्ववदेव, नैवम् अर्थ भी अनुभव के भीतर अभिन्न एकरूपसे रहता है, यह बात तो अयत्न ही सिद्ध है किन्तु यह विचारणीय है कि—'अकालकलित्' काल-विच्छेद-शून्य संवेदन ज्ञान में और उसके अन्तर्वर्त्ती विश्व के समस्त भावपदार्थों में यदि चिन्मयपरामर्श होता हो तब तो 'अहम्' इतने से ही पूर्ण विमर्श हो जाना चाहिए; बाद में इदन्ता भिन्नरूप से अवभासमान होती है, फिर भी उस समय में 'अहमिदम्' सदाशिव-ईश्वर दो 'गति स्थिति' रहती है। 'अहम्' इस भाग में यदि इदन्ता की विश्रान्ति होती हो, तो 'अहमिदम्' सदाशिवस्थिति होगी, इदन्ता नहीं विश्रामित होती हो तो 'इदम्' यही आभासरूप होना चाहिए; और अपूर्वरूप से आभासन होने से तो अनुभवन ही होगा, स्मरण फिर नहीं हो सकेगा, इस पर आशंका कर कहते हैं कि—'स्वैरी' परमेश्वर के स्वातन्त्र्य पद को ही स्वैरी पद से द्योतित किया है। 'स्वम्' अपनी सामग्री को अवश्य कर्त्तव्यों में लगाता है और लगाने के स्वभाववाला भी है तथा 'स्वम्' अपने आपको ही उन्हीं में लगाता है, किसी अन्य प्रेरक की अपेक्षा नहीं रखता अर्थात् किसी दूसरे के मुख की ओर देखना नहीं पड़ता, सर्वतन्त्र स्वतन्त्र रहता है, इसलिए 'स्वैरी' वह स्वतन्त्र है । स्वतन्त्ररूप होने से 'स' वह विमर्शन करता है। 'स' [ उससे भी क्या ? ] विमर्शन का इतना मात्र ही रूप है। नहीं, ऐसी बात नहीं है। जिसका सर्वथा काल से असंकुचित परामर्शरूप ही 'अहम्' स्वरूप है, और उनमें न तो इदन्तरूप से अत्यन्त भेद परामर्शन ही है; अपितु जो भाव पूर्व अनुभव काल में था वह देश, काल अन्य प्रमाता के साथ होने से अलग किया हुआ है अहन्ता में ही विलीन नहीं किया हुआ है, वह उसी प्रकार ही अज्ञानतम से आच्छादित (ढक) कर रखा गया संस्कार शब्द से कहा गया है, उसका अज्ञानतम आच्छादन करनेवाला है वही उसे छिपा देता है, उसमें छिप जाने पर वह पूर्व के जैसा पृथक् किये हुए की भाँति ही भासता है। १. स्व शब्द आत्मा एवं आत्मीय का वाची है; गणपाठ वृत्ति के अनुसार । २. 'तत्' पद से अनुभव लिया गया है, ९

६६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-४, का.-१ तदानीन्तनावभासनपृथक्कृतशरीरादिसंबन्धमनवधूयैव हि तत्प्रकाशः; ततश्च इदानीन्तनावभासन- कालपरामर्शोऽपि न निमीलति, —इति एतत्परामर्श भित्तिप्राधान्येन पूर्वकालपरामर्शः, —इति विरुद्धपूर्वापरपरामर्शस्वभाव एव 'स' इति परामर्श उच्यते। एवं च स एव परमेश्वरः 'स्मरति' । एतदेव हि तस्य स्मरणम्—यत् एवंप्रकारपरामर्शोचितकालकलादिस्पर्शसहिष्णुमायाप्रमातृभाव- परिग्रहः,—इति मायाविद्याद्वयाद्वैधमयम् । तत एव सकलसिद्धिवितरणचतुरचिन्तामणिप्रख्यम् आगमिकाः स्मरणमेव मन्त्रादिप्रमाणित मन्यन्ते । तथा च— 'ध्यानादिभावं स्मृतिरेव लब्ध्वा चिन्तामणिस्त्वद्विभवं व्यनक्ति।' इति। अलं तावत् अनेन । तृन्नन्तसमासेन यत्नतोऽनुभवस्यार्थमुखेन कालस्पर्शम्, अर्थविश्रान्ततां, द्वयोरपि प्रमातरि निरूढिं भेदाभेदाभ्यां दर्शयति, वृत्तौ एकार्थीभावात् तस्य च भेदाभेदमयत्वम्— इति वक्ष्यामः ॥ १ ॥ अब शङ्का करते हैं कि इदन्ता रूप से पूर्व में जैसा अलग से भासित होता था वैसा ही अलग किया हुआ जो शरीरादि अभी भी भासित होगा, ऐसी बात नहीं है । उस अनुभव काल में अवभासन से अलग किया हुआ शारीरादि सम्बन्ध उसे न हटाता हुआ ही उस स्मर्यमाण का प्रकाश रहता ही है और इससे इस समय में होनेवाला अवभासन काल का परामर्श भी नष्ट नहीं होता है, इस स्मरणकालिक परामर्श को आधार मानकर पूर्वकाल का भी परामर्श रहता है, इसी को पूर्वोत्तर विरुद्ध स्वभाव वाला परामर्श कहा जाता है और इस प्रकार वही परमेश्वर 'स्मरति' स्मरण करता है। यही उसका स्मरण है एवं पूर्वोत्तर विरुद्ध स्वभाववाला परामर्श के समुचित काल-कलादि को सहनेवाला माया प्रमाता का भावपरिग्रह ग्रहण करना कहलाता है। जो माया—'भेदप्रथा' और विद्या—'शुद्धविद्या' है यही दोनों का ऐक्यभाव है। इससे ही सकल सिद्धि देनेवाली चतुर चिन्तामणि के तुल्य आगमिक लोग [ शुद्ध विद्या परामर्श प्राणित ] मन्त्रादि जीवित स्मरण मानते हैं और वैसा कहा भी है— 'स्मृति ध्यानादिभाव को उपलब्ध करानेवाली है। स्वातन्त्र्य के ऐश्वर्य विभव को स्मरणात्मिका चिन्तामणि व्यक्त करती है।' इस विषय में इतना ही कहना पर्याप्त है। [ पूर्वानुभूतोपलब्धा इसमें 'न लोकाव्यय- निष्ठाखलर्थतृनाम्' इस पाणिनीय सूत्र से षष्ठी समास का निषेध कर 'द्वितीयाश्रितातीतेति' इस सूत्र में द्वितीया पद का योगविभागादि करके अनायास तृन्नन्त समास कर लिया जाता है ] यत्न पूर्वक तृन्नन्त समास के द्वारा अनुभव का अर्थ प्रधानतया काल से सम्बन्ध रखता है, अर्थ में विश्रान्ति होती है, अर्थात् अनुभव और अर्थ इन दोनों का ही प्रमाता में बैठ जाना भेद एवं अभेद द्वारा दिखाता है, समास में एकार्थीभाव हो जाने के कारण उसका भेद और अभेदमयत्व हो जाता है— इस विषय में हम कहेंगे ॥ १ ॥ १. माया = भेद प्रथा, माया, कला, विद्या, राग, नियति, काल ये छः तत्त्वसमुदाय भेद प्रथा को बढ़ानेवाले हैं इसका दूसरा नाम शास्त्रीय भाषा में 'षट् कंचुक' भी कहा जाता है। विद्या = शुद्ध विद्या, इसका छत्तीस तत्त्वों के मध्य में पञ्चम स्थान है। इस विद्यातत्त्व में इदं च एवं अहं च ये दोनों समान रूप से दृष्टि गोचर होते हैं। यद्यपि इसमें अनेकत्व का अनुभव होता है फिर भी एकत्वभाव रहता है। इसमें आरूढ होनेवाले साधक को मन्त्र शब्द से कहा जाता है।

