ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-४, का.-५ सांख्यानामपि पुरुषच्छायायैव उपलब्धिः, पुरुषश्च असंवैद्यपर्वा इति कथं वेद्यः स्यात् । वैशेषिकाणा- मपि आत्मनि अभेदेन समवायि संवेदनं परगतं मनसा कथं गृह्येत अन्तःशरीरवृत्तिना, तच्छरीरान्तरऽनुप्रवेशे तु तस्यैव अहम् इति शरीरीकरणात् अहन्तावभासितत्वात् आत्मनो भेदो विगलेत्, नित्यानुमेयत्वं तु न आत्मन उपपद्यते, ज्ञानस्य च ज्ञानान्तरवेद्यत्वेऽनवस्थादि उक्तम् । तस्मात् योगिनः परचित्तवेदनावसरे इयान् प्रकाशः —एतद्देहप्रकाशसहचारी घटसुखादि- प्रकाशः —इति । तत्र घटसुखादिः इदन्तया भाति, तद्गतस्तु प्रकाशोऽहम्—इत्येव स्वप्रकाशतया प्रकाशते । प्रमात्रीकृतपरदेहप्राणादिसमवभाससंस्कारात् तु तन्निष्ठाद् इदन्तां प्रकाशभागोऽपि मन्यमान इदं परज्ञानम् इति अभिमन्यते अविगलितस्वपरविभागो योगी । प्राप्तप्रकर्षस्तु सर्वम् आत्मत्वेन पश्यन् स्वसृष्टमेव स्वपरविभागं पश्यति इति ज्ञानस्य न योगिज्ञानेन प्रकाश्यता, भवतु वा तथापि प्रकृते न एतत् समम् । तथाहि—अयमनुभवति इति परनिष्ठ एव असौ अनुभवे योगिनः प्रकाशो, न तु अहमनुभवामि इति आत्मारोहेण, इह तु अन्वभूवम् इति अहम्प्रशिश्रान्तिः अनालीढेदंभावैव अनुभवस्य इति युक्तमुक्तम्—यस्मात् अनुभवः पृथक् न भाति तस्मात् ऐक्यं भिन्नकालानां संविदां वेदिता इति ॥ ५ ॥ उपलब्धि ] माना जाता है, और स्वयं पुरुष भी असंवैद्यवर्ग की श्रेणी में है वह वेद्य कैसे हो सकता है ? वैशेषिक काणादों का भी आत्मा में अभेद समवाय-सम्बन्ध, समवायी संवेदन, अन्तः- शरीरवृत्ति मन के द्वारा दूसरे के विषय को कैसे ग्रहण करेगा, उसके शरीर के भीतर प्रवेश कर लेने पर तो उसका ही 'अहम्' ऐसा जीवात्मा का रूप धारण कर लेने से और उसकी अहन्ता से अवभासित हो जाने से अपना भेद गल जायेगा, आत्मा का नित्य अनुमेयत्व नहीं हो सकेगा और एकता से दूसरा ज्ञान प्रकाशित होता है तो, अनवस्थादि दोष से ग्रस्त हो जायेगा, यह हम कह चुके हैं। इसलिए योगी को दूसरों के चित्त का ज्ञान करते समय ये जो कहे जाने वाले प्रकाश दूसरों के देह के साथ रहनेवाला घटसुखादि प्रकाश है उसकी चिन्ता को देख सकते हैं किन्तु घट सुखादि को नहीं जान सकते हो । घटसुखादि इदन्तरूप से अलग ही भासता है, घटसुखादि तो 'अहम्' इसी प्रकाश में प्रकाशित रहता है । अर्थात् अपने स्वयं के प्रकाश से प्रकाशित होता है । बनाये गये प्रमाता के दूसरे देह, प्राणादि अवभास के संस्कार से उसमें हुई इदन्ता को प्रकाशभाग में भी मानता हुआ यही उत्कृष्ट ज्ञान है—ऐसा समझ लेता है; जिसमें कि योगो दूसरे के साथ अपना भेदभाव नहीं रखता । दृढरूप से अपना और दूसरे का संस्कार भी विनष्ट हो जाने से, योगी आत्मभाव से देखता हुआ स्व-पर-विभाग को भी अपने आप से सर्जन किया हुआ ही देखता है । ज्ञान की प्रकाशता योगी के ज्ञान से नहीं होती है, क्योंकि वैसा उसका विषय न होता है, चित्त- मात्र को ही योगी विषय करता है, भले ही प्रकृत में उसकी आवश्यकता नहीं है। यही बात है देखो, यह अनुभव करता है ऐसा दूसरों के लिए ही अनुभव में योगी का प्रकाश है । मैं अनुभव करता हूँ ऐसा अपने को लगाकर प्रकाश नहीं होता, यहाँ पर मैंने अनुभव किया, ऐसा आत्मा 'अहम्' का उल्लेख है इदं-भाव का अनुभव नहीं चढ़ा हुआ है; इसीलिए हमने ठीक ही कहा है— जिससे अनुभव अलग नहीं भासता है इसीलिए भिन्न कालों के संवित् ज्ञानों को भी एकरूप से जानने वाला वेदिता इत्यादि ॥ ५ ॥