भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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७६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-४, का.-६ उच्यते, अन्यथा दृक् इत्येव स्यात् । ततश्च दृक् मया दृगन्तरेण अनुभूता इति आपतेत् । तत्रापि तथात्वेऽनवस्था । ननु स्मृतेः मौलिकं किंरूपम् ? उच्यते—मया दृष्टम् इति । ननु अत्र दयितावदन- नलिनादिविश्रान्तं दर्शनम् उक्तम् न तु आत्मारूढं—कर्मणि निष्ठोत्पत्तेः । स एष स्ववाचमेव न चेतयति । कर्तुः क्रियया हि आप्यं कर्म इति दृशिक्रियायाः कर्तृनिष्ठतैव । तथा च कर्तृस्थामेव दृशिक्रियामाहुः —‘दर्शयते भृत्यान् राजा इत्यादौ । जैमिनीयेरपि ज्ञानरूपा दृशिः भावनात्मिका प्रमातृविश्रान्तैव उक्ता, केवलं प्रकटता विषयधर्मो, दृष्टता नाम अन्या, संवित् वा स्वतन्त्रा इति अन्यत् एतत् । प्रमातृविश्रान्तत्वमेव कथयितुं मया इत्युक्तम् । तेन अन्वभूवमहम्, मयाऽनु- भूतम् इति शब्दवैचित्र्यमात्रमिदम्, न तु अर्थभेदः । अन्ये तु भिन्नक्रमत्वेन योजयन्ति—दृक् आसीत् सा मे इत्येवं, मया दृष्टम्—इति च यत् स्मरणं, ‘तत् व्याकरणमस्याः’ इति अनन्त- रोक्तान्वभूवम् इति उचितपरामर्शायाः स्मृतेः इति, अपिः चार्थे ॥ ६ ॥ ही होता है । इसलिए ‘ज्ञान को मैंने दूसरे ज्ञान से अनुभव किया’ यही कहना पड़ेगा । उसमें भी दूसरा ज्ञान कहोगे तो अनवस्था हो जायेगी । अब शंका करते हैं कि स्मृति का अविसंवादि स्थान से आया हुआ मूल पारमार्थिकरूप क्या है ? इस प्रश्न के उत्तर में कहते हैं—मैंने देखा है यही स्मृति का रूप है । प्रश्न उठता है कि स्त्री के मुखारविन्द में विश्रान्तिरूप दर्शन कहा गया है । किन्तु अपने ऊपर आरूढ नहीं बताया है बाहरी कर्म में निष्ठा की उत्पत्ति देखी जाती है । वह कर्ता अपनी वाणी को ही नहीं याद करता है; क्योंकि क्रिया के द्वारा कर्ता की अभीष्ट वस्तु की सिद्धि होना कर्म है अर्थात् क्रिया से कर्ता का जो अभीष्ट हो वही कर्म है, इस प्रकार दृशि क्रिया कर्तृनिष्ठ है । अन्य लोग भी कर्ता से ही दृशि क्रिया को मानते हैं—जैसे राजा परिकरों को दिखाता है । मीमांसक लोग भी ज्ञानरूप ‘दृशि’ धातु को भावनारूप में प्रमातृगत विश्रान्ति रहना मानते हैं, केवल प्रकट हो जाना ही विषय-धर्म है, दीखनापन दूसरा ही है, संवित् अथवा स्वतन्त्रता यह सब अवान्तर भेद हैं । प्रमातृगत विश्रान्तिता को ही कहने के लिए मैंने ऐसा कहा है । इसलिए ‘मैंने अनुभव किया’, ‘मेरे द्वारा अनुभव किया गया’ इन दोनों वाक्यों में शब्दों की विचित्रता अवश्य है किन्तु दोनों का अर्थ एक ही है । इसको दूसरे लोग भिन्न क्रम से कहते हैं—‘ज्ञान मुझे था’ और ‘मेरे द्वारा देखा गया’ ऐसा स्मरण होना ही इसका व्याकरण कहलाता है, बाद में जो कहा गया है, मैंने अनुभव किया यही उचित परामर्श वाली स्मृति का व्याकरण है, ‘अपि’ शब्द चकार अर्थ में है ॥ ६ ॥ १. धातु दो प्रकार की होती है—कर्मस्थभाव और कर्तृस्थभाव । जिनकाभाव कर्म से अनुभूत होते हैं, वे तो कर्मगामी हैं ओर जिनका कर्ता से अनुभूत हैं वे कर्तृगामी हो जाती हैं । प्रत्येक का विभाग दिखाते हैं— कर्मस्थः पचतेर्भावः कर्मस्था च भिदेः क्रिया । आसासिभावः कर्तृस्थः कर्तृस्था च दृशेः क्रिया ॥ ‘पच्’ धातु का भाव कर्म में रहता है और ‘भिद्’ धातु की क्रिया भी कर्म में रहती है । ‘आस्’ और ‘अस्’ धातु के भाव कर्ता में रहता है और देखने अर्थ में ‘दृश्’ धातु की क्रिया भी कर्ता में रहती है । जैसे ‘तण्डुलान् पचति’ इस वाक्य में होनेवाले ‘विक्लेत्ति’ नामक क्रियात्मक जो धातु का अर्थ है वह ‘तण्डुलान् इस कर्म में है । उसी प्रकार ‘भवता आस्यते’ जो उपदेशात्मक धातु का