अ.-१, आ.-४, का.-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ६७ एतदेव स्मृतितत्त्वमुपपादयितुं श्लोकान्तराणि । तत्र यदि कश्चिद्ब्रूयात्—इह स्मृतिर्विकल्पः, न च अनेनार्थः प्रकाश्यते, अर्थासंस्पर्शिनो हि विकल्पाः, अनुभवेन च येन सोऽर्थः प्रकाशतां नीतः स इदानीं कीर्तिमात्रमूर्तिर्जातः, न च सोऽपि स्मृत्या प्रकाश्यते—ज्ञानस्य ज्ञानान्तरेणासंवेद्यत्वात् असत्त्वाच्च—इति अर्थस्य प्रकाशनाभावात् ‘इदं स्मरामि’ इति ज्ञानं भ्रान्तिमात्रमेव—इति पुनरपि आपतितम्—इति, तदा तं प्रति उच्यते— भासयेच्च स्वकालेऽर्थात्पूर्वाभासितमामृशन् । स्वलक्षणं घटाभासमात्रेणाथाखिलात्मना ॥ २ ॥ इसी स्मृतितत्त्व के उपपादनार्थं दूसरे श्लोक भी हैं । उस पर यदि कोई बोले कि—स्मृति विकल्प है, इस विकल्प से अर्थ प्रकाशित नहीं होता, क्योंकि वस्तु का संस्पर्श न करने वाला ही विकल्प कहलाता है । जिस अनुभव से उस अर्थ का प्रकाशन होता है वह उस समय में केवल कीर्तिरूप ही रह गया, अर्थात् विनष्ट हो चुका है, और वह भी स्मृति से प्रकाशित नहीं होता क्योंकि एक ज्ञान दूसरे ज्ञान से नहीं जाना जा सकता है, न रहने के कारण; इसलिए कि अर्थ का प्रकाशन न होने से, “इदं स्मरामि” मैं यह स्मरण करता हूँ—यह ज्ञान भ्रान्तिमात्र है । अतः फिर भी वही बात आ जायेगी, तब उसके प्रति कहा जाता है— [ वह महेश्वर भगवान् चिदात्मा तबतक स्मृति में अर्थ को विकल्पित करता है और ऐसा मानने पर उस अर्थ का पूर्व देश-काल के द्वारा अवच्छेद होने के कारण इसी से देश-काल संकोच वशात् पदार्थ के रूप का परामर्श करता है यही इसका निचोड़ है और परामर्श भी परमार्थरूप ही है अर्थात् दूसरा कोई नहीं है, अप्रकाशमानता रहने पर क्या परामर्श होगा ? वह अप्रकाशित है और परामृष्ट भी है ऐसा बोलना अन्धे का बोलना जैसा ही प्रायः है । परामर्श ही प्रकाशक स्वभाववाला है, स्वभाववाले के न रहने से किसका स्वभाव होगा, इसलिए कहिये—परामर्श हेतु से या परामर्श के उपलक्षण से उस स्वलक्षण का अवश्य रहना मानना पड़ेगा । अर्थात् सामर्थ्य होने से परामर्श के बिना अन्यथा नहीं बन सकता, घटाभास हो अकेला या लाल-पीला, ऊँचा- नीचा, छोटा-बड़ा आदि आभास के सम्बन्ध से या वह सब पूर्वाभास से युक्त होकर बहुत प्रकाश से भासित होता है, सब कुछ वह देश-काल के आभास के भेद से अपना स्वरूप ही है । यदि तुम कहो कि पूर्व वाला ही अर्थ प्रकाशित होता हो, तो उस अनुभव से कौन सा भेद है, कौन इस प्रकार कहता है कि प्रकाशित होता है । अरे ! वह प्रकाशित होता है वही पूर्व का काल इसके वेद्य को स्वीकार करनेवाले अवभास अंश में अपने लक्षण का कारण है और इस समय में भी स्मर्ता के देह, प्राण आदि से होनेवाला वर्तमान काल विमर्श भाग में भासता है, यही दोनों काल का स्पर्शन उस विमर्श का हेतु है । ] स्मृति काल में अर्थ सामर्थ्य से युक्त होकर पूर्व अवभासित स्वलक्षणरूप अर्थ को विमर्शन करता हुआ अखिलाभास से मिश्रित वपु केवल घटाभासतया भासित होगा ॥ २ ॥

६८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-४, का.-२ इह स्मृतिकाले तावत् अर्थोऽध्यवसीयते, अन्यथा सुप्तमूर्च्छितकल्पतापत्तेः । एवं च यावत् अध्यवसायोऽर्थस्य तावत् 'अर्थात्' इति सामर्थ्यात् इयत् अभ्युपगन्तव्यम्-यत् सोऽर्थः प्रकाशते, अप्रकाशमानेऽध्यवसाव्येऽध्यवसायोऽन्धप्रायः स्यात् । प्रकाशनं च न तदानीन्तनकालस्य त्यागेन, नापि स्वीकारेण इदम् इत्येवावभासनप्रसङ्गात् तस्मात् अतीतानुभवकालः पूर्वानुभूत- भावस्वालक्षण्याक्षेपकतवेनापेक्षणीयो वेद्यभागे प्रकाशात्मकावभासाभिनिवेशितया, स्मर्तुर्देह- प्राणाद्यवभासकालश्चावलम्बनीयो वेदकभागे विमर्शांशाभिनिवेशित्वेन । आभासमात्रं हि भावस्य स्वरूपं, प्रत्याभासं प्रमाणस्य व्यापारात् । तदेव आभासान्तरव्यामिश्रणया दीपसहस्रप्रभासंमूर्च्छ- नवत् स्फुटीभवति । आभासान्तरव्यामिश्रणाभावेऽपि तु कालाभाससंभेदेनैव स्वालक्षण्यं तस्य आभासस्य करोति-कालशक्तेरेव भेदकत्वात् इति वक्ष्यते । एवं तावत् स्वलक्षणीभावः प्राक्तन- देहाभाससाचिव्याद्युदितकालाभासयोजनया घटाभासस्य इति । तावत्येव वा स्मृतिः आभासान्तरै- रपि व्यामिश्रा अतिस्फुटा । अत्यन्तस्फुटीभावेऽपि तदानीन्तनकालता न त्रुट्यति अन्यसाधारण्येन अनवभासनात् । तथावभासे तु योगिनस्तन्निर्माणमेव । ब्रह्मभाषितादौ तु नैवमेव अवभासनम् स्मृतिकाल में ही स्वलक्षणरूप अर्थ का अध्यवसाय होता है, यह बात न मानोगे तो सुप्त और मूर्च्छित व्यक्ति को जैसे अर्थ का अध्यवसाय नहीं होता है वैसे ही होने लगेगा, और भी जितना अर्थ सम्बन्धी अध्यवसाय होता है उतना अर्थात् अर्थ सामर्थ्य से ही सम्भव हो सकता है यह सभी के लिए स्वीकार करने योग्य होना चाहिए जो वह अर्थ प्रकाशित है, अध्यवसाय का प्रकाश नहीं होने पर प्रायः अन्धे के समान हो जायेगा और प्रकाशन में उस काल का न त्याग करने से, न तो, स्वीकार करने से काम चलेगा केवल 'इदम्' इतना ही कहना पड़ेगा । इस हेतु से अतीत अनुभव काल और पूर्वानुभूतभाव का जो अपना स्वरूप है उसकी वेद्यभाग में अपेक्षा करनेवाले से अपेक्षणीय है प्रकाशरूप में अवभासित होने के अभिनिवेश से स्मर्ता के देह-प्राणादि का अवभासकाल भी वेदक भाग में अवलम्बन करना पड़ेगा, विमर्श अंश का अभिनिवेश होने से आभासमात्र ही भाव का स्वरूप है; क्योंकि प्रत्याभास प्रत्यक्षादि प्रमाण का प्रमाणरूप व्यापार है । वही भावरूप दूसरे आभास के मिल जाने से सहस्र प्रदीप की प्रभा के मिलावट के तुल्य स्फुट हो जाता है । किन्तु दूसरे आभास के न मिलने पर भी कालाभास के पृथक कर देने से ही उस आभास का अपना स्वरूप प्रकट हो जाता है-क्योंकि भेद कराने वाली काल-शक्ति ही है-इस विषय में आगे बताया जायेगा । इस प्रकार पूर्ववर्ती शरीराभास के साथ उदित काल के आभास को जोड़ने से घटाभास का यही अपना लक्षण करना है, तबतक ही स्मृति भी दूसरे आभास के साथ मिली हुई अत्यन्त स्फुट होती है । अत्यन्त स्फुटीभाव होने पर भी उस समय होने वाले काल का स्वरूप नहीं टूटता है; क्योंकि अन्य के सदृश वह अवभासित नहीं होता है । यदि वैसा भासता तो भी वह योगी का निर्माण ही होगा । ब्रह्मा के द्वारा भासित होने वाली वस्तुओ में नया ही १. अर्थ = स्वभाव लक्षण । २. उस काल में होने के कारण ये प्रमातावर्ग सर्वज्ञ कहलाते हैं, अथवा संसारी होते हैं, अनुमान, आगमादि प्रमाणों से आया हुआ उसका विषयप्रकाश अपूर्व रूप से देखते हैं अर्थात् विमर्शन करते हैं उसमें जो ज्ञान का आभास है उसके साथ उस अंश में ही भगवान् की इच्छा से ऐक्यभाव हो जाता है। स्मरण

