ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-४, का.-४ 'अहम्'—इत्येवं स्वभावो य 'आत्मा' पूर्वापरसंविदन्तर्मुखस्वभावः तत्र यत् 'आरोहणं' विश्रमः तेन हेतुना पूर्वसंविद्रूपतयाः स्वप्रकाशाया 'भासनात्' तल्लीनेस्यापि घटस्य स्वप्रकाशदेशीयत्वेन अवभासनम् । 'आत्मनि च आरोहणं' विश्रमणा अनुभवस्य अर्थस्य च । प्रकृतिप्रत्ययौ प्रत्ययार्थं सह ब्रूतः—इति न्यायात् संख्याक्षिप्ते तद्गते वा कर्तृभूतेऽस्मदर्थे प्रत्ययार्थेऽनुभवो बुङ्गितः तद्द्वारेण अर्थोऽपि च, न तु स्वातन्त्र्येणैव असौ, तदर्थमेव कर्म न निर्दिष्टम् । घटादिः पुनः अनुभवकाले न अस्मदर्थमारोहति, 'हि' यस्मात् नैव भाति पूर्वोऽनुभवः पृथक् अपरार्थोक्त्वात् हेतोः, तस्मात् संविदामैक्यम् इति पूर्वेण संबन्धः । लुङा भूतकालस्य द्योतितत्वात्, 'प्राक्' इति भिन्नक्रमः, उत्तमपुरुषेण अस्मदर्थस्य 'अहम्' इत्यपि, आरोहणम् इति रहिरपि णिजन्तोऽपि ॥ ४ ॥ ननु क एवमाह—अनुभवः पृथक् न भाति ?—इति, घटवत् न भाति—इति चेत् किं ततः ? घटोऽपि हि न अनुभवभङ्ग्या भाति—इति, किं न भाति ? स्वभावेन भाति—इति तु उभयत्रापि समानम् । तथाहि—अतीतानागतसूक्ष्मादि यथा योगिज्ञाने विषयोभवति इति अभ्युपगतम्, तथा परचित्तमपि 'प्रत्ययस्य परचित्तज्ञानम् ।' (योगद० ३ पा० १९ सू०) इत्यादौ । ही कहते हैं कि मैंने अनुभव किया था । तब ऐसा है, 'अहम्' ऐसा स्वभाववाला जो 'आत्मा' पूर्व-अपर [ अर्थका अनुभव और स्मृति ] ज्ञान को अपने भीतर रखनेवाले स्वभाव से युक्त होकर वहाँ जो 'आरोहण' विश्रम स्थिर हो जाना उस हेतु से पूर्व पदार्थ का ज्ञान संविद्रूप में स्वयं प्रकाशित है, उसीमें लीन हुए घट का भी स्वप्रकाश के तुल्य अवभासन है । 'आत्मनि च आरोहणम्, अर्थ का और अनुभव का आत्मा में आरोहण हो जाना ही विश्रमण कहलाता है । प्रकृति 'श्रम' धातु और 'युच्' प्रत्यय येही दोनों साथ रहकर अर्थ करते हैं [ इसमें 'ण्यासश्रन्थो युच्' ( पाणिनीय व्याकरण ३ अ-३ पाद० १९ सूत्र से युच् प्रत्यय हुआ है ] इन न्याय से विश्रमणा में एक वचन संख्या आक्षेप करने से उस संख्यावाले आत्मा में जो 'अस्मत्' शब्द का अर्थ कर्तृभूत है वह प्रत्ययार्थ है उसीमें अनुभव डूब जाता है और उसके द्वारा अर्थ भी डूब गया, अब वह स्वातन्त्र्यरूप से नहीं है, इसलिए कर्म का निर्देश नहीं किया है । पुनः घटादि अनुभव- काल में 'अस्मद्' अर्थ के ऊपर नहीं आरोहित होता है, 'हि' जिससे श्लोक में ऊपर कहे हुए हेतु से, जो कि हमने कहा है कि अनुभव पृथक् नहीं भासता इसलिए संवित् ज्ञानों को एकता है यह पूर्व के श्लोक से सम्बन्ध रखता है । 'अन्वभूवम्' इस क्रिया में 'लुङ्' लकार से भूतकाल झलकता है, 'प्राक्' इसका भिन्नक्रम अर्थ है, 'अस्मत्' शब्द का अर्थ 'अहम्' है उसके साथ 'प्राक्' का अन्वय है, आरोहण में 'रुहि' धातु का अर्थ 'णिजन्त' चढ़ा देना भी है ॥ ४ ॥ अब प्रश्न करते हैं कि ऐसा कौन कहता है अनुभव अलग से नहीं भासता है ? अनुभव घट की तरह अलग नहीं भासता है ऐसा यदि कहो, तो उससे क्या होना है [ स्मृति में नहीं भासता है ] घट भी तो अनुभवभंगी रीति से नहीं भासता है, क्यों नहीं भासता है ? अपने स्वभाव से भासता है; ऐसा यदि कहते हो, तो अनुभव और अर्थ में अन्तर ही नहीं रहा, तब तो फिर दोनों में समानता ही रह जायेगी । जैसे कि भूत और भविष्यगत सूक्ष्म परमाणु आदि योगी को प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर हो जाते हैं—यह बात स्वीकार की जाती है, उसी प्रकार दूसरों के चित्त का भी साक्षात्कार हो जाता है— 'प्रत्ययस्य परचित्तज्ञानम्'ति । ( पा० योगदर्शन ३ पा० १९ सूत्र )