भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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अ.-१, आ.-४, का.-७ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ७७ ननु दृष्टमपि निर्विकल्पेन यावत् न परामृष्टं विमर्शविशेषविश्रान्त्या तावत् न स्मर्यंते मार्गदृष्टमिव तृणपर्णादि विशेषरूपेण, तदिदमेव विचारणीयं,—समनन्तरभाविविकल्पकाले तद्दर्शनम् इदन्तया अवभात्पूर्वं वा न वा इति तदेतत् आशङ्क्याह— या च पश्याम्यहमिमं घटोऽयमिति वाऽवसा । मन्यते समवेतं साप्यवसातरि दर्शनम् ॥ ७ ॥ इह दर्शनं यादृशं निजेन वपुषा तादृशेनैव तेन भातव्यं सर्वदा, तच्च स्वकालेऽनन्यप्रकाशम् अहम् इत्येतावता रूपेण उचितप्रकाशम्, तद्विकल्पांशविचारः तावत् न कुत्रचित् अङ्गम्, भवतु वा, किं तु व्यवसायोऽपि एवंभूतः इति अपि-शब्देन सूचयति । तत्र समनन्तरभाविना विकल्पेन वस्तु परामृश्यमानम् अनुभवपरामर्शमुखेन वा परामृश्यते अहमिमं पश्यामि इति वर्तमानतया, इमम् इत्यनेन च प्रत्यक्षव्यापारत्वं प्रत्यक्षायमाणत्वेन दर्शितम् । एवमेव वा परामृश्यते—घटोऽयम् इति । अब शंका करते हैं कि निर्विकल्परूप से देखा हुआ भी जबतक परामृष्ट किये हुए में विमर्श विशेष की विश्रान्ति से अत्यन्त गौरपूर्वक 'दृष्ट' वस्तु को भी नहीं देखते तबतक वस्तु का स्मरण नहीं होता है । जैसे मार्ग में पड़ी हुई तृण-पर्णादि वस्तु विशेषरूप से देखता है तभी उसका स्मरण होता है, अन्यथा नहीं होता है, इसलिए यही विचार करना चाहिए कि ठीक उसके बाद होने वाला विकल्पकाल में निर्विकल्पक निःसन्देह अवभासपूर्व इदन्ता से उस वस्तु का देखना माना जाता है । वह है या नहीं है, इस आशंका को उठाकर कहते हैं— मैं इसको देखता हूँ अथवा यह घट है ऐसा जो अध्यवसाय परामर्श है, उसका भी ग्राहकांश में समवाय सम्बन्ध से विद्यमान ज्ञान माना जाता है ॥ ७ ॥ जैसा ज्ञान अपने शरीर रूपी स्वरूप से है वैसा ही सर्वदा उसे भासित होना पड़ता है और वह ज्ञान अपने निर्विकल्पकाल में अनन्य प्रकाश 'अहम्' इस रूप में ठीक भासित होता है, वह विकल्पांश का विचार पहले कहीं पर किसी का अंग नहीं बनता, सविकल्प में या निर्विकल्प में भले ही हो, किन्तु व्यवसाय (द्वितीय ज्ञान) भी सविकल्प के जैसा ही होता है, यह 'अपि' शब्द से सूचित होता है । [ इदन्ता-उदन्ता को भी आविष्कार नहीं करता है ] बाद में होनेवाले विकल्प से वस्तु का परामर्श करना अथवा अनुभव परामर्श को प्रधान करके मैं इसको देखता हूँ ऐसा जो वर्तमानरूप से होते हुए परामर्श को परामर्श करना है, 'अस्मत्' शब्द के प्रयोग बिना भी 'अहम्' का ही परामर्श किया जाता है कि यह घट है । यहाँ पर 'अयम्' शब्द से प्रत्यक्ष का अर्थ है वह कर्ता में रहता है, इसे भर्तृंह र ने कहा है— गतिबोधाशनत्यागशब्देच्छाप्राप्तिवाचिनाम् । द्वेषार्थकर्मकाणां च भावः कर्त्रनुभूयते ॥ गति = ज्ञान एवं गमन, बोध-ज्ञान, त्याग-छोड़ना, शब्द-बोलना, इच्छा-आकांक्षा करना अर्थात् प्राप्त करना इत्यादि धातुओंके अर्थ और द्वेषार्थक अर्थवाले धातु अकर्मक होती हैं जिनका भाव कर्ता से अनुभूत हो जाता है ।