अ.-१, आ.-४, का.-३ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ६९ इति । तत्र तु आगमादिमानान्तरानुभूतब्रह्मादिस्वरूपस्मरणपरम्परा अभ्युपायः । 'भासयेत्' इति विधिरूपेण नियोगेन नियमो लक्ष्यते, न भासयति इत्येतत् न, अपि तु भासयत्येव इति । 'स्वकाले' इति स्मरणकाले । 'आमृशन्' इति वेदकभागनिवेशी वर्तमानकाल उक्तः । 'पूर्वाव- भासितं स्वलक्षणम्, इति वेद्यांशस्पर्शी भूतकालो घटाभासस्यापि केवलस्य स्वालक्षण्यापत्ति- हेतुर्दर्शितः । इयदेव स्मृतेः अव्यभिचारि वपुः, अर्थितातिशयात् तु स्फुटत्वम् इति 'अथ' शब्दो द्योतयति । तदेवाह 'अखिलात्मना' इति सर्वाभासमिश्रेण वपुषा इत्यर्थः ॥ २ ॥ ननु एवं स्वलक्षणस्य प्रकाशने भेदेन बहिरस्तदवभासेत । एतदेव हि बहिरवभासनम्— यत् स्वलक्षणप्रकाशनम् इति शङ्काशमनाय निरूपयति— न च युक्तं स्मृतेर्भेदे स्मर्यमाणस्य भासनम् । तेनैक्यं भिन्नकालानां संविदां वेदितैष सः ॥ ३ ॥ भासन है। वहाँ पर तो आगम आदि दूसरे प्रमाणों से अनुभूत ब्रह्मादि स्वरूप का स्मरण-परम्परा उपाय है । 'भासयेत्' इस विधिलिङ् के प्रयोग से मालूम पड़ता है कि—नहीं भासित करता है यह बात नहीं है, अपितु भासन करता ही है। 'स्वकाले' स्मरण काल में। 'आमृशन्' विमर्शन करता हुआ वेदक अंश को बतलानेवाला वर्तमानकाल का प्रयोग कहा गया है। 'पूर्वाभासितं स्वलक्षणम्' वेद्यांश का स्पर्श करनेवाला भूतकाल केवल घटाभास का भी स्वलक्षण आ पड़ेगा; इसका हेतु भी दिखा दिया । इतना ही स्मृति का अव्यभिचारी वपु है, जो कि अभीष्ट वस्तु को अत्यन्त चाहने के कारण उससे भी अधिक स्फुरता आ जायेगी, यह 'अथ' शब्द द्योतित करता है । उसी बात को कहते हैं कि 'अखिलात्मना' समस्त आभास से मिला हुआ शरीर है। क्योंकि परमार्थ अन्धे के समान नहीं होता है ॥ २ ॥ अब शंका करते हैं कि इस प्रकार अपने स्वरूप का प्रकाशन करने पर भेद से वह बाहर की ओर प्रकाशित होगा । क्योंकि यही बाहर का अवभासन है जो अपने स्वरूप का प्रकाशन है । इस शंका के समाधान में उत्तर देते हैं—यह स्मर्ता है वही अनुभव करनेवाला है, भिन्नकाल में होनेवाले ज्ञानों की उस हेतु से एकता है। स्मर्यमाण विषय का स्मृति से भेद हो जाने पर भासित होना उचित नहीं है ॥ ३ ॥ में तो पूर्व प्रमाताओं का जो ज्ञानाभास है उस स्मरण करनेवाले का पूर्व अनुभव से मिला हुआ रहता है और वही इस समय उन्मिलित हो जाता है । यही दोनों में भेद है । १. नियोग का अर्थ आज्ञा है और नियम का आवश्यभाव । क्योंकि मर्यादा ज्ञान आज्ञा करना रूपी है, स्वयं मर्यादा को जानकर दूसरों को उसका ज्ञान कराते हुए आज्ञा करना यही इसका तात्पर्य है, 'अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकामः' इसमें स्वर्गकाम के लिए यह अवश्य "जुहोति" हवन करना ही है, नहीं तो स्वर्गकाम का पारमार्थिक रूप नहीं रह जायेगा । इसलिए "भासयेत्" इस क्रिया में लिङ् लकार है । २. 'स्मृतेः' इस प्रयोग में पञ्चमी विभक्ति है ।

७० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-४, का.-३ स्मरणज्ञानात् भिन्नत्वेन बहीरूपतया यदि सोऽर्थो भासेत 'स्मर्यमाणस्य' च यत् 'भासनं' तदेव न स्यात् स्मर्यमाणमेव तत् न स्यात्, अनुभूयमानमेव तत् भवेत् इति यावत् । ननु चैवं कथं स्वलक्षणस्य प्रकाशनम् ? उक्तमेतत्—न इदानीं प्रकाशनम् अपि तु पूर्वकाले एव, तदा चासौ बहिरवभासत । ननु चेदानीं तर्हि किम् ?—विमर्शनम् इति ब्रूमः । ननु प्रकाशनविमर्शनयोः भिन्नकालत्वम् आपतितम् अतः किम् उभयमपि न किंचित् स्यात् अन्योन्यजीवितत्वात् अस्य ?, मैवम्, यस्य हि संवेदनान्येव भिन्नानि तत्त्वम् तस्य इदम् अप्रतिसमाधेयमेव, अस्मद्दर्शने तु भिन्न- काला अपि संविदः तत्कालात्यागेनैव एकताभासनेन स्वतन्त्रः प्रमाता यावदन्तर्मुखतया तावत्यंशे विमृशति तावत् प्रकाशस्य तात्कालिकबहिर्भावावभासो, विमर्शस्य इदानीन्तनान्तर्मुखा स्थितिरेव, एतदेव वेदनाधिकं वेदितृत्वं—वेदनेषु संयोजनवियोजनयोः यथारुचि करणं स्वातन्त्र्यम्, कर्तृत्वं च एतदेव उच्यते घटमहमन्वभूवम् इति वा, स घटः इति वा 'ऐक्यम्' अनुसंधानम् अनुसंधातुरभिन्नम् इति दर्शयितुं यदेव ऐक्यं 'स एव वेदिता' इति सामानाधिकरण्येन दर्शितम् । स्मरण ज्ञान से भिन्न होने के कारण बाहररूप से यदि वह अर्थ स्मरण ज्ञान से भिन्न होकर बाहर में भासित होगा 'स्मर्यमाण' स्मर्यमाण विषय का तो 'भासन' भासित होना होता है, वह स्मर्यमाण विषय हो नहीं होगा, उसे तो अनुभूयमान ही कहा जायेगा । तब फिर स्वलक्षण का प्रकाश कैसे बनेगा ? इस प्रश्न के उत्तर में कहते हैं कि प्रकाशन है वह इस समय का नहीं है अपितु पूर्व काल का ही है इस बात को हम पहले कह चुके हैं, तभी यह बाहर में अवभासित होता है। अब शंका करते हैं कि अभी जो वर्तमानकाल में प्रकाशमान हो रहा है वह क्या चीज है ?—यह तो विमर्शन है—ऐसा हम कहते हैं। जब ऐसी बात है तब तो प्रकाशन और विमर्शन में भिन्न- कालत्व आ पड़ेगा; दोनों का भी कुछ अर्थ नहीं है उससे फिर क्या लाभ होगा जब एक दूसरे परस्पर जीवित हैं तो कुछ भी दोनों से होनेवाला नहीं है ? ऐसी बात नहीं है, क्योंकि जिसका संवेदन ही भिन्न-भिन्न तत्त्व होता है उस बौद्ध के लिए यह अशक्य समर्थन ही है। हमारे शैवाद्वैत दर्शन में तो भिन्न काल के रहते हुए भी संविद्रूप के उस काल को नहीं छोड़ने से ही ऐक्यरूप के आभास होने से स्वतन्त्र प्रभाता माना जाता है, जहाँतक 'संवित्' अन्तर्मुखरूप से रहता है उतने अंश में ही विमर्शन करता है और वहाँतक ही प्रकाश का भी तात्कालिक बाहरी भाव में अवभास होता है, किन्तु विमर्शन की वर्तमानकाल में ही अन्तर्मुखी स्थिति रहती है, यही ज्ञान से अधिक बढ़ा-चढ़ा हुआ ज्ञाता का स्वरूप है एवं ज्ञानों में संयोजन और वियोजन अर्थात् मिलाने-हटाने की जैसी अपनी अभिरुचि है तदनुकूल करना ही स्वातन्त्र्य है, और इसीको कर्तृत्व भी कहा जाता है। या मैंने घट का अनुभव किया, 'वह घट है' ऐसा जो 'ऐक्य' वह अनुसंधानरूप स्वातन्त्र्य है वही ऐक्य अनुसन्धान करनेवाले से अभिन्न है, उसे बताने के लिए जो ऐक्यभाव का अनुसन्धान करनेवाला है 'स एव वेदिता' वही जाननेवाला आत्मा है; ऐसा एक विभक्ति से सामानाधिकरण्य दोनों में बताया गया है। 'एष स' 'यही वह है' इस कथन से जो १. वेदिता = आत्मा ।

