ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-४, का.-५ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ७३ तत्र ज्ञानवृत्तिपरिणतमेव सत्त्वं चित्तशब्देनोक्तम्, अन्यथा प्रत्ययस्य संयमविषयीकार्यत्वं किमुच्यते, आलम्बनयोगश्च कथं शङ्क्येत, — 'न च सालम्बनमिति —' तस्मात् परकीयमनुभवमिव निजमपि विषयीक्रियताम् इत्याशङ्क्य दृष्टान्त एवासिद्धः इति, 'भान्ति' इत्यन्तेन अभ्युपगमेन वा सिद्धत्वेऽपि प्रकृतेऽर्थे विषमः इति शेषेण दर्शयति— योगिनामपि भासन्ते न दृशो दर्शनान्तरे । स्वसंविदेकमानास्ता भान्ति मेयपदेऽपि वा ॥ ५ ॥ 'योगिनां' यत् एतत् 'दर्शनान्तरं' भावनाद्युद्भवः परचित्तविषयो ज्ञानविशेषः, तत्र 'दृशः' इति उपलब्धयो न भान्ति । तथाहि — सौगतानां तावत् स्वप्रकाशैकरूपं ज्ञानं, तत् चेत् ज्ञानान्तरेण वेद्यं, तर्हि यत् अस्य निजं वपुः अनन्यवेद्यतया प्रकाशनं नाम, न तत्प्रकाशितं स्यात् । परपुरुष की वृत्ति में ध्यानसंयम करने से उसके साक्षात्कार हो जाने पर उसके चित्त का बोध होता है कि उसका चित्त अभी रागयुक्त है अथवा वैराग्यवाला है अर्थात् दूसरे चित्त प्रविष्ट धर्मों को जानता है । 'न च तत्सालम्बनं तस्याविषयीभूतत्वात्' रागयुक्त वृत्ति को तो जान लेता है किन्तु इस आश्रय में रक्त है ऐसा ज्ञान का बोध योगी नहीं कर सकता, क्योंकि दूसरे पुरुष के चित्त का आलम्बन अविषय होता है । इसका चित्त नीलरंग विषयक है या पोतरंग विषयक है यह नहीं जानता है। जो ग्रहण नहीं किया है उसमें संयम करना असम्भव होने के कारण, दूसरे के चित्त का जो विषय है उसका ज्ञान नहीं होता उसी कारण दूसरे के चित्त को आलम्बन सहित नहीं ग्रहण किया जाता है, क्योंकि उसका आलम्बन अगृहीत होता है । परन्तु चित्त के धर्म ग्रहण किये जाते हैं। इसके चित्त से क्या वस्तु आलम्बित है जब ऐसा ध्यान किया जाता है तब ऐसा ध्यान संयम उसका करने से उस विषय का ज्ञान भी पैदा होता है। उसमें ज्ञानवृत्ति का परिणाम प्राप्त होनेवाले सत्त्व [ अन्तःकरण ] को चित्त शब्द से कहा गया है, अन्यथा ज्ञान का संयम करना क्या माने रखेगा, और तब फिर आलम्बन योग के विषय में शंका कैसे खड़ी होती है, 'न च सालम्बनमिति' — दूसरे के अनुभव जैसा अपना अनुभव भी [ सविषय ] सालम्बन करो ऐसी शंका करके योगी अर्थात् प्रत्ययरूप दृष्टान्त दिया है, वह असिद्ध हो जायेगा, इस बात को 'भान्ति' प्रकाशित होते हैं, यहाँ तक मान करके या प्रकृत अर्थ के सिद्ध हो जाने पर बचे हुए [ मेय ] पद से दिखाते हैं— दूसरे के विषय में योगी लोगों का ज्ञान भी नहीं भासता है। अथवा वे स्वसंवित् एकता को प्राप्त हुए विषयपद में भी प्रकाशित होते हैं ॥ ५ ॥ 'योगिनाम्' जो यह 'दर्शनान्तरम्' दूसरे के विषय में योगिजन को भूतार्थ-भावना पर्यन्त अन्य के चित्त का ज्ञान विशेष होता है, वहाँ पर 'दृशः' ज्ञान वेद्यरूप से नहीं भासित होते हैं। जैसा कि 'सौगत' बौद्धों का स्वप्रकाशरूप एकमात्र ज्ञान ही है, वह यदि दूसरे ज्ञान से वेद्य है, तो इसका अनन्य वेद्यतया प्रकाशित होना कैसे माना जायेगा, स्वयं प्रकाशित होने वाला ज्ञान दूसरे ज्ञान से प्रकाशित नहीं हो सकता। सांख्यों के मत में भी पुरुष का प्रतिबिम्ब ही ज्ञान [ बुद्धि, १०