भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

पृष्ठ 98, कुल 343 में से

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पृष्ठ 98

अ.-१, आ.-४, का.-६ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ७५ यदि अहँ-भावविश्रान्तिवशात् अनुभवः स्मृतौ पृथक् न भाति इति उच्यते, तदा परामर्शान्तरं साक्षादेव इदन्तया अनुभवं परामृशत्, यदि वा इदं-भावोचितघटादिविश्रान्तताम् अनुभवस्य प्रथयत् उपलब्धम्, इति तदनुसारेणापि किं न व्यवह्रियते इति पराभिप्रायं प्रतिक्षिपति- स्मर्यते यद्दृगासीन्मे सैवमित्यपि भेदतः । तद्व्याकरणमेवास्या मया दृष्टमिति स्मृतेः ॥ ६ ॥ लोकस्य तावत् एवं न संवेदनं, स हि न पृथग्भूतां दृशं कांचिद् मन्यते—‘सा दृक् मे आसीत्’ इत्येवम्, अपि तु यत् स्मर्यते एवंभूतमपि यत् स्मरणं कस्यचित् विवेचकंमन्यस्य, तत् स्मृतेर्व्याकरणम्, पदस्येव प्रकृतिप्रत्ययार्थनिरूपणं काल्पनिकं विभज्य आकरणं परत्र प्रतिपादन- मात्रम् । सोऽपि यदि मूलप्रतेर्ति विमृशति पूर्वोक्तक्रमेण, तदा अनुभवं पृथग्भूतं न वेद, यत एव तत् राहोः शिरः इतिवत् कल्पितं भेदं मन्यते, अन्यथा स घटः इतिवत् ‘सा दृक्’ इत्यत्रापि प्राक्तनं दृगन्तरम् अपेक्षणीयं स्यात् । तत् इत्थनेन हि घटस्य वा दृशो वा पूर्वानुभवविषयापत्तिः यदि अहं [ आत्मा के आरोहण से भासित होने से ] भाव की विश्रान्ति के कारण अनुभव स्मृति में अलग नहीं भासता है—ऐसा कहते हो, तो दूसरा परामर्श साक्षात् ही इदन्तरूप से अनुभव को परामर्श करेगा । अथवा इदंभाव से मिला हुआ घटादि के अनुभव की उपलब्धि को बढ़ाता हुआ उसके अनुसार भी क्यों न व्यवहार हो यह दूसरे के अभिप्राय का हस्तक्षेप करना है— जो मेरा ज्ञान था वह भी ऐसा ही भेदसे स्मरण होता है । इसी स्मृति का जो विस्तार है उसी को मैंने देखा ॥ ६ ॥ घट के विषय में मेरा अनुभव था इस कथन में भी घट ही वेद्य होता जैसा कि इस विषय में कहते हैं—‘घटज्ञानमिति ज्ञानं घटज्ञानविलक्षणम् । घट इत्यपि यज्ज्ञानं विषयोपनिपातितत् ॥’ घट ज्ञान का ज्ञान घट ज्ञान से विलक्षण है । घट यह ज्ञान भी विषय को ग्रहण करता है । संसार का ऐसा ज्ञान नहीं होता है, वैसी दृष्टि थी, वह मेरा अनुभव था ऐसा स्मरण होता है, दृष्टि को अलग नहीं मानता है वह विषय से भिन्न किसी दृष्टि की नहीं मानता, ‘सा दृक् मे आसीत्’ वह ज्ञान मेरा था ऐसा नहीं बोलता है, अपि तु जो किया है जो कोई ऐसा भी स्मरण मानेगा जिसमें किसी दूसरे का विचार करना पड़ेगा, उसे स्मृति का विस्तार कहते हैं, पद के जैसा प्रकृति-प्रत्यय के अर्थ का निरूपण काल्पनिक विभाग करके दूसरे को समझना मात्र है । वह भी यदि मूलप्रकृति का विचार करेगा तो ‘अहम्’ आत्मा के आरोहण का ही विचार करेगा । पूर्वोक्त क्रम से मैंने अनुभव किया, तब तो, अनुभव को अलग नहीं जानेगा, क्योंकि ‘राहोः शिरः राहु का शिर है’ इस प्रकार ‘काल्पनिक’ कल्पित भेद मानना पड़ेगा, यदि नहीं मानते हो तो फिर जैसा यह घट है ‘सा दृक्’ वह ज्ञान है इसमें भी पहले का दूसरा ज्ञान मानना पड़ेगा । उसको घट कहो अथवा वह ज्ञान कहो इस प्रकार पूर्व का अनुभव ही विषय हो जायेगा, अन्यथा ज्ञान इतना १. घट के विषय में मेरा अनुभव था इस कथन में भी घट ही वेद्य होता है । अतः इस विषय में कहते हैं— ‘घटज्ञानमिति ज्ञानं घटज्ञानविलक्षणम् । घट इत्यपि यज्ज्ञानं विषयोपनिपाति तत् ॥’ घट ज्ञान का ज्ञान घटज्ञान से बिलक्षण है । घट यह ज्ञान भी विषय को ही ग्रहण करता है ।