अ.-१, आ.-४, का.-४ ] विमर्शिनीटीकोपेत [ ७१ ‘एष स’ इति आच्छादितस्येव प्रमातृतत्त्वस्य स्फुटावभासनं कृतम् इदम् इति विस्मयगर्भया भक्त्या प्रत्यभिज्ञानमेव सूचितम्। यदाह ग्रन्थकार एव- इत्थं स्वसंवित्तिमपह्नुवानैर्यनैर्दुरद्भिः कलुषीकृतं यत्। प्रमातृतत्त्वं स्फुटयुक्तिभिस्तान्मूकान्विधाय प्रकटीकृतं तत् ॥ इति ॥ ३ ॥ ननु च प्राच्य एव अनुभवो यदि स्मर्यमाणस्य बहिरवभासनरूपः प्रकाशः र्तार्ह इयत् उच्यताम्-सोऽनुभव इदानीं स्मरणेन विषयीक्रियते-इति, ऐक्येन तु अलौकिकेन कोऽर्थः इति व्यामोहं विहन्तुमाह- नैव ह्यनुभवो भाति स्मृतौ पूर्वोऽर्थवत्पृथक् । प्रागन्वभूवमहमित्यात्मारोहणभासनात् ॥ ४ ॥ वैधर्म्यसाधर्म्याभ्यां दृष्टान्तः ‘प्राक्’ इति अनुभवकाले यथा स ‘पूर्वो’ घटादिः अर्थः ‘पृथक्’ इति इदन्तया भाति स्म नैवं स्मरणकाले स्मृतिज्ञानात् पृथक्त्वेन इदं पूर्वमनुभवनम् इति ‘भाति’ । यथा च स्मृतिकाले तस्मात् स्मृतिज्ञानात् सोऽर्थः ‘प्राक्’ इति ‘पूर्वस्वभावो न भेदेन आभाति, स्मृतिकाले बहिरवभासाभावात् । एवं तत एव हेतोः ‘पूर्वोऽपि अनुभवो’ न भेदेन आभाति, कथं र्तार्ह उभयं भाति !-अन्वभूवम् इत्येवम् । एतत् किमुच्यते ?-इति चेत्, ढका हुआ सा था उस प्रमातृतत्त्व का स्फुट अवभासन कर दिया इस विस्मयगर्भ युक्ति से पहचान करा दिया कि यही वह है। ग्रन्थकार ने स्वयं इस विषय में कहा है- इस प्रकार छिपानेवाले बकवासियों के द्वारा जिस स्वसंवित् ज्ञान को कलुषित कर दिया है। उन्हें प्रस्फुट युक्तियों से मूक बनाकर प्रमातृतत्त्व को प्रकट कर दिया। अब शंका करते हैं कि पूर्व का ही अनुभव यदि स्मर्यमाण विषय का बाहर में अवभासित होनेवाला प्रकाश है तो इतना ओर कहिये कि वही अनुभव इस समय स्मरण का विषय किया जाता है यह जो अलौकिक ऐक्यभाव है उससे कौन सा प्रयोजन सिद्ध होगा; ऐसा जो बौद्धों का मोह (अज्ञान) है उसे दूर करने का उपाय बताते हैं। पूर्व का अनुभव स्मृति में अर्थ की भाँति अलग से नहीं भासित होता, मैंने पहले अनुभव किया था, उसी का कर्ता को आगे चलकर भान होता है ॥४॥ उस समय जैसे वस्तु-पदार्थ भासता था वैसे इस वर्तमान समय में नहीं भासता है, यह साधर्म्य है, जिसे अन्वयव्याप्तिक कहा जाता है, इस वर्तमान समय में जैसे एकरूप में अभेदरूप से भासता है वैसे उस काल में नहीं भासता था यह वैधर्म्य दृष्टान्त है। वैधर्म्य और साधर्म्य को दृष्टान्त देकर बताते हैं 'प्राक्' पूर्वकाल में जैसे वह 'पूर्वो' घटादि अर्थ 'पृथक्' भिन्न इदन्तया भासता था, वही इस समय स्मरणकाल में स्मृतिकाल से पृथक्त्वेन यह पूर्व का अनुभव नहीं 'भाति' भासता है। और अब साधर्म्य दृष्टान्त को बताते हैं। स्मृतिकाल में स्मृतिज्ञान से वह अर्थ 'प्राक्' पूर्व स्वभाववाला भेद से नहीं भासता है, क्योंकि स्मरणकाल में बाहरी अवभास का अभाव है। ऐसी अवस्था रहने पर उसी हेतु से [बाहरी अवभास का अभावरूप कारण होने से ] 'पूर्वोऽपि अनुभवः' पूर्व का भी अनुभव भेद से नहीं भासता है, तब उस समय अर्थ और अनुभव ये दोनों कैसे भासते हैं? इसके समाधान में इतना

७२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-४, का.-४ 'अहम्'—इत्येवं स्वभावो य 'आत्मा' पूर्वापरसंविदन्तर्मुखस्वभावः तत्र यत् 'आरोहणं' विश्रमः तेन हेतुना पूर्वसंविद्रूपतयाः स्वप्रकाशाया 'भासनात्' तल्लीनेस्यापि घटस्य स्वप्रकाशदेशीयत्वेन अवभासनम् । 'आत्मनि च आरोहणं' विश्रमणा अनुभवस्य अर्थस्य च । प्रकृतिप्रत्ययौ प्रत्ययार्थं सह ब्रूतः—इति न्यायात् संख्याक्षिप्ते तद्गते वा कर्तृभूतेऽस्मदर्थे प्रत्ययार्थेऽनुभवो बुङ्गितः तद्द्वारेण अर्थोऽपि च, न तु स्वातन्त्र्येणैव असौ, तदर्थमेव कर्म न निर्दिष्टम् । घटादिः पुनः अनुभवकाले न अस्मदर्थमारोहति, 'हि' यस्मात् नैव भाति पूर्वोऽनुभवः पृथक् अपरार्थोक्त्वात् हेतोः, तस्मात् संविदामैक्यम् इति पूर्वेण संबन्धः । लुङा भूतकालस्य द्योतितत्वात्, 'प्राक्' इति भिन्नक्रमः, उत्तमपुरुषेण अस्मदर्थस्य 'अहम्' इत्यपि, आरोहणम् इति रहिरपि णिजन्तोऽपि ॥ ४ ॥ ननु क एवमाह—अनुभवः पृथक् न भाति ?—इति, घटवत् न भाति—इति चेत् किं ततः ? घटोऽपि हि न अनुभवभङ्ग्या भाति—इति, किं न भाति ? स्वभावेन भाति—इति तु उभयत्रापि समानम् । तथाहि—अतीतानागतसूक्ष्मादि यथा योगिज्ञाने विषयोभवति इति अभ्युपगतम्, तथा परचित्तमपि 'प्रत्ययस्य परचित्तज्ञानम् ।' (योगद० ३ पा० १९ सू०) इत्यादौ । ही कहते हैं कि मैंने अनुभव किया था । तब ऐसा है, 'अहम्' ऐसा स्वभाववाला जो 'आत्मा' पूर्व-अपर [ अर्थका अनुभव और स्मृति ] ज्ञान को अपने भीतर रखनेवाले स्वभाव से युक्त होकर वहाँ जो 'आरोहण' विश्रम स्थिर हो जाना उस हेतु से पूर्व पदार्थ का ज्ञान संविद्रूप में स्वयं प्रकाशित है, उसीमें लीन हुए घट का भी स्वप्रकाश के तुल्य अवभासन है । 'आत्मनि च आरोहणम्, अर्थ का और अनुभव का आत्मा में आरोहण हो जाना ही विश्रमण कहलाता है । प्रकृति 'श्रम' धातु और 'युच्' प्रत्यय येही दोनों साथ रहकर अर्थ करते हैं [ इसमें 'ण्यासश्रन्थो युच्' ( पाणिनीय व्याकरण ३ अ-३ पाद० १९ सूत्र से युच् प्रत्यय हुआ है ] इन न्याय से विश्रमणा में एक वचन संख्या आक्षेप करने से उस संख्यावाले आत्मा में जो 'अस्मत्' शब्द का अर्थ कर्तृभूत है वह प्रत्ययार्थ है उसीमें अनुभव डूब जाता है और उसके द्वारा अर्थ भी डूब गया, अब वह स्वातन्त्र्यरूप से नहीं है, इसलिए कर्म का निर्देश नहीं किया है । पुनः घटादि अनुभव- काल में 'अस्मद्' अर्थ के ऊपर नहीं आरोहित होता है, 'हि' जिससे श्लोक में ऊपर कहे हुए हेतु से, जो कि हमने कहा है कि अनुभव पृथक् नहीं भासता इसलिए संवित् ज्ञानों को एकता है यह पूर्व के श्लोक से सम्बन्ध रखता है । 'अन्वभूवम्' इस क्रिया में 'लुङ्' लकार से भूतकाल झलकता है, 'प्राक्' इसका भिन्नक्रम अर्थ है, 'अस्मत्' शब्द का अर्थ 'अहम्' है उसके साथ 'प्राक्' का अन्वय है, आरोहण में 'रुहि' धातु का अर्थ 'णिजन्त' चढ़ा देना भी है ॥ ४ ॥ अब प्रश्न करते हैं कि ऐसा कौन कहता है अनुभव अलग से नहीं भासता है ? अनुभव घट की तरह अलग नहीं भासता है ऐसा यदि कहो, तो उससे क्या होना है [ स्मृति में नहीं भासता है ] घट भी तो अनुभवभंगी रीति से नहीं भासता है, क्यों नहीं भासता है ? अपने स्वभाव से भासता है; ऐसा यदि कहते हो, तो अनुभव और अर्थ में अन्तर ही नहीं रहा, तब तो फिर दोनों में समानता ही रह जायेगी । जैसे कि भूत और भविष्यगत सूक्ष्म परमाणु आदि योगी को प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर हो जाते हैं—यह बात स्वीकार की जाती है, उसी प्रकार दूसरों के चित्त का भी साक्षात्कार हो जाता है— 'प्रत्ययस्य परचित्तज्ञानम्'ति । ( पा० योगदर्शन ३ पा० १९ सूत्र )

