भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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पृष्ठ 94

अ.-१, आ.-४, का.-४ ] विमर्शिनीटीकोपेत [ ७१ ‘एष स’ इति आच्छादितस्येव प्रमातृतत्त्वस्य स्फुटावभासनं कृतम् इदम् इति विस्मयगर्भया भक्त्या प्रत्यभिज्ञानमेव सूचितम्। यदाह ग्रन्थकार एव- इत्थं स्वसंवित्तिमपह्नुवानैर्यनैर्दुरद्भिः कलुषीकृतं यत्। प्रमातृतत्त्वं स्फुटयुक्तिभिस्तान्मूकान्विधाय प्रकटीकृतं तत् ॥ इति ॥ ३ ॥ ननु च प्राच्य एव अनुभवो यदि स्मर्यमाणस्य बहिरवभासनरूपः प्रकाशः र्तार्ह इयत् उच्यताम्-सोऽनुभव इदानीं स्मरणेन विषयीक्रियते-इति, ऐक्येन तु अलौकिकेन कोऽर्थः इति व्यामोहं विहन्तुमाह- नैव ह्यनुभवो भाति स्मृतौ पूर्वोऽर्थवत्पृथक् । प्रागन्वभूवमहमित्यात्मारोहणभासनात् ॥ ४ ॥ वैधर्म्यसाधर्म्याभ्यां दृष्टान्तः ‘प्राक्’ इति अनुभवकाले यथा स ‘पूर्वो’ घटादिः अर्थः ‘पृथक्’ इति इदन्तया भाति स्म नैवं स्मरणकाले स्मृतिज्ञानात् पृथक्त्वेन इदं पूर्वमनुभवनम् इति ‘भाति’ । यथा च स्मृतिकाले तस्मात् स्मृतिज्ञानात् सोऽर्थः ‘प्राक्’ इति ‘पूर्वस्वभावो न भेदेन आभाति, स्मृतिकाले बहिरवभासाभावात् । एवं तत एव हेतोः ‘पूर्वोऽपि अनुभवो’ न भेदेन आभाति, कथं र्तार्ह उभयं भाति !-अन्वभूवम् इत्येवम् । एतत् किमुच्यते ?-इति चेत्, ढका हुआ सा था उस प्रमातृतत्त्व का स्फुट अवभासन कर दिया इस विस्मयगर्भ युक्ति से पहचान करा दिया कि यही वह है। ग्रन्थकार ने स्वयं इस विषय में कहा है- इस प्रकार छिपानेवाले बकवासियों के द्वारा जिस स्वसंवित् ज्ञान को कलुषित कर दिया है। उन्हें प्रस्फुट युक्तियों से मूक बनाकर प्रमातृतत्त्व को प्रकट कर दिया। अब शंका करते हैं कि पूर्व का ही अनुभव यदि स्मर्यमाण विषय का बाहर में अवभासित होनेवाला प्रकाश है तो इतना ओर कहिये कि वही अनुभव इस समय स्मरण का विषय किया जाता है यह जो अलौकिक ऐक्यभाव है उससे कौन सा प्रयोजन सिद्ध होगा; ऐसा जो बौद्धों का मोह (अज्ञान) है उसे दूर करने का उपाय बताते हैं। पूर्व का अनुभव स्मृति में अर्थ की भाँति अलग से नहीं भासित होता, मैंने पहले अनुभव किया था, उसी का कर्ता को आगे चलकर भान होता है ॥४॥ उस समय जैसे वस्तु-पदार्थ भासता था वैसे इस वर्तमान समय में नहीं भासता है, यह साधर्म्य है, जिसे अन्वयव्याप्तिक कहा जाता है, इस वर्तमान समय में जैसे एकरूप में अभेदरूप से भासता है वैसे उस काल में नहीं भासता था यह वैधर्म्य दृष्टान्त है। वैधर्म्य और साधर्म्य को दृष्टान्त देकर बताते हैं 'प्राक्' पूर्वकाल में जैसे वह 'पूर्वो' घटादि अर्थ 'पृथक्' भिन्न इदन्तया भासता था, वही इस समय स्मरणकाल में स्मृतिकाल से पृथक्त्वेन यह पूर्व का अनुभव नहीं 'भाति' भासता है। और अब साधर्म्य दृष्टान्त को बताते हैं। स्मृतिकाल में स्मृतिज्ञान से वह अर्थ 'प्राक्' पूर्व स्वभाववाला भेद से नहीं भासता है, क्योंकि स्मरणकाल में बाहरी अवभास का अभाव है। ऐसी अवस्था रहने पर उसी हेतु से [बाहरी अवभास का अभावरूप कारण होने से ] 'पूर्वोऽपि अनुभवः' पूर्व का भी अनुभव भेद से नहीं भासता है, तब उस समय अर्थ और अनुभव ये दोनों कैसे भासते हैं? इसके समाधान में इतना