अ.-१, आ.-४, का.-५ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ७३ तत्र ज्ञानवृत्तिपरिणतमेव सत्त्वं चित्तशब्देनोक्तम्, अन्यथा प्रत्ययस्य संयमविषयीकार्यत्वं किमुच्यते, आलम्बनयोगश्च कथं शङ्क्येत, — 'न च सालम्बनमिति —' तस्मात् परकीयमनुभवमिव निजमपि विषयीक्रियताम् इत्याशङ्क्य दृष्टान्त एवासिद्धः इति, 'भान्ति' इत्यन्तेन अभ्युपगमेन वा सिद्धत्वेऽपि प्रकृतेऽर्थे विषमः इति शेषेण दर्शयति— योगिनामपि भासन्ते न दृशो दर्शनान्तरे । स्वसंविदेकमानास्ता भान्ति मेयपदेऽपि वा ॥ ५ ॥ 'योगिनां' यत् एतत् 'दर्शनान्तरं' भावनाद्युद्भवः परचित्तविषयो ज्ञानविशेषः, तत्र 'दृशः' इति उपलब्धयो न भान्ति । तथाहि — सौगतानां तावत् स्वप्रकाशैकरूपं ज्ञानं, तत् चेत् ज्ञानान्तरेण वेद्यं, तर्हि यत् अस्य निजं वपुः अनन्यवेद्यतया प्रकाशनं नाम, न तत्प्रकाशितं स्यात् । परपुरुष की वृत्ति में ध्यानसंयम करने से उसके साक्षात्कार हो जाने पर उसके चित्त का बोध होता है कि उसका चित्त अभी रागयुक्त है अथवा वैराग्यवाला है अर्थात् दूसरे चित्त प्रविष्ट धर्मों को जानता है । 'न च तत्सालम्बनं तस्याविषयीभूतत्वात्' रागयुक्त वृत्ति को तो जान लेता है किन्तु इस आश्रय में रक्त है ऐसा ज्ञान का बोध योगी नहीं कर सकता, क्योंकि दूसरे पुरुष के चित्त का आलम्बन अविषय होता है । इसका चित्त नीलरंग विषयक है या पोतरंग विषयक है यह नहीं जानता है। जो ग्रहण नहीं किया है उसमें संयम करना असम्भव होने के कारण, दूसरे के चित्त का जो विषय है उसका ज्ञान नहीं होता उसी कारण दूसरे के चित्त को आलम्बन सहित नहीं ग्रहण किया जाता है, क्योंकि उसका आलम्बन अगृहीत होता है । परन्तु चित्त के धर्म ग्रहण किये जाते हैं। इसके चित्त से क्या वस्तु आलम्बित है जब ऐसा ध्यान किया जाता है तब ऐसा ध्यान संयम उसका करने से उस विषय का ज्ञान भी पैदा होता है। उसमें ज्ञानवृत्ति का परिणाम प्राप्त होनेवाले सत्त्व [ अन्तःकरण ] को चित्त शब्द से कहा गया है, अन्यथा ज्ञान का संयम करना क्या माने रखेगा, और तब फिर आलम्बन योग के विषय में शंका कैसे खड़ी होती है, 'न च सालम्बनमिति' — दूसरे के अनुभव जैसा अपना अनुभव भी [ सविषय ] सालम्बन करो ऐसी शंका करके योगी अर्थात् प्रत्ययरूप दृष्टान्त दिया है, वह असिद्ध हो जायेगा, इस बात को 'भान्ति' प्रकाशित होते हैं, यहाँ तक मान करके या प्रकृत अर्थ के सिद्ध हो जाने पर बचे हुए [ मेय ] पद से दिखाते हैं— दूसरे के विषय में योगी लोगों का ज्ञान भी नहीं भासता है। अथवा वे स्वसंवित् एकता को प्राप्त हुए विषयपद में भी प्रकाशित होते हैं ॥ ५ ॥ 'योगिनाम्' जो यह 'दर्शनान्तरम्' दूसरे के विषय में योगिजन को भूतार्थ-भावना पर्यन्त अन्य के चित्त का ज्ञान विशेष होता है, वहाँ पर 'दृशः' ज्ञान वेद्यरूप से नहीं भासित होते हैं। जैसा कि 'सौगत' बौद्धों का स्वप्रकाशरूप एकमात्र ज्ञान ही है, वह यदि दूसरे ज्ञान से वेद्य है, तो इसका अनन्य वेद्यतया प्रकाशित होना कैसे माना जायेगा, स्वयं प्रकाशित होने वाला ज्ञान दूसरे ज्ञान से प्रकाशित नहीं हो सकता। सांख्यों के मत में भी पुरुष का प्रतिबिम्ब ही ज्ञान [ बुद्धि, १०

७४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-४, का.-५ सांख्यानामपि पुरुषच्छायायैव उपलब्धिः, पुरुषश्च असंवैद्यपर्वा इति कथं वेद्यः स्यात् । वैशेषिकाणा- मपि आत्मनि अभेदेन समवायि संवेदनं परगतं मनसा कथं गृह्येत अन्तःशरीरवृत्तिना, तच्छरीरान्तरऽनुप्रवेशे तु तस्यैव अहम् इति शरीरीकरणात् अहन्तावभासितत्वात् आत्मनो भेदो विगलेत्, नित्यानुमेयत्वं तु न आत्मन उपपद्यते, ज्ञानस्य च ज्ञानान्तरवेद्यत्वेऽनवस्थादि उक्तम् । तस्मात् योगिनः परचित्तवेदनावसरे इयान् प्रकाशः —एतद्देहप्रकाशसहचारी घटसुखादि- प्रकाशः —इति । तत्र घटसुखादिः इदन्तया भाति, तद्गतस्तु प्रकाशोऽहम्—इत्येव स्वप्रकाशतया प्रकाशते । प्रमात्रीकृतपरदेहप्राणादिसमवभाससंस्कारात् तु तन्निष्ठाद् इदन्तां प्रकाशभागोऽपि मन्यमान इदं परज्ञानम् इति अभिमन्यते अविगलितस्वपरविभागो योगी । प्राप्तप्रकर्षस्तु सर्वम् आत्मत्वेन पश्यन् स्वसृष्टमेव स्वपरविभागं पश्यति इति ज्ञानस्य न योगिज्ञानेन प्रकाश्यता, भवतु वा तथापि प्रकृते न एतत् समम् । तथाहि—अयमनुभवति इति परनिष्ठ एव असौ अनुभवे योगिनः प्रकाशो, न तु अहमनुभवामि इति आत्मारोहेण, इह तु अन्वभूवम् इति अहम्प्रशिश्रान्तिः अनालीढेदंभावैव अनुभवस्य इति युक्तमुक्तम्—यस्मात् अनुभवः पृथक् न भाति तस्मात् ऐक्यं भिन्नकालानां संविदां वेदिता इति ॥ ५ ॥ उपलब्धि ] माना जाता है, और स्वयं पुरुष भी असंवैद्यवर्ग की श्रेणी में है वह वेद्य कैसे हो सकता है ? वैशेषिक काणादों का भी आत्मा में अभेद समवाय-सम्बन्ध, समवायी संवेदन, अन्तः- शरीरवृत्ति मन के द्वारा दूसरे के विषय को कैसे ग्रहण करेगा, उसके शरीर के भीतर प्रवेश कर लेने पर तो उसका ही 'अहम्' ऐसा जीवात्मा का रूप धारण कर लेने से और उसकी अहन्ता से अवभासित हो जाने से अपना भेद गल जायेगा, आत्मा का नित्य अनुमेयत्व नहीं हो सकेगा और एकता से दूसरा ज्ञान प्रकाशित होता है तो, अनवस्थादि दोष से ग्रस्त हो जायेगा, यह हम कह चुके हैं। इसलिए योगी को दूसरों के चित्त का ज्ञान करते समय ये जो कहे जाने वाले प्रकाश दूसरों के देह के साथ रहनेवाला घटसुखादि प्रकाश है उसकी चिन्ता को देख सकते हैं किन्तु घट सुखादि को नहीं जान सकते हो । घटसुखादि इदन्तरूप से अलग ही भासता है, घटसुखादि तो 'अहम्' इसी प्रकाश में प्रकाशित रहता है । अर्थात् अपने स्वयं के प्रकाश से प्रकाशित होता है । बनाये गये प्रमाता के दूसरे देह, प्राणादि अवभास के संस्कार से उसमें हुई इदन्ता को प्रकाशभाग में भी मानता हुआ यही उत्कृष्ट ज्ञान है—ऐसा समझ लेता है; जिसमें कि योगो दूसरे के साथ अपना भेदभाव नहीं रखता । दृढरूप से अपना और दूसरे का संस्कार भी विनष्ट हो जाने से, योगी आत्मभाव से देखता हुआ स्व-पर-विभाग को भी अपने आप से सर्जन किया हुआ ही देखता है । ज्ञान की प्रकाशता योगी के ज्ञान से नहीं होती है, क्योंकि वैसा उसका विषय न होता है, चित्त- मात्र को ही योगी विषय करता है, भले ही प्रकृत में उसकी आवश्यकता नहीं है। यही बात है देखो, यह अनुभव करता है ऐसा दूसरों के लिए ही अनुभव में योगी का प्रकाश है । मैं अनुभव करता हूँ ऐसा अपने को लगाकर प्रकाश नहीं होता, यहाँ पर मैंने अनुभव किया, ऐसा आत्मा 'अहम्' का उल्लेख है इदं-भाव का अनुभव नहीं चढ़ा हुआ है; इसीलिए हमने ठीक ही कहा है— जिससे अनुभव अलग नहीं भासता है इसीलिए भिन्न कालों के संवित् ज्ञानों को भी एकरूप से जानने वाला वेदिता इत्यादि ॥ ५ ॥

अ.-१, आ.-४, का.-६ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ७५ यदि अहँ-भावविश्रान्तिवशात् अनुभवः स्मृतौ पृथक् न भाति इति उच्यते, तदा परामर्शान्तरं साक्षादेव इदन्तया अनुभवं परामृशत्, यदि वा इदं-भावोचितघटादिविश्रान्तताम् अनुभवस्य प्रथयत् उपलब्धम्, इति तदनुसारेणापि किं न व्यवह्रियते इति पराभिप्रायं प्रतिक्षिपति- स्मर्यते यद्दृगासीन्मे सैवमित्यपि भेदतः । तद्व्याकरणमेवास्या मया दृष्टमिति स्मृतेः ॥ ६ ॥ लोकस्य तावत् एवं न संवेदनं, स हि न पृथग्भूतां दृशं कांचिद् मन्यते—‘सा दृक् मे आसीत्’ इत्येवम्, अपि तु यत् स्मर्यते एवंभूतमपि यत् स्मरणं कस्यचित् विवेचकंमन्यस्य, तत् स्मृतेर्व्याकरणम्, पदस्येव प्रकृतिप्रत्ययार्थनिरूपणं काल्पनिकं विभज्य आकरणं परत्र प्रतिपादन- मात्रम् । सोऽपि यदि मूलप्रतेर्ति विमृशति पूर्वोक्तक्रमेण, तदा अनुभवं पृथग्भूतं न वेद, यत एव तत् राहोः शिरः इतिवत् कल्पितं भेदं मन्यते, अन्यथा स घटः इतिवत् ‘सा दृक्’ इत्यत्रापि प्राक्तनं दृगन्तरम् अपेक्षणीयं स्यात् । तत् इत्थनेन हि घटस्य वा दृशो वा पूर्वानुभवविषयापत्तिः यदि अहं [ आत्मा के आरोहण से भासित होने से ] भाव की विश्रान्ति के कारण अनुभव स्मृति में अलग नहीं भासता है—ऐसा कहते हो, तो दूसरा परामर्श साक्षात् ही इदन्तरूप से अनुभव को परामर्श करेगा । अथवा इदंभाव से मिला हुआ घटादि के अनुभव की उपलब्धि को बढ़ाता हुआ उसके अनुसार भी क्यों न व्यवहार हो यह दूसरे के अभिप्राय का हस्तक्षेप करना है— जो मेरा ज्ञान था वह भी ऐसा ही भेदसे स्मरण होता है । इसी स्मृति का जो विस्तार है उसी को मैंने देखा ॥ ६ ॥ घट के विषय में मेरा अनुभव था इस कथन में भी घट ही वेद्य होता जैसा कि इस विषय में कहते हैं—‘घटज्ञानमिति ज्ञानं घटज्ञानविलक्षणम् । घट इत्यपि यज्ज्ञानं विषयोपनिपातितत् ॥’ घट ज्ञान का ज्ञान घट ज्ञान से विलक्षण है । घट यह ज्ञान भी विषय को ग्रहण करता है । संसार का ऐसा ज्ञान नहीं होता है, वैसी दृष्टि थी, वह मेरा अनुभव था ऐसा स्मरण होता है, दृष्टि को अलग नहीं मानता है वह विषय से भिन्न किसी दृष्टि की नहीं मानता, ‘सा दृक् मे आसीत्’ वह ज्ञान मेरा था ऐसा नहीं बोलता है, अपि तु जो किया है जो कोई ऐसा भी स्मरण मानेगा जिसमें किसी दूसरे का विचार करना पड़ेगा, उसे स्मृति का विस्तार कहते हैं, पद के जैसा प्रकृति-प्रत्यय के अर्थ का निरूपण काल्पनिक विभाग करके दूसरे को समझना मात्र है । वह भी यदि मूलप्रकृति का विचार करेगा तो ‘अहम्’ आत्मा के आरोहण का ही विचार करेगा । पूर्वोक्त क्रम से मैंने अनुभव किया, तब तो, अनुभव को अलग नहीं जानेगा, क्योंकि ‘राहोः शिरः राहु का शिर है’ इस प्रकार ‘काल्पनिक’ कल्पित भेद मानना पड़ेगा, यदि नहीं मानते हो तो फिर जैसा यह घट है ‘सा दृक्’ वह ज्ञान है इसमें भी पहले का दूसरा ज्ञान मानना पड़ेगा । उसको घट कहो अथवा वह ज्ञान कहो इस प्रकार पूर्व का अनुभव ही विषय हो जायेगा, अन्यथा ज्ञान इतना १. घट के विषय में मेरा अनुभव था इस कथन में भी घट ही वेद्य होता है । अतः इस विषय में कहते हैं— ‘घटज्ञानमिति ज्ञानं घटज्ञानविलक्षणम् । घट इत्यपि यज्ज्ञानं विषयोपनिपाति तत् ॥’ घट ज्ञान का ज्ञान घटज्ञान से बिलक्षण है । घट यह ज्ञान भी विषय को ही ग्रहण करता है ।

७६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-४, का.-६ उच्यते, अन्यथा दृक् इत्येव स्यात् । ततश्च दृक् मया दृगन्तरेण अनुभूता इति आपतेत् । तत्रापि तथात्वेऽनवस्था । ननु स्मृतेः मौलिकं किंरूपम् ? उच्यते—मया दृष्टम् इति । ननु अत्र दयितावदन- नलिनादिविश्रान्तं दर्शनम् उक्तम् न तु आत्मारूढं—कर्मणि निष्ठोत्पत्तेः । स एष स्ववाचमेव न चेतयति । कर्तुः क्रियया हि आप्यं कर्म इति दृशिक्रियायाः कर्तृनिष्ठतैव । तथा च कर्तृस्थामेव दृशिक्रियामाहुः —‘दर्शयते भृत्यान् राजा इत्यादौ । जैमिनीयेरपि ज्ञानरूपा दृशिः भावनात्मिका प्रमातृविश्रान्तैव उक्ता, केवलं प्रकटता विषयधर्मो, दृष्टता नाम अन्या, संवित् वा स्वतन्त्रा इति अन्यत् एतत् । प्रमातृविश्रान्तत्वमेव कथयितुं मया इत्युक्तम् । तेन अन्वभूवमहम्, मयाऽनु- भूतम् इति शब्दवैचित्र्यमात्रमिदम्, न तु अर्थभेदः । अन्ये तु भिन्नक्रमत्वेन योजयन्ति—दृक् आसीत् सा मे इत्येवं, मया दृष्टम्—इति च यत् स्मरणं, ‘तत् व्याकरणमस्याः’ इति अनन्त- रोक्तान्वभूवम् इति उचितपरामर्शायाः स्मृतेः इति, अपिः चार्थे ॥ ६ ॥ ही होता है । इसलिए ‘ज्ञान को मैंने दूसरे ज्ञान से अनुभव किया’ यही कहना पड़ेगा । उसमें भी दूसरा ज्ञान कहोगे तो अनवस्था हो जायेगी । अब शंका करते हैं कि स्मृति का अविसंवादि स्थान से आया हुआ मूल पारमार्थिकरूप क्या है ? इस प्रश्न के उत्तर में कहते हैं—मैंने देखा है यही स्मृति का रूप है । प्रश्न उठता है कि स्त्री के मुखारविन्द में विश्रान्तिरूप दर्शन कहा गया है । किन्तु अपने ऊपर आरूढ नहीं बताया है बाहरी कर्म में निष्ठा की उत्पत्ति देखी जाती है । वह कर्ता अपनी वाणी को ही नहीं याद करता है; क्योंकि क्रिया के द्वारा कर्ता की अभीष्ट वस्तु की सिद्धि होना कर्म है अर्थात् क्रिया से कर्ता का जो अभीष्ट हो वही कर्म है, इस प्रकार दृशि क्रिया कर्तृनिष्ठ है । अन्य लोग भी कर्ता से ही दृशि क्रिया को मानते हैं—जैसे राजा परिकरों को दिखाता है । मीमांसक लोग भी ज्ञानरूप ‘दृशि’ धातु को भावनारूप में प्रमातृगत विश्रान्ति रहना मानते हैं, केवल प्रकट हो जाना ही विषय-धर्म है, दीखनापन दूसरा ही है, संवित् अथवा स्वतन्त्रता यह सब अवान्तर भेद हैं । प्रमातृगत विश्रान्तिता को ही कहने के लिए मैंने ऐसा कहा है । इसलिए ‘मैंने अनुभव किया’, ‘मेरे द्वारा अनुभव किया गया’ इन दोनों वाक्यों में शब्दों की विचित्रता अवश्य है किन्तु दोनों का अर्थ एक ही है । इसको दूसरे लोग भिन्न क्रम से कहते हैं—‘ज्ञान मुझे था’ और ‘मेरे द्वारा देखा गया’ ऐसा स्मरण होना ही इसका व्याकरण कहलाता है, बाद में जो कहा गया है, मैंने अनुभव किया यही उचित परामर्श वाली स्मृति का व्याकरण है, ‘अपि’ शब्द चकार अर्थ में है ॥ ६ ॥ १. धातु दो प्रकार की होती है—कर्मस्थभाव और कर्तृस्थभाव । जिनकाभाव कर्म से अनुभूत होते हैं, वे तो कर्मगामी हैं ओर जिनका कर्ता से अनुभूत हैं वे कर्तृगामी हो जाती हैं । प्रत्येक का विभाग दिखाते हैं— कर्मस्थः पचतेर्भावः कर्मस्था च भिदेः क्रिया । आसासिभावः कर्तृस्थः कर्तृस्था च दृशेः क्रिया ॥ ‘पच्’ धातु का भाव कर्म में रहता है और ‘भिद्’ धातु की क्रिया भी कर्म में रहती है । ‘आस्’ और ‘अस्’ धातु के भाव कर्ता में रहता है और देखने अर्थ में ‘दृश्’ धातु की क्रिया भी कर्ता में रहती है । जैसे ‘तण्डुलान् पचति’ इस वाक्य में होनेवाले ‘विक्लेत्ति’ नामक क्रियात्मक जो धातु का अर्थ है वह ‘तण्डुलान् इस कर्म में है । उसी प्रकार ‘भवता आस्यते’ जो उपदेशात्मक धातु का

अ.-१, आ.-४, का.-७ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ७७ ननु दृष्टमपि निर्विकल्पेन यावत् न परामृष्टं विमर्शविशेषविश्रान्त्या तावत् न स्मर्यंते मार्गदृष्टमिव तृणपर्णादि विशेषरूपेण, तदिदमेव विचारणीयं,—समनन्तरभाविविकल्पकाले तद्दर्शनम् इदन्तया अवभात्पूर्वं वा न वा इति तदेतत् आशङ्क्याह— या च पश्याम्यहमिमं घटोऽयमिति वाऽवसा । मन्यते समवेतं साप्यवसातरि दर्शनम् ॥ ७ ॥ इह दर्शनं यादृशं निजेन वपुषा तादृशेनैव तेन भातव्यं सर्वदा, तच्च स्वकालेऽनन्यप्रकाशम् अहम् इत्येतावता रूपेण उचितप्रकाशम्, तद्विकल्पांशविचारः तावत् न कुत्रचित् अङ्गम्, भवतु वा, किं तु व्यवसायोऽपि एवंभूतः इति अपि-शब्देन सूचयति । तत्र समनन्तरभाविना विकल्पेन वस्तु परामृश्यमानम् अनुभवपरामर्शमुखेन वा परामृश्यते अहमिमं पश्यामि इति वर्तमानतया, इमम् इत्यनेन च प्रत्यक्षव्यापारत्वं प्रत्यक्षायमाणत्वेन दर्शितम् । एवमेव वा परामृश्यते—घटोऽयम् इति । अब शंका करते हैं कि निर्विकल्परूप से देखा हुआ भी जबतक परामृष्ट किये हुए में विमर्श विशेष की विश्रान्ति से अत्यन्त गौरपूर्वक 'दृष्ट' वस्तु को भी नहीं देखते तबतक वस्तु का स्मरण नहीं होता है । जैसे मार्ग में पड़ी हुई तृण-पर्णादि वस्तु विशेषरूप से देखता है तभी उसका स्मरण होता है, अन्यथा नहीं होता है, इसलिए यही विचार करना चाहिए कि ठीक उसके बाद होने वाला विकल्पकाल में निर्विकल्पक निःसन्देह अवभासपूर्व इदन्ता से उस वस्तु का देखना माना जाता है । वह है या नहीं है, इस आशंका को उठाकर कहते हैं— मैं इसको देखता हूँ अथवा यह घट है ऐसा जो अध्यवसाय परामर्श है, उसका भी ग्राहकांश में समवाय सम्बन्ध से विद्यमान ज्ञान माना जाता है ॥ ७ ॥ जैसा ज्ञान अपने शरीर रूपी स्वरूप से है वैसा ही सर्वदा उसे भासित होना पड़ता है और वह ज्ञान अपने निर्विकल्पकाल में अनन्य प्रकाश 'अहम्' इस रूप में ठीक भासित होता है, वह विकल्पांश का विचार पहले कहीं पर किसी का अंग नहीं बनता, सविकल्प में या निर्विकल्प में भले ही हो, किन्तु व्यवसाय (द्वितीय ज्ञान) भी सविकल्प के जैसा ही होता है, यह 'अपि' शब्द से सूचित होता है । [ इदन्ता-उदन्ता को भी आविष्कार नहीं करता है ] बाद में होनेवाले विकल्प से वस्तु का परामर्श करना अथवा अनुभव परामर्श को प्रधान करके मैं इसको देखता हूँ ऐसा जो वर्तमानरूप से होते हुए परामर्श को परामर्श करना है, 'अस्मत्' शब्द के प्रयोग बिना भी 'अहम्' का ही परामर्श किया जाता है कि यह घट है । यहाँ पर 'अयम्' शब्द से प्रत्यक्ष का अर्थ है वह कर्ता में रहता है, इसे भर्तृंह र ने कहा है— गतिबोधाशनत्यागशब्देच्छाप्राप्तिवाचिनाम् । द्वेषार्थकर्मकाणां च भावः कर्त्रनुभूयते ॥ गति = ज्ञान एवं गमन, बोध-ज्ञान, त्याग-छोड़ना, शब्द-बोलना, इच्छा-आकांक्षा करना अर्थात् प्राप्त करना इत्यादि धातुओंके अर्थ और द्वेषार्थक अर्थवाले धातु अकर्मक होती हैं जिनका भाव कर्ता से अनुभूत हो जाता है ।

७८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-४, का.-८ अत्र अयं-शब्देन प्रत्यक्षायमाणत्वमुक्तम् । तत्र अन्त्ये विकल्पे दर्शनस्य पृथक् परामर्श एव नास्ति इति का तत्र इदन्ताशङ्का । ततश्च पारिशेष्यात् अहन्तया तस्य अत्रास्ति परामर्शः, तदभावे विकल्पस्य निमीलिताक्षेऽपि भावात् स्वयमर्थास्पर्शं स्फुटतमविषयपर्यवसितः कथमध्यवसायो भवेत् । आद्ये तु दर्शनं परामृष्टमपि अस्मदर्थान्तर्भूतम् अहंभावास्पदम् अवसातरि विश्रान्तं स्वप्रकाशमेव परामृष्टम् इति विकल्पोऽपि न बोधान्तरबोध्यतां बोधयति बोधस्य । अवसायः अवसा, समवेतंम् इति अपृथग्भावमाह । अवसातरि इति स्वतन्त्रेऽन्तर्मुखे बोधात्मनि अहन्तास्पदे इत्यर्थः । दर्शनम् इति निर्विकल्पकमनुभवनम् । उपलक्षणं चैतत्—विकल्पस्मृत्यादेरपि, ज्ञानस्य ज्ञानान्तरेण परामर्शे हि अयमेव न्यायः । विकल्पयाम्यहं, स्मराम्यहम्, विकल्पितं मया, स्मृतं मया इति अहन्तारूढचैव विकल्पादेः अवभासात् । अत एव आत्मनोऽमी विकल्पाद्याः शक्ति- विशेषाः तद्विश्रान्तशरीरत्वात् इति दर्शितम्, ज्ञानस्मृत्यपोहनशक्तिमान्, इत्यत्र ॥ ७ ॥ एवमियतः प्रमेयस्य यत्फलं तदुपसंहर्तुमाह— तन्मया दृश्यते दृष्टोऽयं स इत्यामृशत्यपि । ग्राह्यग्राहकताभिन्नावर्थौ भातः प्रमातरि ॥ ८ ॥ 'तत्' इति तस्मादर्थे पूर्वोक्तस्य प्रमेयस्य हेतुभावेन उपजीवनम् इह सूचयति । यत एवमुक्तम्—अनुभवस्य अर्थस्येव स्मरणात् न भेदेन अवभासः, स्मृतिशक्तिश्च परमेश्वरस्यैव, तत परामर्श होता है, यह घट है इसमें अलग परामर्श नहीं है इसमें कहां इदन्ता की शंका उठती है, इसलिए यहाँ पर भी अहन्तारूप से ही उसका परामर्श है, नहीं तो उसके अभाव में विकल्प के दब जाने पर भी भाव से स्वयं विषय का स्पर्श नहीं होने से, निश्चित दबा हुआ अध्यवसाय कैसे होगा । 'अहं पश्यामि' इस प्रथम ज्ञान में परामृष्ट होता हुआ भी 'अस्मत्' शब्द के भीतर अर्थ रहता है अहंभाव का स्थान अध्यवसाय करनेवाले में बैठे हुए को अपने प्रकाश का ही मैंने परामर्श किया था, इस विकल्प से भी ज्ञान अन्य ज्ञान को न जानने में समर्थ नहीं होता, अवसाय को अवसा कहते । 'अवसातरि' स्वतन्त्र अन्तर्मुख रहनेवाला बोधात्मा अहन्ता का 'आस्पद' स्थान है—ऐसा अर्थ होता है । दर्शन का अर्थ यह है कि निर्विकल्पक अनुभव और यही विकल्प स्मृति आदि का भी उपलक्षण है । ज्ञान का अन्य ज्ञान से परामर्श करने में भा यही युक्ति है । मैं विकल्प करता हूँ, मैं स्मरण करता हूँ, मैंने विकल्प किया, मैंने स्मरण किया, इस प्रकार अहन्ता-प्रधान ही विकल्प का भास होता है । अत एव ये विकल्पादि शक्तिविशेष अपने ही हैं; क्योंकि परामर्श का स्वरूप अहन्ता में लीन रहता है । ज्ञान, स्मृति और अपोहन-शक्ति का इसमें निर्देश किया गया है ॥ ७ ॥ इस प्रकार इतने से प्रमेय का जो फल दिखाया है, उसके उपसंहार करने के लिए अब कहते हैं [ चित्त्व ही ज्ञानादि शक्तिवाला है, स्मरण और अनुभव एक ही संविद्रूप है इतना अर्थात् आ जाता है । समस्त माय़ीय ग्राह्य-ग्राहक शुद्ध संविद्रूप से अवभासित होते हैं ।] वह मुझसे देखा जाता है, यह मुझसे देखा गया । वह यही अनुभव करता भी है । प्रमाता में ग्राह्य और ग्राहकता के भेद से अर्थ भासता है ॥ ८ ॥ 'तत्' इसलिए अर्थ में पहले कहा हुआ प्रमेय का हेतुभाव से उपजीवन को यहाँ पर

अ.-१, आ.-४, का.-८ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ७९ इदमत्र परिनिश्चितं तत्त्वम् इति । इह स्मृतिः अनुभवं क्रोडीकरोति इत्युक्तम् । अनुभवश्च द्विधा, —परामर्शभेदात् कदाचित् स्वात्मपरामर्शपूर्वकम् अनुभाव्यम् आमृशति यत्र अस्य अभिसन्धिप्रधानता 'मया दृश्यते' इति, कदाचित् अनुभवनीयमेव प्रधानतया परामृशति यत्र अनभिसन्धैरेव सहसा वस्तूपनिपातः, अर्थक्रियां प्रति आग्रहविशेषो वा 'अयम्' इति, तत्रापि च प्रकाशपरामर्शोऽस्त्येव, अन्यथा प्रकाशाद्योगात् । एवमुभयथानुभवे प्रत्येकं स्मृतिरपि द्वयपरा- मर्शमयी उदेति इति चत्वारः स्मरणभेदाः, द्वौ अनुभवभेदौ अनुसन्धानरूपं प्रत्यभिज्ञानमपि एतदुभयमेलनात्मकम् अत्रैवान्तर्भूतम् । तच्च एतद्भेदात् अष्टधा, पूर्वापरविश्रान्तिकृतात् प्रत्येकं द्विधाभेदाच्च षोडशधा । तदेते द्वाविंशतिः संवेदनभेदाः । तेषु च ग्राह्यं तावत् प्रकाशात् अबहिर्भूतम् अन्यथा प्रकाशनायोगात्, बहिर्भूतं च तत् अन्यार्थत्वात्सम्भवात्, न च तत एव, तदैव, तदेव पृथग्भूतं अत्र पृथग्भूतं च भवति इति नूनमन्यः कल्पितप्रकाशात्मा कश्चित् अत्र अर्थोऽस्ति, यतोऽयम् अर्थराशिः पृथग्भवन् अन्योन्यमपि पृथक्ताम् अधिगच्छेत्, अन्यथा प्रकाशाभिन्नानां परस्परमपि कथङ्कारं पृथग्भावो भवेत् । सोऽयं वेद्यैकदेश एव, विच्छिन्न एव अनुज्झितवेद्यभाव एव, अहम् इति विच्छेदशून्योचितेन परामर्शन परामृष्य मानो मायाप्रमाता इति वक्ष्यते,— 'देहे बुद्धौ, .........। ( १.६.४ ) इत्यत्र । स च ग्राहकः इति उच्यते । एवं सममेव स्वात्मनि

ग्रन्थकार सूचित करता है। क्योंकि ऐसा कहा हैं—अनुभव का पदार्थ के जैसा स्मरण होता है, भेद से भान नहीं होता और स्मृति परमेश्वर की ही शक्ति है, इसलिए इतना ही यहाँ पर निष्कर्ष है । स्मृति अनुभव को अपने में लीन कर लेती है यही कहा गया है । और अनुभव दो प्रकार का हैं—परामर्श भेद से कभी-कभी अपने को परामर्श करता हुआ [ अनुभव का विषय ] अनुभाव्य को परामर्श करता है जहाँ पर प्रमाता का परामर्श प्रधान रहता है 'मया दृश्यते' इस प्रयोग में तो प्रमाता प्रधान है, कभी अनुभव के विषय को प्रधान करके जहाँ पर प्रमाता का परामर्श न कर सहसा पदार्थ की ही उपस्थिति रहती है, अथवा अर्थक्रिया के प्रति आग्रहविशेष होता है जिसको 'अयम्' कहा जाता है और वहाँ पर भी प्रकाश का परामर्श रहता ही है, नहीं तो प्रकाश का योग ही नहीं बैठेगा । एवं दोनों प्रकार से अनुभव में प्रत्येक स्मृति भी दोनों को परामर्श करनेवाली उदित होती है इस तरह चार स्मरण भेद हो जाता है, पहला और बाद का मिला देने से प्रत्येक में दो-दो होने के कारण सोलह भेद हो जाते हैं ! [ मेरे द्वारा यह घट देखा गया ] इस प्रकार बाईस से संवेदन ज्ञान के भेद होते हैं और उनमें ग्राह्य है वह तो प्रकाश के अन्तर्भूत ही है अर्थात् प्रकाश से भिन्न नहीं है, नहीं तो, प्रकाश से योग नहीं बैठेगा और यदि उसमें अन्तर्भाव नहीं मानते हो, तो उसका प्रकाशरूप अर्थ संभव नहीं हो सकेगा और उससे ही नहीं होता है, वही है, वही अलग होकर ग्राह्य से अलग भी रहता है निश्चय ही कोई दूसरा कल्पित प्रकाशात्मा पदार्थ है, जिससे यह अर्थसमूह अलग होता हुआ आपस में भी भेद को प्राप्त करेंगे अन्यथा प्रकाश से अभिन्न होंगे तो आपस में कैसे अलग भाव होगा, इस प्रकार वह इस वेद्य का एक अंग है, जिसका वेद्यभाव नहीं छूटा है; ऐसा विच्छिन्न ही है, 'अहम्' ऐसा विच्छेद से रहित होकर यह उचित परामर्श के साथ परामर्श किया गया माया प्रमाता है—इसी को आगे कहेंगे, देहे बुद्धौ ...... । ( १.६.४ ) और वह ग्राहक है ऐसा उसे कहा जाता है । इस प्रकार समानरूप से स्वच्छ दर्पण के सदृश विमल स्वात्मा में जो कि दोनों अपने रूप से भिन्न

८० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-१ विमलमुकुरस्थानीये यत् युगलकं स्वस्मात् प्रकाशरूपात् अव्यतिरिक्तम् अवभासयति परमेश्वरः तदेव एतत् भगवतो ज्ञानकर्तृत्वं, स्मरणकर्तृत्वं, ज्ञानशक्तिस्मृतिशक्तिरूपम् उच्यते इति तात्पर्यार्थः । अक्षरार्थस्तु—मया दृश्यते इति, अयम् इति च यत् आमृशति प्रमाता प्रकाशरूपो येन अनुभवति इति उच्यते, तत आमर्शनात् एतत् लक्ष्यते, ग्राह्यरूपेण ग्राहकरूपेण योजितौ घटादि- देहादिस्वभावौ अर्थौ वेद्यौ प्रमातरि विशुद्धप्रकाशरूपे भातः प्रकाशेते । एवं दृष्टः इति स इति च यत् परामृशति प्रकाशरूपः प्रमाता, यतोऽसौ स्मरति इति व्यपदेश्यः, ततोऽपि एतदेव लक्ष्यते । अनुभवरूपोपजीवित्वं पूर्वोक्तं द्रढयितुं प्रसङ्गात् अत्र ज्ञानशक्तेरपि उन्मीलनं कृतम् । लक्षणे शत्रादेशः । अपि-शब्दश्चार्थे । अर्थ-शब्दो विच्छिन्नवेद्यवाची । ग्राहको मायीयः कल्पितः प्रमाता अशुद्धप्रकाशस्वभाव इति ॥ ८ ॥ आदितः श्लो० ॥ ३१ ॥ श्रीमदाचार्याभिनवगुप्तविरचितायामीश्वरप्रत्यभिज्ञासूत्रविमर्शिन्यां प्रथमे ज्ञानाधिकारे स्मृतिशक्तिनिरूपणं नाम चतुर्थमाह्निकम् ॥४॥ अथ प्रथमे ज्ञानाधिकारे ज्ञानशक्तिनिरूपणाख्यं पञ्चममाह्निकम् महागुहान्तर्निमग्नभावजातप्रकाशकः । ज्ञानशक्तिप्रदीपेन यः सदा तं स्तुमः शिवम् ॥ एवं तावत् स्मृतिशक्तेः स्वरूपं प्रतिपादितम्, अधुना तदुपजीवनीयज्ञानशक्तिपरामर्श- निर्णयं वितत्य, 'वर्तमानावभासानाम्' इत्यादिकया, 'सक्रमं प्रतिभासते' इत्यन्तया श्लोकैकविंशत्या नहीं है परमेश्वर प्रकाशित होता है वही भगवान् का ज्ञानकर्तृत्व, स्मरणकर्तृत्व है ज्ञान-शक्ति एवं स्मृति-शक्तिवाला ही कहा जाता है इसका यही भावार्थ है । अब अक्षरार्थ बताते हैं—मुझसे देखा जाता है, ऐसा जो प्रकाशरूप प्रमाता परामर्श करता है जिससे कि अनुभव करता है, ऐसा कहा जाता है इस परामर्श से यह लक्षणा द्वारा लक्षित होता है, ग्राह्य और ग्राहक ये दोनों रूपों से घटादि और देहादि स्वभाववाले दोनों पदार्थ वेद्य होकर विशुद्ध प्रकाशरूप प्रमाता में प्रकाशित होते हैं । इस प्रकार से देखा गया है ऐसा ही वह प्रकाशरूप प्रमाता परामर्श करता है, जिससे कि वह स्मरण करता है—ऐसा कहा जाता है, इसीसे यह ग्राह्यरूप से बोधित होता है । अनुभवरूप उपजीवन के विषय में पहले कह चुके हैं उसी को प्रसंग से दृढ़ करने के लिए ज्ञान-शक्ति का भी प्रकाश किया है। लक्षण में 'शतृ' प्रत्यय का आदेश करना चाहिए । 'अपि' शब्द 'चकार' के अर्थ में पढ़ा गया है । अर्थ शब्द विच्छिन्न वेद्य- विषयवाची है । ग्राहक शब्द का यह अर्थ है कि मायीय कल्पित अशुद्ध प्रमाता है ॥ ८ ॥ ॥ चतुर्थ आह्निक समाप्त ॥ जो महा गुहा के अन्तर में निमग्न पदार्थसमूह को ज्ञान-शक्तिरूप प्रदीप से प्रकाशित करने वाले हैं, उस शिव की हम स्तुति करते हैं । इस प्रकार स्मृति-शक्ति के स्वरूप का प्रतिपादन कर दिया, सम्प्रति उस स्मृति-शक्ति का उपजीवनीय आधार ज्ञान-शक्ति है उसके परामर्श का निर्णय विस्तारपूर्वक कर 'वर्तमानावभासानाम्'